Thursday, August 03, 2006

पति एक आइटम होता है

http://web.archive.org/web/20110101191700/http://hindini.com/fursatiya/archives/184

पति एक आइटम होता है

‘पति-पत्नी’ यूँ तो मात्र एक शब्द युग्म है। यदि किसी कविता में प्रयोग हो जाये तो ‘प’ वर्ण की आवृत्ति के कारण इसमें अनुप्रास अलंकार बरामद हो सकता है। तथा इस सत्य का उद्‌घाटन करने वाला विद्यार्थी परीक्षा में एकाध अंक ज्यादा झटक सकता है बशर्ते कापी जाँचने वाला शिक्षक कापी जाँचते समय देश की शिक्षा व्यवस्था में निरन्तर होती गिरावट पर होने वाली शाश्वत बहस में अपना योगदान (जो कि हमेशा बहुमूल्य होने के लिये अभिशप्त होता है)मत व्यक्त न कर रहा हो।
‘पति-पत्नी’ के अकेलेपन को दूर करने के लिये इनके साथ अक्सर ‘वो’ जोड़ दिया जाता है। लेकिन पिछले कुछ समय से ‘वो’ की जगह ‘वैगपाइपर’ ने ले ली है तथा ‘पति-पत्नी और वो’ की जगह मैं-तुम और वैगपाइपर कहने से आधुनिकता में कुछ इजाफा टाइप होता है।
पत्नी के बारे में शास्त्रों में तमाम बातें कहीं गई हैं लेकिन सबसे नया तथ्य यह सामने आया है कि पत्नी असल में वह प्राणी होती है जो अपने पति को छील-छाल, गढ़-तराश कर आदमी बनाती है।
इससे मुझे यह अहसास हुआ गोया पत्नी कोई बढ़ई हो तथा पति कोई अनगढ़ लकड़ी जिसे छीलछाल कर वह उसे काम लायक बनाती है।
इससे यह भी लगता है कि पति वह पदार्थ है जो पत्नी द्वारा संस्कारित किये जाने पर आदमी बनता है। यदि आप इस बात से सहमत हैं तो यह अपने आप सिद्ध हो जाता है कि दुनिया के सारे ‘कुँवारे’ वे पदार्थ होते हैं जिनमें बरास्ता पति होते हुये आदमी बनने की संभावनायें छिपी होती हैं।जो ‘कुँवारा’जितनी जल्दी पति बनता है उसके आदमी की मंजिल हासिल करने की संभावनायें उतनी ही अधिक होती हैं।
हर नियम के अपवाद की शाश्वत परंपरा के मुताबिक इस नियम के भी अपवाद हैं। जिन मामलों में पतियों को उनकी पत्नियाँ ‘आदमी‘ बनाने में असफल रहती हैं उनमें वे अपनी असफलता का ठीकरा मूल पदार्थ पर ही फोड़कर ,नाच न आवै आंगन ठेढ़ा, उक्ति के पक्ष में मतदान करती हैं।
पत्नियों के लिये पति का इंतजा़म आमतौर पर उनके घरवाले करते हैं। वे सामान्यत: अपनी आर्थिक हैसियत के मुताबिक अपनी कन्या के लिये पति खरीदकर दे देते हैं । पहले इस संबंध में बाजार भाव में गिरावट थी l लेकिन अब आधुनिक जमाने के साथ पति के दामों में काफी उछाल आया है। पति खासकर कमाऊ पतियों के दाम भारत में भ्रष्टाचार तथा विश्व में पेट्रोल की कीमतों की तरह लगातार बढ रहे हैं।
पहले जो ‘पति‘कन्या के पिता लोग अपनी एक साल की तनख्वाह में खरीद लेते थे अब उसी गुणवत्ता का पति खरीदने के लिये लोग अपनी जिंदगी भर की कमाई दाँव पर लगाकर तथा बाकी जिंदगी भर के लिये कर्जा लेकर जुगाड़ करने लगे हैं।अपनी जाति,कुल,गोत्र के अनुसार वर खरीदने में लोग अपनी जान की बाजी लगाकर भी सौदा करने में हिचकिचाते नहीं। जान भले चली जाये लेकिन लड़की दूसरी जाति में न जाये।
पहले पति खरीदने के लिये सदियों पुरानी लेन-देन की (बार्टर )प्रणाली का प्रचलन था। ‘पति’ साइकिल,स्कूटर,टीवी,पलंग, के बदले में मिल जाते थे। लेकिन आधुनिकता के साथ-साथ हिसाब-किताब में पारदर्शिता रखने के लिये अब सारा हिसाब-किताब नकद रुपयों-पैसों में करने की परंपरा बढ़ रही है। इसका फायदा यह हुआ है कि बिकने के बाद मतभेद की गुंजाइश कम रहती है। लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है उसी तरह मुंह-मांगे दाम चुकाये जाने पर भी पति के कौडी का तीन होने की संभावना से इंकार नही किया जा सकता।
कुछ और आधुनिक वर-पिता सारा पैसा एक साथ न लेकर किस्तों में भुगतान पसंद करते हैं। समझदार होने के नाते वे ऐसी बहू के रूप में ऐसी मुर्गी लेना पसंद करते हैं जो ताजिंदगी निरंतर बड़े होते अंडे देती रहे। ऐसी मुर्गी को लोग काम-काज वाली बहू तथा पति नामक प्राणी ‘वर्किंग वूमैन’ कहते हैं।
बहरहाल, पति खरीद कर जैसे ही पत्नी को सौंप दिया जाता है वह उसको उलट-पुलट कर दायें-बायें,ऊपर-नीचे हर तरफ से देखने-संवारने में जुट जाती है । पत्नियों के लिये पति वास्तव में वह गुड्डा होता है जिसे वे बहुत दिनों से पढ़ाई-लिखाई ,खेल-कूद के चक्कर में सालों तक भूली रहती हैं। शादी की अंगूठी पहनते ही उनको अपना गुड्डा वापस मिल जाता है जिसमें इतने सालों में जान भी आ जाती है। पति उनके लिये जीता-जागता खिलौना होता है,जिसकी चलाने चाबी उनको शादी के बाद मिल जाती है।
पति को बना-संवारकर आदमी बनाने के लिये पत्नी को उसपर अधिकार भावना रखना मजबूरी होती है।आमतौर पर ऐसा देखा गया है कि पति के ऊपर पत्नी का अधिकार भाव पत्नी के घरवालों द्वारा पति को खरीदने के लिये चुकाई गये धन की मात्रा के समानुपाती होती है। अमूमन पति जितना मंहगा खरीदा जाता है उस पर पत्नी का अधिकार उतना ही तगड़ा होता है।
जिन मामलों में पति खरीदने के लिये एकमुश्त रकम का भुगतान नहीं होता उनमें पत्नी द्वारा जुटाई गई नियमित किश्त (कमाई)की मात्रा अधिकार भावना की मात्रा का निर्धारण करती है।
जिन पत्नियों के मायके वाले पतियों की कीमत चुकाने में असमर्थ रहते हैं उनके लिये पति का जुगाड़ करना भारतीय रेलों के सामान्य कूपे में यात्रा करने के समान होता है। अव्वल तो डिब्बे में घुसना नहीं हो पाता और अगर येन-केन-प्रकारेण डिब्बे में धंस गये तो सीट मिलना मुश्किल होता है।
अगर आप इस बात से इत्तफाक रखते हैं तो यह मान लेने में मुझे तो नहीं लगता कुछ हर्ज है कि बिना दहेज के मिले पति पर अधिकार भावना रखना कुछ ऐसा ही प्रयास है जैसे किसी जनरल डिब्बे में घुसकर सफलता पूर्वक कोई सीट जुगाड़ लेना।
बहरहाल यह सब बातें तो किसी पदार्थ के पति बनने से संबंधित हैं। पत्नी का पति को आदमी बनाने का काम तो इसके बाद शुरू होता है।
आमतौर पर पत्नियाँ पति को पाने के बाद अपने सपनों के राजकुमार से पति की तुलना करती हैं।वे पति को टटोल-मटोल कर ,धकिया-मुकिया कर अपने सपनों के ढांचे फिट करती हैं। इस दौरान वे खूब सारी मतलब-बेमतलब की बातें करती हैं। कभी- कभी कुछ न समझ में आने पर :-

तुम्हीं मेरी मंजिल,तुम्हीं मेरी पूजा
तुम्हीं प्राण मेरे ,तुम्हीं आत्मा हो।
तुम्हीं मेरी माथे की बिंदिया झिलमिल…
जैसे भावुकता पूर्ण गाने गाने लगती है। पति नामक पदार्थ भी घबड़ाकर:


