Friday, May 30, 2025

गली में समय एकदम ठहरा हुआ सा दिखा


 अमीनाबाद में किताब की खरीदारी करते दोपहर हो गयी थी। घर चलने का निर्णय कर चुके थे लेकिन फिर मन किया कि चौक चलकर नागर जी का घर देख ही लें। 'मन की बात' कितनी वाहियात लगे लेकिन उसको टालना मुश्किल होता है। चल दिये चौक की तरफ।

चौक के लिए भी पहले सोचा कैब कर लें लेकिन फिर पैदल ही चल दिये। पैदल चलने की वजह यह सोच थी कि रास्ते के नजारे देखते चलेंगे।
रामा बुक स्टोर के लिए आते समय पास में जगत सिनेमा दिखा था पते में। उसके पहले छेदीलाल धर्मशाला दिखी। ईश्वरी प्रसाद वर्मा ट्रस्ट द्वारा संचालित। ईश्वरी प्रसाद वर्मा जी के बारे में जानकारी लेने के लिए नेट पर सर्च किया तो सबसे पहले ईश्वरी प्रसाद वर्मा ट्रस्ट के एक मुकदमे के बारे में जानकारी मिली , दूसरे में 'पटना कलम' के चित्रकार के नाम से परिचय मिला। लेकिन वे कभी लखनऊ आए नहीं । पता नहीं चला ईश्वरी प्रसाद जी के बारे में जिनके नाम यह ट्रस्ट है। धर्मशाला देखने से ऐसा लग रहा था कि यहां लोग आते, ठहरते हैं। ऐसी इमारतें बनना अब बंद सा हो गया है। इसकी जगह लोग अब होटल या मॉल बनवाते हैं।
छेदीलाल धर्मशाला के बगल में ही जगत सिनेमा हाल है। सिनेमा हाल में अमिताभ बच्चन की फ़िल्म नमकहलाल चल रही थी। सन 1982 में बनी फ़िल्म 43 साल बाद भी देखी जा रही है।
पुराने समय के सिनेमा हाल की तरह बाहर ही टिकट काउंटर था। वहाँ एक पठान टाइप का चौकीदार मौजूद था। उसने बताया कि आज आख़िरी शो है नमकहलाल का। कल से यहाँ भोजपुरी फ़िल्म 'कईसे हो जाला प्यार' लगने वाली है।
सिनेमा हाल के ऊपर 'सुंदर पिक्चर पैलेस' लिखा था। चौकीदार ने बताया कि पहले सिनेमा हाल का नाम सुंदर सिनेमा ही था। बाद में जगत टाकीज हुआ नाम। चौकीदार
से और जानकारी लेने की कोशिश की तो उसके तेवर थोड़ा सख्त से हो गए । उसके लहजे से लगा मानो कह रहा हो कि देखना हो तो टिकट लेकर फ़िल्म देखो वरना आगे बढ़ो । हमें पिक्चर देखनी नहीं थी लिहाजा आगे बढ़ गए।
आगे बढ़ते हुए एकदम निखालिश लखनौवी चाल वाली दुकानें मिलती गयीं। कहीं कबाब , कहीं बिरियानी , कहीं पराठा के दुकानें। एक गली में कई कागज की दुकानें दिखीं। A4/A3 साइज के कागजों के बंडल लादे इधर -उधर आते-जाते दिखे। आगे कुछ चिकन की दुकानें भी मिलीं। लखनऊ के चिकन के कपड़े मशहूर हैं ।
सड़क पर एक जगह मेज़ पर दुकान का पोस्टर लटकाये चाय वाला भी दिखा। उसके पोस्टर पर चाय शायरी लिखी थी :
सुनो ये हकीकत बहोत पुरानी है ,
चाय आज भी दिल के राजधानी है।
चाय वाले से पूछा ये शायरी कहाँ लिखी ? वो बोला -" प्रिंटर ने छाप दिया। हमको कुछ नहीं पता।" यह कुछ ऐसा ही हुआ जैसे माननीय लोग बिना मतलब समझे लिखा हुआ भाषण पढ़ देते हैं । पोस्टर भले बना लिया हो लेकिन चाय के दुकान का नाम नहीं लिखा था पोस्टर पर। बताया -"नाम नहीं तय किया अभी।" बिना नाम के चाय बेचने वाले के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही न हो जाये हम कुछ देर यही सोचते रहे।
दुकान के पास खड़ा एक लड़का दुकान वाले से जिस 'लोकभाषा' में बात कर रहा था उस तरह से बातचीत करते हुए अगर कोई माननीय कैमरे के सामने पकड़ा जाता तो टीवी चैनलों/यूट्यूबरों के लिए कम से कम हफ़्ते भर की बहस का और सौ -पचास लेखकों/व्यंग्यकारों के लेखों इंतजाम हो जाता। लेकिन दोनों बालक सेलिब्रिटी कहलाने के चोंचले से दूर थे इसलिए उनकी बतकही वहीं की फिजाओं में खो गई।
