Sunday, July 21, 2013

डेट्रॉएट को तो दीवालिया होने की हड़बड़ी है

http://web.archive.org/web/20140420081832/http://hindini.com/fursatiya/archives/4525

डेट्रॉएट को तो दीवालिया होने की हड़बड़ी है

Detroitकल खबर सुनी कि अमेरिका में गाडियों के लिये मशहूर शहर डे्ट्रॉएट ने कर्ज में डूबे होने के चलते दीवालिया होने के लिये अर्जी दी है। जब से सुना तब से डेट्रॉएट के बारे में ही सोच रहे हैं। ससुर एक पूरा का पूरा शहर कैसे दीवालिया हो गया? दुनिया के सबसे रुतबे वाले देश का एक शहर दीवालिया हो गया। सुनते हैं कि अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदार देश है। क्या उसकी भी दीवालिया अर्जी आयेगी?
सोचते हैं कि डेट्रॉएट के मेयर को फ़ोनिया के पूछे कि हजार-दो हजार में दीवालिया होना बचता हो बताना, भेज देंगे पहली तारीख को। ये भी कि अगर डालर जरा नीचा कर लें तो उनको ही सहूलियत होगी।
डेट्रॉएट कभी अमेरिका का चौथा सबसे बड़ा शहर था। दुनिया की आटोमोबाइल इंडस्ट्री की धुरी। न जाने कित्ते तीसमार खां मैनेजर, अर्थशास्त्री इसके अच्छे दिनों में यहां थे। आज बचा है केवल कर्जा। वीरान इमारतें और 80% काले लोग। बेहतरीन दिमाग वाले हुशियार लोग खा पीकर, पैसा पीटकर शहर को दीवालिया करके फ़ूट लिये।
लोग बताते हैं दुनिया के बेहतरीन मैनेजर, अर्थशास्त्री अमेरिका में बसते हैं। लेकिन वे कैसे खलीफ़ा हैं जो अपने शहर और बैंको को दीवालिया होने से नहीं बचा सकते। कैसे वे मैनेजर हैं जो जब डेट्रॉएट का आटोमोबाइल सेक्टर अपनी गजल का मक्ता पढ़ रहा था तब कुछ अलग काम करने के लिये नहीं सोच पाये। खाली कारों में अपनी ऊर्जा बेकार में काहे खपाते रहे? कार न बिक रही तो कुछ और बनाते। साइकिल, रेल के डिब्बे, पापड़, कचरी, अचार, मैगी, दवाई, कपड़े, बैट-बल्ला, गहने, जहाज, मशीन
किसी एक चीज के उत्पादन में ही फ़न्ने खां बने रहने का यही नुकसान है। डेट्रॉएट खाली कार के उत्पादन में ही महारत हासिल किये रहा। पूरा शहर कार उत्पादन की धुरी बना रहा। अब जब सबके पास कारें हो गयीं और दूसरे और सस्ती कारें बनाने लगे तो जलवा कम हुआ। लेकिन उनको कार बनाने के अलावा और कुछ आता ही नहीं। हो गयी हालत पतली। सच्ची में समझदार होते तो कार के धंधे में मंदी देखते ही किसी और धन्धे का फ़ीता काट लिये होते।
कानपुर भी कभी अपनी मिलों के चलते मैनचेस्टर ऑफ़ इंडिया कहलाता था। मिलें न जाने कब की बंद हो गयीं। मजदूर बेरोजगार हो गये। कोई रिक्शा चलाने लगा, किसी ने ने चाय की दुकान खोली किसी ने पान की। मिलों में उल्लू बोलते हैं। लेकिन शहर दीवालिया नहीं हुआ। झाड़े रहो कलट्टरगंज कहते हुये शहर आज भी बिंदास है। ई ससुर डेट्रोइट कैसे इत्ती जल्दी दीवालिया हो गया? अमेरिका को बुरा नहीं लगता अपने शहर को दीवालिया बताते?
टूंडला में हमारी एक फ़ैक्ट्री थी वहां फ़ौज के लिये मीट बनता था। मीट का काम बन्द हो गया तो वहां कपड़े बनने लगे। जहां हवाई जहाज रिपेयर होते थे वहां राइफ़ल बनाने लगे, जहां तोप पीटते थे वहां गोले छीलने लगे, जहां लोहा गलता था वहां डब्बे बनाने लगे। जब काम नहीं मिला तो बाजार में काम टटोलने लगे। सब किया लेकिन खाली नहीं रहे। दीवालिया नहीं हुये। जब सरकार के अनुभाग इतनी पटरियां बदल सकतें तो वे प्राइवेट फ़ैक्ट्रियां ऐसा क्यों नहीं कर पायीं? कार का उत्पादन से किसी और तरफ़ क्यों नहीं लग सकीं?
