Friday, July 12, 2013

सफ़ाई का मौका

http://web.archive.org/web/20140420081915/http://hindini.com/fursatiya/archives/4478

सफ़ाई का मौका

सफ़ाईमंत्री जी की शिकायत है कि उनको सफ़ाई का मौका नहीं मिला. दूध से मक्खी की तरह निकाल दिया गया. घोर कलयुग है जी. कल तक सरकार में अंगद की तरह जमा आदमी उत्तराखंड में आई बाढ में मामूली सामान सा बह गया.
मीडिया को भी तकलीफ़ हुई होगी. हफ़्ते भर का जो मामला खिंचता वह दो दिन में निपट गया. मीडिया का ’सनसनी लॉस’ हो गया. बुजुर्गवार ए.टी.एम. न्याय का शिकार हो गये. मंत्रीजी को ऐसे निकाल दिया जैसे ए.टी.एम. से पैसे निकाले गये हों. उनकी तकलीफ़ जायज है. सफ़ाई का मौका न मिला. न हाय-हाय हुई न किचकिच. निकाल बाहर किया गया.
देखा जाये तो बुजुर्गवार ने लीक तोड़ने का काम किया. राजनीति वाले घपले-घोटाले, भाई भतीजावाद और घूस-फ़ूस के लिये बदनाम हैं. बुजुर्गवार ने जनप्रतिनिधियों की बदनामियों की एकरसता को तोड़ा है. भ्रष्टाचार के दलदल से मामला उठाकर यौनाचार की जमीन तक लाये हैं. नयी नजीर पेश की है राजनीतिज्ञों के सामने. बदनामी के लिये कब तक करप्शन का मुंह जोहते रहोगे भाई. बदनामी के लिये करप्शन का विकल्प मौजूद है आपके पास.
बुजुर्गवार ने देश के युवाओं के सामने भी एक नजीर पेश की है. युवा पीढी दिन रात मल्टीनेशनल कंपनियों की चाकरी करती हुई राजनीति से दूर भाग रही है. तनाव के चलते उनके अपने यौनक्षमता प्रभावित हो रही है. इस नजीर से उनको राजनीति में आने की प्रेरणा मिल सकती है. राजनीति में आओ, फ़िर से यंग बन जाओ.
भूतपूर्व वजीर साहब के सहारे बुढ़ापे में जवानी का संचार करने की दवा बेचने वाले भी अपनी दुकान चमका सकते हैं. अगले ने हमारी कंपनी की बनी दवाई खायी तभी जवानी बरकरार रही. हमारी जड़ी सूंघी उसी से ताकत का संचार हुआ. झटका हकीम भी सार्वजनिक शौचालयों में अपना हल्ला मचा सकते हैं. हमसे झटका लगवाओ, कयामत तक जवानी चमकाओ. देशी ताकत की दवा बनाने वाले वियाग्रा के मुकाबले स्वदेशी गोली के चमत्कार के किस्से सुना सकते हैं.
बुजुर्गवार की पार्टी वालों ने उनको सफ़ाई का मौका नहीं दिया लेकिन खुद दिये पड़े हैं सफ़ाई. कह रहे हैं आरोप लगाने वाली पार्टी के लोग यह सब बहुत पहले से करते आ रहे हैं. हमारे यहां तो अब शुरु हुआ.
यह अपराध बोध ठीक बात नहीं. न बुजुर्गवार के लिये, न उनकी पार्टी के लिये न समाज के लिये. सबको छाती ठोंककर कहना चाहिये हम परम्परा से जुड़े रहे हैं. अपने पूर्वज ययाति की परंपरा निबाह रहे हैं.ययाति ने तो अपनी यौन इच्छा पूरी करने के लिये अपने लड़के से जवानी उधार ली थी. हम तो अपनी से काम चला रहे हैं. जवानी के लिये किसी लोन की अर्जी नहीं दी. वे तो सिर्फ़ स्त्रियों को भोगते थे , हम तो लड़कों को भी कृतार्थ कर रहे हैं. पूर्वजों के आदर्शों को नये आयाम दे रहे हैं. नयी नजीर पेश कर रहे हैं.
बुजुर्ग की शिकायत जायज लगती है. उनको सफ़ाई का मौका तो मिलना चाहिये था. आपको क्या लगता है?

