हमने मई महीना खत्म होने के दो दिन पहले से स्वीमिंग सीखना शुरू किया। पहले हफ़्ते के बाद हाथ और पांव पानी में चलाने लगे। शुरुआत मिक्स्ड स्ट्रोक से की। हाथ ब्रेस्टस्ट्रोक और पांव फ्री स्टाइल में। हाथ और पांव की समस्या के कारण यह 'गठबंधन स्ट्रोक' चुना। फ्री स्टाइल में कंधे उखड़ जाने का डर था। ब्रेस्ट स्ट्रोक में जांघ के जोड़ में दर्द था। तैराकी शुरू हो गई। लेकिन सर पानी के ऊपर नहीं आता था।
समय के साथ जांघ का दर्द खतम हो गया। शायद स्वीमिंग से फ़ायदा हुआ। वाटर थेरेपी जैसा कुछ। हम पाँव भी ब्रेस्ट स्ट्रोक में चलाना शुरू कर दिए। लेकिन फ्री स्टाइल में पांव चलाना भूलने और ब्रेस्ट स्ट्रोक में सीखने में हफ्ता से ज़्यादा लग गया। अब हाथ और पांव ब्रेस्ट स्ट्रोक में चलने लगे हैं। कभी ग़लत चलता है तो फ़ौरन अंदाज़ा हो जाता है। लगता है 'मिसस्ट्रोक' हो गया।
सीखने के दो हफ़्ते बाद एक कोच ने PC का सुझाव दिया। PC मतलब पर्सनल कोचिंग। सुझाया -'आप फलाने सर से PC ले लीजिए। जल्दी सीख जायेंगे।' हमने सुझाव सुन लिया लेकिन अमल में नहीं लाए। हमको कोई हड़बड़ी नहीं थी। जल्दी सीखकर क्या करेंगे? सोचा आराम से सीखेंगे। जल्दी सीखने में लफड़ा यह भी गलतियाँ कम होंगी। ग़लतियाँ नहीं होंगी तो मजा नहीं आयेगा। उन ग़लतियों से सीखने का मौक़ा गँवाना कोई समझदारी थोड़ी है।
PC से हमको अपनी कक्षा 11 के एक किस्से की याद आ गई। हम हिन्दी मीडियम से कक्षा 10 पास कर के अंग्रेजी मीडियम में कक्षा 11 में आए थे। बीएनएसडी के F1 सेक्शन में। उस समय हाई स्कूल के यूपीबोर्ड के 75% से ऊपर नंबर लाए बच्चे F1 में पढ़ते थे। शुरुआती दिनों में लेक्चर अंग्रेजी समेत बाउंसर जैसे निकलते रहे। जो बोर्ड में लिखते गुरुजी वही समझ में आता। बाक़ी हवा हवाई हो जाता। तिमाही इम्तहान हुआ। फिजिक्स में चालीस में नौ नम्बर थे। मतलब फेल। हाईस्कूल में अपने स्कूल का टॉपर रहा बच्चा तीन महींने बाद फेल हो गया। सिर्फ़ माध्यम बदलने से।
कॉपी दिखाई गई। पता चला एक चार नम्बर का सवाल जांचने से रह गया था। हमने सवाल सही भी किया था। चार नम्बर जोड़कर 13/40 नंबर हो गए। फेल होने से बच गए। बाद में पता चला गुरु जी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हैं। कई लड़कों ने उनसे पढ़ना शुरू कर दिया। हमसे भी कहा गया। लेकिन हमारे पास न गुजाईश थी न मन। हमने ट्यूशन ज्वाइन नहीं की। बस मेहनत करते रहे। उस समय की चलन में जितनी भी किताबें थीं सबके सवाल लगाकर अभ्यास करते रहे। उसका फ़ायदा हुआ कि बिना ट्यूशन पढ़े पास होते रहे। बाद में तो बाजपेयी सर के संपर्क में आने पर उत्साह भी बढ़ गया। मेहनत और उत्साह के संगम का फल यह हुआ कि इंटर में यूपीबोर्ड की मेरिट लिस्ट में भी नाम आया।