किसी शहर के बने रहने के लिये उसको फ़ुल्लमफ़ुल आधुनिक नहीं बनना चाहिये। एक ही धंधे के भरोसे नहीं रहना चाहिये। परम्परागत काम भी चलते रहते चाहिये। रोजी रोटी के लिये एक ही धन्धे पर शहर नहीं टिका रहना चाहिये। उद्योग भी हों, दुकानें भी हों, खेती से भी जुड़ा हो, कोचिंग , गुटखा, गुंडागिरी, उगाही, पान, हलवाई, स्कूल, गुटखा, राजनीति, लाटरी, सट्टा, क्लब, बैंक, पुलिस, पंडा, पुजारी, नेता, जनता सब तरह के लोग होने चाहिये। ये नहीं कि एक धंधा गया तो शहर मंदा हो गया। भारत में आजतक कोई शहर डेट्रॉएट की तरह किसी एक ही धंधे पर निर्भर नहीं रहा इसीलिये दीवालिया भी नहीं हुआ। हाल भले ही खस्ता रहे हों।
अब डेट्रॉएट का जो हाल है उसमें फ़िलहाल हम कुछ करने की स्थिति में हैं नहीं। पहले बताते तो कुछ सोचते भी। अब तो लगता है उनका दीवालिया होना तय सा है। लेकिन वे कुछ और तरकीबें अपना सकते थे कमाई की। जैसे कि:
  1. डेट्रॉएट में मकान तमाम खाली हैं। अमेरिका वाले दुनिया भर में काली कमाई करने वालों को झांसे में डालकर वे मकान बेंच लेते।
  2. भारत सरकार से बात करते कि भाई ये अपना खुल्ले में सड़ता अनाज हमारे खाली मकानों में धर लो। बदलें में थोड़ा कर्जा लाओ ताकि कुछ दिन और मजे से रहें फ़िर कायदे से दीवालिया हों।
  3. ऊंचे-ऊंचे मकान किसी खड़खड़े में लादे लाते भारत और किराये पर उठा देते यहां। बेंच देते। न जाने कित्ते लोग यहां मकान की तलाश में हैं।
  4. कारों की असेम्बली लाइन उखाड़ के ले आते यहां और जहां जगह मिलती वहां जमाकर कारपार्किंग बना लेते और पैसा पीटते।
  5. पार्क जिनका रखरखाव नहीं कर पा रहे हैं वो भी लाकर पटक देते यहां। सबमें मंदिर बन जाते, तबेले चलने लगते। सबसे थोड़ा-थोड़ा पैसा मिलता। कुछ तो काम चलता।
  6. भारत की कई जेलों में कैदियों के रहने की जगह नहीं है। कैदी कांजी हाउस में जानवरों की तरह ठुसे रहते हैं। डेट्रॉएट अपनी इमारतों को जेलों में बदल भारत को किराये में देने का प्रस्ताव दे सकता था। वहां वी.आई.पी. कैदी रखे जा सकते थे।
  7. भारत के तमाम मेट्रोपॉलिटन शहरों में इंटरनेशनल स्कूल हैं लेकिन उनमें खेल के मैदान नहीं हैं। डेट्रॉएट अपनी तमाम फ़ालतू इमारतों को गिराकर समतल करके मैदान ऐसे अंतर्राष्ट्रीय स्कूलों को बेंच सकता है। इंटरनेशनल स्कूल वाले वीकेंड में अपने बच्चों को अमेरिका के डेटॉएट के मैदान में ले जाकर खिलाते। हवाई किराये के पैसे बच्चों के अभिभावकों से ऐंठते।
  8. हर दीवालिया कंपनी का मालिक ’कैसे बरबाद हुये हम’ टाइप की किताबें लिखता। किताबें बेस्ट सेलर साबित होतीं। बाद में जुगाड़ लगाकर नोबल-ऑस्कर झटक लेते। कुछ दिन रोजी-रोटी चलती।
  9. करने को तो डेट्रॉएट यह भी कर सकता था कि अपने को स्विटजरलैंड में शामिल कर लेता। उसके बाद दुनिया भर के अपराधियों को अपने यहां रहने की सुविधा मुहैया कराता। खूब किराया मिलता। काले धन को रखने की अपनी अच्छी इमेज के चलते दुनिया भर के अपराधी टूट पड़ते अपना कमरा बुक कराने के लिये।
  10. निर्मल बाबा के यहां जाना चाहिये थे मेयर को। वो कोई उपाय बताते कि किस रंग की गाय को कित्ती पूड़ी खिलाने से किरपा होगी। शहर के दिन बहुर जाते।
उपाय तो और बहुत से हैं। लेकिन किसको बतायें। डेट्रॉएट वालों को तो दीवालिया होने की हड़बड़ी है। :)