चांद सी महबूबा हो मेरी,कब ऐसा मैंने सोचा था
हाँ तुम बिल्कुल वैसी हो जैसा मैंने सोचा था।
जैसे गाने गाते हुये पकड़ा जाता है।
इस संबंध में विद्वानों में शाश्वत मतभेद हैं कि पति नामक प्राणी यह गाना गाते हुये अपना अंधे के हाथ बटेर का सुख प्रकट कर रहा होता है या किस्मत में यही बदा था तो क्या कर सकते हैं का मजबूरन संतोष प्रकट कर रहा होता है।
किसी भी पति को आदमी बनाने की प्रक्रिया बड़ी जटिल होती है। इसके लिये पत्नी को अथक प्रयास करने पड़ते हैं। हर पत्री अपनी-अपनी समझ के अनुसार इसके लिये प्रयास करती है।
पत्नियों की यह मंशा होती है कि उनके अतीत के शानदार पन्नों को उनका पति पढ़े ताकि उसके आदमी बनने की राह सुगम हो। जिनके पति पढ़ाकू किस्म के नहीं होते उनकी पत्नियाँ बोल-चीख-चिल्लाकर अपना अतीत वर्णन करती हैं।( यह प्रयास कुछ-कुछ ऐसा ही होता है जिस तरह महिला चिट्ठाकार अपने चिट्ठे ऊंघते हुये पतियों को घेर-घार कर पढातीं हैं।)
अपने अतीत वर्णन करते हुये पत्नियाँ अक्सर किसी की हिम्मत नहीं थी कि मेरी तरफ निगाह उठाकर देख ले से लेकर सारे कालेज के लड़के मेरे ऊपर मरते थे तक के संवादों का भाव भंगिमा पूर्ण प्रयोग करती हैं। यह भाव भंगिमायें कुछ इतनी प्रभावी होती हैं कि यदि नाटक वाले देख लें तो उनका नाटकों के लिये नायिकाऒं की कमी का रोना खतम हो जाये।
आमतौर पर किसी की हिम्मत …श्रेणी की पत्नियाँ वे होतीं हैं जिनको देखने के मुकाबले पति लोग अपने घर की सालों पहले पुती दीवार देखना ज्यादा सुकून देह मानने लगते हैं तथा सारे कालेज के लड़के मुझपर मरते थे श्रेणी की पत्नियाँ वे होती हैं जिनका सबसे ज्यादा पैसे का लेन-देन सावन के महीने में राखी भेजने तथा नेग बटोरने में हुआ होता है।
उदार या बेहतर होगा कहें समझदार या और बेहतर कहें तो मजबूर टाइप पति मिल जाने पर पत्नियाँ अपने अतीत का कुछ ज्यादा ही उदारता पूर्वक बखान करती पायी जाती हैं। ‘आई कुड गेस ही वज इन्कलाइंड टुवर्ड्स मी’ मुझे अहसास हो गया था कि वह मेरी तरफ झुका हुआ था। मानो ‘वह ‘ वह न होकर पीसा की मीनार हो गया जो झुक गया तो झुकता ही चला गया।’ ही हैड फीलिंग्स फार मी’ सुनकर लगता है कि भावनायें न होंगी तो क्या साबुन तेल होगा? तमाम लोगों ने मुझे प्रपोज करना चाहा- दुनिया में बेवकूफों की कमी थोड़ी है- एक ढूँढो,हजार मिलते हैं..।
अपनी सांस्कृतिक परंपरा के निर्वाह के चलते हर पत्नी का प्रयास होता है कि जितनी जल्दी हो सके वह अपने लिये एक सौत का जुगाड़ कर ले। पुराने जमाने में पति लोग जिम्मेदार होते थे तथा पत्नी के लिये सौत का इंतजाम खुद करते थे। खासतौर पर जो पति ,राजा होने के साथ-साथ ,पति भी होते थे वे जहाँ कहीं दौरे पर जाते थे अपनी पत्नियों के लिये एक सौत साथ में लटकाये लिये चले आते थे।
समय के साथ-साथ बढ़ती मंहगाई तथा कन्या भ्रूण हत्या की वजह से मादाओं की संख्या में आती गिरावट के कारण पतियों के लिये ऐसा करना दिन-प्रतिदिन मुश्किल होता जा रहा है तथा पति अपनी पत्नियों के एक अदद सौत तक खोजने में असमर्थ होते जा रहे हैं।
मजबूरन अब पत्नियों ने जहाँ चाह वहाँ राह के नियम का सहारा लेते हुये पति में ही सौत को खोजना शुरू कर दिया है। इसका तरीका भी बहुत सरल है। पति की जो आदतें पत्नियों को भाती नहीं हैं उनको वे अपनी सौत का दर्जा दे देती हैं।
दुनिया की ज्यादातर महिलायें टीवी,कम्प्यूटर,किताबों,सिनेमा आदि में अपनी सौत के दर्शन लाभ करती हैं। इन महिलाओं के पति ,पत्नियों से ज्यादा टीवी / कम्प्यूटर से चिपके रहते हैं,उनसे ज्यादा किताबों को पढ़ते हैं तथा पत्नियों को देखने के मुकाबले सिनेमा ज्यादा चाव से देखते हैं। जिन पत्नियों के पति ब्लागिंग करते हैं उनके लिये यह फायदे का काम हुआ है कि सौतन की तलाश में उन्हें अपना दिमाग नहीं खपाना पड़ता है। पति की ब्लागिंग की आदत को सहज सौतन स्वीकार करके सुख की नींद ले सकती हैं। ऐसी भरोसेमंद सौत और कहाँ!
जैसा कि बताया जा चुका है कि पति बनने के पहले व्यक्ति एक पदार्थ मात्र होता है। कभी कभी पत्नियाँ अपने पति को भी पदार्थ मानने लगतीं हैं जैसे किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री नाराज होकर किसी भी एस.पी. को वापस दरोगा बना देता है। ऐसी स्थिति में अपने पदार्थ बोले तो आइटम के हर पहलू का बखान वे ‘सेल्स वूमेन’ की तरह करती हैं।
अपने आइटम-वर्णन की प्रक्रिया में पति को लापरवाह,भुलक्कड़,गैर कामकाजी,बिगड़ैल, मूडी,बीबी कम टीवी चिपकू ज्यादा ,पत्नी की बिल्कुल परवाह न करने वाला,चाय तक बनाने में असमर्थ,निहायत गैर रोमांटिक बताते हुये दुनिया की सबसे नकारात्मक तूलिका से अपने पति का चित्र खींचती रहती हैं। यदि श्रोता ने भूलकर भी इसको नकारने का प्रयास किया तो वे और रंग उड़ेलकर पति-चित्र को और अनाकर्षक बनाने का भरसक प्रयास करती हैं।
ऐसा लगता है कि वे अपने पति का वर्णन न करके किसी आइटम के बारे में किसी ग्राहक को बता रही हों तथा उस आइटम की बिक्री तभी संभव है जबकि वह सबसे खराब साबित हो जाये। आमतौर पर ये प्रयास तभी तक चलते हैं जब तक आप उनसे असहमत रहते हैं। आपकी असहमति के साथ-साथ उनके प्रयासों में तेजी आती जाती है।
यदि आपने भूलकर भी पत्नी के स्व पति निंदा पुराण से सहमति प्रकट करने का प्रयास किया तो वे तुरंत प्रत्यावर्ती विद्युत धारा(ए.सी.करेंट) की तरह दिशा बदलकर अपने पति के दूधिया,उज्जवल चरित्र,आदतों वाले गुण वर्णन करने लगेंगीं। फिर तो उनके वही निहायत बांगडू़ पति धुल-पुंछ कर ऐसा चमचमाता आइटम बन जाता है जिसके बराबर दुनिया में कोई भला,ख्याल रखने वाला, समझदार,उदारहृदय पति और कोई दूसरा नहीं।
एक ही पति में सबसे अच्छे तथा सबसे बांगड़ूपने के गुण तलाशने की आदत (टू इन वन)पति में सब कुछ पाने की स्वाभाविक चाहना का परिणाम है। उनको लगता है कि उनके पास ऐसा आइटम है जिसमें दुनिया के सारे अच्छे -बुरे गुण मौजूद हैं। हर स्त्री का दूसरों के पति से हर मायने में आगे होता है ,चाहे वह अच्छाई हो या बुराई।
पत्नी के सरदर्द से बेखबर खर्राटे भरकर सोते पति की लापरवाही किस्से बखानती पत्नी उसको अच्छा बताने के लिये “आपको पता है ये मुझे इतना चाहते हैं कि मेरे लिये एक दिन खिचखिच दूर करने वाली विक्स की गोली लेने के लिये रात को बारह बजे कार उठाकर दूसरे शहर चले गये फिर तीसरे दिन लौटे” के लड़ियाने वाले मोड में कब आ जाये यह विधाता भी नहीं बता सकते।
कुछ स्त्रियाँ मानती हैं कि उनके पति तथा उनके कोई भी गुण ,विचार नहीं मिलते। गुण नहीं मिलते। उनके लिये यह जानकारी शायद सुकून देह हो कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम तथा जगद्जननी माता सीता के ३६ गुण मिलते थे। लेकिन दोनों को अंतत: आत्महत्या ही करनी पड़ी। रामजी ने जलसमाधि ली तथा सीता जी ने भू समाधि।
रुचियाँ एक होना भी बवालेजान है। अब देखिये कि कोई कवियत्री पत्नी लिखती है:-
जब आँखों से ओझल होता है वो कोना,
तुम उस मोड़ पर नज़र आते हो.
जब बहुत याद आते हो तुम,
सन्नाटे के शोर में गूँजते नज़र आते हो.
अब चूँकि उनके पति की भी रुचियाँ भी साहित्यिक हैं लिहाजा उन्होंने उनको अगरबत्ती सा सुलगा दिया:-
तुम सिर्फ़ एक पँक्ति में कुछ इस तरह समाती हो
स्वयं अगरबत्ती सी सुलगती हो मुझ को महकाती हो ।
रुचियाँ समान हैं इसका मतलब यह थोड़ी कि उसकी आड़ में उनको सुलगा दिया जाये। सुलगाना तो नकारात्मक विचार है । अगरबत्ती महकाने के लिये सुलगाना जरूरी थोड़ी है भाईसाहब!
इससे अच्छा तो वे गैर साहित्यिक पति हैं जो पत्नी का लिखा पढ़ते-पढ़ते सो जाते हैं। पत्नी का लेखन न हो गया नींद की गोली हो गयी।
बहरहाल ,बात हो रही थी पत्नी द्वारा पति को आदमी बनाये जाने के प्रयासों की।
आमतौर पत्नियों को पति जिस हालत में मिला होता है उससे एकदम अलग बनाने का प्रयास करती हैं। सबसे पहला प्रयास उनका यह होता है कि पति की स्वाभाविकता पर लगाम कसी जाये। देर रात तक जगने वाले पति को वह अर्ली टु बेड अर्ली ट राइज सिखाती है। जल्दी सोने वाले से कहती है ये भी कोई समय है सोने का। ठहाका मारकर हंसने वाले पति को क्या गंवारों की तरह मुंह फाड़कर हंसते हो कहकर बोलती बंद करती है। मुस्कराने वाले को क्या लड़कियों की तरह लजाते हो कहकर गँवार पने की तरफ ठेलती है। यार बास पति को घरघुसुआ तथा आंचल से लिपटे रहने वाले मियां को एकदम से सामाजिक बनाने का प्रयास करती है ।
सुरुचि पूर्ण तथा सौंदर्य प्रेमी पत्नियों के पति की हालत तो अमेरिका के हत्थे चढ़ गये सद्दाम हुसैन की तरह होती है। वे उसके बाल खींचते हुये काढ़ती हैं, पाउडर इस तरह लगाती हैं जैसे अमेरिका में भारतीयों की जामा तलाशी होती है। पहने हुये कपड़े उतरवा कर दूसरे पहनाने के बाद इससे अच्छे तो वही पहन लो की प्रक्रिया अक्सर दोहराती हैं। सफेद होते बालों वाले पति की पत्नियाँ तो शायद यमराज को भी डाँट के भगा दें कि अभी रुको उनके बाल डाई करके तैयार कर दें तब ले जाना । ऐसे बिना तैयार हुये इनको कैसे भेज दें।
ऐसी सौंदर्य प्रेमी पत्नियों को झटका देने तथा बेहोश करने के लिये उनकी किसी अंतरंग सहेली का यह जुमला काफी होता है भाईसाहब कितने एजेड ,डल से लग रहे थे कल पार्टी में। अपने आइटम के बारे में नकारात्मक बात सुनते ही उनका खून उसी तरह खौल जाता है जैसे वंदे मातरम का अपमान होते देखकर किसी भी देशभक्त का खून खौलने लगता है।
जिन पतियों पर घर का खर्चा चलाने के लिये कमाई करने बाहर जाने की जिम्मेदारी होती है वे अपने पतियों पर कुछ ज्यादा ही निगाह रखती हैं। आदमी बनाने के लिये पति पर शक बहुत जरूरी आदत है। ऐसे में किसी भी दूसरी अनजान महिला को ऐसे वायरस की तरह समझती हैं जिसके संपर्क में आते ही उनके पति के सिस्टम का ‘कोर डम्प’ (साभार ठेलुहा)हो जायेगा।
वे अपने पति की पर उसी तरह निगाह रखती हैं जिस तरह अमेरिका आतंकवादियों पर नजर रखता है। अपने पति के मोबाइल की आयी-गयीं कालें देखती हैं,कभी खुद न खोल पाने वाली पति की मेलें देखने का प्रयास करती हैं। अचानक आफिस फोन करके पूछती हैं -इतनी देर से फोन इंगेज्ड था किससे बात कर रहे थे? खाने में कद्दू बनाया है कुछ और बना लूं क्या?
ये समझदार पत्नियाँ टेलीमार्केटिंग के लिये किसी कन्या से हुई पांच मिनट की बातचीत का विवरण पति से घंटों कभी कभी हफ्तों पूछती हैं। पाँच मिनट से अधिक उनके पति से बात करने वाली अनजान महिला का नाम कितना भी अनाकर्षक क्यों न हो लेकिन वे उसे बड़े प्यार से चुडै़ल कहकर पुकारती हैं। सारी भाभियाँ,जिनसे वे खुद इठलाकर बोलती हैं ,से उनके पति के ज्यादा बातचीत के प्रयास उनको उसी तरह नागवार लगते हैं जिस तरह भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को गांगुली के समर्थन में दिये गये वीरेंद्र सहवाग के बयान लगते हैं।
इतना सब लिखने के बाद मैं यह बताना जरूरी समझता हूँ कि ये जो सच लिखे गये वे जितने हमारे हैं उतने ही आपके भी। यह पति से आदमी बनाये जाने की प्रक्रिया अनंत है, लिहाजा इसके किस्से भी अनंत हैं। इनका न आदि है न अंत है। सुनाने बैठो तो फसंत ही फसंत है। लिहाजा इतनी कथा सुनाकर बाकी की आपको खुद समझने तथा हिम्मत करे तो सुनाने के लिये रुकता हूँ।
लेकिन रुकने के पहले यह बताना चाहूँगा कि मुझे लगता है कि महिलाओं की ,जरूरी नहीं कि वे पत्नियाँ ही हों,सहज बुद्धि पुरुषों के मुकाबलें में ,चाहे वे पति भले क्यों न हो जायें , बेहतर होती है। इस संबंध में वर्षोंपहले सारिका में पढ़ी किसी लेखक की कहानी का अंत याद आ रहा है:-