8 responses to “सफ़ाई का मौका”

  1. arvind mishra
    यह व्यंग की अश्लील विधा है हमें तो आगे पढने में शर्म आ रही है :-(
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..बिचारी कर्मनाशा!
  2. प्रवीण पाण्डेय
    सफाई करने का और सफाई देने का अवसर तो मिलना बनता है, कुछ नहीं तो क्षमा माँगने का ही सही।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..मैं किनारा रात का
  3. Pawan Mishra
    ये बुजुर्ग भ्रमवश 377 हटाने की जगह 370 हटाने के नाम से भाजपा से जुड़ गये होंगे शायद।
  4. sanjay jha
    बुजुर्गवार ने जनप्रतिनिधियों की बदनामियों की एकरसता को तोड़ा है. राजनीति में आओ, फ़िर से यंग बन जाओ. हम तो अपनी से काम चला रहे हैं. जवानी के लिये किसी लोन की अर्जी नहीं दी.
    …………………………..
    …………………………..
    प्रणाम.
  5. alpana
    वाकई पते की बात है यह कि ‘मीडिया का ’सनसनी लॉस’ हो गया.’
    अच्छा हो कि बाकि मामलों में भी अदालतें इतना त्वरित फैसला सुना दें.
    alpana की हालिया प्रविष्टी..रंग बदलता मौसम
  6. PN Subramanian
    पूरा मामला उतना सरल और सीधा नहीं है. इस निष्कासन और ए टी एम जैसी दीगर कार्रवाई के पीछे कई राज छुपे होंगे. आपने जो तस्वीर लगाईं है उसपर भी एक यथार्तवादी पोस्ट बननी चाहिए.
  7. Khushdeep Sehgal
    अब समय आ गया है, जब राघवजी, एनडी तिवारी और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे लोगों को मिलकर अपनी नई
    पार्टी का ऐलान कर देना चाहिए…
    जय हिंद…
  8. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] सफ़ाई का मौका [...]

Monday, July 08, 2013

टमाटर की डॉलर को पटकनी

http://web.archive.org/web/20140420081720/http://hindini.com/fursatiya/archives/4465

