Tuesday, May 13, 2025

भारत-पाकिस्तान के बीच हुई झड़प के बीच शायरी

 हाल में भारत-पाकिस्तान के बीच हुई झड़प में तमाम कविताएँ/शायरी फिर से साझा हुई। लोगों द्वारा साझा की गयी पंक्तियों से उनकी तरफ़दारी पता चलती है। इसके अलावा भी लोगों ने खुद या दूसरों की लिखी आशु कविताएँ भी साझा कीं। यह साहित्य की सार्वभौमिक ताक़त को बयान करता है। कुछ कविताएँ यहाँ पेश हैं:

1. तू इधर उधर की न बात कर ये बता कि क़ाफ़िले क्यूँ लुटे- शहाब जाफ़री
2. जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध - दिनकर
3. क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो। - दिनकर
4. याचना नहीं, अब रण होगा,जीवन-जय या कि मरण होगा।- दिनकर
5. विनय न मानत जलधि जड़ , गए तीन दिन बीत
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होय न प्रीत - तुलसीदास
'विनय न मानत जलधि जड़' सेना के एक अधिकारी ने अपने वक्तव्य में प्रयोग की। उसमें दो शब्द इधर-उधर हो गए। जिन लोगों को यह दोहा याद होगा वो शायद सोचें कि देखकर रिकार्डिंग करते तो बेहतर होता। कोई कहेगा कि भाव देखिए शब्द नहीं।
इस सारे मसले पर सीजफ़ायर होने के बाद ख़ालिस कनपुरिया टिप्पणी का लिंक कमेंट में दिया है। देखकर आप भी कहेंगे - झाड़े रहो कलट्टरगंज।

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