इससे एक बार फिर साबित हुआ कि आम इंसान की आवाज तो छोड़िये , उनकी गाली गलौज तक कहीं नहीं सुनाई देती। जिस तसल्ली से निश्चिंत होकर वे आपस में गाली गलौज कर रहे थे उससे लगा कि उनको यूसुफ़ी साहब के बात अच्छे से पता है -"गाली, गिनती और गंदा लतीफ़ा तो अपनी मादरी ज़बान में ही मज़ा देता है।"
चलते-चलते थक गए और चौक अभी भी ढाई किलोमीटर दूर था। सुस्ताने के बहाने एक ठेले वाले के पास रुककर मट्ठा पिया। उससे चौक का रस्ता पूछा। उसने वही रास्ता बताया जो पहले के दस लोगों ने बताया था। लेकिन उसने सलाह भी दी कि टेम्पो में चले जाओ , धूप तेज है।
मट्ठे वाले की सलाह मानकर हम सामने से आते एक टेम्पो पर बैठ गए। उसमें पहले से एक महिला अपने बच्चे के साथ बैठी थी। बैठते ही हमने बच्चे से बात शुरू करने के लिहाजा से पूछा -"इसके क्या ले जा रहे हो ?" बच्चे ने अपने साथ के पोटली को जकड़ते हुए हल्की सी बेरुख़ी से बताया -"बिरियानी।" यह कहकर बच्चा चुप हो गया। उसके साथ की महिला , जो शायद उसकी अम्मी रही होगी , ने अपने चेहरे पर नक़ाब चढ़ा लिया। उन दोनों को चुप देखकर अपन भी चुप हो गए। टेम्पो भी चुपचाप आवाज करता हुआ आगे बढ़ता रहा। थोड़ी देर में चौक भी आ गया।
चौक पहुंचकर हमने अँगड़ाई लेते चौराहे का मौक़ा मुआयना किया। चौराहे पर लोग ऐसे भागते हुए जा रहे थे मानों जरा देर हुई तो बवाल मच जाएगा। रास्ता पूछते हुए आगे बढ़ने पर खुनखुन जी ज्वेलर्स की हवेली दिखी। कभी बुलंद रही हवेली अब मार्गदर्शक इमारत सरीखी दिख रही थी । अब वहाँ किसी स्कूल का बोर्ड लगा था।
खुनखुन जी ज्वेलर्स वाली हवेली के बारे में बताते हुए चौराहे के ठेले वाले ने बताया था -"उनके वारिस सब मर मरा गए। हवेली वीरान है अब ।" यह एक आम आदमी के एक हवेली के लोगों के बारे में बयान था ।
सड़क पर तमाम फलों , सब्जियों और खाने-पीने के दुकानें देखकर लगा कि किसी खाते-पीते इलाके में आ गए हैं।
Alankar Rastogi ने जानकारी दी थी कि उनके स्कूल के पीछे ही नागर जी का घर है। हम गूगल मैप देखते हुए एक गली में घुस गए। आगे पूछा तो एक दुकान वाले ने बताया -"आप ग़लत आ गए। उधर से भटक जाएँगे।" अपनी दुकान पर खड़े उस आदमी के आधे दाँत ऊपर के और आधे दाँत नीचे के जिस तरह नदारद थे उसको देखकर लगा उसके ऊपर नीचे के दाँत मिलकर अंग्रेजी का Z बना रहे हो मुँह में ।
उसने हमको वापस लौटकर अगली गली से जाने को कहा। साथ ही यह भी -" वहाँ कोई गली में किसी से भी पूछा लेना बता देगा नागर जी का घर कहाँ है। उनके घर के सामने ही चिकन की दुकान है।"
लौटकर सड़क पर आकर अगली गली की तरफ़ बढ़े। रास्ते में अमृत लाल नागर सभागार दिखा। सभागार की बाहरी छत उड़ी हुई थी । लखनऊ विकास प्राधिकरण के जिम्मे सभागार की देखभाल का जिम्मा होगा। सभागार के हाल देखकर लगा कि लखनऊ विकास प्राधिकरण के देखभाल का जिम्मा किसी क़ाबिल इंसान के हवाले है ।
आगे गली में घुसने के बाद एक चिकन के दुकान दिखी। वहाँ काम करनेवाली एक बच्ची ने बताया कि यही सामने अमृत लाल नागर जी का घर है। उसने बताया -"बहुत बड़ा , सात आँगन का, घर है। यहाँ से लेकर अगली गली तक है।"
इससे ज्यादा वह कुछ बता नहीं पायी। उसके अनुसार यह घर नागर जी का ही है। जबकि लोगों के जानकारी के हिसाब से नागर जी यहाँ किराए पर रहते थे। घर के दरवाज़े पर दो बड़े ताले लटके देखकर लगा मकान पर कब्जे का भी कोई विवाद है।बच्ची ने बताया कि नागर जी के घर वाले बंबई में रहते हैं। बहुत दिन से आए नहीं । उसने यह भी बताया कि उसने नागर जी का घर अंदर से नहीं देखा है।