16 responses to “डेट्रॉएट को तो दीवालिया होने की हड़बड़ी है”

  1. हितेन्द्र अनंत
    हा! हा!
    मजा आ गया! सझाव जबर्दस्त हैं! लेकिन ईश्वर करे ये सुझाव उन तक ना पहुंचें, और ये शहर खंडहर होकर रहे!!
    क्यों? क्योंकि हमारे यहाँ तो इतिहास ही ऐसे खंडहर बन चुके शहरों से भरा पड़ा है! आई मीन, वर्तमान खंडहरों से और इतिहास उन रौनक भर डेट्रायट के भारतीय संस्करणों से!
    मजा आ रहा है, ह्मारे साथ तो हजारों सालों से हुआ, अब गुरू तुम भी लो मजा!
    हितेन्द्र अनंत की हालिया प्रविष्टी..चुनावी पैरोडी: हम समर्थन करने वाले!
  2. आशीष
    अकी मारीतो सोनी के संस्थापक ने अपनी पुस्तक ‘मेड इन जापान’ मे यह भविष्य वाणी पहले ही कर दी थी। उन्होंने फ़ोर्ड के एक कारख़ाने की यात्रा की और एक क्रम मे असेंबली लाइन देख काफ़ी प्रभावित हुये। १० वर्ष बाद वे उसी कारख़ाने मे दोबारा गये और देख के हैरान हो गये कि कुछ भी नहीं बदला था। तब उन्होंने कहा था विकास , उन्नती के लिये परिवर्तन आवश्यक है, अमरीकी कंपनी परिवर्तन को नहीं अपनायेंगी तो उनका बरबाद होना निश्चित है। ठहरा पानी सड़ है।
    आशीष की हालिया प्रविष्टी..सौर मंडल की सीमा पर वायेजर 1? शायद हां शायद ना !
  3. Dr. Monica Sharrma
    बढ़िया सुझाव हैं :) आर्थिक स्तर पर तो सचमुच यह एक विचारणीय विषय है ….
  4. Gyandutt Pandey
    बड़ी मुश्किल से दिवालिया भये। भारत में तो कारोबार खड़ा ही दिवालिया होने के लिये करते हैं कर्मवीर!
    Gyandutt Pandey की हालिया प्रविष्टी..मन्दाकिनी नदी पर रोप-वे बनाने में सफल रही शैलेश की टीम
  5. देवांशु निगम
    फ्रॉम जबलपुर टू कानपुर वाया डेट्रोएट !!!! वंडरफुल !!!!कानपुर की बात अलग ही है :) :)
    वैसे जो सुझाव आपने दिए हैं सारे के सारे बहुत शानदार हैं , कोई बस मान ले | वो बात ये भी है कि लोग हड़बड़ी में रहते हैं “फुरसतिएया” जी के पास आयें , तो फुरसत से सुझाव पायें | ये भागता-दौड़ता अमरीका नहीं समझेगा , सो इम्मेच्योर यू नो :) :)
    वैसे देखने वाली बात ये भी होगी कि अमरीका इससे कैसे निकलता है !!!!
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..यूँ ही, ऐसे ही !!!
  6. प्रवीण पाण्डेय
    अच्छा हम तो दीवाली मना कर ही खुश हो लेते हैं, धँुआ निकलने के ये लोग दीवाला कहते हैं क्या?
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..स्वयं से भागते, हम लोग
  7. shefali pande
    किसी का दीवाला निकल गया और आप हैं की दीवाली मना रहे हैं …इत्ता भयंकर बम फोड़कर ……
  8. कट्टा कानपुरी असली वाले
    निर्मल बाबा वाला आईडिया धाँसू रहा है …
    कट्टा कानपुरी असली वाले की हालिया प्रविष्टी..मिसरा,मतला,मक्ता,रदीफ़,काफिया,ने खुद्दारी की थी -सतीश सक्सेना
  9. विवेक रस्तोगी
    ऊ मेयर को सुझाव दिया जाये कि कंगाल घोषित करने की कंसलटेंसी खोल ले, जबरदस्त चलेगी ।