टमाटर की डॉलर को पटकनी

टमाटरआजकल टमाटर के भाव चढ़ते जा रहे हैं. एक टमाटर से हमने इस बारे में बातचीत की। टमाटर ने अपने दाम बढ़ने के पीछे के कारण बताये. सुनिये बातचीत के मुख्य अंश:
सवाल: आपके भाव इत्ते भाव क्यों बढ रहे हैं?
जबाब: मैं डॉलर को पटखनी देना चाहता हूं. स्वदेशी समर्थक हूं. मुझे यह कत्तई बर्दाश्त नहीं कि कोई बाहरी ताकत हमारे देश वासियों को परेशान करे. मैं डॉलर के बढ़ते दाम से हलकान देशवासियों को सुकून का एहसास दिलाना चाहता हूं. मैं डॉलर का घमंड चकनाचूर करना चाहता हूं.
सवाल: आपकी ये कैसी स्वदेशी भावना है कि आप अपने दाम बढ़ाकर लोगों को परेशान कर रहे हैं.
जबाब: दुनिया में सब कुछ सापेक्ष होता है. परेशानियां भी. मैं अपने दाम बढ़ाकर लोगों को सुकून का एहसास दिलाना चाहता हूं कि बाकी सब्जियां मेरे मुकाबले सस्ती हैं. न केवल सब्जी बल्कि जुलाई में बच्चों के एडमिशन, बढती फ़ीस, मंहगी किताबों आदि सब परेशानियों को भुलाने में सहायता करना चाहता हूं. लोग मेरे कारण बाकी सब छोटी मंहगाई झेल लेंगे. मैं तो कोशिश में हूं कि लोग मेरे कारण उत्तराखंड की आपदा भी भूल जायें.
सवाल: ऐसे कैसे हो सकता है कि रोजमर्रा की परेशानियां सब आपके कारण भूल जायें?
जबाब: अरे चाहने से क्या नहीं हो सकता? मीडिया से बातचीत चल रही है अपनी. बात पक्की होते ही खेल शुरु होगा. फ़िर देखियेगा मेरे जलवे. सारे मीडिया वाले अपने-अपने कैमरा मैन लिये मंडी में दिखेंगे.
सवाल: तो आपकी योजना प्याज की तरह सरकार गिराने की है?
जबाब: देखिये हम किसी की नकल नहीं करते. प्याज जी से हमारे मधुर संबंध हैं. हम उनका आदर करते हैं. मुद्दों के आधार पर संबंध हैं. सलाद में हमारा उनका गठबंधन सदियों से अच्छा चल रहा है लेकिन सॉस में हम उनके साथ नहीं हैं. वैसे भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिये विकल्प होना हमेशा अच्छी बात है. सरकार गिराने के लिये एक ही सब्जी पर निर्भरता किसी भी लोकतंत्र के लिये ठीक नहीं. लेकिन फ़िलहाल हमारी प्राथमिकता सरकार की नहीं लोगों को कई तरह की मंहगाई से राहत महसूस कराने की है. लोग हमारी मंहगाई को देखकर बाकी मंहगाई से राहत महसूस करे यही हमारा उद्धेश्य है. सिंगल विंडो मंहगाई राहत केंद्र समझिये मुझे.
सवाल: अगर कभी सब्जियों की सरकार बनी तो क्या आप प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करेंगे?
जबाब: आप पत्रकारों की बलिहारी है. जो भी कोई जरा सा चर्चा में आया उसमें प्रधानमंत्री बनने की संभावना देखने लगते हैं. धन्य हैं आप लोग भी.
सवाल: देखिये यह हमारी पेशागत मजबूरी है. इसलिये इस सवाल का जबाब तो आपको देना ही पड़ेगा कि अगर कभी आपकी सरकार बनी तो क्या आप प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करेंगे?
जबाब: देखिये सब्जियों का उपयोग हमेशा सरकार गिराने के लिये होता है. बनाने के लिये नहीं. हमारे वरिष्ठ मित्र प्याज के साथ भी यही हुआ. एक बार उनके नाम पर सरकार गिरी लेकिन जब सरकार बनी तो उनको कोई पद नहीं मिला. वैसे भी हमारा उद्धेश्य सेवा है. सरकार बनाना नहीं. लेकिन यदि कभी ऐसा मौका आया तो सब्जी मंडी में सभी सब्जियां बैठकर सामूहिक निर्णय लेंगी और सर्वसम्मति से जो फ़ैसला होगा उसे सब स्वीकार करेंगे.
इस बीच सब्जियों के नारे गूंजने लगे:
टमाटर तुम संघर्ष करो,हम तुम्हारे साथ हैं.
हमारा नेता कैसा हो, टमाटर भैया जैसा हो.
आगे संवाददाता कुछ और पूछता तब तक टीवी पर कामर्शियल ब्रेक की घोषणा हो गयी.

10 responses to “टमाटर की डॉलर को पटकनी”

  1. आशीष
    टमाटर जी भी विदेशी है, १६ वी सदी मे पुर्तगालियों ने लाया था उन्हे । अब वो इटालीयन नहीं है इसका मतलब यह नहीं की उन्हे छोड़ दें!
  2. arvind mishra
    सटीक व्यंग है टमाटर के बहाने नेतागिरी और मीडियागिरी पर :-) हम तो कोई सुर्खरू टमाटर गाल नेत्री की खोज में है -उसके आगे यह टमाटर बेदम है !
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..मिथक का मतलब
  3. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    दम है जी टमाटर में, मीडिया को तो इसके पीछे जाना ही पड़ेगा।
    आशीष जी, विदेशी मूल तो सुना है आर्यों का भी था। जो भारत में आ गया वह यहीं का हो गया।
  4. Alpana
    बहुत ही मस्त- जबरदस्त लगा टमाटर महोदय का साक्षात्कार.
    ये ‘प्याज जी ‘की नक़ल नहीं करते लेकिन ये भी किंग मेकर कहलायेंगे .इतिहास में दर्ज हो जायेंगे.
    Alpana की हालिया प्रविष्टी..चित्र और त्रिवेणी
  5. Anonymous
    टमाटर ने पटकनी तो दे ही डाली
  6. shikha varshney
    अब कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी..यूँ हि तो टमाटर भाव नहीं बढाता :):)
    जोरदार , शानदार व्यंग है.
    shikha varshney की हालिया प्रविष्टी..कड़वा सच …
  7. प्रवीण पाण्डेय
    सलाद के गठबन्धन को तो मँहगा कर ही दिया, इन लोगों ने।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..मैे किनारा रात का
  8. karun kumar
    phursatiya ji aapko jankar khusi hogi ki sabji morcha ko Ncp ka samarthan mil gaya hai. Hon’l krishi mantri sharadpawar pyaj ko abroad jane ke khilaph nahi hain.
  9. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] टमाटर की डॉलर को पटकनी [...]

