Saturday, December 31, 2022

फॉस्टर सिटी, लैगून और कुत्ता पार्क



25 दिसम्बर की दोपहर को अमेरिका आये। सैनफ्रांसिस्को उतरे। फॉस्टर सिटी में बेटे के घर आये। तब से एक दिन छोड़ बाकी आसपास ही टहलते रहे। फॉस्टर सिटी को हम पहले सैन फ्रांसिस्को का ही मोहल्ला समझते रहे। आज पता चला कि यह खुद में एक शहर है।
34-35 हजार के करीब की आबादी वाले इस शहर को 1960 के दशक में सैन फ्रांसिस्को की दलदली जमीन को पाटकर बसाया गया। इस काम में उस समय के रियल स्टेट व्यवसायी टी जैक फॉस्टर की अहम भूमिका थी। ज्यादातर जमीन उसके ही नाम थी। उसी के नाम पर शहर का नाम फॉस्टर सिटी पड़ा। सिलिकॉन घाटी का प्रमुख शहर है फॉस्टर सिटी।
फॉस्टर सिटी अमेरिका के सबसे सुरक्षित शहरों में से एक माना जाता है।
सैनफ्रांसिस्को के समुद्र तट से जुड़े लैगून शहर की ड्रेनेज व्यवस्था को सुचारू बनाने में सहायक हैं। लोग इनमें नाव भी चलाते हैं।
जिस दिन आये उस दिन तो चुपचाप पड़े आराम करते रहे। अमेरिका में आये बर्फीले तूफान का नजारा और खबर देखते रहे। लग रहा था कि पूरे अमेरिका में किसी बर्फीली फौज ने हमला कर दिया है। जिधर देखो उधर बर्फ ही बर्फ। टीवी की इन खबरों के उलट फॉस्टरसिटी में धूप खिली थी।
शाम यहां बड़ी जल्दी हो जाती है। एक दिन देखा तो साढ़े पांच बजे ही अंधेरा हो गया। आसपास टहलने निकले तो कोई बाहर नहीं दिखा। अलबत्ता कई घरों में क्रिसमस के सांता जी दिखे। कुछ घरों में बिजली की झालरें भी चमक रही थी।
सड़को पर गाड़ियां बड़ी तेज भागती दिखीं। लोगों को घर पहुंचने की जल्दी होगी। ऐसा लग रहा था कि गाड़ियों को पीछे से कोई दौड़ा रहा हो। गाड़ियां मानों अपनी जान बचाने के लिए भाग रही हों।
कालोनी के पास ही एक लैगून को पार करके दूसरी तरफ गए। लैगून को पार करने के लिए जगह-जगह ओवरब्रिज बने थे। लैगून के दूसरी तरफ कुछ लोग वोटिंग करते दिखे। हमारे देखते-देखते एक आदमी लैगून से अपनी नाव निकालकर उसे अपने बगल में लादकर कार के पास गया और नाव को कार पर लादकर चलता बना।
वहां पास में ही एक कुत्तों का पार्क दिखा। उसमें लोग अपने कुत्तों को खिला रहे थे। कुत्ते आपस में दूसरे कुत्तों के साथ खेल रहे थे। हेलो हाय कर रहे थे। कुत्तों के मालिक-मालकिन अपने कुत्तों को कसरत करा रहे थे। ट्रेनिंग दे रहे थे। ज्यादातर लोग गेंद दूर फेक रहे थे और कुत्ते उनको उठाकर ला रहे थे।
दो पार्क थे। अगल-बगल। उनमें करीब दस बारह कुत्ते दिखे। लगभग इतने ही उनके मालिक। प्रति कुत्ता एक मालिक हिसाब समझिए। कुत्तों के लिए पानी की व्यवस्था थी। लोग कुछ देर कुत्तों को खिलाकर टहला कर उनको अपने साथ लेकर कार में बैठकर जाते दिखे। कुछ लोग कुत्तों को साथ लाते हुए भी दिखे। कार से उतरकर पार्क की तरफ कुत्ते इतनी तेज लपककर जा रहे थे कि उनको देखकर यही लगा कि पार्क में पहुंचते ही किसी पद या कुर्सी पर कब्जा कर लेंगे। लेकिन यह देखकर अच्छा लगा कि पार्क में पहुंच कर भी उनका कुत्तापन बरकरार रहा। उन्होंने कोई मानवोचित हरकत नहीं की।
एक कुत्ते ने कसरत करते हुए पार्क के बीच में ही दीर्घशंका कर दी। उसकी मालकिन लपककर पार्क में ही मौजूद व्यवस्था से एक प्लास्टिक का बैग निकाला। कुत्ते के निपटान को उठाया और वहीं मौजूद डस्टबिन में फेंक दिया।
कुत्तापार्क पर लगी नोटिस के अनुसार :
"यह पार्क कुत्तों को दूसरे कुत्तों से मिलन-जुलन की व्यवस्था के लिए बनाया गया है। बच्चे कुत्तों के मनोरंजन में बाधा पहुंचा सकते हैं।
अगर आप अपने बच्चे को कुत्तापार्क में लाते हैं तो उनकी ठीक से देखभाल करें। बच्चों को कुत्ता पार्क रहने का व्यवहार सिखाएं। जैसे कि बच्चे दौड़े नहीं, चिल्लाएं नहीं, छड़ी न हिलाएं और उन जानवरों की तरफ न जाएं जिनसे वे परिचित नहीं हैं। कुत्तों के बाल झाड़ते समय टूटे हुये बाल अपने बैग में रखें।"
कुत्तों के लिए इतनी शानदार और सुरक्षित व्यवस्था देखकर दिनकर जी की कविता याद आ गयी:
श्वानों को मिलता दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं
माँ की हड्डी से चिपक ठिठुर जाड़ों की रात बिताते हैं
युवती के लज्जा वसन बेच जब ब्याज चुकाए जाते हैं
मालिक जब तेल-फुलेलों पर पानी-सा द्रव्य बहाते हैं
पापी महलों का अहंकार देता तब मुझको आमन्त्रण
यह कविता बचपन में पढ़ी थी इसलिए याद आ गयी। बाकी भूखे बच्चों के हाल तो कविता लिखे जाने के समय से और बेहाल हुए होंगे। मालिक लोगों का तेल-फुलेल पर खर्च और बढ़ा होगा। पापी महलों के अहंकार भी बढ़े होंगे लेकिन कहीं कुछ बदल नहीं रहा।
हालाँकि हमको वहाँ खेलते कुत्तों और उनके मालिकों से कोई शिकायत नहीं है। लेकिन दुनिया भर के भूखे रह जाने वाले बच्चों के हाल सोचकर दुःख होता है।
कुछ देर वहां ठहरकर हम वापस घर चले आये।