    विवेक रस्तोगी की हालिया प्रविष्टी..बात करने का बहाना चाहिये तो प्रकृति सबसे अच्छा विषय है
  10. कट्टा कानपुरी असली वाले
    मुझे अमेरिका का सिस्टम अच्छा लगता है , हमारे देश में भी शहरों की नगर पालिकाओं को स्वायत्तता देनी चाहिए !
    वे अपने फंडिंग अपने आप करें , लोन लें अथवा किन सोर्से से पैसा कमायें और कहाँ खर्च करे वे खुद निर्णय लें , और संपन्न हों या दीवालिया उसे खुद भुगतें तो शायद आर्थिक उन्नयन के लिए भला ही होगा !
    डेट्रॉइट की दीवालिया अवस्था, अमेरिका के अन्य राज्यों की ऑंखें खोलने के लिए काफी होगा !
    कट्टा कानपुरी असली वाले की हालिया प्रविष्टी..मिसरा,मतला,मक्ता,रदीफ़,काफिया,ने खुद्दारी की थी -सतीश सक्सेना
  11. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    डेट्रॉएट दिवालिया क्या हुआ आप तो ब‍उरा गये हैं। कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं। इतना इलाज एक साथ बता देंगे तो भारत सरकार के एजेन्ट आपको अगवा करके ले जाएंगे। मौनमोहन सिंह आजकल दिवालियत की कगार पर खड़े हैं, बस आदत के मुताबिक बता नहीं रहे हैं।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..खो गया बटुआ मिल गयी चिठ्ठी : कितनी मिठ्ठी
  12. eswami
    ये कमीनेपन और नाकरेपन की कहानी है.
    planned obsolescence, overconfidence, incompetence, protectionism जैसे शब्द दिमाग में आते हैं. वैसे डेट्रॉइट शहर और बंगाल में ज्यादा फरक नहीं है – एक पार्टी राज और यूनियंस ने शहर को बरबाद कर दिया.
    eswami की हालिया प्रविष्टी..कटी-छँटी सी लिखा-ई
  13. समीर लाल "टिप्पणीकार"
    ओबामा आपको बुलावा भेजने वाला है सलाहकार बन कर चले आईये …कुछ मंच वंच भी कर लेंगे उस दौरान :)
    समीर लाल “टिप्पणीकार” की हालिया प्रविष्टी..पहाड़ के उस पार….इस बार मेरी आवाज़ में
  14. Swapna Manjusha
    कम से कम उनकी आँखों का पानी मरा नहीं है, कबूल लेते हैं सच्चाई को और कर देते हैं घोषित।
    इस नज़र से देखें तो भारत का कौन सा ऐसा प्रान्त है तो दीवालिया नहीं है। भारत आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक रूप से बहुत पहले दीवालिया हो चुका है, फर्क सिर्फ इतना है हमलोग कोढ़ पर मेकप लगाए बैठे हैं.… एक बात और हाथी मरे भी तो सवा लाख का होता है,
    आपका सजेसन मान कर किराए पर दे तो दें भारत को वो अपने मकान-दूकान लेकिन किराया देवेगा कौन ???? क्योंकि हम तो कब्ज़ाने में माहिर हैं किराया देने में नहीं :)
    Swapna Manjusha की हालिया प्रविष्टी..इक सानिहा…..!
  15. Abhishek
    शानदार सुझाव हैं :)
    Abhishek की हालिया प्रविष्टी..इंजीनियर साहेब ‘भुट्टावाले’ (पटना १७)
  16. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] डेट्रॉएट को तो दीवालिया होने की हड़बड़ी … [...]

