Thursday, May 08, 2025

युद्ध की घटनाओं में मनोरंजन खोजना अमानवीय है

 1990-91 में अमेरिका ने इराक़ पर हमला किया था। अमेरिकी सेना इराक़ पर पैट्रियट मिसाइल दाग रही थी। हमले की खबरें टेलिविज़न पर दिखाई जा रहीं थीं। कुछ अमेरिकी अपने घरों में बैठे, काफ़ी,कोक, दारू पीते हुए दगती मिसाइलों को उल्लास भाव से देखते हुए दिखाए गए थे। हर गिरती मिसाइल के साथ खुश होते उल्लसित अमेरिकी दिखाए गए थे।

मिसाइल अटैक के आनलाइन प्रसारण के पीछे अमेरिका की मंशा बताई गयी थी कि वह अपनी मिसाइल का प्रचार भी करता जा रहा है। दुनिया को दिखाते हुए कि ये देखो हमारे पास है ये मिसाइल। खरीद लो अगर अगर ख़रीदना हो।
अमेरिका-इराक़ युद्द के प्रसारण से युद्द के मनोरंजन में तब्दील होना भी देखा दुनिया ने। अमेरिकी और दुनिया भर के लोग इस घटना को ऐसे देख रहे थे जैसे कोई पतंगबाज़ी का शो देख रहे हों।
इस युद्द में 25000 से 50000 हज़ार इराक़ी सैनिक मारे गए थे। कुछ हज़ार से लेकर एक लाख तक इराक़ी नागरिक हताहत हुए थे। अच्छा खासा सम्पन्न देश इराक़ बर्बादी के कगार पर पहुँच गया । 383 अमेरिकी भी मारे गए थे। मारे गए परिवारों के लिए युद्ध की याद अभी भी एक भयावह याद की तरह होगी।
पहलगाम में हुई आतंकवादी घटना के बाद भारत की सेना ने आपरेशन सिंदूर शुरू किया। पाकिस्तान के कई आतंकवादी अड्डे तबाह कर दिए। आपरेशन की खबरें आते ही भारत की सेना के पराक्रम की खबरें मीडिया और सोशल मीडिया में छा गयीं। अनगिनत लोगों ने पलपल की कमेंट्री सोशल मीडिया में साझा की। जिस अन्दाज़ में खबरें पोस्ट की लोगों ने उसको देखकर ऐसा लगा कि फ़ौजों ने अपने एक्शन की रिपोर्ट सबसे पहले उनको भेजी इसके बाद अपने अपने कमांडर को बताया।
लोग हमले की खबरें आई पी एल के साथ देख रहे हैं। मनोरंजन होता रहना चाहिए। घर में बैठकर चाय, काफ़ी पीते हुए युद्ध की खबरें देखते हुए लोग खुश हो रहे हैं और कह रहे हैं पाकिस्तान को घुस कर मारा। आह्वान कर रहे है -'तबाह कर दो। क़ब्ज़ा कर लो। नाम-ओ-निशान मिटा दो। हास्य कवि की चिरकुट तुकबंदियाँ करने वाले वीर रस में शिफ़्ट हो गए हैं। जो खुद तुकबंदियाँ नहीं कर पा रहे हैं वो पुरानी ओज कविताएँ खोजकर ला रहे हैं।
पढ़े-लिखे अनुभवी बुजुर्ग पत्रकार -सम्पादक लोग भी अपनी टिप्पणियाँ करते हुए बयानों की मिसाइलें दागते दिख रहे हैं। कुछ लोगों ने तो अपनी भाषा का स्तर इतना नीचा कर लिया है जिसे देखकर लगता है कि उनको डर है कि कहीं इसके बिना लोग उनको कम देश भक्त न समझ लें।
देश की सेना ने अपनी ब्रीफ़िंग में संयत भाषा में अपनी कार्यवाही की जानकारी दी। लोगों ने उसकी तारीफ़ की।
ऐसे समय में सोशल मीडिया पर अपनी जान जोखिम में डालने वाले कुछ लोग ऐसे भी हैं जो युद्ध को दोनों देशों के लिए ख़राब बताते हुए इसके फ़ौरन ख़ात्मे की बात कर रहे है। ऐसे लोगों की या तो लोग अनदेखी कर रहे हैं या उनको जमकर गरिया रहे हैं। भयंकर युद्द उन्माद में हैं लोग। युद्ध रोकने की अपील करने वाले और लोगों से सवाल करने वाले देश में छिपे हुए ग़द्दार भी बताती हुई भी कुछ पोस्ट्स आईं।
ऐसे समय में जब हमले में जब देश को एकजुट रहने की ज़रूरत है, कुछ लोग पाकिस्तान पर हमले के साथ-साथ देश के अल्पसंख्यक समुदाय पर सीधे या तिरछे वाचिक हमले करते जा रहे हैं।
युद्द और हमले की सही-ग़लत रिपोर्टिंग को अपने खाते से पोस्ट करने वाले लोग तरह-तरह के मीम, कार्टून, उपहास वाले डायलाग पोस्ट कर रहे है। ऐसा लग रहा है युद्द ने उनको ऐसा मौक़ा मुहैया कराया है जिसका पूरा मज़ा न लिया तो जन्म बेकार चला जाएगा।
इस बीच पाकिस्तान के जवाबी हमले में अपने देश के भी मारे जाने की खबरें भी आनी शुरू हुई हैं। मरने वालों में सेना के जवान, नाबालिग बच्चे और महिलाएँ भी हैं। हिंदू भी हैं मुसलमान भी।दीगर समुदाय के लोग भी होंगे। गोला-बारूद साम्प्रदायिक नहीं होते। वे जाति-धर्म पूछकर जान नहीं लेते। उनकी जद में जो आता है, मारा जाता है।
युद्द किसी भी समाज के लिए घातक और खतरनाक होता है। कहीं गिरती मिसाइलों, कहीं मरते लोग, कहीं ढहती इमारतें, कहीं बरबाद होते लोगों को देखकर खुश होंने से पहले यह सोचना चाहिए कि बरबादी की जद में अगर हम या हमारा परिवार या हमारे जानने वाले होते तो भी क्या हम इसी तरह खुश हो रहे होते।
फ़िलहाल कमान सेना के हाथ में है। उसको अपना काम करने दें। उसको सहयोग दें। लेकिन युद्ध की घटनाओं को मनोरंजन के लिए इस्तेमाल करने से बचें। युद्ध किसी मसले को निपटाने का आख़िरी विकल्प होता है तो युद्ध की घटनाओं में मनोरंजन खोजना अमानवीय है।
यह मेरी सोच है। आपकी अपनी सोच अलग हो सकती है।

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