Friday, December 23, 2022

गरीबी बहुत खराब चीज है

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 सड़क किनारे मूंगफ़ली की दुकानें गुलजार हैं। हर दूसरी दुकान के बाहर भट्टी पर रखी कड़ाही में मूंगफ़ली भुन रही हैं। एक दुकान पर मूंगफ़ली बेंचती बच्ची गोद में फ़ुदकते 'बच्चा खरगोश' से खेल रही है। बगल की दुकान पर बुजुर्ग दुकानदार पूरी गंभीरता से ग्राहक का इंतजार कर रहे थे। चेहरे पर गंभीरता वे इतनी गंभीरता से धारण किये थे मानो उनको डर हो कि चेहरे से गंभीरता का चोला उतरते ही ग्राहक हुसक जायेगा।

सड़क किनारे एक आदमी कम्बल लपेटे सर्दी को ललकारते हुये सो रहा था। सर्दी की हिम्मत नहीं हुई उसका सामना करने की। वह भागकर मेरे पास आ गयी। मैंने सर्दी से ठिठुरते हुये उसको अभयदान दिया -’डरो नहीं हमारे पास रहो। हम तुम्हारी इज्जत करते हुये तुम्हारी रक्षा करेंगे।’
बुजुर्ग गुप्ताजी अपने बेटे के साथ बैठे आग ताप रहे थे। बेटे ने मेरे लिये कुर्सी छोड़ दी। कुर्सी बीच से तार से सिली थी। मानो उसकी ओपेन हार्ट सर्जरी हुई हो। हमारे बैठने के बाद तसले में जमा आग को कुरेदकर उसमें से गर्मी ऊपर निकालने की कोशिश करने लगे। यह कोशिश ऐसे ही लगी जैसे चुनाव के समय पार्टियां अपने हिसाब से पुराने सियासी मुद्दे कुरेदकर माहौल अपने तरीके से सुलगाने की कोशिश करती हैं।
हमने गुप्ताजी से पूछा -’चश्मा नहीं बनवाया अब तक?’
”पैसे का इंतजाम कर रहे हैं। इंतजाम होते ही बनवा लेंगे। अभी काम चल रहा है।’ -वे बोले।
’ऐसा तो आप साल भर से कह रहे हैं।’- हमने कहा।
’हां लेकिन क्या करें। हर बार कोई न कोई नई समस्या आ जाती है।’ -गुप्ता जी बोले।
समस्या के बारे में पूछने पर बताया गुप्ताजी ने कि उनकी बड़ी बहू पिछले दिनों ब्लड कैंसर से गुजर गयी। घर वालों का पैसा उसमें खर्च हो गया। तफ़सील से बताते हुये जानकारी दी :
"बहू को पेट में दर्द रहता था। डॉक्टर बोला- ’पथरी है।’ पेट खोला तो बोला -’पथरी है ही नहीं।’ ले जाओ। जब दर्द बना रहा तो फ़िर ले गये। पता चला कि टीबी है। फ़िर जांच कराई तो पता चला कि ब्लड कैंसर है। डाक्टर ने बताया कि पथरी के आपरेशन के लिये पेट खोला गया तो उसी समय कैंची से पित्त की थैली कट गयी। उसी से ब्लडकैंसर हो गया। उसी में खत्म हो गयी। सबने कहा - ’केस करो उस डॉक्टर पर जिसने पथरी का आपरेशन किया।’ लेकिन हमने कहा-’ जब बहू ही नहीं रही तो केस किस लिये करें? इसके अलावा केस अगर करते भी हैं तो सब डॉक्टर तो आपस में मिले हैं। लिखकर दे देंगे कि इलाज में कोई गलती नहीं हुई।’
गुजरी बहू की एक बिटिया है। 11 साल की । बेटा, जिसकी पत्नी नहीं रही , सब्जी बेंचता है। डॉक्टर ने कहा कि कैंसर का इलाज मंहगा है तो वो बोला -’आप इलाज करो हम और कर्ज लेकर फ़ीस देंगे।’ लेकिन वह बच नहीं पाई। तीन लाख लग गये इलाज में।