हमने तो PC नहीं ली। लेकिन कोच लोग कुछ लोगों को जिस तरह तल्लीनता से सिखाते हैं उससे लगता है कि उन लोगों ने PC ली है। कोच लोग उन कुछ लोगों को हाथ पकड़कर, सर और पैर के मूवमेंट सिखाते हैं उससे लगता है कि वे उन लोगों के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम कुछ पूछते हैं तो हाँ, ना में बताकर उनको सिखाने में लग जाते हैं। हमारे हिस्से पूल और पानी ही आता है। लेकिन हमको कोई शिकायत नहीं। हमने ख़ुद को अपना कोच नियुक्त कर रखा है। पर्सनल कोच। बिना फीस का कोच। हर स्टेप पर अपनी कॉपी जांचते हैं और कमियाँ पकड़कर सही करते हैं। कभी-कभी वहाँ मौजूद कोच से अपने मूवमेंट के बारे में पूछते हैं तो वो दूसरी तरफ़ या अनमने अंदाज़ में देखकर बताते हैं -' ठीक है। साँस लीजिए। सर थोड़ा और ऊपर उठाइये। सीख जायेंगे।'
हम सोचते हैं -' सीख तो जायेंगे ही। कोई नाम नहीं मुश्किल, जब किया इरादा पक्का।'
आज थोड़ा देर से पहुँचे पूल। दस मिनट देर। लेकिन आज सर पानी से बराबर ऊपर उठने लगा। साँस पानी के अंदर नाक से छोड़ते हुए सर उठाने लगे। थोड़ी साँस लेने भी लगे। लेकिन पूरी तरह साँस लेना अभी आया नहीं। असल में जिस समय सर ऊपर होता है उस समय पैर तमाशबीन की तरह ठहर जाते रहे। पैरों को लगता होगा कि पानी से सर बाहर आना कितनी ऐतिहासिक घटना है। इसको देखना जरूरी है। लिहाजा वे ठहरकर शायद नजारा देखने लगते। इसके चलते शरीर पानी में डूबने लगता। हम खड़े हो जाते।तैरना स्थगित हो जाता।
दूसरी समस्या यह महसूस की हमने हम जिस समय सर पानी के ऊपर उठाते हैं ठीक उसी समय पाँव पीछे की तरफ़ करते हैं। दोनों काम एक साथ होने से फ्लोटिंग को समय कम मिलता है। शरीर टेढ़ा होकर पानी में न्यूनकोण (45 डिग्री) बनाकर खड़ा हो जाता है।जबकि होना यह चाहिए कि सर ऊपर उठाकर साँस लेने के बाद पांव पीछे करने चाहिए ताकि पानी में संतुलन बना रहे। फ्लोटिंग होती रहे। इस पर मेहनत करना है। एकाध, दो-चार, पाँच-सात दिन में हो जाएगा।
हमारा तैराकी रोचनामचा पढ़कर हमारे कुछ मित्र भी पानी में उतर चुके हैं। तैरना सीखने लगे हैं। हमारे कानपुर के मित्र राजीव टंडन जी ने तो तैरने के साथ -साथ हर गतिविधि का विश्लेषण भी करना शुरू कर दिया है। तैरते हुए टिल्ट क्यों होता है, ये क्यों, वो कैसे। कल सुनीता सनाढ्य पांडेय जी ने भी बताया कि वे अपने जीवन-जोड़ीदार के साथ तैरना सीख रही हैं। इसके अलावा और कई मित्रों ने तैरना सीखने के बारे में सोचना शुरू कर दिया। शायद जल्दी ही वे भी स्वीमिंग पूल पहुंचे।
हमारी यह 'तैराकी कुंडली' हमारे मित्र Parveen Goyal ने बनाकर हमारी पिछली पोस्ट की टिप्पणी में लगाई थी। हम इसे अपने पोस्ट में लगा रहे हैं। इसमें तैराकी के टिप्स भी हैं और सीखने का सूत्र वाक्य भी - ' उम्र सिर्फ़ एक संख्या है। सीखने की कोई उम्र नहीं होती।'
आप भी सोच रहे हैं तैरना सीखने के बारे में? सीखिये। मजेदार है।

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