[आज प्रसिद्ध क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल जी का जन्मदिन है। तुर्की के राष्ट्रपति अतातुर्क कमाल पाशा बिस्मिल की क्रांतिकारी चेतना से इतना प्रभावित थे कि उन्होंने तुर्की में एक बिस्मिल के नाम से बिस्मिल शहर बनाया। इस बारे में प्रसिद्ध लेखक सुधीर विद्यार्थी जी Sudhir Vidyarthi से प्राप्त जानकारी यहाँ पेश है। ]
तुर्की में एक राज्य है दियारबाकिर, जिसका अर्थ होता है 'बागियों का दियार’। हिंदी में इसे विद्रोहियों का इलाका या भूखंड कहा जा सकता है। तुर्की के दक्षिणी-पूर्वी अनातोलिया क्षेत्र के इस दियारबाकिर प्रांत के पूर्व में बिस्मिल के नाम पर एक जिला है। यह वही भारतीय क्रांतिकारी रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ हैं, जिन्हें नौ अगस्त, 1925 के प्रसिद्ध 'काकोरी कांड’ में अपने तीन अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ 19 दिसंबर, 1927 को ब्रिटिश हुकूमत ने फांसी पर चढ़ा दिया था। दियारबाकिर में 'बिस्मिल जिला’ और 'बिस्मिल शहर’ की स्थापना 1936 में अतातुर्क कमाल पाशा ने की थी। बिस्मिल का नाम उनकी शहादत के समय तक हिंदुस्तान में क्रांति का प्रतीक बन चुका था और कमाल पाशा उनसे बहुत प्रभावित थे।
रामप्रसाद 'बिस्मिल’ का क्रांति और कलम से समान रिश्ता था। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं। अपनी शहादत से दो दिन पूर्व तक बिस्मिल गोरखपुर के जेल अधिकारियों की नजर बचाकर जिस आत्मकथा को लिपिबद्ध करते रहे, उसमें कमाल पाशा का बहुत सम्मान के साथ जिक्र है। कमाल पाशा के प्रति बेहद आस्थावान बिस्मिल अपने साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष को शायद वैसे ही किसी मुकाम तक ले जाना चाहते थे। 1936 में केन्या से भारी संख्या में तुर्की भाग कर आए कुर्द विस्थापितों को बसाने के लिए जिस जिले को बनाया गया था, उसका नाम बाद में तुर्की के राष्ट्रपति कमाल पाशा ने शहीद रामप्रसाद 'बिस्मिल’ के नाम पर रखा। इस जिले का मुख्यालय बिस्मिल शहर है। यह पहाड़ियों के बीच बसी एक खूबसूरत बस्ती है, जो अपने आकर्षक पार्कों के लिए देश भर में प्रतिष्ठित है। यहां के अधिकांश निवासी कुर्द ही हैं। बिस्मिल शहर की जनसंख्या 60,150 है।
शायद कमाल पाशा का क्रांतिकारी अभियान ही वह बिंदु था, जिसने बिस्मिल को अतातुर्क की ओर आकर्षित किया और वे 'विजयी कमाल पाशा’ के घोर प्रशंसक बन गए। बिस्मिल और अतातुर्क कमाल पाशा का रिश्ता दो देशों की क्रांतिकारी चेतना का अनूठा संगम है, जब इन जमीनों पर साम्राज्यवादी वर्चस्व के विरूद्ध सशस्त्र संघर्ष जारी थे। मैं बार-बार सोचता हूं कि क्या बिस्मिल कमाल पाशा की तरह साम्राज्यवाद से सशस्त्र संघर्ष करना चाहते थे। मुकदमे के दौरान बिस्मिल की यह आकांक्षा थी कि उन्हें किसी तरह जेल से छुड़ा लिया जाए। उनका हौसला था कि वे कैद से बाहर आकर साम्राज्यवाद से एक बार हथियारबंद संघर्ष करें। तो क्या बिस्मिल कमाल पाशा बनना चाहते थे या उनके भीतर कमाल पाशा बनने की संभावनाएं थीं? हालांकि फांसी के फंदे तक पहुंचने के अंतिम कुछ क्षणों में उन्हें तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के बीच क्रांतिकारी आंदोलन की सफलता पर भी संदेह होने लग गया था। क्रांति के लिए जैसे सहयोग की अपेक्षा उन्होंने अपने समय में नौजवानों से की थी, वह किसी भांति पूरी नहीं हुई।
उत्तर भारत में क्रांतिकारी संगठन के ढांचे को मजबूती से खड़ा करने के लिए उन्होंने बहुत श्रम और शक्ति व्यय की, पर वह बार-बार निराश हुए। ऐसे में उन्हें जनता को शिक्षित बनाने की जरूरत शिद्दत से महसूस होती रही। वह मानने लग गए थे कि शायद शिक्षा के अभाव में उनके क्रांतिकारी प्रयासों को पर्याप्त स्पेस नहीं मिल सका। अपनी इसी सोच के चलते उन्होंने अंत में कहा भी था कि नवयवुकों को मेरा अंतिम संदेश यही है कि वे रिवाल्वर या पिस्तौल अपने पास रखने की इच्छा को त्याग कर सच्चे देशसेवक बनें। पूर्ण स्वाधीनता उनका ध्येय हो और वे वास्तविक साम्यवादी बनने का प्रयत्न करते रहें। बावजूद इसके बिस्मिल धर्म के मामले में कमाल पाशा के निकट नहीं दिखाई पड़ते हैं।
उन्हें अपने विचारों और योजनाओं को अमली जामा पहनाने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। कमाल पाशा को हमारे देश के काकोरी कांड के एक क्रांतिकारी सैनिक और नेतृत्वकर्ता ने बेहद प्रभावित किया और वह उस प्रभामंडल की छाया तले तुर्की की धरती पर 'बिस्मिल शहर’ का निर्माण संभव कर पाए। यह एक तरह से बिस्मिल की क्रांतिकारी चेतना का विस्तार भी है।
पिता मुरलीधर और मां मूलमती के बीच खड़े मासूम बालक रामप्रसाद बिस्मिल का एक दुर्लभ चित्र सुधीर विद्यार्थी जी के सौजन्य से।
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