Saturday, July 06, 2013

टमाटर पर गदर

http://web.archive.org/web/20140420082620/http://hindini.com/fursatiya/archives/4469

टमाटर पर गदर

गदर मची है टमाटर पर,
पहुंचेगा क्या ये सौ पर। हर स्टेटस पर दिखता है,
चहक रहा FB,ट्विटर पर।
मंहगा है, छोड़ो मत खाओ,
काहे को जान दें टमाटर पर।
-कट्टा कानपुरी

टमाटरटमाटर पर गदर मची है। जिसे देखो इस सब्जी पर बयान जारी किये जा रहा है। लाल टमाटर के बहाने गाल टमाटर के किस्से सुनाये जा रहा है। बवाल है टमाटर भी। टमाटर सब्जी, सलाद और सॉस में लगता है। सड़ जाने पर फ़ेंक के मारा जाने के किस्से भी सुने हैं। जाने कौन सी फ़िल्म थी जिसमें टमाटर से सब कीचड़ की तरह नहाते हैं, उबटन की तरह मसलते हैं। बजरिये सिद्धेश्वर – नरुदा लिखते हैं:
The street
filled with tomatoes..
_______Neruda
टमाटर भरी गलियों के लिये तो अच्छा है। रास्ता साफ़ होगा। लेकिन उनका क्या जो पाव,आध पाव के हिसाब से टमाटर से जुड़ते हैं।
टमाटर आम तौर पर घरों में पाव-आधा किलो ही लिया जाता है। आम तौर पर फ़्रिज में ही धरा जाता है। फ़्रिज में धरा टमाटर कहां सड़ता है। सड़े तो जाना चाहिये न कन्ज्यूमर फ़ोरम में फ़्रिज की शिकायत के लिये। अरे लेकिन हम यह तो भूल ही गये कि फ़्रिज बिजली से चलती है। बिजली गायब तो सड़ सकता है भाई। कन्ज्यूमर फ़ोरम वाली बात कैसल।
फ़्रिज में टमाटर धर सकने वाले लोग आम तौर पर नौकरी/पेशा वाले ही होते हैं। वे कहां जायेंगे किसी पर टमाटर फ़ेंकने। वैसे भी आजकल सारा विरोध तो सोशल मीडिया पर होने लगा है। टमाटर, सब्जी फ़ेंकने की कोई जरुरत नहीं। स्टेटस से हमला किया जा सकता है। सस्ता, तुरंता, बहुहंता। बिनु कट्टा, चाकू बिना, करे कत्ल ये यार।
टमाटर के अभी भाव बढ रहे हैं। रुपया डॉलर के मुकाबले गिर रहा है। दुख है। लेकिन यह खुशी की बात है कि टमाटर के मुकाबले ज्यादा तेजी से गिर रहा है। टमाटर ने डॉलर को पटक दिया मंहगाई के मामले में।
बढ़ते टमाटर के दाम का एक मुफ़ीद इलाज तो यही है कि टमाटर खाना छोड़ दिया जाये। कुछ दिन न खायेंगे तो क्या जी न पायेंगे।
टमाटर के दाम बढ़ने का फ़ायदा व्यंग्यकारों, कार्टूनिस्टों, हास्य/हास्यास्पद कवियों को हुआ है। ये बिरादरी किसी भी मुद्दे को ऐसे लपकती है जैसे ट्रेन से उतरते यात्रियों को ऑटो, टैक्सी वाले कब्जे में करते हैं। हुनर वाले लोग दस-बारह आइटम निकाल लेता है किसी भी मुद्दे पर। ताज्जुब हो रहा है कि अभी तक किसी चैनल ने इस मुद्दे पर अभी तक कोई स्टोरी क्यों नहीं की- सब्जी मंडी से कैमरा मैन अलाने के साथ मैं फ़लाना। लगता है कि अमेरिका का हाथ है इसमें। वह नहीं चाहता होगा कि डॉलर के मंहगे होने के मुकाबले टमाटर की मंहगाई के चर्चे हों। बहुत छुई-मुई और डरपोंक है अमेरिका। जलता है दूसरे का जलवा देखकर।
देखते हैं कि टमाटर के जलवे कित्ते दिन बरकरार रहते हैं। अभी तो दफ़्तर निकलें वर्ना देरी होने पर लोग टमाटर की लालिमा लोगों आंखों में दिखेगी।
तबतक आप कट्टाकानपुरी के टमाटर स्टेटस पर अब तक आयी टिप्पणियां देखिये:
Niroj Kumar टोमाटो सौस और हमने खाना सिख लिया है………… जो खरीद और स्टॉक फ्रिज में कर लिया है………..
50 मिनट पहले · पसंद
Acharya Sushil Awasthi Prabhakar ट्माटर की सुर्खियत बढ गई है, कांग्रेस को निजात मिली , उसकी बहुत किरकिरी हो रही थी , उत्तराखंड आपदा पर…..सरकार कह रही है, ” वाह टमाटर तुमने मेरी जान बचाई, तुम आए तो राहत पाई”
46 मिनट पहले · पसंद
Dhiru Singh अगर हम तय कर ले कि एक सप्ताह टमाटर नहीं खायंगे तो यही टमाटर दो रुपये किलो मारा मारा फिरेगा ।
42 मिनट पहले mobile के द्वारा · पसंद · 1
Kajal Kumar टोमैटो चिंतन
35 मिनट पहले · पसंद · 1
Siddheshwar Singh The street
filled with tomatoes..
_______Neruda
12 मिनट पहले · नापसंद · 1
Shivang Tripathi Pyaz le dooba tha b.j.p ko
To kya tamatar le doobega congress ko???
Lagta to nahi hai….bade makkar hai yeh congresi