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Thursday, December 29, 2022

दोहा से अमेरिका वाया ईरान, अफ़्रीका और अटलांटिक महासागर



अमेरिका का टिकट कतर एयरलाइंस से हुआ था और फ्लाइट कतर की राजधानी दोहा होकर जानी थी। उस समय कतर में 2022 का फुटबाल विश्व कप भी हो रहा था। कतर में ढाई घण्टे का ठहराव भी था। हालांकि रूकना नहीं था फिर भी जानकारी ली कतर के बारे में।
पता चला कि कतर दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक है। 9 वां नम्बर बैठता है अमीरी के मामले में। आबादी कुल जमा करीब तीस लाख। कानपुर की आबादी (45 लाख) इसकी डेढ़ गुनी है। कुल शहर 51 हैं कतर में इससे ज्यादा तो मोहल्ले होंगे कानपुर में। एरिया लगभग कानपुर के बराबर।मतलब कतर की पूरी आबादी को समेट के कानपुर में रखा जा सकता।
कतर की खास बात यह कि यहाँ की करीब नब्बे प्रतिशत आबादी बाहर से आई है। सर्विस देने। मतलब करीब 3 लाख लोग ही यहां के हैं। बाकी सब दिहाड़ी पर काम करने आये दुनिया के दूसरे देशों से। प्रवासी मजदूरों से काम कराने का रिकार्ड यहाँ अच्छा नहीं बताया जाता। कांट्रैक्ट पर आए लोगों के वीसा यहाँ लोग जब्त कर लेते हैं। बंधुआ मजदूर की तरह काम कराते हैं। पिछले साल विश्व कप फुटबाल के आयोजन की तैयारियों से सम्बंधित निर्माण के काम में करीब 6500 मजदूरों की मौत हो गयी। किसी लोकतांत्रिक देश में इतनी मौतों पर बवाल होता लेकिन कतर में इसके बावजूद शानदार आयोजन हुआ।
गरीब की जान की अमीर लोग परवाह नहीं करते।
कतर के बारे में पढ़ते हुए एक रोचक बात पता चली। रोचक क्या नकारात्मक ही कहेंगे आज के समय के हिसाब से। वैसे संविधान के अनुसार तो कतर में स्त्री-पुरुष समानता है। लेकिन कतर की परम्परा के अनुसार हर महिला को जिंदगी भर अपना कोई न कोई अभिभावक रखना होता। बिना अभिभावक की लिखित अनुमति के वे अपने जीवन से जुड़ा कोई भी अहम फैसला नहीं ले सकती। यह अहम फैसला महिलाओं की पढाई, शादी, तलाक़ या कहीं बाहर जाने-आने से भी सम्बंधित हो सकता है।
(बीबीसी की रिपोर्ट का लिंक कमेंट बॉक्स में)
हालांकि कानून इस बात के लिए मजबूर नहीं करता लेकिन परम्परा के अनुसार यह जरूरी है। और नकारात्मक बातों में परम्परा हमेशा कानून पर हावी रहती है। भारत में ही शादी में दहेज कानूनन अपराध है लेकिन बकौल परसाई जी -'हमारे समाज की आधी ताकत लड़कियों के लिए दहेज जुटाने में लग जाती है।'
बहरहाल बात हो रही थी दोहा की। जहाज दिल्ली से एक घण्टे देरी से उड़ा था। एक घण्टे देर ही पहुंचना था। अगली फ्लाइट में डेढ़ घण्टे समय था। दिल्ली में जिस तरह देरी हुई सुरक्षा जांच में उससे डर लग रहा था कि कहीं अगली फ्लाइट हमको लिए बिना न चली जाए और हम दोहा में ही रह जाएं।
यह बात हमने एयरहोस्टेस से पूछी। उसने कहा -'ऐसा नहीं होगा। सेम एयरलाइन है और इसके कई लोग उसमें जाने हैं इसलिए आपको लेकर ही जायेंगे। अगर छूट भी गयी तो दूसरी फ्लाइट से भेजेंगे। उसकी बात मानकर हम चुप हो गए। लेकिन जब मन आता तो मन ही मन चिंता तो कर ही लेते। चिंता करने में कौन पैसा लगता है।
मुफ्त की सुविधा होने के चलते दुनिया ने तमाम लोग इसका फायदा उठाते हैं और दनादन ऊलजलूल चिंताएं करते रहते हैं। दनादन चिंतित होते हैं। काल्पनिक समस्यायों से चिंतित होते हैं। एक की चिंता से उबरते हैं दूसरी में घुस जाते हैं। मुफ्त की सेवाओं का यह साइड इफेक्ट होता है, हर कोई उसका लाभ उठाना चाहता है।
इस बीच नाश्ता पानी भी आता रहा। चाय , पानी,जूस और तमाम खाने के सामान। इनके साथ हवाई जहाज के शौचालय सबसे व्यस्त जगह दिखे। अतिशय उपयोग के चलते सबसे ज्यादा गन्दी जगह हो गए थे शौचालय। न जाने की इच्छा के बावजूद लोग जा रहे थे।
इस बीच फुटबाल में विश्वकप की झलकियां भी देखीं। पुराने खिलाड़ियों के मैच। इसी क्रम में विश्व कप क्रिकेट 1983 पर बनी पिक्चर भी देखी। लेकिन सबसे ज्यादा देखा फ्लाइट स्टेटस। अब कहाँ हैं, किसके ऊपर से उड़ रहे हैं। कितना तापमान है बाहर। कितनी दूरी बची है, कितनी तय कर आये।
ईरान के ऊपर से उड़ते हुए वहां चल रहा युवाओं का आंदोलन याद आया। पढ़ने-लिखने , घूमने-फिरने और मजे का जीवन जीने की उम्र के बच्चे पहनने, ओढ़ने और बुनियादी आजादी के लिए आंदोलन कर रह रहे हैं। तीन सौ से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। न जाने कितनों को मौत की सजा सुनाई जा चुकी है। महिलाओं के हिजाब पहनने की पाबन्दी से आजादी की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन न जाने कितने और लोगों की जान लेगा। इंसान की जिंदगी से कीमती कुछ नहीं होता। यह अमूल्य जीवन कुछ लोगों की हठधर्मिता और अड़ियल पैन के चलते बर्बाद हो रहा। न जाने कब यह सिलसिला रुकेगा।
दोहा से अमेरिका की दूरी करीब 16 घण्टे की थी। सैनफ्रांसिस्को पहुंचने का समय सुबह के 1240 था। हम खिड़की से दूर थे। लेकिन समुद्र लहराता दिख रहा था। सूरज भाई भी हमारी अगवानी में चमकते-चहकते दिखे। खिड़की से सटकर चलते रहे।
आखिर में पहुंच ही गए। सैनफ्रांसिस्को। मौसम खुशनुमा और खिला-खिला था।

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Wednesday, December 28, 2022