Friday, July 19, 2013

ये क्या हो रहा है

http://web.archive.org/web/20140420081449/http://hindini.com/fursatiya/archives/4516

ये क्या हो रहा है

Mid day mealबिहार में दोपहर का भोजन खाने से 23 बच्चों की मौत हो गयी।

बच्चों की मौत की खबर आते ही मीडिया के संवाददाता ’मिड डे मील’ वाले स्कूलों की तरफ़ उसी तरह लपक लिये जैसे कांजी हाउस की दीवार टूटने पर जैसे मवेशी अदबदा के बाहर भागते हैं। कैमरा लिये वे बच्चों के स्कूलों के दोपहर के भोजन पर टूट पड़े। जैसे इनकमटैक्स वाले छापा मारते हैं तो घर के गद्दे,तकिया तक उधेड़ के देखते हैं वैसे ही मीडिया वाले स्कूलों में बंटने वाले सब्जी, दाल, चावल, राजमा को चीर-फ़ाड़ के देखने लगे। खाने में गंदगी, कीड़े, सड़न, गलन को कैमरे से जूम करके दिखाने लगे। जनता का सच जनता को चिल्ला-चिल्ला के दिखाने लगे।

स्कूल को निपटाने के बाद मीडिया ने अस्पताल की तरफ़ मुंह किया। वहां की दुर्दशा पर हमला बोल दिया। अस्पताल की गंदगी, थूक, पीक, कूड़ा-करकट और दुर्व्यवस्था को कैमरे की तलवार से टुकड़े-टुकड़े करके जनता के सामने पेश कर दिया। ’मिड डे मील’ और सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा कैमरे पर दिखाते हुये मीडिया को देखकर पुराने जमाने के राजा-महाराजा लोग याद आ गये जो किसी मरे हुये शेर के ऊपर लात और बंदूक टिकाकर शिकारी होने का गर्व चेहरे पर धारण करते थे।

दुर्घटना जिस राज्य में हुई उस राज्य के हाकिम के सुशासन के मंगलगीत मीडिया सालों से गाता आ रहा था। मीडिया को अचानक हुई इस दुर्घटना के बाद ही पता चला कि राज्य के सब स्कूलों में ऐसे ही ’मिड डे मील’ लापरवाही होती है। खाना खराब मिलता है। अस्पताल में कोई व्यवस्था नहीं है। सब गड़बड़ है। देश के नौनिहालों के भविष्य और जान से खिलवाड़ हो रहा है। अगर यह दुर्घटना न होती तो शायद मीडिया को पता ही न चल पाता कि दोपहर के भोजन में इत्ते लफ़ड़े हैं। अस्पतालों में इत्ती बदइंतजामी है।

अपने देश के मीडिया की इन मीडिया सुलभ अदाओं को देखकर महाभारत के धृतराष्ट्रजी याद आते हैं। किसी भी घटना के घट जाने का आभास होने पर वे मुंह ऊपर उचकाकर, अपनी दृष्टिवंचित आंखे मिचमिचाते हुये पूछते रहते थे- ये क्या हो रहा है, ये क्या हो रहा है।

मीडिया को सब पता है कि मिड डे मील में खाना कैसा बनता है, सरकारी अस्पतालों में गन्दगी रहती है। लेकिन वह उसको तबतक नहीं देखती जब तक वहां कोई दुर्घटना नहीं होती, उससे कोई सनसनी नहीं निकलती। वह गड़बड़ी के पास से गुजरती भी है तो गांधारी की तरह आंख में पट्टी बांधकर ताकि उसको वह सब न दिखे जो राजा धृतराष्ट्र को नहीं दिखता। गड़बड़ी की जगह कोई बड़ी दुर्घटना होते ही वही उसे वह दुर्योधन की तरह प्रिय हो जाती है। उसके प्रति उसके मन में वात्सल्य छलकता है। वह अपनी आंख की पट्टी उतार उतारकर उसे स्नेह से निहारती है ताकि वह दुर्घटना/सनसनी अजर अमर हो सके।
श्याम रुद्र पाठक’मिड डे मील’ दुर्घटना के बाद मीडिया कैमरा खाने पर चमकाते धृतराष्ट्र की तरह आंख मिचमिचाते पूछ रहा है -ये क्या हो रहा है, ये क्या हो रहा है।

आजकल दिल्ली में श्यामरुद्र पाठक ऊंची अदातलों की कार्यवाही भारतीय भाषाओं में किये जाने की मांग को लेकर नियमित अनशन पर रहते हैं। रोज गिरफ़्तार किये जाते हैं, छोड़े जाते हैं। फ़िर पकड़े जाते हैं , फ़िर छोड़े जाते हैं। मीडिया उनको देख नहीं पा रहा है। उसके कैमरे की नजर उन तक पहुंच नहीं पा रही है। वह इस इंतजार में है कि इस संबंध में कोई सनसनीपूर्ण दुर्घटना हो तो वह धृतराष्ट्रजी की तरह आंख मिचमिचाते हुये कैमरा चमकाते हुये तेज आवाज में चिल्लाते हुये पूछे -ये क्या हो रहा है, ये क्या हो रहा है।

12 responses to “ये क्या हो रहा है”