एक प्रेमी जोड़ा एक ऐसे मंदिर में मानता मांगने गया जहाँ मांगी गयी हर मुराद पूरी होती थी।
प्रेमिका ने बेरोजगार प्रेमी से पूछा-तुम क्या मांगोगे?
प्रेमी बोला- मुझे दुनिया में तुम्हारे सिवाय कुछ नहीं चाहिये। मैं तुमको ही मांगूंगी।
प्रेमिका बोली- देखो समझदारी से कामलो।तुम मुझे मांगने की बजाय अपने लिये नौकरी मांग लेना। मैं तुमको मांग लूँगी दोनों काम हो जायेंगे।
प्रेमी बोला -ठीक।
मंदिर से निकलने के बाद प्रेमिका ने देखा प्रेमी खामोश था। उसने कारण पूछा तो प्रेमी ने बतायाकि उसको प्रेमिका के सिवाय कुछ सूझा ही नहीं। सो उसको नौकरी मांगने का ख्याल ही नहीं रहा। उसने उसे ही मांगा। अब वह परेशान है कि गुजारा कैसे होगा!
प्रेमिका ने हंसते हुये कहा-मुझे अच्छी तरह पता था कि तुम ऐसी ही हरकत करोगे। इसीलिये मैंने तुमको न मांगकर
तुम्हारे लिये नौकरी मांगी थी।
पदार्थ के पति बनने के पहले ही उसको आदमी बनाने के प्रयास शुरू हो चुके थे।
मेरी पसंद
आओ हम धूप वृक्ष काटें।
इधर-उधर हलकापन बाँटें।

अमलतास गहरा कर फूले
हवा नीमगाछों पर झूले,
चुप हैं गाँव,नगर,आदमी
हमको तुमको सबको भूले।
हर तरफ घिरी-घिरी उदासी
आओ हम मिल-जुल कर छाँटें।
परछाईं आ करके सट गयी
एक और गोपनता छँट गयी,
हल्दी के रंग-भरे कटोरे-
किरन फिर इधर-उधर उलट गयी।
वह पीलेपन की गहराई
लाल-लाल हाथों से पाटे।
आओ हम धूप वृक्ष काटें।
-माहेश्वर तिवारी

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

23 responses to “पति एक आइटम होता है”

  1. राजीव
    अनूप जी, बहुत गहन अध्ययन और विश्लेषण किया है आपने, जैसे कोई निबन्ध भी हो और जटिल रसायन को शोधित और परिष्कृत करने की प्रक्रिया का वैज्ञानिक शोध-पत्र भी। दीर्घकालिक अनुसन्धान के फ़लस्वरूप ही ऐसे उच्च स्तरीय शोध पत्र प्रकाशित हो सकते हैं।
  2. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह
    यह तो विवाहितो तथा पति और पत्नियों का मामला है। मेरा तो नो कमेन्‍ट।
  3. eswami
    गुरुदेव,
    आपके इस लेख में हास्य व्यंग्य और सामाजिक सरोकारों पर आपके विचार सबकुछ संतुलत है! मजेदार तो है ही! लेकिन बस एक बात ने कुछ भावुक कर दिया है.
    कुछ और आधुनिक वर-पिता सारा पैसा एक साथ न लेकर किस्तों में भुगतान पसंद करते हैं। समझदार होने के नाते वे ऐसी बहू के रूप में ऐसी मुर्गी लेना पसंद करते हैं जो ताजिंदगी निरंतर बड़े होते अंडे देती रहे। ऐसी मुर्गी को लोग काम-काज वाली बहू तथा पति नामक प्राणी ‘वर्किंग वूमैन’ कहते हैं।
    एक बार जीतू नें आत्मनिर्भर पत्नी की चाह को “खुद तो गुरद्वारे का लंगर खा आना मेरे लिए भी बंधवा लाना” टाईप कुछ करार दिया था. इस बार मैंने आपके लेख में आत्मनिर्भर पत्नी की चाह पर ‘कमाऊ मुर्गी’ से विवाह करने की समझदारी का दर्शन देखा. कई श्याने लोगों पर फ़िट भी होता होगा ये, लेकिन ब्लाग पर लिखने के बजाए यहीं कुछ शेयर करता हूं –
    हम सब अपने अनुभवों और भयों के बने होते हैं. मैं बहुत छोटा था – मेरी मौसीजी का शादी के कुछ समय बाद ही तलाक हुआ और उन्हें फ़टाफ़ट अपने पैरों पर खडा होना पडा – ३ माह का बच्चा था गोद में. वे किस अज़ाब से गुज़रीं अपने आप को स्थापित करने में मैने देखा था. आज अपने भूतपूर्व पति से ज्यादा सफ़ल और सक्षम होंगी.
    कुछ वर्ष पूर्व मेरी बहुत पढीलिखी कज़िन के पति (जो एक सफ़ल व्यवसायी इंजीनियर थे) एक कार दुर्घटना में चल बसे. कज़िन विवाहपूर्व काम करती थी. उसी एक्सिडेंट में टूटी अपनी टांग पर लैब्स में घंटो खडे रह कर काम करती अब वो एक मल्टीनेशनल कंपनी में वैज्ञानिक के पद पर आसीन है – मेरे जिजाजी के देहांत के समय कज़िन की बिटिया २ बरस की थी. विवाह के पश्चात कज़िन ने काम करना बंद कर दिया था – उसने कहा काश मैं विवाह के बाद भी काम करना ज़ारी रखती तो नौकरी ढूंढने में दिक्कत ना होती. अगर वो विवाहपूर्व काम ना कर रही होती तो उसे मौसी के समान कितनी समस्या आती अपने पैरों पर खडे होने में!
    इन दोनों केस में माता-पिताओं के पास किसी चीज की कमी नही थीं – लेकिन इनका आत्मसम्मान आत्मनिर्भरता चाहता है और उन में हमेशा सम्मान से जीने का बौद्धिक और भावनात्मक दम देखकर उन पर असीम गर्व महसूस करता हूं!
    मेरी पत्नी विवाह पूर्व काम करती थी. विवाह के बाद हमारी यायावरी के चलते काम नही किया. फ़िर कुछ वर्ष पश्चात अब दोबारा कार्यरत है. उसके लिए काम करने की वजह पैसा कतई नही है. अपनी उच्च शिक्षा का सदुपयोग और बौद्धिक कार्य करने का सुख पाना है. लेकिन अपने अनुभवों और भयों का गढा मैं इसे किसी और वजह से सही मानता हूं. पति अच्छा हो या बुरा दोनो केस में पत्नी को आत्मनिर्भर होना चाहिए!
    फ़िर सोसाईटी देखिए आप देस की! बालीवुड की फ़िल्मों की कसम, अपनी सोच है की पति के असमय मरने पर ६६ बरस का लाला नवविधवा को मदर इंडिया स्टाईल में “रानी बना के रखुंगा” टाईप डाईलाग ना मार सके इसलिए और वो अपनी जिंदगी मनपसंद तरीके से चला सके इसलिए ही सही पत्नी को काम करना चाहिए – चाहे पति करोडपति हो. ये सीधे आत्मनिर्भरता और घर से निकल कर समाज में रोज़ उठने बैठने से आए आत्मविश्वास का मामला है. जैसा की मैने कहा – इसे मेरा भय कह लें या अनुभवों से जला छांछ भी फ़ूंक कर पीता है वो केस – मज़ाक तो किसी भी चीज का बनाया जा सकता है लेकिन किसी ना कमाने वाली विधवा के लिए स्तिथितों की भयावहता क्या हो सकती है उसका अंदाजा भी हमारे समाज को करना चाहिए!
    राजीवजी के निधन के बाद सोनियाजी और लालूजी के आरामकाल के दौरान राबडीजी को अचानक ‘वर्किंग वुमन’ हो चुकने में कितनी दिक्कतें आईं! इंदिराजी के समान शुरु से प्रेक्टिस रहती तो आसानी होती ना राज करने मे भी! साला बुरा वक्त कह कर नही आता और ये सोच कर ही मुझ जैसे लोग आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी साथी चाहते हैं – उसकी कमाई के लिए नहीं! :)
  4. निधि
    मज़ेदार विवरण। वैसे इस विषय पर है कुछ कहने को मेरे पास, प्रतिवाद नहीं बस मेरे हिस्से के विचार। फुरसत पाते ही लिखा जाएगा।
  5. सागर चन्द नाहर
    मजा आ गया, मैं भी निधि जी की ही तरह अपने विचार कभी लिखुंगा, फ़ुरसत मिलते ही :)
  6. SHUAIB
    इस लम्बे लेख पर सिर्फ इतना कहना चाहुंगा के मुझे आज ही पता चला “पति एक आइटम” होता है :) अब जब मैं पति बनूंगा तो शायद आइटम ही कहलाऊँगा ;) बहुत बढिया लिखा है।
  7. आशीष
    इस लेख ने हमे पूरी तरह से कनफुजिया दिया है, सारा का सारा सर से सर्र से सटक गया
    वाह ये तो अनुप्रास अलंकार मे लिख दिया हमने तो….
    आज सुबह ही हमने कही पढा की कुंवारापन यानी शानदार नास्ता, सादा दोपहर का भोजन और कष्टप्रद रात्री का भोजन…
    क्या आप शादी के बाद की स्थीती पर रोशनी डालेंगे…
  8. Tarun
    पति एक आइटम होता है और पत्नि खरीदार बस इतनी सी बात कहने के लिये आपने इतना लम्बा लिख मारा। ;) मजाक कर रिया हूँ धांसू लिखा है लेकिन हमने दूबारा लेख को लेख की तरह पढ़ा फिर भी स्वामी जी की बात में ज्यादा वजन नजर आया। परन्तु बेरोजगारी के चलते प्रोब्लम ये है कि अगर ५० प्रतिशत पत्नियां आत्मनिर्भर हो जाती हैं तो किसी दूसरी पूरी की पूरी फैमिली के बेरोजगारी की संभावना बढ़ जाती है।
  9. जीतू
    बहुत सुन्दर लिखे हो।
    टिप्पणी करने मे देर हुई, क्योंकि पूरा लेख किश्तों मे पढा। इस बार लेख की लम्बाई ज्यादा थी, लेकिन खली नही। सत्य वचन कहे हो फुरसतिया।
    कुछ तो बहुत शानदार है:
    १) बिना दहेज के मिले पति पर अधिकार भावना रखना कुछ ऐसा ही प्रयास है जैसे किसी जनरल डिब्बे में घुसकर सफलता पूर्वक कोई सीट जुगाड़ लेना।
    २) यह प्रयास कुछ-कुछ ऐसा ही होता है जिस तरह महिला चिट्ठाकार अपने चिट्ठे ऊंघते हुये पतियों को घेर-घार कर पढातीं हैं।
    ३)भाईसाहब कितने एजेड ,डल से लग रहे थे कल पार्टी में
    ४)किसी भी दूसरी अनजान महिला को ऐसे वायरस की तरह समझती हैं जिसके संपर्क में आते ही उनके पति के सिस्टम का ‘कोर डम्प’ (साभार ठेलुहा)हो जायेगा।
    ५)खाने में कद्दू बनाया है कुछ और बना लूं क्या?
    ६) सारी भाभियाँ,जिनसे वे खुद इठलाकर बोलती हैं ,से उनके पति के ज्यादा बातचीत के प्रयास उनको उसी तरह नागवार लगते हैं जिस तरह भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को गांगुली के समर्थन में दिये गये वीरेंद्र सहवाग के बयान लगते हैं।
    फुरसतिया ने ये मुद्दा उठाकर हम अबला पतियों की, दुखती रग पर हाथ रख दिया है। अब दो काम होंगे, एक तो और अबला पति अपनी व्यथा सुनाते हुए आएंगे, दूसरी तरफ़ महिला ब्लॉगर पत्नियों की तरफ़ से मोर्चा सम्भालेंगी। लगे रहो गुरु, भिड़ा दिया सबको तुमने। अंतर्राष्ट्रीय अबला पति एकता जिन्दाबाद! (यार! इस श्रेणी वालों के लिए कोई आरक्षण नही है क्या?)
  10. अन्तर्मन
    गज़ब लिखे हो भाई..अभी सिर्फ़ एक तिहाई पढ़ा है…फ़ुर्सत मिलते ही आगे पढ़ूंगा।
    भैया पढ़ने का भी तो मौक़ा दिया करो!
  11. राकेश खंडेलवाल
    हाथ जोड़कर पत्नी के आगे करते सम्पूर्ण समर्पण
    हमने हर इक गीत किया है उनके श्री चरणों में अर्पण
    और अहिन्दीभाषी पत्नी, गदगद होकर ये कहती हैं
    तुम मुझको अर्पण करते हो, मैं आऒ करती हूँ तर्पण
  12. kali
    लेख को लेख ही रहने दो बकझक ना करो, क्या बात है, फुरसतिया डिफेन्सिव मुड में. बहुत बढिया लिखे रहे. २ बार पढ कर हँसा तीसरी बार मुस्काया, चौथी बार में समझ आया, पाँचवी बार पत्नी से ताना खाया — हूँ! ब्लाग-नशेडी.
  13. समीर लाल
    वाह भाई वाह, अभी अभी तीन दिन की यात्रा से लौटा और अपनी पहचान प्राप्त कर सारी थकान मानो जाती रही.वाकई, क्या आईटम लायें हैं. हर बिन्दु पर हमारी आपके साथ सहमति है. बधाई.
  14. ratna
    क्या हम कहें और क्या न कहें
    लिगं भेद की जंग को कब तक सहें
    इघर गर है कूआं तो उधर भी है खाई
    इक दूजे में दोनों की खुशियां समाई
  15. अनूप भार्गव
    बढिया लिखा है । अगरबत्ती के सुलगनें पर विचार करते हैं , शायद कुछ अच्छा सूझ जाये । महकना तो निश्चित है …..
  16. अतुल शर्मा
    अद्भुत! फुरसतियाजी यह पढ़ कर मुझे आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई है कि आखिर ये मेरे साथ कुछ समय से क्या हो रहा था। अरे भाई मेरी छिलाई-गढ़ाई और तराशने का कार्य चर रहा है। आगे क्या होगा यह भी जान गया हूँ और पूरी तरह तैयार हूँ। बहुत सुंदर लिखा है।
  17. फुरसतिया » फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 1. पति एक आइटम होता है 2. गुरु गुन लिखा न जाये… 3. मेरा पन्ना के दो साल-जियो मेरे लाल 4. गालिब भी गये थे कलकत्ता… 5. मजाक,मजाक में हिंदी दिवस 6. अनूप भार्गव सम्मानित 7. …अथ लखनऊ भेंटवार्ता कथा 8. फप्सी हाट में कविता का ठाठ 9. चाह गयी चिंता मिटी… 10. चिट्ठा चर्चा के बहाने पुस्तक चर्चा [...]
  18. anita kumar
    इस लेख में व्यंग है, गहरी सौच है, संवेदनशीलता है, दुखती रग है(पतियों की)…॥महिलाएं तो हर हाल में लुटती हैं, पिता की जिन्दगी भर की कमाई चली जाती है और हाथ आता है एक पदार्थ , एक आइटम जिसे आदमी बनाने की मश्क्कत फ़िर भी करनी पड़ती है, कोई रेडिमेड आदमी मैटिरियल पती बनाने की फ़ैक्टरी नहीं है भाई?
    इस लेख के लिए आप को हमारी तरफ़ से डॉक्टरेट की उपाधी से नवाजा जाता है, शानदार लेख
  19. AMAR