बर्फीले तूफान में अमरीका यात्रा



दो दिन हुए अमेरिका आये। 25 की सुबह चार बजे चले थे नई दिल्ली से। 25 की दोपहर को दोपहर करीब 1240 पर सैनफ्रांसिस्को में उतरे।
ऊपर का समय देखने से लगता है कि दिल्ली से अमेरिका साढ़े आठ घण्टे में पहुंच गए। करीब साढ़े बारह हजार किलोमीटर है सैन फ्रांसिस्को नई दिल्ली से सीधी दूरी में । मतलब डेढ़ हजार किलोमीटर प्रति घण्टा।
लेकिन समय के लफड़े इत्ते सीधे कहाँ होते हैं। हर शहर का अलग टाइम जोन होता। जैसे अभी दिल्ली में 28 दिसम्बर के दोपहर बाद के 1240 हुए हैं जबकि सैन फ्रांसिस्को में 27 दिसंबर के रात के 1110 हुए हैं। मतलब साढ़े बारह घण्टे पीछे है सैन फ्रांसिस्को दिल्ली से।
इस बार दोहा होते हुए आये। दिल्ली से दोहा 2565 किलोमीटर दोहा से सैन फ्रांसिस्को 12967 किलोमीटर। कुल जमा हुए 15532 किलोमीटर। कुल मिलाकर करीब 20 घण्टे की हवा बाजी हुई। बीच में करीब ढाई घण्टे का ठहराव दोहा में।
अमेरिका आये हुए दो दिन हुए। दिमाग अभी भी दिल्ली, दोहा, अमेरिका के टाइम जॉन में उलझा है। गड्ड-मड्ड। यहां समय देखते हैं तो फौरन हिसाब लगाते हैं कि इस समय भारत मे क्या बजा होगा।
हम तो तीन टाइम जोन की सोचकर हलकान हुए जा रहे। ऊपरवाला तो तमाम टाइमजोन की समस्याएं , प्रार्थनाएं सम्भालता होगा। उसके क्या हाल होते होंगे। अलग- अलग तरह की सभ्यताओं के लोगों से निपटते हुए ऊपर वाला परेशान होगा।
जहाज में बैठते ही खबर आई कि अमेरिका में बर्फ़ीले तूफान के चलते सैकड़ों उड़ाने निरस्त हो गयीं। हवाई अड्डे बन्द हो गए। खबर पढ़ते ही लगा कि कहीं अमेरिका पहुंचने पर यह न कह दिया जाए कि ले जाओ अपना उड़न खटोला वापस। यहां सब दुकान बंद है। बर्फीला तूफान खत्म होने के बाद आना।
लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। जहाज तसल्ली से उतरा सैन फ्रांसिस्को में। पूरे अमेरिका के बर्फीले मौसम से अलग यहां मौसम अच्छा था। धूप भी खिली थी। लगता है सूरज भाई का खास इंतजाम था।
उतरकर इमिग्रेशन पर आए। लम्बी लाइन थी। लेकिन तसल्ली थी कि अब कोई जहाज छूटना नहीं। एक लाइन अमेरिकन नागरिकों की थी। दूसरी वीसा वाली। अमेरिकन लोग बाहर हो गए तो हमको भी उसी लाइन में बुला लिया गया। काउंटर पर आधिकारी ने पूछा -'किसके पास जाना, कितने दिन रुकना, कोई खाने-पीने का सामान तो नहीं लाये।' सबके जबाब लेकर बाहर कर दिया।
बाहर अपना सामान जमा किया। सूटकेस इधर-उधर रखे मिले। ट्राली लेने गए तो देखा वहां आठ डॉलर की फीस। भारत से सीधे आये थे, ताजा-ताजा लिहाजा डॉलर और रुपये का काउंटर फौरन चालू हो गया। हमने सोचा कि पास ही है गेट, पहिये लगे हैं सूटकेस में, काहे को ट्राली में साढ़े छह सात सौ फूंकना।
हम एक बार में दो सूटकेस गेट तक लाकर रख दिये। बाकी के लेने के लिए पलटे तो वहां मौजूद सुरक्षा कर्मी ने टोंक दिया, आप वापस नहीं जा सकते। हिन्दुस्तान होता तो कहे होते -'काहे नहीं जा सकते भाई।' लेकिन यहां मामला अलग था।
हमने बताया कि हमारा सामान उधर है। वो बोला -'हमारे इंचार्ज से बात करिये।' हम बोले -'आप ही समझो हमारी बात।'
साथ की महिला बोली -'हम समझ गए लेकिन आप हमारी मजबूरी समझो। हम नियम के आगे मजबूर हैं।'
अब मुकाबला मजबूरी में होने लगा। आखिर में हमारी मजबूरी भारी पड़ी जब हमने कहा कि अंदर हमारी श्रीमती जी सामान के पास खड़ी हैं। उसने कहा उनको बुला लो सामान के साथ। फोन करो। हमने कहा -'उनका फोन एक्टिवेट ही नहीं है फोन कैसे करें?'
आखिर में वो सुरक्षा कर्मचारी हमारे साथ गया और हम सामान सहित आगे आये और बाहर हुए।
बाहर लोगों की भीड़ थी। गाड़ियां अफरा-तफरी में लगी थीं। मेरा बेटा भी आ गया लेने दोस्त के साथ। सामान गाड़ी में रखा। घर आ गए।
घर आकर खबरों में देखा कि पूरे अमेरिका में बर्फीला तूफान आया है। करीब 50 लोग नहीं रहे । कई जगह बिजली गायब, कहीं पानी की पाइप लाइन फट गईं। छह-छह फुट तक बर्फ जमी है। देखकर लगा कि इंसान की सारी कलाबाजी प्रकृति की कलाकारी के सामने बौनी साबित होती हैं।
शुक्र यह कि कैलिफोर्निया में तूफ़ान का असर नहीं । यहां मौसम सामान्य है।
ऐसे विकट मौसम ने स्वागत किया यहां। लगता है मौसम भी भन्नाया हुआ था कि तीन साल पहले आये थे। फिर आ गए मुंह उठाके।
यह हमारी दूसरी अमेरिका यात्रा थी। कुल मिलाकर तीसरी विदेश यात्रा।

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दिल्ली एयरपोर्ट - विदेश यात्रा के लफड़े