  1. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    जबरदस्त…।
    ऐसा ही चित्रण फेसबुकियों का भी होना मांगता है।
    कैसे-कैसे लोमहर्षक स्टेटस आ रहे हैं।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..वैज्ञानिक चेतना के प्रसार के लिए ब्लॉग बनाएँ
  2. प्रवीण पाण्डेय
    सबक लेने या देने का तत्व तो हो खबर में..
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..उथल पुथल में क्रम
  3. देवांशु निगम
    जो बिकता है बस वही दीखता है !!!
    वैसे बिहार में हुए इस काण्ड से ये भी पता चलता है की वहां खाना दिया जा तो रहा है कमसकम , अपने यहाँ तो महीने के राशन की तरह बाँट देते हैं , महीने की शुरुआत में आओ, ५-७ रुपये जो फीस है वो भरो, और राशन उठा कर चले जाओ |
    कितने ही स्कूलों में ऐसे बच्चे पढ़ रहे हैं जो इस दुनिया में अपना वजूद नहीं रखते , उनका नाम है रजिस्टर में , मास्टर साहब फीस भर देते हैं , फीस से ज्यादा का राशन मिल जाता है |
    पर ये सब मीडिया को तब दिखेगा जब इस टाइप का कोई घोटाला-फोटाला खुल के आएगा !!!!
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..डीज़ल-पेट्रोल
  4. Anonymous
    हाँ तो दुर्घटना होने के बाद तो चले गए न.. क्या आप भी :P
    अब नेताओं की नौकरी भी तो बजानी है . कि यही देखते रहें .
  5. Shikha Varshney
    ये ऊपर वाली टिप्पणी हमारी है..शायद मीडिया के डर से जल्दी भाग गई :):)
  6. सतीश चन्द्र सत्यार्थी
    जो भी हो रहा है अच्छा तो नहीं ही हो रहा है..
  7. Gyandutt Pandey
    जिसे देखना है, वह धृतराष्ट्र है। जिसे करना है, वह दुर्योधन! :-(
    Gyandutt Pandey की हालिया प्रविष्टी..मन्दाकिनी नदी पर रोप-वे बनाने में सफल रही शैलेश की टीम
    1. sanjay jha
      :(:(:(
      प्रणाम.
  8. arvind mishra
    अभी तो दुखी हूँ स्तब्ध हूँ बस
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..कुछ छुट्टा तूफानी विचार -फेसबुक से संकलन!
  9. समीर लाल "टिप्पणीकार"
    मीडिया को देखकर पुराने जमाने के राजा-महाराजा लोग याद आ गये जो किसी मरे हुये शेर के ऊपर लात और बंदूक टिकाकर शिकारी होने का गर्व चेहरे पर धारण करते थे।
  10. mahendra mishra
    हमेशा मीडिया की आदत है कि घटना होने के पश्चात कैमरा हिलाने लगते हैं और जोर जोर से भोंपू बजाने लगते है और दस पांच दिन बाद शांत हो जाते हैं । बच्चों को कैसा खाना दिया जा रहा है अथवा कहीं उन्हें मिलावटी भॉजन तो नहीं दिया जा रहा है इसकी परख मीडिया या जिम्मेदारों द्वारा कभी नहीं की जाती है । आकस्मिक निरीक्षण नहीं किया जाता है। वैसे सही माइनों में मिड डे मील योजना भ्रष्टाचार की चारागाह बन गया है। धन के लोलुप बच्चों की जान से खिलवाड़ करने से नहीं चूक रहे हैं।
  11. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] ये क्या हो रहा है [...]

Sunday, July 14, 2013

फ़टाफ़ट क्रिकेट -खलीफ़ा तरबूजी के बमकने से लेकर धोनी की फ़िनिशिंग तक

http://web.archive.org/web/20140420081906/http://hindini.com/fursatiya/archives/4490

फ़टाफ़ट क्रिकेट -खलीफ़ा तरबूजी के बमकने से लेकर धोनी की फ़िनिशिंग तक

धोनीकभी बच्चों की पत्रिका पराग में के.पी. सक्सेना ’खलीफ़ा तरबूजी’ के किस्से लिखते थे। धारावाहिक किस्तें। एक किस्त में खलीफ़ा एक क्रिकेट मैच देखने जाते हैं। सुराही, पान, हुक्का और सब टंडीला लेकर पहुंचते हैं इस्टेडियम। एक खिलाड़ी की तेज शॉट को एक फ़ील्डर गेंद ,पेट के पास हाथ लाकर , लपककर मैदान में लेट जाता है। आउट हुआ खिलाड़ी पवेलियन की तरफ़ लपकता है। बाकी खिलाड़ी उछलने, खुशी मनाने लगते हैं। खलीफ़ा तरबूजी बमकने लगते हैं- ये देखो उसकी खिलाड़ी के पेट में गेंद मारकर भागा जा रहा है अगला और उसके साथ के खिलाड़ी मर्दुये सब उसको पकड़ने की जगह खुशी मना रहा हैं। उठाओ उसको, डॉक्टर बुलाओ। कैसे साथ के लोग हैं- लाहौलविलाकूवत।
 
बाद में खलीफ़ा को पता चलता है खेल के बारे में। उसके अलग किस्से हैं। खलीफ़ा सच्चे खेल प्रेमी थे सो हार-जीत से अलग खेल के बारे में सोचते थे। आज लोग सिर्फ़ हार-जीत के बारे में सोचते हैं। इसीलिये हलकान रहते हैं।