    शानदार ही नहीं… बल्कि क्लासिकल !
    बस एक टिप और दे देयो कि अपनी पोस्टों की सूची मैनुअली बनाई है,
    या किसी तकनीकी सुविधा से.. और यह भी कि मई 2007 के बाद अपडेट क्यों नहीं की गयी ।
    आपको खँगालने के क्रम में यह पोस्ट बहुत पहले देखी थी… पर ई-स्वामी की टिप्पणी पढ़कर लगा कि इत्मिनान से पढ़ेंगे..
    वह इत्मिनान आज नसीब हुआ.. यह क्लासिकल पोस्ट आपने आपमें एक सम्पूर्ण सँदर्भ है !
  20. पति क्या होता है सिर्फ़ एक आइटम ही तो
    [...] जो हम ठीक दो साल ग्यारह महीने पहिले कह चुके हैं कि पतियों को अपनी असलियत का अन्दाजा [...]
  21. मैं मोटा क्यों हूँ…मैं मोटा क्यूँ हूँ ? « Binavajah's Blog
    [...] संभावित कारणों की पड़ताल में, थायरायड महाशय दोषी पाये गये । टेस्ट में कामचोरी करते रंगेहाथों पकड़े गये । यानि हाइपोथायराडिज़्म ! बस एक गोली का सवाल है, वह ले रहा हूँ । इस पोस्ट की अँतिम लाइन लिखने तक वज़न 68.5 कि०ग्रा० है ! बाकी तफ़सील बाद में.. अभी टैम नहीं रहा, सो, इतना ही लिख सका । तो मित्रों,  जैसे  मेरे  दिन  बहुरे,  आप लोग दुआ करें कि,  वैसे ही समीर भाई के भी बहुरें । इन्हीं सद्कामनाओं के साथ, मेरा नमस्कार ! Technorati Tags: ज्ञानदत्त पाँडेय,रक्तचाप,हाइपोथायराडिज़्म,समीरलाल,Manuel Uribe,蒂利浦,Dilip Acharya   यह भी अवश्य पढ़ें [...]
  22. मैं मोटा क्यों हूँ…मैं मोटा क्यूँ हूँ ? » कुछ तो है... जो कि,
    [...] Uribe,蒂利浦,Dilip Acharya   यह भी अवश्य पढ़ें इसी मिज़ाज़ के यह दो पोस्ट !विरोध का यह [...]

बुझाने के लिये पागल हवायें रोज़ आती हैं

http://web.archive.org/web/20110925131813/http://hindini.com/fursatiya/archives/153

बुझाने के लिये पागल हवायें रोज़ आती हैं

[कन्हैया लाल नंदनजी के बारे में लिखे संस्मरण तथा कविताओं में साथियों की रुचि देखते हुये उनका खुद के बारे में लिखा संस्मरण पेश कर रहा हूँ। इस बीच नंदनजी ने जन्मदिन की शुभकामनाओं के लिये साथियों को धन्यवाद देते हुये सभी को शुभकामनायें प्रेषित की हैं।]
बड़ी मुश्किल यात्रा होती है यह ,कि आप आईने के सामने खड़े होकर अपने जन्म से लेकर अब तक के जीवन को एक गवाह की तरह निहारें। मेरे शायर मित्र(स्व.) अमीर क़ज़लबाश ने लिखा था :-


सुबह मेरे माथे पर इस कदर लहू कैसा
रात मेरे चेहरे पर आईना गिरा होगा।
आदमी अपने जीवन की तल्ख सच्चाइयों से लहूलुहान हो जाता है और फिर मुकद्दर को कोसने लगता है और माथे का पसीना पोंछने लगता है। जब यह शेर सुना था पहली बार,तो पहली बार,उसकी भावाभिव्यक्ति की चमक ने आकर्षित किया था। फिर धीरे-धीरे इस शेर की गहराई मेरे सामने खुलती गयी और अब मैं जब खुद उसकी गहराई में उतरने को हूँ तो लगता है कि ज़िन्दगी फिर लहूलुहान कर देगी-


ये सच है हम भी कल तक जिन्दगी पर नाज़ करते थे
मगर अब ज़िन्दगी पटरी से उतरी मेल लगती है।
ऐसा नहीं है कि पूरी उतर गयी हो और ऐसा भी नहीं कि इस यात्रा में आनन्द नहीं आया या शिकायतें ही शिकायतें हैं जिनको गिनने और उठाकर बयान करने मेंमुश्किलें आ रहीं हैं। मुश्किल सिर्फ यह है कि इनमें से किसे उठाऊँ और किसे छोड़ूँ। रंगतें हज़ार हैं,बल्कि कहूँ तो रंगो का मेला है यह सफर ,तो अतिशयोक्ति न मानी जाये।हर रंग को जीने का अवसर दिया जिन्दगी ने,भरपूर अवसर दिया…गुरबत का आलम क्या होता है यह भी देखा तो अमीरी किस कदर बेहूदगी से अट्टहास करती है यह भी मुंबई में रहकर अमीर घरों में आ-जाकर देख सका। व्यवस्था किस कदर जरूरी होती है जीवन में यह भी जाना तो यह भी कि सब कुछ व्यवस्थित-व्यवस्थित जीने में कितनी ऊब होती है। जीवन बिल्कुल किताब बनकर रह जाता है,एक तरह की रूल बुक। इसलिये जीवन में थोड़ी बहुत अव्यवस्था होती है तो छोटी-मोटी चुनौतियों को जूझने का सुख मिलता रहता है और कारे-जहाँ दराज़ का काम भी चलता रहता है। इसका आनन्द एक अलग आनन्द होता है,ऐसा आनन्द कि अल्ला ताला से भी कहने का मन हो जाये कि:-