मेरी पसंद

एक ग्राहक आता है
और टोकरी हिलने लगती है
मुझे लगता है बुढिया टोकरी से
अपनी जगह बदल रही है
मैं कांपने लगता हूँ यह देखकर
कि टमाटर इस काम में
बुढ़िया की मदद कर रहे हैं
अब बुढ़िया के हाथ
टमाटरों से खेल रहे हैं
वह एक भूरे टमाटर को धीरे से उठाती है
और हरी पत्तियों के नीचे
छिपा देती है माँ की तरह
__________’टमाटर बेचने वाली बुढिया’ कविता का एक अंश / केदारनाथ सिंह
सिद्धेश्वर सिंह के फ़ेसबुक स्टेटस से आभार सहित

10 responses to “टमाटर पर गदर”

  1. arvind mishra
    तो फिर आईये टमाटर जैसे कुछ सुर्ख गालों की जिक्र छेड़ें :-)
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..मिथक का मतलब
  2. कट्टा कानपुरी असली वाले
    ग़दर मचा है आजकल , बड़ा टमाटर पर
    लग रहा बहुत जल्द यह पंहुच जाए सौ पर
    जहाँ देखो वहीँ यह आजकल चहकता है !
    मेरे तो फेस बुक पे भी और तेरे ट्वीटर पर !
    अगर महंगा लगे तो चीख क्यों रहे यारो
    कहे को जान दे रहे हो,. इस टमाटर पर !
    अनूप शुक्ल को देखो, जो सरे आम इधर
    कट्टा के शेर खूब छापते हैं , ब्लोगर पर !
    कट्टा कानपुरी असली वाले की हालिया प्रविष्टी..अपनी गलियों में,अक्सर ही,हमने गौतम लुटते देखे !- सतीश सक्सेना
  3. मंजीत ठाकुर
    टमाटर पर हाहाकार के बीच प्याज आंसू बहाने के लिए तैयार है। दोयम, आज ज़ी न्यूज़ पर खबर देखी, स्लग था–टमाटर से डर लगता है। दबंग वाले संवाद से जोड़ा था, लेकिन पत्रकारिता के इन महारथियों की कदमबोशी करने को जी चाहता है।
  4. प्रवीण पाण्डेय
    ज्ञानदत्तजी ने प्यूरी का विकल्प दिया है, समस्या का समाधान हो गया। किसी न किसी को श्रेय लेने आ जाना चाहिये अब तक।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..दृष्टिक्षेत्रे
  5. Alpana
    :)..टमाटर की तरह कभी प्याज़ के वारे न्यारे थे.
    ज्योतिष गण बताएँ कि टमाटर के कौन से ग्रह बदल गए जो इतना भाव खा रहा है.अचानक!
    सरकार को अपने खेवनहार को ही चुनाव चिन्ह रख लेना चाहिए.आखिर इस आपदा की घडी में इसी ने जान बचाई !
    Alpana की हालिया प्रविष्टी..खुद को छलते रहना..
  6. Anonymous
    टमाटर पर अच्छा शोध किया है । सर !पी एच डी के लिए कहाँ सिफारिश की जाय ।
  7. Anonymous
    टमाटर पर अच्छा शोध किया है । सर !पी एच डी के लिए कहाँ सिफारिश की जाय । –सुरेश साहनी ,कानपूर
  8. Bhavana
    अच्छा लिखा है आपने .. टमाटर पर गहन चिंतन !!!!
  9. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] टमाटर पर गदर [...]
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Friday, July 05, 2013

वन वे ट्रैफ़िक में फ़ंसा एक आम नागरिक

http://web.archive.org/web/20140420081659/http://hindini.com/fursatiya/archives/4460