बहरहाल , परसों पता चला कि भारत की क्रिकेट टीम त्रिकोणीय श्रंखला जीत गयी। आखिरी ओवर की जीत के चर्चा मीडिया में हैं- बाकी सारे मुद्दे पीछे धकियाते हुये। मजा देखिये तीन टीमें खेली उसको टूर्नामेंट बना दिया। आगे लगता है दो टीमों के बीच भी टूर्नामेंट होंगे। कई फ़ाइनल होंगे। एक पहले बैटिंग का फ़ाइनल, दूसरा पहिले फ़ील्डिंग का फ़ाइनल, इसके बाद ये फ़ाइनल, वो फ़ाइनल फ़िर डकवर्थ लुईस वाला फ़ाइनल। सबमें देश सांस रोककर बेहाल होता रहेगा मैच के पीछे।

हम तो रात लंबी तान के सो गये। सुबह पता चला देवांशु से कि धोनी माना नहीं, भारत को जिता दिया। हमने कहा -ये तो गड़बड़ किया। हारना चाहिये था। 

क्रिकेट जैसे अनिश्चित खेल में भी अगर सब सोचे मुताबिक हो जाये तब तो हो चुका। क्रिकेट बीच में फ़िक्सिंग के चलते जरा बदनाम सा हुआ लेकिन अब फ़िर लगता है उसकी हालत में सुधार हो रहा है। लोग क्रिकेट के नाम पर फ़िर समय बर्बाद करने लगे हैं। पोस्ट लिखने लगे हैं।

क्रिकेट की फ़िक्सिंग पर जो बवाल मचाते हैं उनको सोचना चाहिये कि क्रिकेट में सब तो फ़िक्स है, पिच की लंबाई, चौड़ाई, ओवर की गेंदें, खिलाड़ी की संख्या, ओपनर, अंपायर, थर्ड अंपायर, कप्तान, उपकप्तान, विकेटकीपर, कमेंट्रटर, विशेषज्ञ हेन-तेन तो एक ठो परिणाम और फ़िक्स हो जाने से कौन पहाड़ टूटता है। फ़ालतू का बवाल।

क्रिकेट की अनिश्चितता वाली अदा बड़ी जालिम लगती है। बहुत हाला-डोला मचता है कभी-कभी। जीत राणा के चेतक सी इधर-उधर लपकती है- था अभी यहां अब यहां नहीं, किस अरि मस्तक पर कहां नहीं। जो टीम जीतती लगती है वह हारने लगती है, हारते-हारते जीत जाती है। कुछ पता नहीं चलता कभी-कभी कि जीतने वाला जीतेगा भी या हार के ही मानेगा। राजनीतिक पार्टियों के गठबंधन के तरह पता नहीं चलता कि जीतती टीम कब जीत से अपना गठबंधन सिद्धांतों के आधार पर तोड़ ले।

कभी-कभी तो टीमें खेल में जीत-हार का इतना वैरियेशन इस्तेमाल करती हैं कि लगता है मार्डन संगीत सुन रहे हैं। जीत का आखिरी तक पता नहीं चलता किसके पक्ष में वोट डालेगी। कभी-कभी तो ऐन टाइम पर वोटिंग से वॉक आउट कर जाती है। मैच ड्रा या टाई हो जाता है।

कभी-कभी तो खिलाड़ी जबरियन जीत-हार को इधर-उधर उछालते रहते हैं। राहत सामग्री की तरह पता नहीं चलता कि किधर गिरेगी जीत की पोटली। अच्छा-खासा जीतती टीम अचानक कहने लगती है- नहीं जीतते , जाओ क्या कल्लोगे?
 
कभी-कभी खिलाड़ी यह दिखाने के चक्कर में पड़ जाते हैं कि वे मैच के परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। लोस्कोरिंग में बायकाट से भी धीमी गति से बैटिंग करने लगते हैं ( बकौल Gyan Dutt Pandey : जैफ बायकाट बैटिंग कर रहे थे। एक दर्शक पेड़ पर बैठा नीरस मैच देख रहा था। उसे झपकी आ गयी। टपक गया और सिर में चोट से अस्पताल मेँ भर्ती कराया गया। होश में आने पर जब यह पता चला कि बायकाट तब भी बैटिंग कर रहा था तो वह पुन: बेहोश हो गया। … कोमा में! :) )। पहले आसानी से हासिल होने वाले टुइयां से स्कोर को पहाड़ सरीखा असंभव बनाते हैं। इसके बाद जब मैच फ़ंस जाता है तो फ़िर उसको जीतने में जान लगा देते हैं। जीत हासिल करके हीरो जैसा बन जाते हैं। कई दिनों तक मीडिया हीरो बने रहते हैं। पैसे, विज्ञापन, रुतबा बढ़ता है। लोग उनकी तारीफ़ में कढ़ाई करते हैं कि कैसे अगले ने मैच बचाया, जिताया। लेकिन लोग यह भूल जाते हैं कि यही बरखुरदार थे जिन्होंने मैच को जीत के नेशनल हाईवे से हार की तंग गली में फ़ंसा दिया था। लोग मैच निकालने वाले को लपक कर सम्मानित करने के चक्कर में फ़ंसाने वाले को भूल जाते हैं।