बागे़-बहिश्त से मुझे हुक्मे सफर दिया था क्यों,
कारे जहाँ दराज़ है अब मेरा इंतजार कर।
जीवन का असली आनन्द तभी मानना चाहिये जब मन यह हो कि अल्लाताला से भी कहने का हुलास पैदा हो कि हुजूर,अब मुझे आपकी कायनात में दिल लग गया है,वापस बुलाने की जल्दी मत कीजिये। तो साहबान! सफ़र यह कुछ इसी ढब का रहा है जिसकी शुरुआत एक छोटे से गांव परसदेपुर से हुई।
परसदेपुर उत्तर प्रदेश के जिले फतेहपुर की पश्चिमी सरहदों पर बसा हुआ एक छोटा सा गांव ,जिसे दो तरफ से एक छोटी सी सदानीरा नदी ने घेर रखा है। वह नदी किसी पहाड़ से नहीं निकली थी लेकिन फिर भी सतत प्रवाहमान ही दिखती है,गर्मियों में भी इतना कभी नहीं सूखी कि पानी मँझाए बिना पार उतर जायें। उत्तर की तरफ हावड़ा-दिल्ली रेलवे लाइन का छोटा सा स्टेशन करबिगवाँ,जहाँ भाप से चलने वाले इंजनों के लिये उसी सदानीरा पांडव नदी से पानी भरने का इंतजाम था इसलिये हर मालगाड़ी का इंजन पानी लेने के लिये उस छोटे से स्टेशन पर रुके बिना आगे नहीं बढ़ती। करबिगवाँ स्टेशन से दक्खिन के तमाम गावों के लोग मेरे गांव के अंदर से होकर ट्रेन पकड़ने जाते थे और रास्ता मेरे घर के सामने से होकर जाता था तो आते-जाते लोग मेरे बाबा पंडित देवी दयाल तिवारी को सभी लोग पैंलगी करते थे।”मैं बालक बंहियन को छोटो” उन सारे सम्पर्क-सूत्रों को अपने हितू का दर्जा देकर सम्बन्धों की संपन्नता का एहसास करता गया और गर्व से कहता रहा कि मेरे बराबर संपन्न कौन हो सकता है जिसे इतने गांवो के लोग चाहने वाले हैं।
इन्ही चाहने वालों के बीच मेरा बचपन कटा । पिता श्री यदुनन्दन तिवारी इलाहाबाद में नौकरी करते थे। जब मेरे जन्म की खबर उन्हें मिली तो मारे खुशी के उन्होंने अपनी कमाई के रुपये कमर में समेटे और ऊपर से फेंटा कसा और बैठ गये ट्रेन में । स्टेशन से उतरे तो टिकट न होने के कारण स्टेशन मास्टर के दफ्‍तर में दाखिल किये गये।उन्होंने टिकट न ले पाने में अपनी मज़बूरी बताई तो किसी को यकीन न हो कि कोई खुशी में टिकट लेना कैसे भूल सकता है। उन्होंने हज़ार मिन्नतें की लेकिन स्टेशन का बाबूवृंद उन्हें छकाने के आनन्द में उतर आया। बोले,’फाइन भरना पड़ेगा। अंग्रेज बहादुर का राज है कोई मजाक नहीं है।’ अब पंडित यदुनन्दन प्रसाद तिवारी को आ गया गुस्सा, उन्होंने पूछा,” बोल कितने रुपये फाइन के हुये?” और अपनी कमर का फेंटा खोला और सारे रुपये खड़-खड़ करके मेज़ पर उड़ेल दिये। चांदी के रुपये चलते थे सो सारी मेज़ रुपयों से पट गयी। बैंक-वैंक तो होता नहीं था इस काम के लिये । जो काम था सब नकद का था। पूरी कमाई मेज पर पड़ी थी। बोले पिताजी,”ले ले जितना तेरा फाइन बनता हो और भर ले अपने अंग्रेज बहादुर का पेट। मजबूरी का फायदा उठाना है तो उठा ले और फिर बता कि अब जाऊँ कि न जाऊँ” इस तरह के यात्री से पाला रेल बाबू का पाला नहीं पड़ा था । रेलबाबू ने अचकचाकर पिता जी से माफी मांगना शुरू कर दिया और एक नयी रिश्ते की डोर बननी शुरू हो गयी। पिताजी ने खुद एक बार जब यह किस्सा सुनाया तो मुझे अपने पिताजी के तेवर उसमें झांकते दिखाई दिये। उन तेवरों का कोई न कोई अंश मेरे वजूद का हिस्सा भी बना जिसके अनेक उदाहरण जीवन में भरे पड़े हैं। एक सीमा तक विनम्रता और फिर सीमा के पार पहुँचते ही बिल्कुल विपरीत अक्खड़पना-इस धजा के कुछ नुकसान होते हैं कुछ फायदे भी। मैंने नुकसान का कोई हिसाब नहीं लगाया और फायदा हुआ तो उसे जीवन का सहज अंग मानकर आगे बढ़ गया।
आगे बढ़ने में सबसे बड़ा सहारा मेरे लिये शिक्षा रही। गांव में प्राइमरी पाठशाला थी सो एक दिन बाबा स्कूल में दाखिले के लिये मेरी पाटी पुजाने ले गये। हेडमास्टर थे पास के औराड़ी खेड़ा के पंडित जी। बोले : जन्मदिन क्या लिखें? अब जन्मदिन किसी को याद हो तो बतावे न! बोले :’यही कोई पांच साल का है।सो हिसाब लगाया गया और पांच साल पहले के साल की उसी तारीख को जिस दिन स्कूल में दाख़िल हुये थे मेरी जन्मतिथि तय हो गयी। उस दिन तारीख थी १ जुलाई और सन्‌ निकला १९३३ सो बन्दे की जन्मतिथि बिना किसी हीले-हवाले के १ जुलाई ,१९३३ मुक़र्रर कर दी गयी जो आज तक मान्य, मुकर्रर और बरकरार है।
चूंकि उसके पहले की दो पीढ़ियों में कोई पढ़-लिख नहीं सका था सो बन्दे के स्कूल जाने को बाबा ने एक उत्सव बना दिया। घर के दोनों और देवस्थान थे। दक्षिण की तरफ काले देव बाबा का चबूतरा जिसमें यदाकदा हवन हुआ करता था,उत्तर की तरफ शिवजी का मंदिर। बीच में मेरा घर। बाबा ने दोनों जगह प्रसाद बँटवाया और मेरा स्कूल जाना ऐसे ‘सेलिब्रेट’हुआ जैसे दाखिला लेते ही डिग्री हासिल हो गयी हो। बाबा और पिताजी दोनों की इच्छा थी कि लड़का खूब पढ़े-लिखे।
पढ़ने-लिखने में मेरी तरफ से कोई कोर-कसर नहीं रही अगर कुछ रही भी तो स्थितियों की रही। चार बहनें थीं,पिताजी मामूली कमाई वाले नौकरी पेशा इंसान थे। बाबा अपनी जगह-जमीन एक कत्ल के मुकदमें से दूर रहने के क्रम में छोड़कर चले आये थे और परसदेपुर में आकर बस गये थे सो आटा हमेशा गीला रहता था। पढ़ाई में जो थोड़ा-बहुत खर्च होता था,उसकी भी गुंजाइश नहीं थी। उसे बन्दे ने वजीफा का इम्तिहान देकर पूरा कर लिया। वजीफा का इम्तिहान दिया तो पछता-पछताकर लेकिन नतीजा निकला तो अपनराम ज़िले में अव्वल आ गये। दो रुपये महीने वज़ीफा।
उस दो रुपये के लालच में मेरा मिडिल स्कूल दाखिला हुआ। उर्दू दीगर ज़बान चलती थी सो मौलवी एक मौलवी की तरह ककहरे के साथ अलिफ़-बे की पढ़ाई भी की। उर्दू मुझे खासी रुचिकर लगती। उसकी नज्‍़में और ग़ज़लों की लय आकर्षित करती थी। हिन्दी और उर्दू के सम्मिलित बहाव से जो भाषा-प्रवाह बनता है,वह मेरे लिये सहज अभिव्यक्ति का माध्यम बना जिसे मेरे अध्यापकों ने बड़ी खूबसूरती से संवारा।
मुझे अध्यापक भी मिले उम्दा वे पढ़ाने में तो थे ही,अपने चारित्रिक गुणों में ए वन थे। विद्यार्थी को अपनी सन्तान से बढ़कर समझने वाले। एक बार मेरी छूट गयी और मैं घर के हालात में आर्थिक सहारा बनने के लिये मुड़िया (एक भाषा जो मुनीमी के लिये लोग सीखते थे) पढ़ाकर मुनीमी में डाल दिया गया।तीस रुपये महीने में कत्थे की दुकान पर पर्ची काटने का काम। मैं अंग्रेजी पढ़ना चाहता था लेकिन अंग्रेजी तो काफूर हो रही थी। तभी एक दुर्धटना घट गयी। मेरी दो बहनें, जिन्हें मैं अपनी माँ के साथ कानपुर लिये जा रहा था,अचानक रेल के एक इंजन के नीचे आ गयीं और देखते-देखते उन्हें हमेशा खो बैठा।
उस सदमें से उबरने के क्रम में मैं नौकरी से छुट्टी लिये रहा और फिर नर्वल के भाष्करानंद विद्यालय के अपने अध्यापक पंडित प्यारेलाल त्रिपाठी के सहयोग से मैं फिर नर्वल में जा दाखिल हुआ। उन्होंने मेरी संगीत दक्षता को आधार बनाकर प्रिंसिपल पंडित शिवशंकर लाल शुक्ल से मेरी फीस ही नहीं माफ करायी,मेरी किताबों की भी व्यवस्था स्कूल से ही करायी और मैं हाई स्कूल का विद्यार्थी हो गया। वहीं मुझे मिले डा.ब्रजलाल वर्मा जो मेरे क्लास टीचर भी थे और हिंदी,उर्दू, अंग्रेजी और फारसी तथा संस्कृत के खासे विद्वान थे। उन्होंने शब्दों की लरजन,उसकी ऊष्माउस सदमें से उबरने के क्रम में मैं नौकरी से छुट्टी लिये रहा और फिर नर्वल के भाष्करानंद विद्यालय के अपने अध्यापक पंडित प्यारेलाल त्रिपाठी के सहयोग से मैं फिर नर्वल में जा दाखिल हुआ। उन्होंने मेरी संगीत दक्षता को आधार बनाकर प्रिंसिपल पंडित शिवशंकर लाल शुक्ल से मेरी फीस ही नहीं माफ करायी,मेरी किताबों की भी व्यवस्था स्कूल से ही करायी और मैं हाई स्कूल का विद्यार्थी हो गया। वहीं मुझे मिले डा.ब्रजलाल वर्मा जो मेरे क्लास टीचर भी थे और हिंदी,उर्दू,अंग्रेजी और फारसी तथा संस्कृत के खासे विद्वान थे। उन्होंने शब्दों की लरजन,उसकी ऊष्मा और उसकी संगति की ऐसी पहचान मेरे मन में बिठा दी कि मुझे साहित्य जीवन जीने की कुंजी जैसा लगने लगा। वे हिन्दी की किसी कविता की पंक्ति को समझाने के लिये उर्दू और संस्कृत के काव्यांशों के उदाहरण देते थे और इस तरह साहित्य की बारीकियों पर मेरा ध्यान केंद्रित करते थे। लोकजीवन से संवेदना के तमाम तार झनझना देते थे:-


छापक पेड़ छिउलिया तपत वन गह्‌वर हो,
तेहि तर ठाढ़ी हिरनिया हिरन का बिसूरइ हो।
यह सोहर मैंने पहली बार डाक्टर ब्रजलाल वर्मा के मुख से सुना था और पहली बार उस दर्द को गहराई से महसूस किया था कि एक हिरनी कैसे अपने हिरन को मार दिये जाने पर उसे याद करने के लिये कौशल्या मां से कहती है-” जब उसकी खाल से बनी डपली पर तुम्हारा लाड़ला थाप देता है तो मेरा हिया काँप जाता है,माँ वह डफली मुझे दे दो।मुझे उस आवाज में हिरना की सांस बजती हुई मालूम होती है और मैं बिसूर कर रह जाती हूँ।”
संवेदना की इन गहराइयों में उतरने का अभ्यास मेरे उन्हीं प्रारंभिक अध्यापकों ने कराया था जो शब्द की सिहरन को दिल की धड़कन के इशारों की तरह बारीकी से पढ़ना सिखा देना चाहते थे। डा.ब्रजलाल वर्मा अक्सर गुगुनाया करते थे:-


कोई हमराज तो पायें कोई हमदम तो मिले
दिल की धड़कन के इशारात किसे पेश करें।
यही साहित्यिक अभ्यास थे जो जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ का दर्शन और ‘आंसू’ की रोमानियत को समझ सकने का सलीका भी दे सके और यह भी कि साहित्य और कुछ नहीं,जीवन की बारीकियों का बुना हुआ टुपट्टा है जो जिन्दगी को ज़ेवर भी बनाता है और ज़हर भी । यह आप पर निर्भर है कि आप उसे जे़वर बना लें या ज़हर। मैं एक बार नहीं अनेक बार लिख चुका हूँ कि साहित्य मेरे लिये और खास तौर पर कविता,जिंदगी को बेहतर बनाने का ज़रिया है। कविता सुनना,कविता लिखना और पढ़ना मेरे लिये बेहतर मनुष्य बनने का एक ज़रिया है। जब से कविता को समझने की समझ पैदा हुई तब से मैंने कविता को जीकर अपनी जिंदगी संवारी है। भाषा की दीवारें इसमें कभी आड़े नहीं आयीं,खासकर उर्दू और हिन्दी के बीच की दीवारों को मैंने भरसक तोड़ने की कोशिश की है। आज भी जब कुछ लोग प्रेम के अतिरेक में मुझे यह कहते हुये हिन्दी-उर्दू के बीच पुल बनाने का श्रेय देते हैं कि आपके बाद हिन्दी सम्पादकों में कोई ऐसा नहीं दिखता जो दोनों भाषाओं की खूबसूरती को पहचान कर उसकी बारीकियों को उभार सके तो एक धक्का सा लगता है कि क्या सचमुच भविष्य का मंजर इतना वीराना है! लेकिन जब आज के साहित्यिक मित्रों के बीच उर्दू शब्दों की छीछालेदर सुनता हूँ या पत्रकारों में उर्दू के शीन काफ दुरुस्त करने के क्रम में जबलपुर को ज़बलपुर कहते सुन लेता हूँ तो अपनी आत्मप्रशंसा में लगा हुआ धक्का एक तकलीफ में बदल जाता है। भाषाओं के प्रति मेरा उदार भाव ,हो सकता है, थोड़ा -बहुत अव्वहारिकता की हदें छुये लेकिन मेरे लिये सरदार जाफरी ,कैफ़ी आज़मी,कृष्ण बिहारी ‘नूर’,बशीर बद्र, और निदा फाज़ली अथवा अहमद फ़राज़,किश्वर नाहीद और फ़हमीदा रियाज़ उतने ही प्रिय हैं जितने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना,कुंवर नारायण, धर्मवीर भारती,जगदीश गुप्त अथवा दिनकर,अज्ञेय और सुमनजी लगते हैं। मैंने अपने अनेक समकालीनों के रचनाखंडों को अपने जीवन का अंग बनाया है और उससे अपने जीवन शैली के सिद्दान्त गढ़े हैं। पंडित रमानाथ अवस्थी की पंक्तियाँ हैं:-


आये गये बड़े-बड़े पंडित औ’ज्ञानी
कह नहीं पाये कोई मिट्टी की कहानी
कोई मिला बस्तियों में कोई बियाबान में
कोई कहीं टूट गया भूख की थकान में
टूटने का दर्द जहाँ समझा न जाये
ऐसी दुनिया को जिस वास्ते संवारूँ!
करने वाला और है किसी को क्यों पुकारूँ
जीवन की नाव किसी घाट क्यों उतारूँ!
मुझे ये पंक्तियां ऐकान्तिक संघर्ष का सबसे बड़ा संबल लगती हैं। एक ऐसी ऊर्जा, जो असहाय सी दिखने वाली अवस्था में भी स्वाभिमान को जागृत रखती है,इन पंक्तियों में प्रवाहित होती रहती है। डा.बशीर बद्र की पंक्तियाँ पढ़ता हूँ:-


