Thursday, July 19, 2018

तकनीेक के लफ़ड़े

यह 2016 का फ़ोटो है। गोवा में समुद्र तट पर चाय पीते हुये।

तकनीक की अज्ञानता भी मजेदार लफ़ड़े कराती है।
पिछले साल हम अपने मोबाइल में अपने परिवार के लोगों के फ़ोटो लगाये थे। दोनों बेटे, अम्मा और घरैतिन ! फ़ोटो हमने खुद खींचा था और खींचकर लगा था कि अच्छा खींचा। बिटिया स्वाती नहीं थी उस समय वर्ना और मुकम्मल बनती फ़ोटो ! दिन में जब भी मोबाइल देखते, फ़ोटो दिख जाता। याद हो जाती।
पिछले हफ़्ते मोबाइल का कोई बटन दब गया तो फ़ोटो दायें-बायें हो गयी। स्थिर पारिवारिक फ़ोटो की जगह हर बार अलग-अलग सीन आने लगे। खूबसूरत प्रकृति के फ़ोटो और भी तमाम इधर-उधर के फ़ोटो! लेकिन हम सोचते कि फ़ेमिली वाला फ़ोटो लगा रहे थे अच्छा !
दो दिन पहले सुबह सोचा मोबाइल के प्रोफ़ाइल पिच्चर में फ़ेमिली फ़ोटो लगा लें। टहलते हुये फ़ेसबुक का फ़ोटो फ़ेमिली वाला डाउनलोड हो गया। उसके बाद वही प्रोफ़ाइल पिक्चर में लग गया। कवर फ़ोटो और प्रोफ़ाइल फ़ोटो एक से। जब तक समझ में आया तब तक कुछ लोग लाइक कर चुके। कुछ दोस्त आत्मीय टिप्पणी भी कर चुके।
बहरहाल जब देखा तो फ़िर से वही गोवा में समुद्र तट वाली फ़ोटो लगाई प्रोफ़ाइल पिक्चर वाली। लगते ही शानदार प्रतिक्रियायें आनी शुरु हो गयी:
-गोवा में साइकिल
- साइकिल किसकी है, झोला किसका है?
-गोवा में चाय, बियर क्यों नहीं?
-हसीन लग रहे हैं?
-मडगार्ड कहां है साइकिल का
-ये साईकल व थैला अपना ही है सर जी
-अरे वाह !! छैल छबीले बांका अंदाज
-दरअसल अपडेट तो महज एक बहाना है
-सुकुल जी का ये पीपी तो बहुत पुराना है ।
-कित्ती बार ये फोटू डालोगे दद्दा, लेकिन टिकट आपको नी मिलने वाला
-गोआ और चाय हाय हाय हाय

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 4 लोग, Anany Shukla, Saumitra Mohan और Suman Shukla सहित, लोग खड़े हैं और बाहर
दोनों सुपुत्र, अम्मा और घरैतिन — Saumitra Mohan औरSuman Shukla के साथ.
मतलब जितने दोस्त उससे ज्यादा मजेदार टिप्पणियां। तकनीकी अज्ञानता के साइड इफ़ेक्ट हैं ये। जिस फ़ोटो को लगाना नहीं चाह रहे थे वह लग गई। फ़िर दुबारा पुरानी फ़ोटो लगाई तो रोचक टिप्पणियां मिलीं। सबके जबाब देने का मन होते हुये भी दे नहीं पाये। टिप्पणियों के जबाब देना मुझे पोस्ट लिखने से कम रोचक नहीं लगता लेकिन समय मुआ इत्ता हरजाई कि पास आते ही फ़ूट लेता है।
कवि यहां यह कहना चाहता है कि तकनीकी मोबाइल , फ़ेसबुक और अन्य जगहों पर कई काम तकनीकी अज्ञानता के चलते होते हैं। उनमें से कुछ हसीन भी हो जाते हैं। जैसे यह वाला हुआ।
ऐसे ही एक और लफ़ड़ा हुआ रखा है मेरे मोबाइल में। वीडियो सेव करते हैं मोबाइल में वो चलते नहीं। बताता है - अपनी सेटिंग में बदलाव करो। सेटिंग अभी तक न बदल पाये। जो भी (खुद का बनाया) वीडियो देखना होता है वो किसी को फ़ेसबुक पर पोस्ट करते तब देख पाते हैंं। तकनीकी जाहिलियत है न अपन की।
कल ऐसे ही एक संदेश मिला। फ़ेसबुक मेसेंजर पर। उसका लब्बोलुआब यह कि आजकल हैकर लोग फ़ेसबुक खाते को हैक करके अश्लील वीडियो संदेश भेज रहे हैं। यदि आपको मेरे नाम से कोई संदेश मिले तो वह इन्हीं हैकरों की वजह से है। मैंने कोई संदेश नहीं भेजा आपको।
कल को वर्चुअल तकनीक का चलन बढेगा। क्या पता कुछ ऐसा हो कि आपका आभासी व्यक्तित्व कोई अपराध टाइप कर डाले और आप उसकी सजा भुगतो। ऐसे में सक्षम लोग खुद कोई अपराध करके अपने वर्चुअल को जेल भेज देंगे। पचीस लोगों की हत्या, बलात्कार में अगर उनको सजा हुई तो वे अपने सैकड़ों आभासी भक्तों को जेल भेज देंगे सजा भुगतने के लिये।
तकनीक जितनी तेजी से प्रगति कर रही है , उस गति से उसको उपयोग करने की समझ नहीं बढ रही। अनजाने में तमाम लफ़ड़े होने की जबर संभावना है।
यह तो खैर हुई सोशल मीडिया की बात। कल को यही लोचे किसी खतरनाक तरीके से भी हो सकते हैं। किसी जमूरे या फ़िर तानाशाह शासक के हाथ में संहारक हथियारों के संचालन का बटन हो और मजाक-मजाक में वह उसे दबा दे। पानी मांगने के लिये दबाये जाने वाले बटन की जगह लाखों लोगों के संहार की क्षमता करने वाले परमाणु बम चलाने वाला बटन दब जाये। मजाक-मजाक में दुनिया निपट जायेगी फ़िर तो। बंदर के हाथ में उस्तरे से तो केवल बंदर या एकाध आदमी ही निपटते लेकिन ऐसे में तो दुनिया ही इधर-उधर हो जायेगी।
कहने का मतलब यही है बेवकूफ़ियां हसीन होती हैं लेकिन तभी तक जब कोई नुकसान न हो।
नुकसान पहुंचाने वाली बेवकूफ़ियां खतरनाक होती हैं। लेकिन अफ़सोस यही है कि बेवकूफ़ियां खतरनाक हैं कि हसीन यह होने के बाद ही पता चलता है। लेकिन खतरे के डर से हसीन बेवकूफ़ियों का गला न घोंटे। मस्त रहें। बेवकूफ़ियां करते रहें। निर्मल मन से। बेवकूफ़ीं का सौंदर्य अद्भुत ही होता है।

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