मैच फ़ंसाकर निकालने की अदा दिखाने वाले खिलाड़ियों की हरकतें प्रोफ़ेशनल कालेज के उन लड़कों जैसी लगती हैं जो इम्तहान के पहले किताबों की धूल झाड़ना हराम समझते हैं और लेकिन इम्तहान नजदीक आने पर किताबों सी ऐसे जुड़ जाते हैं जैसे चुनाव के समय में जनप्रतिनिधि जनता से। पहले मैच फ़ंसाने के लिये पसीना बहाना फ़िर मैच बचाने/जिताने के लिये बनियाइन भिगोना।

इस चक्कर में देखने वालों के दिल की धड़कने सेंसेक्स की तरह ऊपर नीचे और चीयरबालाओं के ठुमकों की तरह उचकती-गिरती रहती हैं। ब्लॉड प्रेशर डालर की कीमतों के तरह और रुपयों की औकात की तरह झटका देता है।

क्रिकेट मैच को जिस तरह अपने खिलाड़ी जबरियन आखिरी ओवर तक घसीट के ले जाते हैं उससे किसी भावुक क्रिकेट प्रेमी की सदमे से मौत हो सकती है और किसी खिलाड़ी पर गैर इरादतन हत्या का मुकदमा ठुक सकता है।

खेल के उतार-चढ़ाव का क्रिकेट प्रेमियों के दिल पर तगड़ा असर होता है। प्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी इसी झटके में गये। सचिन का आउट होना झेल नहीं पाये। चले गये।

उतार चढ़ाव की बात से याद आया कि घरों, मोहल्लों, दफ़्तरों में तमाम लोग मैच के रोमांचक क्षणों में एक ही पोज में बैठे रहते हैं। हिलते नहीं इस डर से कि जहां वे हिले नहीं , टीम का विकेट हिल जायेगा। रोमांचक मैच दर असल इनके कारण ही जीते जाते हैं। लेकिन क्रेडिट, पैसा और विज्ञापन मैदान के लोगों मिलते हैं।

बहरहाल अब भारत जीत चुका है। कुछ दिन के लिये शांति हुई हल्ले-गुल्ले से। अब अगला मैच होने तक भारत में मैच के रोमांच के चलते सदमे से निपटने की आशंका संभावना कम हुई है। है कि नहीं?

8 responses to “फ़टाफ़ट क्रिकेट -खलीफ़ा तरबूजी के बमकने से लेकर धोनी की फ़िनिशिंग तक”

  1. देवांशु निगम
    ये प्रोफेशनल कालेज के स्टूडेंट वाली बात मारू टाइप है एकदम | तभी सारे स्टूडेंट पंखा हैं धोनी के :) :) :)
    प्रभाष जोशी वाली बात पता नहीं थी | अभी उनका विकी पेज देखे |
    और मैच जीतने से फिक्सिंग की बात पर मट्ठा पड़ गया | बेचारे न्यूज़ चैनल अब काहे पर डिस्कसिआयेंगे :) :)
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..चीर-फाड़ , पोसमार्टम !!!!
  2. arvind mishra
    ये नशा आप पर भी हावी है क्या ? हमें तो क्रिकेट शब्द से अब एलर्जी है !आपका एक अच्छा ख़ासा व्यंग हम पर भारी पड़ रहा है सो खिसकते हैं !
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..बिचारी कर्मनाशा!
  3. देवेन्द्र बेचैन आत्मा
    रोचक
  4. आशुतोष कुमार
    खलीफा तरबूजी की याद दिला कर आप ने चित्त प्रसन्न कर दिया . किरकिट और खलीफा का संयोग यों ही जान मारू है .
  5. shobha
    मियां तरबुजी की खूब याद दिलाई बाकि क्रिकेट में कोई दिलचस्पी नहीं. ये मियां तरबुजी वही है ना जो फ को फ बोलते है?
  6. प्रवीण पाण्डेय
    रोचक बनाने के प्रयासों के मध्य सौन्दर्यलहरी बिखेरता अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट..
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