आजकल ईरान-इजरायल-अमेरिका पर इतनी एक्सपर्ट जानकारी सोशल मीडिया, यूट्यूब, अखबार और दीगर माध्यमों से मिलती है कि समझ में नहीं आता किसके सहमत हुआ जाये। व्हाट्सएप ग्रूपों पर इतना गुरु गंभीर ज्ञान का सागर लहराता है कि किनारे खड़े-खड़े ही लगता है इसमें उतरे तो डूब जायेंगे।
हर पक्ष के अपने तर्क है। ईरान , इजरायल और अमेरिका समर्थकों के अपने तर्क हैं। लेकिन यह बात तय है कि यह लड़ाई दुनिया की बड़ी आबादी के आम लोगों के ख़िलाफ़ है। दुनिया की बहुसंख्यक आबादी चाहती है कि यह लड़ाई ख़त्म हो। इस लड़ाई का निर्णय लेने वाले लोग संख्या में कम हैं लेकिन चालाकी, धूर्तता और सिस्टम पर कंट्रोल के चलते निर्णय का अधिकार उन्होंने अपने हाथों में कर रखा है। इजरायल, ईरान या अमेरिका तीनों देशों की बड़ी आबादी इन लड़ाइयों के ख़िलाफ़ है लेकिन तीनों ही राष्ट्रवाद की आड़ में लड़ाई में जुटे हैं। ये भी शायद अपने से बड़ी ताकतों की कठपुतलियाँ हैं।
बाक़ी देशों में भी अधिकतर चालाकी, धूर्तता से क़ब्ज़ा जमाये हुए लोग सरकारें चला रहे हैं। दुनिया की बड़ी आबादी सबको चुपचाप देखती हुई अपने-अपने हिसाब से अपडेट हो रही है। सोशल मीडिया नहीं होता तो कहाँ जाते तमाम लोग। इतना ज्ञान का सागर जो यहाँ उफनाता रहता है वह कहाँ लहराता ?
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