अमेरिका के लिए दिल्ली एयरपोर्ट से जहाज पकड़ा। फ्लाइट 25 दिसम्बर की सुबह 0340 पर थी। पहले शताब्दी में रिजर्वेशन करवाया था। सोचा था कि शाम को चलकर रात साढ़े दस तक दिल्ली फिर वहां से एयरपोर्ट पहुंचकर फ्लाइट पकड़ लेंगे।
लेकिन आने के पहले के दिनों में ट्रेने बहुत बेतरतीब तरीके से चलने लगीं। कोई दस घण्टे लेट, कोई दो घण्टे। बहक गई हों जैसे जाड़े में। कोई भरोसा नहीं कब आ जाएं, कब ठहर जाएं। दिल्ली कानपुर साढ़े आठ बजे शाम आती है। वह एक दिन सुबह चार बजे आई। हमने ट्रेन पर भरोसा छोड़ा और दिल्ली के लिए गाड़ी ली।
गाड़ी से दिल्ली के निकले दोपहर डेढ़ बजे। गूगल मैप की कृपा से भटकते, चलते रात दस बजे पहुंच गए दिल्ली एयरपोर्ट।
विद्वानों में इस बात पर मतभेद था कि इतनी जल्दी एयरपोर्ट में घुसने देंगे कि नहीं। कुछ का कहना था तीन घण्टे पहले नहीं आने देते। लेकिन हम घुस ही गए टिकट दिखाकर। पता चला कि बोर्डिंग पास नहीं बनता तीन घण्टे से पहले। अंदर आने में कोई मनाही नहीं।
अब समय इफरात था। उसको खर्च करने के लिहाज से इधर-उधर टहले। खरामा-खरामा चलते हुए पता किया कि कतर एयरलाइंस का बोर्डिंग पास किधर बनता है। पता चला अमेरिकन एयरलाइन का सबसे आख़िरी में काउंटर हूं उसी पर बनेगा बोर्डिंग पास। साढ़े ग्यारह बजे से।
लौटकर वापस आये। फिर सोचा कुछ डॉलर नकद और खरीद लिए जाएं। काउंटर पर नाम बताया तो उसने जानकारी दी -'4 नवम्बर, 2019 को आपने खरीदे थे डॉलर।'
हमने पूछा -'कितने।' उसने बता दिए देखकर। जबकि हमने लिए किसी और काउंटर से थे। मतलब विदेशी मुद्रा के एक-एक रुपये के हिसाब किताब पर नजर रखी जाती है।
काउंटर पर कुछ बच्चे सिंगापुर की मुद्रा खरीद रहे थे। कुछ पैसे कम पड़े तो दूसरे से लाये। हमने भी अपना फार्म भरा। जब तक मिलें डॉलर तब तक एक महिला और आ गयी। उसको कुछ विदेशी मुद्रा चाहिए थी। पैन कार्ड मांगा गया तो निकाल के दे दिया उसने। अपने पति के पास जा रही थी वो। काउंटर वाले ने पति का वीसा मांगा। उसके पास था नहीं। पता नहीं होगा शायद कि यह भी लगेगा।
इधर-उधर खोजने पर नहीं मिला तो उसने घर से भेजने को फोन किया। काउंटर वाले ने मजे लेते हुए कहा- 'सब कुछ लेकर चलेंगे लेकिन कागज घर पर रख के आएंगे।'
इस बीच हमें डॉलर मिल गए। हम लोग अपनी एयरलाइंस के काउंटर के पास पहुंच गए। अभी भी घण्टा भर बाकी था काउंटर खुलने में। सोचा गया कुछ खा लिया जाए।
कुछ खाने निकले तो पता चला सामानों की कीमतों के एयरपोर्टिकरण हो चुका था। चाय 125 रुपये में और ब्रेड को दो पीस 120 पर पहुंच गए थे।
चाय पीकर वापस आये तो काउंटर के लिये लाइन लग गयी थी। हम बीच में लग लिए। किसी ने टोंका नहीं क्योंकि समय इफरात था और लाइन ढीली। कोई सबूत नहीं कि हम गलत लगे थे।
इस बीच एक बुजुर्ग महिला को व्हीलचेयर पर बैठा कर अटेंडेंट ले जा रहा था। महिला को बहुत तकलीफ थी। बैठने में समस्या से उपजा दर्द उनकी आंख में झलक रहा था। बगल में होने के कारण हमने भी सहयोग करके उनको बैठा दिया। बैठने के बाद उनकी आंखों में जो धन्यवाद का भाव दिखा उसका अनुवाद असंभव है। कितना भी भाषा-समर्थ हो जाये इंसान लेकिन कई मनोभाव अनुवादित हुए बिना ही रह जाते हैं।
कुछ देर में काउंटर पर पहुंचे। टिकट बन गए। सामान जमा होने लगा। छह बैग में तीन का वजन कम था। तीन का थोड़ा ज्यादा। बुकिंग बालिका बोली -'ये ज्यादा है इसका अतिरिक्त पैसा लगेगा।' अतिरिक्त मतलब 75 डालर प्लस टैक्स। 75 डालर मतलब लगभग 6300 रुपये।
हमने बहुत कहा कि कुल मिलाकर तो वजन कम ही है। फिर काहे का पैसा। लेकिन वह मानी नहीं। बोली सामान एडजस्ट कर लें। हम लोग सारे बैग लेकर बाहर आये और आधे घण्टे से भी ज्यादा मशक्कत में इधर का सामान उधर करते करते रहे। तरतीब से लगाया सामान बेरहमी से बेतरतीब किया। जाड़े में पसीना आ गया। पसीने में मेहनत और देरी के कारण फ्लाइट छूटने का डर भी शामिल हो गया था।
सामान सजाकर जब दुबारा पहुंचे काउंटर पर तो भी कुछ ग्राम इधर-उधर था। लेकिन इस बार उसने टिकट दे दिया।
इस बीच एक सरदार जी का सामान भी कुछ ज्यादा निकला।एक्स्ट्रा चार्ज मांगने पर वो बमक गए कि आते समय नहीं लिया, जाते समय भी वही वजन है। काउंटर बालिका नियम की आड़ में छिप गई और पैसे धरा लिए। सरदार जी ने बाद में वसूल लेने की धमकी देते हुये पैसे भरे।
एक महिला टिकट के लिए लाइन में खड़ी थी। उसका वीसा देखकर एयरलाइन वाले ने बताया कि उसका टूरिस्ट वीजा तीन महीने का था। खत्म हो गया। जाने के पहले उसको वीसा बढ़वाना होगा। साइप्रस जाना था उसको। महिला की बच्चा हल्ला मचा रहा था। महिला ने पूछा -'क्या करें? कैसे होगा।'
एयरलाइन वाले ने अपनी मजबूरी जाहिर की। बोला -'आपको वीजा बढ़वाना होगा। दूतावास से।' महिला फोन पर इधर-उधर न जाने किधर-किधर बात करती रही।
विदेश यात्रा में न जाने कितने लफड़े हैं। न जाने कितने पचड़े हैं।
बहरहाल हमको टिकट मिल गया था। टिकट मिलते के बाद इमिग्रेशन काउंटर पर पहुंचे। वहां भयंकर भीड़ थी। लाइन एकदम चींटी की रफ्तार से चल रही थी। हर कोई परेशान। देखा देखी हमको भी होना पड़ा यह सोचकर कि फ्लाइट छूटी तो क्या करेगे।
लाइन के हाल एकदम ट्रैफिक की तरह थे। जिसकी मर्जी होती वो अतिक्रमण कर जाता। हमने भी किया एकाध बार। आखिर में इमिग्रेशन से निकले तब तक एक घण्टा बचा था। अब लाइन सुरक्षा जांच के लिए थी। जिस गति से आगे बढ़ रहे थे वहां उससे लग रहा था कि गयी फ्लाइट। लेकिन अंततः सिक्योरिटी चेकिंग के बाद बोर्डिंग के लिए पहुंचे तब तक 10 मिनट बाकी थे।
हमने सारी साँसों को स्थगित करके स्पेशल सांस ली जिसे लोग 'सुकून की सांस' कहते हैं। ऐसा लगा कि हमने छूटी हई फ्लाइट दौड़ कर पकड़ी है।
बोर्डिंग के बाद फ्लाइट घण्टे भर बाद चली दोहा के लिए। पहले बता दिया होता तो इतना हड़बड़ काहे को करते। लेकिन एयरलाइन वाले तो अपनी मर्जी से काम करते हैं।
कतर एयरलाइन का जहाज था। कतर में अभी फुटबाल का विश्वकप हुआ था। हर तरफ विश्वकप की छाप थी। हर सामान पर फीफा 2022 का विज्ञापन। टीवी पर विश्वकप की झलकियां।
दिल्ली से एक घण्टा देरी से उड़े थे। दोहा एक घण्टा देर पहुंचे। अगली उड़ान कहीं छूट न जाये यह धुक़ुर-पुकुर मचनी शुरू हो गयी थी।