मैं तो दरिया हूँ मुझे अपना हुनर मालूम है
मैं जिधर से जाऊँगा वो रास्ता हो जायेगा।
तो ये पंक्तियाँ मुझमें मगरुरी नहीं,गहरा आत्मविश्वास जगाती हैं। अपनी अकिंचनता में भी अपनी अस्मिता को रेखांकित करने का जो हलास बाबू जगन्नाथ प्रसाद रत्नाकर ‘उद्धव शतक’ की एक पंक्ति में दे देते हैं कि:-


जइहै बनि बिगरि न बारिधिता बारिधि की
बूंदता बिलैइहै बूंद बिबस बिचारी की।
उसी को कृष्णबिहारी नूर मेंपढ़ता हूँ:-
मैं एक कतरा हूँ लेकिन मेरा वजूद तो है
हुआ करे जो समन्दर मेरी तलाश में है।
अपने एकान्त को बांटने के लिये मैं कुंवरनारायण जी की कविता पुस्तक ‘इन दिनों’को अपने साथ रखता हूँ और उनके शब्दों के साथ जिंदगी की तमाम धूल झाड़कर तरोताज़ा हो जाता हूँ। डा.धर्मवीर भारती की ‘सपना अभी भी’ में अपने ही नहीं,देश और दुनिया के तमाम अधूरे सपनों के साकार होने का विश्वास जीने लगता हूँ। जीवन की अनेक विषम परिस्थितियों में कविता ने राह दी है। इलाहाबाद के मेरे मित्र कवि बुद्धसेन शर्मा ने लिखा है:-


जिस तट पर प्यास बुझाने में अपमान प्यास का होता हो
उस तट पर प्यास बुझाने से प्यासा मर जाना बेहतर है।
ये पंक्तियां पढ़कर मुझे जीवन में रीढ़ सीधी करके जीने का मंत्र मिल जाता है। कोलकाता के उर्दू शायर मुनव्वर राना की गज़ल का एकशेर मेरी कै़फियत बयान करने के लिये मुझे कई बार काफ़ी लगा है। वे कहते हैं:-


मियाँ मैं शेर हूँ शेरों की गुर्राहट नहीं जाती
मैं लहज़ा नर्म भीकर लूँ तो झुंझलाहट नहीं जाती।
काव्य के ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जिनसे मैंने अपना मानस रचा और संवारा है और उस रचाव से जो मेरा शब्द बनकर निकला है उसकी बाकायदा इज्ज़त की है। अपने बोले हुये शब्द के प्रति पूरी आस्था के साथ डटे रहना मेरी कमजो़री भी है और मेरी शक्ति भी। यह अवगुण मेरी पैतृक संपत्ति है और उसकी रक्षा करना मैं अपना परम धर्म मानता हूँ।
हुआ कुछ यूँ कि मेरे पिताजी उन दिनों नौकरी-वौकरी छोड़कर गांव में ही रह थे। रिश्ते के दूर के चाचा राधेश्याम जो साधू हो गये थे,अपने गांव में भंडारा करना चाहता थे। उन्होंने अपनी यह इच्छा पिताजी को बतायी ने इसे मांगलिक ‘सर्वजनहिताय’ काम समझकर उसमें पूरी तरह सम्मिलित रहने का वचन दिया। जब भंडारे का समय आया। तो गांव के चंडाल प्रकृति ब्राह्मणों ने भंडारे का बहिष्कार शुरू कर दिया। बहिष्कार का कारण यह साधू है,हर जगह का भोजन छुआछूत का विचार छोड़कर करते हैं,ऐसे व्यक्ति के भंडारे में सम्मिलित होने से ब्राह्मणत्व की साख को बट्टा लगेग और ‘उच्चता’ लांछित होगी।अजीब तर्क कि साधू अछूत है।
पिताजी पर भी ब्राह्मण मंडली ने दबाव बनाया और चाहा कि वे भी सम्मिलित होने से इंकार कर दे। पिताजी ने कहा कि मैं अपनी ज़बान से राधे को वचन दे चुका हूँ। मुझसे राय लेकर उन्होंने भंडारा किया है,अब कैसे इंकार कर दूँ। ब्राह्मण मंडली अब ज़रा सख्‍त हो गयी और बोली:” अगर यदुनन्दन तिवारी भंडारे में शामिल होंगे तो हम उनका भी जाति बहिष्कार करेंगे।” पिताजी ने खबर भिजवा दी जवाब में कि जाति बहिष्कार तो अब से ही कर लें क्योंकि मैं भंडारे में सम्मिलित होऊंगा।
वे भंडारे में सम्मिलित हुये और शान से भंडारा हुआ। मैं आयु में छोटा था लेकिन पिताजी का वचन देकर उस पर टिकने का तेवर मेरे लिये प्रेरक मंत्र बना और जीवन भर बना रहा। लांछन सहकर भी अपने शब्द को जीना मैं अपने चंद बुनियादी सिद्धांतो में मानता हूँ और लांछन मैंने जीवन में कम नहीं सहे।
सबसे बड़ा लांछन तो यह कि मैं’पूँजीपतियों का पिट्ठू’रहा।मेरा ‘दुर्भाग्य’ कि मैंने बम्बई विश्वविद्यालय की प्राध्यापिकी छोड़ने के बाद पूंजीपति संस्थानों में ही नौकरी पायी। सौभाग्य यह कि मुझे कोई प्रार्थनापत्र देने कहीं नहीं जाना पड़ा। जिस नौकरी के लिये प्रार्थनापत्र देते घूम रहा था वह थी किसी इंटरमीडियट कालेज में ड्राइंग मास्टर की नौकरी। जिन दिनों मैं इंटरमीडियट कर रहा था तभी मेरे अग्रज और आत्मीय, जो बाद में मेरे सगे संबंधी बने ,श्री रामावतार चेतन ,उनकी प्रेरणा से मैंने सर जे.जे.स्कूल आफ आर्टस बम्बई की इंटरमीडियट ग्रेड ड्राइंग की परीक्षा पास की। उसका उत्तर भारत में केन्द्र था ग्वालियर में जहां मैंने पहली बार ग्वालियर का राजमहल भी देखा। परीक्षा देने गया तो ग्वालियर का किला और फिर महल देखने की इच्छा हुई । महल में गया तो सब लोग जिधर जा रहे थे उधर से अलग वह खंड भी देखने की इच्छा हुई जिधर कोई नहीं जा रहा था। जब मैं उधर जा रहा था तो किसी अन्य दर्शक ने रोका कि उधर नहीं जाने देंगे,उधर शाही निवास है।
मैंने कहा: “जब कोई रोकेगा तो देखा जायेगा,लौट आऊंगा। जाने नहीं देगा तो आने तो देगा।”
और मैं अंदर तक अटपटे अंदाज़ में महल को देखता हुआ अन्दर तक चला गया। काफी दूर अंदर जाकर एक पहरेदार ने झिड़का:”ए कहाँ जाता है तुम? ”
मैंने कहा:”मैं महल देख रहा हूँ बाहर से आया हूँ।”
उसने कहा:” बाहर से आया है तो अंदर कहां जा रहा है? बाहर जाओ।”
मैंने उसी बे डर टोन में कहा:” तो अकड़ क्यों रहा है,जा रहा हूँ।”
और मैंने बाहर जाने का रास्ता पकड़ा और बाहर आ गया। लेकिन इसी क्रम में आधे से ज्यादा महल का अंतर टटोल आया।
उसका परीक्षाफल आया तो मैं पास हो गया था। उस समय यू.पी.बोर्ड में सर जे.जे.स्कूल आफ आर्टस से ‘पास’ को इंटर कालेज में ड्राइंग पढ़ाने का हकदार माना जाता था। अपनराम ने उसका फायदा उठाना चाहा और बी.ए. करते -करते थोड़ी आमदनी का ज़रिया बना लेना चाहा। नौकरी मिली लेकिन गंगा पार उन्नाव जिले के गांव रुझेई में। वहां कुछ संयोग ऐसा बना कि इंटरव्यू पहले हो लिया और उसमें प्रिंसिपल साहब की रुचि दिखी तो उन्होंने कहा कि आप प्रार्थना पत्र दे दीजिये। मैंने सुबह वहीं उठकर प्रार्थनापत्र लिख दिया।लिखा अंग्रेजी में और पहुंचवा दिया। जो परिचित प्रार्थनापत्र देने गये थे उनसे प्रिंसिपल साहब ने पूछा कि यह प्रार्थनापत्र किसने लिखा है। चूंकि उन्होंने खुद देखा था मुझे लिखते हुये ,सो बोले लिखा तो उन्होंने ही है,लेकिन नींद में से जागे थे इसलिये हो सकता है कुछ चूक हो गयी हो।
मेरे परिचित सज्जन तो जैस आसमान से जमीन में आ गिरे।प्रिंसिपल साहब ने कहा:”चूक नहीं बहुत अच्छी अंग्रेजी लिखा है।”वे लौटे गदगद भाव से -नौकरी की स्वीकृति साथ लेकर।
मैंने वह नौकरी साल भर की और फिर एम.ए. करने इलाहाबाद चला गया। इलाहाबाद गया तो यह पता नहीं था कि रहूंगा कहां,फीस कैसे भरूंगा और खाऊंगा क्या? लेकिन अपन ने एक कहावत सुन रखी थी कि जिसने मुंह चीरा है ,वह खाने को भी कुछ न कुछ कहीं से लेआयेगा। यह अजब किस्म का विश्वास लेकर मैं इलाहाबाद गया और वहाँ प्रकाशकों के भरोसे शान से दो साल गुज़ारे। सुबह यूनिवर्सिटी जाता था,दोपहर को प्रकाशकों के चक्कर लगाता था,पुस्तकों के कवर डिजा़इन करने का काम ढूंढता था और रात में उसे पूरा करके सुबह देर तक सोता था। इतनी देर तक कि कई बार नाश्ता किये बिना ही क्लास में जाने की मज़बूरी होती थी। वह सुबह देर तक सोने की आदत आज तक नहीं छूटी ।
अगली नौकरी जाकर लगी महाराष्ट्र में। चेतनजी उन दिनों बम्बई में रह रहे थे। उन्होंने वहाँ एल्फिंसटन कालेज के हिंदी विभागाध्यक्ष डा.इंदु प्रकाश पांडेय की सलाह से मुझे सरकारी कालेजों में आवेदन भेजने को कहा।मैंने बेमन से आवेदनपत्र भेजा क्योंकि पूना में शिक्षा विभाग के निदेशक के नाम भेजना था एक प्रार्थनापत्र। भेज दिया और भेजकर निश्चिंत हो गया कि होना जाना तो कुछ है नहीं। सो हिंदी भवन,इलाहाबाद की पुस्तकों की प्रचार-मुहिम हाथ में लेकर पश्चिमी यू.पी. के कालेजों में भटकता रहा। जब लौटकर इलाहाबाद आया तो देखा कि इंटरव्यू – लेटर आया है। और ‘कल’पूना में इंटरव्यू है। कल…यानी कि तत्काल गाड़ी पकडूँ तो भी कल तक बम्बई ही पहुंचूंगा,फिर वहाँ से पूना जाना… मतलब कि नौकरी की उम्मीद गयी।
उम्मीद गयी थी ,मगर गाडी़ मेरी नहीं गयी थी। मैंने फौरन टिकट के पैसों का इंतज़ाम किया और हावड़ा मेल पकड़ बम्बई के लिये रवाना हो गया। इंटरव्यू के दिन बम्बई पहुंचा,उससे अगले दिन पूना भी गया लेकिन चिड़िया खेत चुग गयीं थीं।
मैं निदेशक महोदय से मिलने की जिद में दिन भर पूना में रहा,उनसे कुछ कहता उसके पहले ही उन्होंने बता दिया कि वे अज्ञेयजी के भाई हैं,अब जरूर कुछ नहीं कर सकते लेकिन शाम का खाना खिलाने अपने घर ले गये।
खैर अगले साल मैंने फिर प्रार्थनापत्र दिया और एक साल किसी तरह फुटकर काम करके बम्बई में गुजार दिया। नौकरी मिली और शानदार मिली। मुझे मेरे मन की नियुक्ति दी गयी । जिस कालेज में मुझे प्राध्यापिकी मिली उसमें प्रिंसिपल थे मराठी के मशहूर कवि पु.शि.रेगे जो मराठी में मर्ढेकर के बाद कविता के पुरोधा माने जाते थे।दो साल मैंने उनके साथ काम किया। उन्हीं के साथ काम करते हुये मेरी शादी हुयी। उन्होंने शादी के बाद खाने पर आमन्त्रित किया और जो भेंट दी वह अपने आप में अद्‍भुत थी। उन्होंने अपने बगीचे से रातरानी ,एक्जोरा और पारिजात के पौधे दिये। वही मेरे लिये शादी की सौगात थी। वैसी सुगन्धभरी सौगा़त जीवन में दोबारा किसी ने नहीं दी। रातरानी और पारिजात की सुगन्ध से मैं आज भी अविभूत हो उठता हूँ।
एक दिन रेगे साहब ने बड़ी गंभीरतापूर्वक मुझे राय दी कि मैं सरकारी कालेजों के बजाय यूनिवर्सिटी के स्थानीय कालेजों में शिफ्ट हो जाऊँ। कारण यह कि मैं गैर मराठी अध्यापक मराठा राजनीति में पिसकर पूरे प्रदेश में ट्रांसफर भोगता रहूंगा,मेरा लिखना पढ़ना सब स्वाहा हो जायेगा। और इस तरह मैं शींव के एस आई ई एस कालेज में हिंदी विभाग में आ गया। वहां मेरे प्रिंसिपल थे प्रोफेसर ए.बी.शाह और वाइस प्रिंसिपल थे प्रोफेसर राम जोशी जो बाद में बंबई विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर बने। साल भर मैं विले पार्ले के मीठीबाई कालेज में हिंदी विभागाध्यक्ष बनकर चला गया और उसी के छह महीने बाद डा.धर्मवीर भारती ने मुझे ‘धर्मयुग’ में बुला लिया।
‘धर्मयुग’ में मेरा साल मुश्किल से बीता कि भारतीजी को मेरा सुकून खलने लगा। उन्हें अपने मातहतों को अग्नि की लपटों में रखने का हुनर हासिल था। संपादकीय संप्रभुता की रक्षा के लिये प्रतिबद्ध टाइम्स का प्रकाशन इसमें भारतीजी का पक्ष लेने को मज़बूर था और इस तरह उन्होंने पंडित विद्यालंकार के जमाने से अपने भरती किये आदमियों तक करीब अठारह आदमी निकाल दिये थै। धर्मयुग में भारती जी की तूती के आगे किसी की पिपिहरी भी नहीं बज सकती थी। धर्मयुग का संपादकीय स्तर सुधारने में भारती जी का योगदान बेजोड़ है लेकिन वहाँ का सौहार्द का माहौल नष्ट करने में उनका योगदान ऐतिहासिक था।अनेक भावी के होनहार बडे़ बेआबरू होकर निकाल फेंके गये।मैं भी भारती जी की अपेक्षाओं के मुताबिक खरा न उतरा और अंत में उनके बम की आखिरी चोट नंबर दो होने के नाते मुझ पर आकर दम लेती थी। मुझे उनके साथ ग्यारह साल काम करना पड़ा। लंबी दास्तान है वह जीवन की,जिसे फिर कभी बयान करूँगा। लेकिन उस दरमियान मुझे अनेक दोस्तमिले जो तब जुड़े तो जीवन भर जुड़े ही रहे। रवीन्द्र कालिया उनमें से एक हैं और मुझे उनसे दोस्ती निर्वहन पर आज भी गर्व होता है। खासकर उनके सामने रखा गया भारती जी का सहायक संपादक बनने का प्रस्ताव और बदले में कालिया द्वारा अपने प्रभाव का उपयोग करके विभाग से मेरे खिलाफ सहयोगियों का एक शिकायती पत् बनवाने का प्रस्ताव सिरे से ठुकरा देना।कालिया का उस प्रस्ताव को ठुकराने के लिये साहस जुटाने के लिये शराब पीकर भारती जी के घर जाना उनकी कथाकृतियों ‘काला रजिस्टर’ और ‘मोनालिसा की मुस्कान’ में दर्ज है।
बहरहाल वह ऐसा इतिहास है जो मेरी पत्रकारिता की पाठशाला भी है और मेरे टाइम्स में जीवित बने रहने का एक अजूबा भी। मगर जैसा मैंने कहा कि मुझे उसी दौरान अनके घने मित्र मिले जो मेरे तूफानी दिनों का लंगर साबित होते रहे। उनमें कुछ तो भारतीजी के ही घने मित्र थे। स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद झुनझुनवाला और उनकी विदुषी धर्मपत्नी श्रीमती शीला झुनझुनवाला उनमें मुख्य थे। उस घर में मुझे अपार प्रेम मिला जो आज तक मिलता आ रहा है।आज भी मेरे घर का कोई भी मांगलिक कर्म,पूजा-अनुष्ठान शीला जी की शिरकत के बिना पूरा नहीं होता। प्रसिद्ध संगीतकार सुरिन्दर सिंह सिंह हैं जो मेरे एकान्त के क्षणों के लिये ‘एक अकेला काफी’ है।रवीन्द कालिया मेरे लिये आज भी अनुजवत प्यारे हैं।डा.महीप सिंह आज तक घने विश्वास के हकदार बने हुये हैं। कमलेश्वर जी को अब भी मैं उसी विश्वास और आत्मीयता के साथ अपने नजदीक पाता हूँ जिसे उन्होंने मुझे बम्बई में मुझे दिया था। टाइम्स संस्थान के तत्कालीन महाप्रबन्धक डा.राम तरनेजा के प्रबन्ध कौशल और प्रशासनिक दक्षता ने एक दिन मुझे संपादक बनाकर दिल्ली भेज दिया और मैं बिना किसी सूचना के संपादक बनाकर भेज दिया गया। सुनने में बात अविश्वसनीय लगती है लेकिन सच है कि मुझे मेरी पदोन्नति की भनक तक न दी गयी और एक झटके में बम्बई छोड़कर दिल्ली जाने का मार्चिंग आर्डर दे दिया गया।
दिल्ली में मेरे जीवन का बन्द ढक्कन जो खुला तो फिर पलटकर देखने के दिन नहीं आये। मेरे संपर्कों का दायरा एकदम विस्तार पा गया। राजनीति,साहित्य, पत्रकारिता ,समाजसेवा,शिक्षा,मीडिया…बहरहाल हर कहीं अपनी झंडी का रंग दिखाई देता था। और यही मेरे लिये ईष्या और लांझनों का कारण बनता गया। लेकिन विश्वास मानिये ,बन्दे ने अपने अन्दर झांकने अलावा किसी भकुये का कथन कान नहीं दिया। मैं ‘पराग’ से ‘सारिका’ से ‘दिनमान’और ‘दिनमान’ से’नवभारत टाइम्स’ तक का सफर तय करने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा कि मुझे जिनका आशीष मिलता तो मैं मालामाल अनुभव करता ,वे इतने कमज़र्फ थे कि उन्होंने अपने अल्फ़ाज़ मेरा कद छोटा करने में ही सर्फ़ किये। दुष्यन्त कुमार की पंक्तियाँ रह-रहकर याद आया करती थीं।’एक कण्ठ विषपायी’ में शंकर सती का शव ढोते-ढोते आखिर कह उठते हैं:-