वन वे ट्रैफ़िक में फ़ंसा एक आम नागरिक

one way
आजकल शहरों में भीड़ बहुत हो जाती है. रास्तों में जाम का ट्रैफ़िक वालों के पास एक ही इलाज होता है कि भीड़ वाले रास्ते को ’एकल दिशा मार्ग’ घोषित कर दो. वन वे घोषणा इत्ते चुपके से होती कि रोज के राहगीर तक को पता नहीं चलता. सुबह काम पर निकलते समय जो रास्ता दोनो तरफ़ था वह शाम को लौटते समय वन वे हो जाता है. ट्रैफ़िक वाले किसी भी रस्ते पर वन का बोर्ड ऐसे चुपके से लगा देते हैं जैसे अपने घर की बला टालने के लिये लोग रात के अंधेरे में चौराहे पर टोना-टटका धर जाते हैं. जिसने चौराहा पार किया उसके सर पर बलाय और जिसने ’वन वे’ अनुशासन तोड़ा उस पर जुर्माना.
आज के समय में किसी भी योजना में घपले और शहर के किसी भी रस्ते के ’एकल दिशा मार्ग’ बन जाने के बारे में कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता.
ऐसे ही हम भी कल एक एकल दिशा मार्ग में फ़ंस गये. गये तो पता ही नहीं था कि मार्ग एकल दिशा है. कहीं बोर्ड लगा नहीं दिखा. हम सड़क को आना-जाना एक समान समझते हुये चले आ रहे थे. अगल-बगल जबर ट्रैफ़िक मानों सुरीली आवाज में गा रहा हो- गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हांको जी.
अचानक एक सिपाही ने हाथ दिया. हमें लगा शायद शरीफ़ समझकर सलाम करना चाहता हो. लेकिन उसने इशारे से गाड़ी किनारे करने को कहा. हमें लगा शायद वह हमारा इंटरव्यू लेना चाह रहा था. हम किनारे होने लगे.
हमेशा की तरह श्रीमतीजी माजरा तेजी से भांपीं और बोली कि अरे उधर मत जाओ. गाड़ी घुमाओ. इधर लगता है ’वन वे’ है.
लेकिन तब तक जाम हद से ज्यादा बढ़ गया था. हम मजबूरन सूरमा चाल से घबराते हुये सिपाही की तरफ़ बढ़े. हाथ में पहचान पत्र ले लिया. हम कांपती हुयी आवाज में रोब से बात करने लगे.
सिपाही ने अपराध बताया. हम ’वन वे’ को ’टू वे ’ बनाने पर तुले थे. कानून का उल्लंघन किया था. सजा एक हजार रुपये मात्र.
एक हजार जुर्माने ने हमें बहस के लिये हिम्मत जुटा दी. भले ही रुपया गिर रहा है लेकिन मध्यम वर्गीय आदमी के लिये सौ-पचास के जुर्माने से ज्यादा का जुर्माना बहस के उकसाता है.
हमने बिना बजरंगबली का नाम लिये बहस शुरु कर दी.
हम अभी गये थे. बस यहीं तक. वहीं से गाड़ी घुमा रहे थे. हम ट्रैफ़िक उल्लंघन करने वाले थोड़ी हैं. अनुशासित नागरिक हैं.
सिपाही ने हमारे अनुशासन की अपील खारिज कर दी. बोला साहब से बात कल्लीजिये. साहब मतलब दरोगा जी.
हमने हथियार के रूप में अपना पहचान पत्र निकाल के सामने हिलाया. अपने सारे आर.टी.ओ. दोस्तों के नाम एक साथ फ़ेंक दिये दरोगा जी के कान में.
लेकिन साहब पसीजे नहीं. शायद कान में कुछ तकलीफ़ हो.
हमें बड़ा खराब लगा. जिस महकमें के मातहत अपने साहब के नाम का लिहाज न करें उस महकमें का भगवान ही मालिक. नौकरशाही इतनी खुदगर्ज और अफ़सर निरपेक्ष हो गयी है देखकर अफ़सोस हुआ. बिना तीखी बहस कोई गुजारा नहीं. हम अरविन्द केजरीवाल हो गये.