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Friday, December 23, 2022

गरीबी बहुत खराब चीज है

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 सड़क किनारे मूंगफ़ली की दुकानें गुलजार हैं। हर दूसरी दुकान के बाहर भट्टी पर रखी कड़ाही में मूंगफ़ली भुन रही हैं। एक दुकान पर मूंगफ़ली बेंचती बच्ची गोद में फ़ुदकते 'बच्चा खरगोश' से खेल रही है। बगल की दुकान पर बुजुर्ग दुकानदार पूरी गंभीरता से ग्राहक का इंतजार कर रहे थे। चेहरे पर गंभीरता वे इतनी गंभीरता से धारण किये थे मानो उनको डर हो कि चेहरे से गंभीरता का चोला उतरते ही ग्राहक हुसक जायेगा।

सड़क किनारे एक आदमी कम्बल लपेटे सर्दी को ललकारते हुये सो रहा था। सर्दी की हिम्मत नहीं हुई उसका सामना करने की। वह भागकर मेरे पास आ गयी। मैंने सर्दी से ठिठुरते हुये उसको अभयदान दिया -’डरो नहीं हमारे पास रहो। हम तुम्हारी इज्जत करते हुये तुम्हारी रक्षा करेंगे।’
बुजुर्ग गुप्ताजी अपने बेटे के साथ बैठे आग ताप रहे थे। बेटे ने मेरे लिये कुर्सी छोड़ दी। कुर्सी बीच से तार से सिली थी। मानो उसकी ओपेन हार्ट सर्जरी हुई हो। हमारे बैठने के बाद तसले में जमा आग को कुरेदकर उसमें से गर्मी ऊपर निकालने की कोशिश करने लगे। यह कोशिश ऐसे ही लगी जैसे चुनाव के समय पार्टियां अपने हिसाब से पुराने सियासी मुद्दे कुरेदकर माहौल अपने तरीके से सुलगाने की कोशिश करती हैं।
हमने गुप्ताजी से पूछा -’चश्मा नहीं बनवाया अब तक?’
”पैसे का इंतजाम कर रहे हैं। इंतजाम होते ही बनवा लेंगे। अभी काम चल रहा है।’ -वे बोले।
’ऐसा तो आप साल भर से कह रहे हैं।’- हमने कहा।
’हां लेकिन क्या करें। हर बार कोई न कोई नई समस्या आ जाती है।’ -गुप्ता जी बोले।
समस्या के बारे में पूछने पर बताया गुप्ताजी ने कि उनकी बड़ी बहू पिछले दिनों ब्लड कैंसर से गुजर गयी। घर वालों का पैसा उसमें खर्च हो गया। तफ़सील से बताते हुये जानकारी दी :
"बहू को पेट में दर्द रहता था। डॉक्टर बोला- ’पथरी है।’ पेट खोला तो बोला -’पथरी है ही नहीं।’ ले जाओ। जब दर्द बना रहा तो फ़िर ले गये। पता चला कि टीबी है। फ़िर जांच कराई तो पता चला कि ब्लड कैंसर है। डाक्टर ने बताया कि पथरी के आपरेशन के लिये पेट खोला गया तो उसी समय कैंची से पित्त की थैली कट गयी। उसी से ब्लडकैंसर हो गया। उसी में खत्म हो गयी। सबने कहा - ’केस करो उस डॉक्टर पर जिसने पथरी का आपरेशन किया।’ लेकिन हमने कहा-’ जब बहू ही नहीं रही तो केस किस लिये करें? इसके अलावा केस अगर करते भी हैं तो सब डॉक्टर तो आपस में मिले हैं। लिखकर दे देंगे कि इलाज में कोई गलती नहीं हुई।’
गुजरी बहू की एक बिटिया है। 11 साल की । बेटा, जिसकी पत्नी नहीं रही , सब्जी बेंचता है। डॉक्टर ने कहा कि कैंसर का इलाज मंहगा है तो वो बोला -’आप इलाज करो हम और कर्ज लेकर फ़ीस देंगे।’ लेकिन वह बच नहीं पाई। तीन लाख लग गये इलाज में।
हमको लगा कि सही में अगर दुनिया ईश्वर ने बनाई है तो वह उसको बड़ी लापरवाही से चला रहा है। दुनिया चलाने का उसका अंदाज लोकतांत्रिक देशों की सरकारों की तरह है। लोकतंत्र में सरकारें उस जनता का ख्याल नहीं रखतीं जिन्होंने वोट देकर सरकार बनाई ! उसी तरह भगवान भी अपने उन भक्तों की देखभाल कायदे से नहीं कर पाते जिनके दम पर उनको भगवान का दर्जा मिलता है।
दुनिया में भगवान पर सबसे ज्यादा भरोसा गरीब आदमी करता है। लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी भगवान गरीब के ऊपर ठेलता है। अगर भगवान को अपने गरीब भक्तों की जरा भी चिन्ता होती उनको उनकी हैसियत के हिसाब से बीमारी देता। ये क्या कि एक सब्जी वाले की बीबी को ब्लड कैंसर थमा दिया?
अगर भगवानों के चुनाव वोट देकर होते तो भगवान भी चुनावी सभाओं में वादा करते- ’अपन की सरकार बनते ही गरीबों को मंहगी बीमारियों से मुक्त कर दिया जायेगा।’
हमारे वहां बैठे हुये एक बच्ची आकर अलाव तापने लगी। नाम बताया - ’सिमरन।’ यह भी बताया कि प्यार से सब उसको अप्पू कहते हैं। इंटर बाद पढाई छूट गयी।
हमने कारण पूछा तो बोली - ’क्या बतायें आपको?’
हमने कहा-’ न बताओ कोई बात नहीं लेकिन या तो स्कूल दूर होगा या फ़ीस नहीं दे पाई होगी या मन नहीं लगता होगा तुम्हारा।’
दूरी वाली बात पर बोली-’ अरे स्कूल तो खोपड़िया में है।’
आगे कोई बात हो तब तक उसको बुलाने कोई आ गया। पता चला चाचा हैं।
अनमने मन से वह जाने के लिए उचकी। जाते-जाते रुक गयी। फ़िर बोली -’चलें नहीं तो चाचा यहीं खोपड़ी पर खड़े रहेंगे।’ चली गयी।
सिमरन के जाने के बाद गुप्ताजी ने बताया -इसका बाप कहीं बाहर मजूरी करता है। यहां चाचा के पास रहती है। पैसे नहीं इसीलिये पढाई छूट गयी। अब एक मोबाइल की दुकान पर काम करती है।’
आगे बोले-’ मोबाइल की दुकानों पर आजकल लड़कियों को काम मिलता है। लड़कियों को रखने से बिक्री ज्यादा होती है।’
हमने मजे लिये -’आजकल क्या पहले भी तो ऐसा था। तुम्हारी अम्मा भी तो कलट्टरगंज में पराठे बेंचती थी।’
अम्मा का जिक्र आते ही ८५ साल का बुजुर्ग फ़िर से फ़िर बच्चा बन गया। बताया कि उस समय की बात और थी। पराठे तौलकर मिलते थे। गुलगुले भी बनाती थीं अम्मा। सबको साथ लेकर चलती थीं अम्मा। हमको बहुत प्यार करतीं थीं। उनके जाने के बाद घर बिखर गया।
गुप्ताजी के बेटे के काम के बारे में पता किया तो पता चला कि उसकी पंचर की दुकान ठप्प है। कुछ दिन मसाला भी बेंचा लेकिन उसमें भी सिक्के चलते नहीं। सौ रुपये के सिक्के पर नब्बे रुपये के नोट मिलते हैं। इसीलिये वह भी छोड़ दिया। फ़िलहाल मंदिर की आमदनी पर भरोसा है।
आजकल धर्मस्थल तमाम लोगों के रोजी-रोटी का सहारा है। सरकारें तक मंदिरों-मस्जिदों-चर्चों के सहारे हैं। बहुत जलवा है धर्मस्थलों का।
गुप्ता जी के बेटे राम अचानक भावुक हो गये। बोले-’गरीबी बड़ी खराब चीज है। इंसान की जिन्दगी भार हो जाती है। ’
कुछ देर गरीबी के भंवर में फ़ंसने के बाद वो अचानक आशावादी हो गये। बोले-’ इंसान को अपने हिम्मत से मेहनत करके जीवन जीने