आदर्शों का परिधान ओढ़
मैंने क्या पाया जीवन में? प्रेयसि वियोग!
हर परम्परा के ढोने का श्रेय मुझे मिला
हर सूत्रपात का श्रेय ले गये ‘और लोग’।
मैं ऊब चुका हूँ इस महिमामंडित छल से
अब मुझको अपना जीवन सत्य पकड़ना है
जिन आदर्शों ने मुझे छला है कई बार
उन आदर्शों से मुझको लड़ना है।
मेरी यह लड़ाई मेरे उन्हीं अपनों से रही जो मुझे परोक्ष रूप से लांक्षित करके मेरे लिये खाई खोदते रहे और सामने मुझसे मेरे सम्पर्कों का लाभ लेने का बानक बनाते रहे।
इस सबके बावजूद मेरे आत्मीयों की परिधि छोटी नहीं थी जिनमें जोड़ने का सूत्र केवल ‘मनुष्यता’थी। देखने काबिल दृश्य था जब मेरी बड़ी बेटी का तिलक जाने वालों में श्री रमेश चंद्र जैन थे, पंडित रमानाथ अवस्थी थे,सरदार सुरिन्दर सिंह और डा.महीप सिंह थे,डाक्टर कैलाश बाजपेयी थे,मैं उस जमात में सबसे पीछे था। आज भी जब मेरे दोनो दामाद मेरे मित्रों-अग्रजों के पैर को हाथ लगाकर आशीर्वाद लेते हैं तो मैं फूला नहीं समाता कि जात-पाँत और धर्म की जिन बेमानी दीवारों को मैंने अपने जीवन में कोई स्थान नहीं दिया,उन्हें मेरे दोनों बेटों(दामाद) ने भी अपने जीवन में ज्यों का त्यों उतारा।श्री भागवत झा आजाद और पंडित शिवशंकर मिश्र बारात की अगवानी करने वालों में थे। ताराचंद खंडेलवाल अपने घर की एक शादी को भुलाकर सारा इंतजाम देख रहे थे,प्रबन्धकर्ता थे।घरेलू हेतू व्यवहारी के रूप में सुशील अंसल और उनकी सुप्रसिद्ध लेखिक पत्नी कुसुम अंसल थीं,लक्ष्मी निवास झुनझुनवाला,अशोक जैन, डा.लक्ष्मीमल्ल सिंघवी और भौजाई कमला सिंघवी,श्री रामनिवास जाजू जैसे आत्मीय थे जो आज भी वही आत्मीय गौरव देते हैं। अनुज के रूप में आलोक मेहता मिले हुये थे। मेरी पत्नी को सगी बहन से भी ज्यादा मानने वाले कुलदीप तलवार और विजय क्रांति थे।…सम्बन्धों की एक लहलहाती शस्य श्यामला फसल थी जो मुझे दिल्ली में मिली और जिन्हें पाकर मैं धन्यता अनुभव करता हूँ। इन आत्मीयों ने मुझे कभी विपन्न नहीं महसूस होने दिया।
सत्ता का प्यार भी मुझे कम नहीं मिला था। यह मेरा सौभाग्य था कि श्रीमती इंदिरा गांधी के जमाने से लेकर उनके पुत्र राजीव गांधी,श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह,चंद्रशेखर ,पी वी नरसिंहराव,इंदर कुमार गुजराल,अटल बिहारी बाजपेयी तक सभी प्रधानमंत्रियों के सान्निध्य से मैं मंडित रहा लेकिन इस सान्निध्य का अनधिकृत लाभ मेरे हिस्से कभी नहीं आया और न कभी उसके लिये मेरा मन किया कि अपनी रीढ़ झुकाकर कुछ हासिल करूँ। पद्मश्री अलंकरण मिला तो तब जब राजग की सरकार थी जिसका मैं बहुत प्रशंसक नहीं रहा,यहां तक कि कुछ ‘महापुरुषों’ ने प्रधानमंत्री को मेरे विरुद्ध भड़का भी दिया था। नेहरू फेलोशिप मिली जब मैं अखबार का संपादक तो क्या किसी को भी ‘ओबलाइज़’ कर सकने का भ्रम भी नहीं दे सकता था। ‘परिवार’ पुरस्कार तब मिला जब मैं प्रिंट मीडिया से अलग इलेक्ट्रानिक मीडिया में ‘इन चैनेल’ का डायरेक्टर बन गया था। पत्रकारिता का सर सैयद पुरस्कार तब मिला जब मैं वहां से भी मुक्त होकर पुन: दिल्ली आ गया। व्यवस्था को भी आंख मूंद कर मैं कभी नहीं भाया। श्रीमती इंदिरा गांधी के समय श्री श्रीकांत वर्मा के जब लेखक संगठन बनाया तो एक मीटिंग में मुझे बुलाया गया। उसमें मैंने एक तिर्यक बयान दे दिया था तो फिर दोबारा मैं कभी उस मीटिंग के काबिल नहीं समझा गया। राजनीतिक सम्पर्क सूत्र का लाभ इमरजेंसी के वक्त कुछ निर्दोष लोगों के वारंट कटवाने में जरूर किया ,कुछ के तबादले रुकवाये। लेकिन उन्हीं लोगों ने मेरे लिये हलफिया बयान दिये कि वे निजी अनुभवों के आधार कह सकते हैं कि इमरजेंसी के दिनों’व्यवस्था’ से सम्पर्क घनेरे थे। मैंने ऐसे लांझन सुने और सहे । ऐसे ही लांझनों का पत्थर एक दिन उस पूंजीपति संस्थान कि तरफ से भी आया जिसका मैं बड़ा पिट्ठू बताया जाता था।
चूंकि न व्यवस्था का पिट्ठू होना मंजूर रहा और न पूंजीपति का ,सो दोनों ओर से किनाराकशी हुई और मैं टाइम्स संस्थान से निकलकर दूजे पूंजीपति संजय डालमिया के अखबार ‘संडे मेल’ में आ गया और अपनी कीमत पर ही गया। ‘संडे मेल’ हिंदी का सर्वाधिक लोकप्रिय रविवासरीय अखबार बना ,यह मेरा सौभाग्य रहा। ‘पराग ‘से लेकर’संडे मेल’ तक मैंने हर क्षेत्र की प्रख्‍यात हस्तियों से साक्षात्कार किया। संसार भर की सैर की। अपने देश के प्रधानमंत्रियों और विदेशमंत्रियों के साथ घूमा, विदेशी सरकारों के आमंत्रण पर बाहर गया, मौका पाकर हर विभूति से बातचीत की,फिदेल कास्त्रो से क्यूबा में मिले तो मार्गरेट थैचर से नयी दिल्ली के प्रगति मैदान में। अपने देश के हर प्रधानमंत्री के साथ लम्बे-लम्बे साक्षात्कार किये,दुनिया देखी और अपने पाठकों को दिखाई। आज भी इस शौक से उबर नहीं पाया । अपनी कमाई का अधिकांश हवाई जहाज के किराये में दिया और पर्यटन और भ्रमण का सुख उठाया।
…और जब संडे मेल बंद हुआ तो एक बार फिर किंकर्तव्यविमूढ़ होने की स्थिति में पहुंचता कि उसके पहले ही दुनिया के सबसे धनी माने जाने वाले लोगों में से हिन्दुजा समूह के चैनेल में मीडिया डायरेक्टर बनकर चला गया। ईर्ष्या की स्याही के धब्बे अभी मेरे दामन में पड़ने बंद नहीं हुये ,कम भले हो गये हैं। कुछ तो इसलिये भी कम हो गये हैं कि स्याही फेंकने वाले भी मान बैठे हैं कि यह तो लाइलाज़ मरीज़ है,अपनी मौत मरने दो। लेकिन मरीज़ अपनी चाहत के दियों के साथ ज्यों का त्यों जिंदा है:-