जिस घर के बारे में अनगिनत किस्से सुन रखे हों , जहाँ पर हिन्दी साहित्य के अनेक ग्रंथ रचे गए हों वहाँ ताले लटके हुए थे। मकान के ईंटें उखड़ रही थीं।खंडहर होने की तरफ़ बढ़ते मकान को देखते रहे। कुछ देर वहाँ ठहरकर लौट लिए।
लौटते हुए अग्रसेन इंटर कालेज देखते हुए आए। यहाँ अलंकार पढ़ाते हैं। आजकल स्कूल बंद है। स्कूल के आँगन से होते हुए आए। प्रिंसिपल के कमरे के सामने स्कूल के प्रार्थना लिखी हुई थी :
हे प्रभु सद्बुद्धि दो , सद कार्य ही हम कर सकें
सद मार्ग पर चलते रहें , हम नियम पालन कर सकें।
प्रार्थना के रचयिता विद्यालय के प्रधानाचार्य रहे हरिनेंद्र श्रीवास्तव 'रोशन ' थे। वे यहाँ 1962 से लेकर 1989 मतलब 27 साल प्रिंसीपल रहे। आजकल इतने दिन किसी स्कूल का प्रधानाचार्य बने रहना दुर्लभ बात है।
स्कूल बंद था। वहां मौजूद स्टाफ ने बताया स्कूल का एडमिशन जुलाई में होगा । तब आना। हमने बताया कि हम ऐसे ही आए। स्कूल के गेट पर दो कुत्ते ऊँघ रहे थे। शायद उनको भी स्कूल खुलने का इंतजार था।
बाहर आकर चौक के गलियों से होते हुए आगे बढ़े। गलियाँ का संकरापन देखकर यूसुफ़ी साहब का जुमला याद आ गया -"उस शहर की गलियां इतनी तंग थीं कि अगर मुख्तलिफ़ जिंस (विपरीत लिंगी) आमने-सामने से आ जायें तो निकाह के अलावा कोई गुंजाइश नहीं रहती।"
यहाँ हालाँकि ऐसा कुछ नहीं हुआ। अलबत्ता एक जगह मोटरसाइकिल पर खड़ा आदमी गली में खड़े दूसरे आदमी से बतियाता दिखा तो लगा कि उनके रहते कोई तीसरा वहाँ से नहीं गुज़र सकता। हमारे वहाँ से गुजरने पर दोनों ने थोड़ा टेढ़े होकर हमको निकलने दिया।
गली में समय एकदम ठहरा हुआ सा दिखा। एक दम ऊँघता हुआ , छुट्टी मनाता समय। दोपहर भी मानों लंच लेकर आराम फ़रमा रही थी गली में। किसी को कोई जल्दी नहीं। न आने की न जाने की । गली में मोटरसाइकिलें भी तिरछी होकर आराम से ऊँघती दिखी।
एक दुकान पर बैठे एक आदमी ने गली से कान का मैल निकालने वाले को जाते देखा तो गद्दी से सरककर नीचे आ गया और अपना कान 'कनमैलिये' के हवाले कर दिया। कान का मैल निकालने वाला उसका कान खोदने लगा।
गली से बाहर आकर हमने पहले सोचा कैब करें। कैब बुक करने का काम उबर के हवाले करके हम वहीं ठेले पर बिक रहे फ़ालसे लेकर खाने लगे। उबर का एप इधर -उधर घूमता रहा। उसको हमारे लिए कोई कैब नहीं मिली। इसके बाद हम सामने निशातगंज के लिए आवाज लगाने वाले टेम्पो में लपक कर बैठ गए। ठेले वाले ने बताया था कि यहां से निशातगंज और फिर वहाँ से इंदिरा नगर के लिए टेम्पो मिल जाएगा।
हमारे बाद दो महिलायें टेंपों में घुसते ही टेम्पो वाले से बोली -"साथ में बच्चा है उसके पैसे न लेना।" टेम्पो वाले ने फौरन हाँ करते हुए कहा-"बच्चे को गोद में बैठा लेना।" बच्चा अगली सवारी आने तक सीट पर बैटने के इरादे से बैठते ही उछल गया। सीट धूप से नाराजगी में गरम हो रही थी। कुछ देर बाद सामने की सीट पर एक और महिला आकर बैठ गई। बुर्का पहने महिला के साथ दो छोटे बच्चे थे ।उसने बच्चों के किराए के बारे में पूछा भी नहीं। तसल्ली से बैठ गई। उनमें से एक बच्चा खड़े-खड़े ऊँघ रहा था। कुछ देर बाद वह अपनी अम्मी के कंधे से टिककर खड़े-खड़े सो गया ।
निशातगंज आकर हमने टेम्पो बदला। इंदिरा नगर आए। चौंक से इंदिरा नगर का कैब का किराया 200 रुपए बता रहा था । टेम्पो से आने में कुल जमा 25 रुपये लगे (चौक से निशातगंज 15 रुपये, निशातगंज से इंदिरा नगर 10 रुपए) । इस तरह हमने लौटते हुए 175 रुपए बचाए ।
इंदिरानगर से पैदल टहलते हुए घर आ गए।

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