की कोशिश करनी चाहिये।’
रात हो रही थी। हम गुप्ताजी से जल्दी ही उनका चश्मा बनवाने का वादा करके लौट आये।

Wednesday, December 21, 2022

दाल रोटी चल जाती है

 नेपाल के संस्मरण लिखने के चलते लोकल किससे पिछड़ रहे। मेक इन इंडिया के जमाने में यह अच्छी बात नहीं। इसलिए बीच-बीच में कानपुरिया किससे भी चलते रहने चाहिए।

बाज़ार जाते हैं तो लोगों से बातचीत में बहुत कुछ पता चलता है। इतवार को एक ताला ख़रीदने गये। दुकान के बाहर अंदर पहनने वाले कपड़े झालर की तरह लटके थे। हमको पता था कि ये ताले भी रखते हैं। ताला माँगा तो पूजा करना स्थगित करके ताले दिखाए। दिए। इसके बाद धूप बत्ती जलाई। हमने कहा -‘पूजा कर लिए होते पहले।’
बोले -‘फिर आपको इंतज़ार करना पड़ता।’
कोई और बात हुई तो वो अपने घर के बारे में बताने लगे। पत्नी बीमार हैं। उनकी भी देखभाल करनी होती है दुकान के साथ। न्यूरो की समस्या है।
बड़े होने के साथ लोगों की मानसिक समस्यायें बढ़ते देख रहे हैं। तनाव, अकेलापन और दीगर बवाल तेज़ी से बढ़ रहे हैं।
‘उनको भी ले आया करो दुकान साथ में। अच्छा लगेगा।’ -हमने बिना माँगी सलाह उछाल दी।’
‘सही कह रहे आप। एक दिन लाए थे। दिन भर रहीं दुकान पर। खुश रहीं। लेकिन फिर बाद में आईं नहीं।’- दुकान वाले ने बताया।
‘बच्चियों की शादी हो गई। मियाँ-बीबी हैं। अब ऐसे ही कट रही है ज़िंदगी।’- कहते हुए कई तरह के ताले दिखाए। कुछ में साफ़ लिखा था -‘मेड इन चाइना।’
देशभक्ति के चलते हमने चीनी ताले नकार के देशी ताले लिए। ब्रांडेड। चले आये।
शाम को सब्ज़ी ख़रीदने गये। लौटे तो गज़क, लैया-पट्टी का ठेला दिखा। ग़ज़क ली। बतियाये।
पता चला दो महीना यही बेंचते हैं। बाक़ी दिन पानी के बतासे। पानी के बतासे में कमाई अच्छी होती है। लेकिन जाड़े में बिक्री नहीं होती उसकी। इसलिए जाड़े का मौसम गज़क ,लैया-पट्टी के नाम।
कमाई की बात पर बोले-‘दाल रोटी चल जाती है।’
आवाज़ में आस्था है। किसी तरह ज़िंदगी गुजरने का भाव। अभाव है लेकिन शिकायत नहीं। बच्चे पढ़ रहे हैं।
देश की क्या दुनिया की बहुत बड़ी आबादी तमाम अभावों के बावजूद इसी आस्था और विश्वास के भाव से जी रही है। -‘गुजर रही है। कट रही है किसी तरह।’
चलते समय गुड और मूँगफली की पट्टी के दाम पूछे। दाम बताने के पहले ही मन में तय किया कि लेना नहीं है। गज़क बहुत है।
दाम बताते हुए यह भी कहा कि ले जाइए। अच्छी है। साठ रुपये का पैकेट था।
दाम ज़्यादा नहीं था लेकिन हम पहले ही न ख़रीदने के निर्णय पर अमल करते हुए चल दिये। भुगतान नक़द ही हुआ। गूगल पे के झाँसे में अभी तक नहीं आए थे ठेलिया वाले।
चल तो दिए लेकिन आगे बढ़ते हुए ठेलिया वाले की बात पीछा करती रही -‘ले जाइए। अच्छी है।’
आवाज़ ने क़रीब सौ मीटर तक पीछा किया। धीमी होती गई। और धीमी हो इसके पहले हम पलट लिए। गुड की पट्टी ख़रीदी। वापस आये। घर में आकर उस दिन दूध के साथ गुड की जगह गुड पट्टी खाई। अच्छा लगा।
दो दिन हुए इस बात को। अभी भी उनका लहजा याद आता है कहने का -‘दाल रोटी चल जाती है।’


