आज सबेरे तैरने के लिए समय पर निकले। हमारे आगे दो महिलायें साइकिल पर जा रहीं थीं। शायद काम पर। हमने सोचा आगे बढ़कर उनके काम के बारे में बतियायें। लेकिन उनको आपस में बतियाता देखकर नहीं बढ़े। एक बच्ची सड़क पारकर रही थी। उसको देखकर केदारनाथ सिंह कविता याद आ गई :
"मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है
क्योंकि इस तरह एक उम्मीद -सी होती है
कि दुनिया जो इस तरफ है
शायद उससे कुछ बेहतर हो सड़क के उस तरफ़।"
बच्ची दिन में कई बार सड़क पार करती होगी। उसके लिए दुनिया एक जैसी रहती है।
आगे एक बच्चे मोटरसाइकिल पर बैठा था। बाइक की चाबी मुँह में दबाये वह इधर-उधर ताक रहा था। उसके माँ-बाप जमीन पर बैठे बतिया रहे रहे। मुझे लगा ऐसे ही किसी मामले में चाबी मुँह में चली जाती है। फिर उसको निकलने की जद्दोजहद होती है। कभी -कभी फँस भी जाती है चीजें गले में । फिर ऑपरेशन होते हैं।
डिवाइडर पर बैठे मजदूर लोग सुबह के होने का इंतज़ार कर रहे थे। कुछ लोग मोबाइल देख रहे थे। कुछ बतिया रहे थे। कुछ बीड़ी पी रहे थे। कुछ लोग आते-जाते लोगों को ताक रहे थे। सामने एक छुटकी गुमटी में महिला ठसक के साथ मजदूरों को सामान बेच रही थी। उसके पान खाये मुँह से आत्मविश्वास की छटा दर्शनीय थी।
पूल पर ठीक आठ बजे पहुँचे। उतर गए पानी में। अच्छा अभ्यास हुआ। हाथ-पाँव सब ठीक चले। मुंडी भी ऊपर उठी। पानी के बाहर सर ऊपर करके साँस भी ली। लेकिन शायद ठीक से काम बना नहीं। इसलिए पाँच-सात मीटर बाद फिर से शुरू करते रहे।
पानी के बाहर सर करने के बावजूद साँस नहीं ले पाने का कारण शायद यह रहा कि हमको एक ही साँस में काम चलाने का अभ्यास है अभी तक। साँस का कैप्सूल जब तक चला तब तक तैरे। जहाँ साँस का कोटा ख़त्म, खड़े हो गए। साँस की बचत करके तैरने के अभ्यास के चलते नई सांस लेने में परहेज करते रहे।
राहत इंदौरी का शेर याद आता रहा :
"उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो
खर्च करने से पहले कमाया करो"
मतलब साँस पूरी छोड़ने के पहले नई साँस ले लेनी चाहिए। लेकिन सर पानी के ऊपर उठाने के बावजूद हवा से सांस लेने का अभ्यास पक्का नहीं हुआ है अभी। एकाध बार ले भी की साँस। हाथ और पाँव आज पूरे अनुशासन से ड्यूटी पर लगे रहे। पुल ठीक हुआ, किक बढ़िया हुई। बस अब बीच का मामला ठीक करना है। बीच का मामला ठीक हो जाये तब क़ायदे से तैरना हो।
घंटे भर में 210 किलोकैलोरी खर्च करके पूल से वापस लौटे। कल पूल की छुट्टी है। लेकिन हमको अभ्यास करना है। किसी दूसरे पूल में जायेंगे। तैराकी सीखने में मजा आ रहा है। यह तैराकी से प्रेम है या हमारा पागलपन कहना मुश्किल। लेकिन प्रेम और पागलपन से जुड़ा एक संवाद जेरी पिंटो लिखित किताब 'एम और हूम साहब' में इस तरह है :
"प्रेम कभी भी पर्याप्त नहीं होता। पागलपन ज़रूर पर्याप्त होता है, यह अपने आप में पूरा होता है।"
कैसा लगा यह संवाद? किताब अभी पढ़ रहे हैं। पूरी पढ़ लेंगे तब लिखेंगे इसके बारे में।
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