हमको लगा कि सही में अगर दुनिया ईश्वर ने बनाई है तो वह उसको बड़ी लापरवाही से चला रहा है। दुनिया चलाने का उसका अंदाज लोकतांत्रिक देशों की सरकारों की तरह है। लोकतंत्र में सरकारें उस जनता का ख्याल नहीं रखतीं जिन्होंने वोट देकर सरकार बनाई ! उसी तरह भगवान भी अपने उन भक्तों की देखभाल कायदे से नहीं कर पाते जिनके दम पर उनको भगवान का दर्जा मिलता है।
दुनिया में भगवान पर सबसे ज्यादा भरोसा गरीब आदमी करता है। लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी भगवान गरीब के ऊपर ठेलता है। अगर भगवान को अपने गरीब भक्तों की जरा भी चिन्ता होती उनको उनकी हैसियत के हिसाब से बीमारी देता। ये क्या कि एक सब्जी वाले की बीबी को ब्लड कैंसर थमा दिया?
अगर भगवानों के चुनाव वोट देकर होते तो भगवान भी चुनावी सभाओं में वादा करते- ’अपन की सरकार बनते ही गरीबों को मंहगी बीमारियों से मुक्त कर दिया जायेगा।’
हमारे वहां बैठे हुये एक बच्ची आकर अलाव तापने लगी। नाम बताया - ’सिमरन।’ यह भी बताया कि प्यार से सब उसको अप्पू कहते हैं। इंटर बाद पढाई छूट गयी।
हमने कारण पूछा तो बोली - ’क्या बतायें आपको?’
हमने कहा-’ न बताओ कोई बात नहीं लेकिन या तो स्कूल दूर होगा या फ़ीस नहीं दे पाई होगी या मन नहीं लगता होगा तुम्हारा।’
दूरी वाली बात पर बोली-’ अरे स्कूल तो खोपड़िया में है।’
आगे कोई बात हो तब तक उसको बुलाने कोई आ गया। पता चला चाचा हैं।
अनमने मन से वह जाने के लिए उचकी। जाते-जाते रुक गयी। फ़िर बोली -’चलें नहीं तो चाचा यहीं खोपड़ी पर खड़े रहेंगे।’ चली गयी।
सिमरन के जाने के बाद गुप्ताजी ने बताया -इसका बाप कहीं बाहर मजूरी करता है। यहां चाचा के पास रहती है। पैसे नहीं इसीलिये पढाई छूट गयी। अब एक मोबाइल की दुकान पर काम करती है।’
आगे बोले-’ मोबाइल की दुकानों पर आजकल लड़कियों को काम मिलता है। लड़कियों को रखने से बिक्री ज्यादा होती है।’
हमने मजे लिये -’आजकल क्या पहले भी तो ऐसा था। तुम्हारी अम्मा भी तो कलट्टरगंज में पराठे बेंचती थी।’
अम्मा का जिक्र आते ही ८५ साल का बुजुर्ग फ़िर से फ़िर बच्चा बन गया। बताया कि उस समय की बात और थी। पराठे तौलकर मिलते थे। गुलगुले भी बनाती थीं अम्मा। सबको साथ लेकर चलती थीं अम्मा। हमको बहुत प्यार करतीं थीं। उनके जाने के बाद घर बिखर गया।
गुप्ताजी के बेटे के काम के बारे में पता किया तो पता चला कि उसकी पंचर की दुकान ठप्प है। कुछ दिन मसाला भी बेंचा लेकिन उसमें भी सिक्के चलते नहीं। सौ रुपये के सिक्के पर नब्बे रुपये के नोट मिलते हैं। इसीलिये वह भी छोड़ दिया। फ़िलहाल मंदिर की आमदनी पर भरोसा है।
आजकल धर्मस्थल तमाम लोगों के रोजी-रोटी का सहारा है। सरकारें तक मंदिरों-मस्जिदों-चर्चों के सहारे हैं। बहुत जलवा है धर्मस्थलों का।
गुप्ता जी के बेटे राम अचानक भावुक हो गये। बोले-’गरीबी बड़ी खराब चीज है। इंसान की जिन्दगी भार हो जाती है। ’
कुछ देर गरीबी के भंवर में फ़ंसने के बाद वो अचानक आशावादी हो गये। बोले-’ इंसान को अपने हिम्मत से मेहनत करके जीवन जीने


की कोशिश करनी चाहिये।’
रात हो रही थी। हम गुप्ताजी से जल्दी ही उनका चश्मा बनवाने का वादा करके लौट आये।

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