अभी रोशन हैं चाहत के दिये सपनों की आंखों में
बुझाने के लिये पागल हवायें रोज़ आती हैं।
ये पागल हवायें अब सेहत की जानिब से भी हमला करने लगीं हैं। पता यों चला कि एक दिन ब्लड प्रेसर नाप लिया गया। पता चला कि जिस रक्तचाप का आदी धर्मयुग के ज़माने से हो गया था,उसने दिल को तो बचा लिया लेकिन किडनी पर हमला कर बैठा। करीब करीब अठहत्तर प्रतिशत गुर्दे ढेर हो चुके थे। मैंने हिन्दुजा अस्पताल के फ़िजीशियन डा.एफ.डी.दस्तूर की मदद से वहां के गुर्दा विभाग के हेड डा. भरत शाह सीधा सवाल किया कि डाक्टर साहब,अगर इसी रफ्तार से मैं चलता रहा तो मुझे कितना सुरक्षित वक्त आप दे सकेंगे ? उन्होंने डाक्टर के नाते सवाल का जवाब देना गैर वाजिब माना लेकिन इसरार करने पर दोस्त के नाते बता दिया कि अठारह महीने के बाद जिंदगी को डावांडोल मानना चाहिये। डाक्टर दस्तूर अठारह महीने की बात सुनकर घबरा गये।मैं उनकी घबराहट देखकर घबरा गया। मैंने डाक्टर दस्तूर से कहा कि डाक्टर साहब,एक नियम होता है ऐकिक नियम,जिसमें हिसाब लगाया जाता है एक इकाई के आधार पर। सो आप हिसाब लगाइये कि एक आदमी की दोनों किडनियाँ अठहत्तर प्रतिशत खराब होने में सत्तर साल लगे तो बाकी बाइस प्रतिशत खराब होने में उसे कितने साल लगेंगे?
सवाल सुनना था कि डाक्टर भरत शाह सहित हम सब ठहाका लगाकर हँस पड़े।डा.शाह बोले : “डाक्टर नंदन ,आई अप्रीशियेट योर सेंस आफ ह्यूमर ऐंड विल पावर,कीप इस अप।”
अब मैं उन्हें कैसे बताऊँ कि उनके दिये अठारह महीने कई बार गुज़र कर चले गये और हम हैं कि अभी चले ही जा रहे हैं। पिछले दिनों दिल्ली के डाक्टरों ने एक आपरेशन जरूरी माना तो मैंने उनके हुजूर में अपने को दाखिल कर दिया। सर्जन साहब तीन घंटे लगे रहे,एक धमनी काटकर किसी शिरा में जोड़ी जानी थी। शिरा ने जुड़ने से साफ इंकार कर दिया,आपरेशन फेल घोषित हो गया। सर्जन साहब अफसोस में। मैंने कहा : डाक्टर ,मस्त हो जाओ, अपन को अभी जल्दी कुछ नहीं होने का।


मेरे अजदाद ने रौंदे हैं समन्दर सारे ,
मुझसे तूफान में लंगर फेंका नहीं जाता।

कन्हैयालाल नंदन

(मासिक पत्रिका संचेतना से साभार)
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फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

13 responses to “बुझाने के लिये पागल हवायें रोज़ आती हैं”

  1. सृजन शिल्पी
    नंदनजी का स्वयं-लिखित संस्मरण पढ़कर बहुत अच्छा लगा। उनके बारे में उनके समकालीन बुद्धिजीवियों एवं उनके पूर्व सहकर्मियों के मुँह से बहुत कुछ सुनता रहा हूँ। धर्मयुग में उनके कार्यकाल के दौरान के संस्मरण विस्तार से पढ़ने को मिलें तो और भी अच्छा लगेगा। आजकल रामशरण जोशी जी अपने संस्मरणों के कारण चर्चा के केन्द्र बने हुए हैं । नंदनजी के संस्मरण साहित्य की यादगार धरोहर बनेंगे। यदि संभव हो सके तो आप ही क्यों नहीं उनकी एक जीवंत जीवनी लिख डालते हैं।
  2. आलोक
    एक सवाल – क्या यह पुनर्प्रकाशन मूल लेखक या उनके मौजूदा रॉयल्टीधारों की अनुमति से हुआ है? हिन्दुस्तान में पचास साला नियम है इसलिए पूछ रहा हूँ।
  3. e-shadow
    बहुत सुंदर, और साधुवाद, इसे हमें उपलब्ध कराने के लिये।
  4. फ़ुरसतिया » थोड़ा कहा बहुत समझना
    [...] आलोक ,जो कि हमारे आदि चिट्ठाकार हैं,ने अपनी टिप्पणियों में कुछ बुनियादी सवाल उठाये हैं। नंदनजी जी कविताओं पर टिप्पणी करते हुये उन्होंने पूछा कि क्या इसके लिये लेखक या प्रकाशक से पूछ लिया गया है। नंदनजी की रचनाओं के बारे में तो बता दूँ कि वे हमारे मामा हैं। उन्होंने हमें कह रखा है कि जो रचना मन करे छापो। बल्कि उन्होंने तो अपनी साइट बनाने के लिये भी कहा है। [...]
  5. अनूप भार्गव
    नन्दन जी कविताओं में ‘बेबाकपन’ अब ज्यादा समझ में आता है ।
  6. फुरसतिया » काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाये
    [...] मुंबई ब्लागर मिलन में अनिल रघुराज का गीत सुनकर अद्भुत आनंद आया। इस गीत के संदर्भ में अपने मामा डा.कन्हैयालाल नंदन का आत्मपरक लेख याद आ गया। इस लेख में उन्होंने अपने उन दिनों की याद की थी जब उनकी संवेदना को उनके गुरू डा.ब्रजलाल वर्मा संवार रहे थे। उन्होंने लिखा था- मैं हाई स्कूल का विद्यार्थी हो गया। वहीं मुझे मिले डा.ब्रजलाल वर्मा जो मेरे क्लास टीचर भी थे और हिंदी,उर्दू, अंग्रेजी और फारसी तथा संस्कृत के खासे विद्वान थे। उन्होंने शब्दों की लरजन,उसकी ऊष्माउस सदमें से उबरने के क्रम में मैं नौकरी से छुट्टी लिये रहा और फिर नर्वल के भाष्करानंद विद्यालय के अपने अध्यापक पंडित प्यारेलाल त्रिपाठी के सहयोग से मैं फिर नर्वल में जा दाखिल हुआ। उन्होंने मेरी संगीत दक्षता को आधार बनाकर प्रिंसिपल पंडित शिवशंकर लाल शुक्ल से मेरी फीस ही नहीं माफ करायी,मेरी किताबों की भी व्यवस्था स्कूल से ही करायी और मैं हाई स्कूल का विद्यार्थी हो गया। वहीं मुझे मिले डा.ब्रजलाल वर्मा जो मेरे क्लास टीचर भी थे और हिंदी,उर्दू,अंग्रेजी और फारसी तथा संस्कृत के खासे विद्वान थे। उन्होंने शब्दों की लरजन,उसकी ऊष्मा और उसकी संगति की ऐसी पहचान मेरे मन में बिठा दी कि मुझे साहित्य जीवन जीने की कुंजी जैसा लगने लगा। वे हिन्दी की किसी कविता की पंक्ति को समझाने के लिये उर्दू और संस्कृत के काव्यांशों के उदाहरण देते थे और इस तरह साहित्य की बारीकियों पर मेरा ध्यान केंद्रित करते थे। लोकजीवन से संवेदना के तमाम तार झनझना देते थे:- [...]
  7. फुरसतिया » सम्मान का एरियर
    [...] वर्मा की आपबीती बस यूं हीPopularity: 2% [?]Share This (1 votes, average: 5 out of 5)  Loading …  [...]
  8. फुरसतिया » मुन्नी पोस्ट के बहाने फ़ुरसतिया पोस्ट
    [...] हवायें रोज़ आती हैं बस यूं हीPopularity: 2% [?]Share This (1 votes, average: 5 out of 5)  Loading …  [...]
  9. उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए
    [...] कन्हैयालाल नन्दन संबंधित कड़ियां: १.कन्हैयालाल नंदन- मेरे बंबई वाले मामा २. कन्हैयालाल नंदन की कवितायें ३. बुझाने के लिये पागल हवायें रोज़ आती ह�… [...]
  10. anita kumar
    नंदन जी के संस्मरण उन्हीं की जबानी सुनने का मजा ही कुछ और है, काश हम भी आप की तरह उनसे मिले होते
  11. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] मामा 2.कन्हैयालाल नंदन की कवितायें 3.बुझाने के लिये पागल हवायें रोज़ आती है… 4.अथ कम्पू ब्लागर भेंटवार्ता 5.थोड़ा [...]
  12. काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाये
    [...] वर्मा संवार रहे थे। उन्होंने लिखा था- मैं हाई स्कूल का विद्यार्थी हो [...]
  13. : मेरी ख्वाबगाह में नंदन- ज्ञानरंजन
    [...] २.कन्हैयालाल नंदन जी की कवितायें ३.बुझाने के लिये पागल हवायें रोज़ आती है… ४. क्या खूब नखरे हैं परवरदिगार [...]