हमने अकड़कर पूछा -यहां ’वन वे’ कब से हो गया? जैसे हम कहना चाह रहे हों कि बिना हमारी परमिशन के आपकी हिम्मत कैसे हुयी इसे ’एकल दिशा मार्ग’ करने की.
पिछले हफ़्ते से. साहब ने अकड़कर आंख तरेरते हुये सूचना दी. कहने का मतलब यह था कि कोई रास्ता ’वन वे’ क्या जनता से पूछ के बनाया जायेगा.
यहां कहां लिखा है कि यह ’वन वे’ है? -हमने अकड़ के जड़त्व में पूछा.
उसने अपनी जीप के पीछे लगा, जैसे किसी छोटे शहर के लोग विकास के नाम अपने शहर का मॉल दिखाते हैं , छटंकी सा बोर्ड दिखाया. किसी स्थानीय कंपनी के सौजन्य से उसमें लिखा था – एकल दिशा मार्ग. उल्लंघन करने पर एक हजार जुर्माना.
जुर्माने की राशि सुनकर हम एक बार फ़िर बौखलाये. समानता का सिद्धांत लेकर दरोगा पर उलझ गये -देखिये वो आपके सिपाही उस गाड़ी को लौटा रहे हैं. उसको वापस कर रहे हैं. हमको भी वापस जाने दीजिये.
facebookलेकिन दरोगा की गरदन में वसूली और कर्तव्यबोध का ’जुड़वां स्पांडलाइटिस’ था. वह गर्दन घुमाकर गाड़ियों को देख नहीं पा रहा था. हमारा परिचय पत्र अपने हाथ में लेकर जुर्माने की रसीद बनाने लगा.
देखिए ये आपके सामने से जा रहे हैं लोग. इनको क्यों नहीं पकड़ते आप. जुर्माना वसूलना है तो सबसे वसूलिये.- हमारी श्रीमती जी भी संकट में साथ हो लीं. महीने की आखिरी हफ़्ते एक हजार रुपये बहुत लगते हैं वह भी जुर्माने में जायें तो चोट दोगुनी लगती है.
वे लाल बत्ती में जा रहे हैं. आपको इतना तो समझ होनी चाहिये. लाल बत्ती वालों पर कौन जुर्माना लगता है. -दरोगा जी ने समझाया.
सब लड़के बैठे हैं उसमें. बच्चे. कोई अफ़सर थोड़ी बैठा है उसमें. -श्रीमती जी ऊंचे स्वर में बोली.
लालबत्ती का आपको पता है कुछ. लालबत्ती , लालबत्ती होती है. उसमें कुत्ता भी बैठा हो तो उसको भी नहीं टोका जाता. -दरोगा जी ने लालबत्ती का प्रोटोकॉल बताया.
हमारा परिचय पत्र अपने कब्जे में लेते हुये वह जुर्माने की रसीद बनाने लगा. अब हम अपना सारा अधिकार बोध, समानता का सिद्धांत, बहस की अकड़ भूलकर जुर्माने के मोलभाव पर उतर आये. दरोगा जी नाम,पता, वल्दियत पूछते हुये निर्लिप्त भाव से रसीद काटते रहे. रसीद काटने समय पूछी जानी वाली हर सूचना का जबाब देते हुये हम श्लोक की तरह दरोगा को एक-दो रसूख वाले दोस्तों के नाम भी फ़ूंकते रहे. दोस्तों के नाम लेते समय हम उन दोस्तों को कोसते भी गये कि क्या फ़ायदा ऐसे जलवे का कि नाम लेने के बाद भी जुर्माना देना पड़े.
अंतत: हजार रुपये से चली हुयी जुर्माने की रकम तीन सौ पर टूटी.
जुर्माना भरकर घर आते हुये हम यह दोनों यह तय नहीं कर पा रहे थे कि जुर्माने के तीन सौ ठुके कि सात सौ बचे. आप बताइये आपको क्या लगता है.
(नयी दुनिया में 3 जुलाई को प्रकाशित)