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Monday, December 19, 2022

नेपाल की सेल रोटी मतलब चावल की जलेबी



कहीं बाहर जाने पर सबसे बड़ी चुनौती खाने की होती है। 3 साल पहले जब अमेरिका गए थे तो न्यूयार्क की सड़कों पर घण्टों शाकाहारी खाने के लिए भटकते रहे थे। जब एक पंजाबी ढाबा मिला था तो जो सुकून मिला था उसका बयान मुश्किल है। महसूस ही किया जा सकता है उसे।
नेपाल में खाने की तो कोई समस्या नहीं हुई। शाकाहारी खाना आराम से होटल में और बाहर भी मिला। इसी क्रम में कुछ नए अनुभव भी हुए।
पहुंचने के अगले दिन शुरू हुई मीटिंग देर तक चली। मीटिंग के बाद बाजार में खाने का जुगाड़ देखा गया। कई होटल देखे इधर-उधर। सभी दोपहर के बाद आराम मुद्रा में थे। ऐसा कोई जुगाड़ नहीं दिखा जहां तसल्ली से बैठलर लंच किया जा सके।
भोजन की तलाश में भटकते हुए कई ढाबे दिखे। एक जगह जलेबी जैसी कोई चीज बनती देखी। पता चला यह सेल रोटी है। नेपाल का खास व्यंजन।
पहली बार नाम सुना था सेल रोटी। घुस गए दुकान में। छुटकी सी दुकान। बाहर समोसा, पकौड़ी जैसी चीजों के साथ सेलरोटी बन रही थी। चाय तो सदाबहार पेय पदार्थ है भारत की तरह नेपाल में भी।
सेल रोटी बनने की विधि देखी। चावल के आटे को में शक्कर या कोई और मीठा मिलाकर एक कुप्पी नुमा बर्तन में डालकर जलेबी की तरह कड़ाही में तलते हैं। पकौड़ी की तरह तलकर खाने के लिए तैयार हो जाती है रोटी। जलेबी से इस मायने में अलग होती है कि जलेबी को तलने के बाद उसको मीठा करने के लिए चासनी में डाला जाता है। जबकि सेल रोटी में मीठा उसके आटे में ही मिला होता है। कहीं-कहीं मसाला भी मिलाते हैं।
सेलरोटी के बारे में पढ़ते हुए जानकारी मिली कि सेल रोटी बनने की शुरुआत 800 साल पहले हुई नेपाल में। पहले इसमें मीठा नही और मसाला नहीं मिलाते थे। बाद में इसके स्वरूप में बदलाव आता गया और आज के रूप में पहुंची इसको बनाने की विधि।
सेल रोटी का नाम नेपाल में पैदा होने वाले चावल के प्रकार सेल से जुड़ा है। अपने यहां भी चावल का एक नाम सेल्हा चावल सुनते हैं। एक और जानकारी के अनुसार नेपाल में नए साल के मौके पर बनाये जाने के कारण इसका नाम साल से होते हुए सेल हो गया। अब तो यह साल भर बनती है और दुकानों में समोसे, पकौड़ी की तरह सर्वसुलभ है।
दो-दो सेलरोटी खाने के बाद चाय पी गईं। इतने में ही तृप्त हो गए। लंच हो गया।