10 responses to “वन वे ट्रैफ़िक में फ़ंसा एक आम नागरिक”

  1. कट्टा कानपुरी असली वाले
    वनवे ट्रेफिक में फंसे
    फुरसतिया महाराज
    पटा रहे, कब से खड़े
    लेकर बटुआ हाथ !
    कह कट्टा कविराय , न पकडे फर्जीवाडा
    दो सौ दिए छिपाय , बंद न गाडी करदे !
    कट्टा कानपुरी असली वाले की हालिया प्रविष्टी..अपनी गलियों में,अक्सर ही,हमने गौतम लुटते देखे !- सतीश सक्सेना
    1. sanjay jha
      :):):)
      प्रणाम.
  2. देवांशु निगम
    २०० रुपये का नुकसान, १०० रुपये दरोगा जी को देते तो फटाफट काम हो जाता :) :) :)
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..च से बन्नच और छ से पिच्चकल्ली
  3. रवि
    वाह! तो फुरसतिया भी अब अखबारी रिटर्न हो गए.
    माने, अब तक तो ब्लॉग से मसाला अखबारों में जाता था, अब अखबारों से वापस मसाला ब्लॉग में आएगा.
    बहरहाल, इस उन्नति (अरविंद मिश्र जी के शब्दों में?) के लिए बधाईयाँ!
  4. Kajal Kumar
    अखबारी रिटर्न :-)
    Kajal Kumar की हालिया प्रविष्टी..कार्टून :- इनका बॉस भी एक दम गधा है
  5. arvind mishra
    हद है बासी माल इधर फेंक रहे हैं -हम नहीं पढ़ते जाईये ! हुंह ! :-(
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..मिथक का मतलब
  6. प्रवीण पाण्डेय
    विचारधारायें तो पूर्णकालिक वनवे बन गयी हैं, वापस जाने का कोई मार्ग नहीं।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..है अदृश्य पर सर्वव्याप्त भी
  7. Alpana
    बहुत -बहुत बधाई लेख के छपने के लिए!
    हमेशा की तरह ही बढ़िया लिखा है .
    Alpana की हालिया प्रविष्टी..खुद को छलते रहना..
  8. Monika Jain
    Nice One..Interesting
    Monika Jain की हालिया प्रविष्टी..Poem on True Happiness
  9. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] वन वे ट्रैफ़िक में फ़ंसा एक आम नागरिक [...]