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Sunday, December 18, 2022

मेरा बच्चा बहुत प्यारा है



बोधा स्तूप के बाहर तमाम कबूतरों का जमावड़ा था। एक कोने में सैकड़ों कबूतर जमा था। पास ही अनेक लोग कबूतरों के लिए दाने लिए बैठे थे। लोग उनसे लेकर दाना कबूतरों को डाल रहे थे।।कबूतर दाने खाते हुए, इठलाते हुए, टहलते हुए अचानक एकाध मिनट की उड़ान भरकर फिर वापस कबूतरों के बीच आ जाते।
कबूतरों के लिए इस तरह का इंतजाम कई जगह देखा है। पिछले साल जयपुर यात्रा में सड़क के डिवाइडर पर कई जगह देखा। लोग दाना बेंचने के लिए बैठे रहते हैं। आते-जाते लोग दाना खरीदकर उनको डालते है। शायद कबूतर भी उन दाना बेंचने वालों के होते हों। कानपुर में फूलबाग के सामने एक कोने में भी तमाम कबूतर इकट्ठा होते हैं। लेकिन यहां दाना बेचने वाला कोई नहीं बैठता। लोग अपने साथ दाना लाते हैं, कबूतरों को खिलाते हैं। कबूतरों की उड़ान एयरशो की तरह लगती है।
कबूतरों को उड़ते देखकर समीक्षा तैलंग Samiksha Telang की किताब का शीर्षक याद आया -कबूतर का कैटवॉक।
कबूतरों का जमावड़ा देखकर लगा कि जहां खाने-पीने का इंतजाम होता है , जीव वहीं जमा होते हैं। रोजी-रोटी के लिए ही लोग आज शहरों की तरफ भाग रहे हैं। शहर उजड़ रहे हैं।
आगे की एक दुकान पर बीसीसी लिखा था -बुद्धा कैसेट सेंटर (Buddha Cassette center)। दुकान अभी खुली नहीं थी।
आगे एक नुक्कड़ पर एक बच्ची जैसी दिखती महिला चाय बेंच रही थी। उसकी पीठ पर बच्चा था। बच्चे को पीठ पर सहेजे महिला लोगों को चाय बेंच रही थी। लोग उसके पास खड़े होकर या पास के चबूतरे पर बैठकर चाय पी रहे थे। हमने उससे बात करके की मंशा से चाय ली और चाय पीते हुए बात करते रहे। वह भी चाय बेंचते हुए, चाय पीते हुए बतियाती रही। रेशमा तमांग नाम था उसका।
रेशमा ने बताया कि दस किलोमीटर दूर घर है उसका। सुबह तीन बजे उठकर चाय बनाती है। घण्टे भर की दूरी तय करके चाय बेंचने आती है। चाय बेंचकर वापस जाती है। पति कमाई करने के लिए सऊदी अरब गया है। अपना खर्च चलाने के लिहाज से चाय बेचने का काम शुरू किया है। यह बात उसने विदेश गए अपने पति को नहीं बताई है यह सोचकर कि -'वह परेशान होगा।'
कुछ ही दिन पहले चाय बेंचना शुरू किया है रेशमा ने। पहले कुछ लोगों ने आपत्ति की लेकिन अब सब ठीक है। चार लीटर करीब चाय लाती है चाय। बिक जाने पर वापस चली जाती है। अपनी कमाई के एहसास से रेशमा बहुत खुश है। थोड़ा खर्च जुट जाता है।
चाय बेंचना कैसा लगता है पूछने पर रेशमा ने बताया -'बहुत अच्छा लगता है। बहुत खुश लग रहा है। चाय का बिक्री हो रहा है।'
बच्चा सहयोग करता है इस काम में पूछने पर रेशमा ने बताया -'बहुत सपोर्ट करता है। बहुत प्यारा बच्चा है मेरा। बिल्कुल परेशान नहीं करता। '
बात करते-करते रेशमा आसपास के लोगों को चाय भी देती जा रही थी। हम चाय पी चुके इस बीच रेशमा दूर किसी को चाय देने चली गयी। लौटकर आयी तब हमने उसको पैसे दिए। चाय पीकर अगला कहीं फूट न ले यह भाव कहीं नहीं दिखा उसके व्यवहार में। सहज विश्वास का भाव उसके चेहरे पर था।
अभाव में जीने के बावजूद उसके चेहरे पर या बातचीत में दैन्य भाव नहीं था। विनम्रता के साथ सहज रुप से बात करते हुए अपनी कठिनाई का जिक्र भले किया लेकिन हाय-हाय वाले भाव मे नहीं। यह भी कहा कि यह काम करते हुए बहुत अच्छा लग रहा है।
रेशमा के पास से चाय पीकर और अगले दिन फिर आने का वादा करके हम आगे बढ़े। उससे विदा लेने के पहले उसके फोटो और वीडियो उसको दिखाया। वह खुश हुई। बोली हमको भी भेज दीजिए। हमने पूछा कैसे भेजेंगे? उसने मेरे मोबाइल पर अपना फेसबुक खाता खोलकर दिखाया। बाद में मैंने देखा कि उसके फेसबुक में उसके बेटे के कई फोटो हैं। एक फोटो में वह बच्चे के साथ घुड़सवारी करते हुए विक्ट्री का निशान बनाये हुए है।
आगे एक जगह कुछ फूलों की दुकानें थीं। लोग फूल खरीद रहे थे। वहीं पास ही तमाम लोग बैठे थे। लोग उनको चाय पिला रहे थे। और भी सामान और कुछ लोग पैसे भी दे रहे थे।
मंदिर की परिक्रमा करते हुए लोग मंदिर की चाहरदीवारी पर लगे पूजा चक्र घुमाते जा रहे थे। कुछ लोग लेटकर भी परिक्रमा कर रहे थे। वे जमीन पर पेट के बल लेट जाते। अपनी लंबाई भर की जमीन नाप कर आगे बढ़ते और जहां उनका सर रहा होगा पहले वहां पैर रखकर फिर शाष्टांग हो जाते। हाथ में खड़ाऊ जैसी लकड़ी बांधे थे। उसी लकड़ी को जमीन पर रखकर वे परिक्रमा कर रहे थे। महिला और पुरुष दोनों ही इस तरह परिक्रमा करते दिखे। लोग उनको बचाकर , उनके बगल से निकलकर तेजी से परिक्रमा करते जाते।
आगे एक बेंच पर एक ब्रिटेन वासी बैठे मिले। बातचीत होने लगी तो बताया उन्होंने कि दस साल से यहां आते-जाते, रुकते-ठहरते रहते हैं। दुनिया में बढ़ती यांत्रिकता और मिलन-जुलन में आई कमी से नाराज से थे। यहां काठमांडू में लोगों का व्यवहार उनको अच्छा लगता है। ब्रिटेन कभी-कभी जाते हैं, दोस्तों से मेल-मुलाकात करने।
बातचीत करते हुए हमको चाय पिलाई उन्होंने। हमने पैसे देने चाहे लेकिन उन्होंने जिद करके खुद पैसे देने के लिए हजार का नोट निकाला। चाय वाले के पास फुटकर नहीं थे। बोले,-'ले आओ।' लेकिन कहीं मिलने का जुगाड़ नहीं दिखा। मैनें पैसे दे दिए। बोले -'कल हम पिलायेंगे तुमको चाय।'
घर से दूर दो मिनट की मुलाकात के बाद कोई चाय पिलाने, पैसा देने की जिद करे, न दे पाने पर अगले दिन पिलाने का वायदा करे यह कितना खुशनुमा एहसास है।
बातचीत करते हुए एक महिला को देखकर -' हेलो, हाउ आर यू कहकर वह उनसे बतियाने लगे।' हैट लगाये वह महिला मुझे परिक्रमा करते हुये दिखी थी। फिनलैंड, हेलसिंकी से आई थी। कुछ देर बात करने के बाद वह चली गयी। हम भी विदा लेकर चल दिये।
चलने के पहले हमने उनका फोटो दिखाया। उन्होंने मेल करने को कहा। मेल खाता लेकर फोटो भेजा वहीं खड़े-खड़े। डिकी नाम है उनका।
लिखते समय याद आया कि जीवन में बढ़ती यांत्रिकता की।लानत-मलानत करते हुए डिकी ने मेरे मोबाइल की तरह इशारा करते हुए ( यांत्रिकता के प्रतीक के रूप में) - 'दिस स्टुपिड मशीन।' डिकी की बात सुनकर हमने अपने मोबाइल को छिपाने की कोशिश की लेकिन तब तक वह सुन तो चुका ही था। मोबाइल समझदार था। उसने अपने को बेवकूफी के प्रतीक के रूप में इशारा किये जाने का बुरा नहीं माना। मोबाइल की जगह कोई प्रभावशाली आइटम होता तो उसकी बेइज्जती का मुद्दा उठाते हुए उसके समर्थक धरना, प्रदर्शन, हल्ला, गुल्ला शुरू कर दिए होते।
लौटते में स्तूप के अंदर गए। लोग पूजा कर रहे थे। दीप जला रहे थे। पूजा चक्र को घुमा रहे थे। पास ही ढेर सारा चूना जमा था। चूना भी पूजा के काम आता है।
स्तूप से बाहर निकलकर हम जिस रास्ते गये थे उसी रास्ते वापस आ गए। दुकानें खुलने लगीं थीं। गली गुलजार हो गयी थी। एक जगह ड्राइवर लोग अपनी कारें साफ करते दिखे। टूरिस्टों के लिए तैयार हो रहीं थी गाड़ियां।
होटल के पिछले दरवाजे को पीटकर खुलवाया। दरबान आया तो देखा कि वहीं पर घण्टी भी लगी है। अनजाने ही हमने हल्ला मचाया। दरबान ने भी हमको हमारी बेवकूफी का एहसास कराते हुए घण्टी के बारे में बताया। वो कहो होटल का दिहाड़ी का दरबान था। कोई स्थायी चौकीदार होता तो शायद कहता-' घण्टी दिखती नहीं तुमको, हल्ला मचाये हुए हो।'
होटल वापस लौटकर काम के लिये निकलने के लिए तैयार होने लगे।

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