Friday, April 15, 2005

इतने भी आजाद नहीं हैं हम साथी

मैंने सैकड़ों कवि सम्मेलन सुने होंगे.अक्सर ऐसा होता है कि एकाध कवि ही कविसम्मेलन में जमते हैं.बाकी कवि या तो हूट हो जाते हैं या जनता की उपेक्षा से फूट जाते हैं.दो महीने पहले मैंने कानपुर के लाजपत भवन में एक कवि सम्मेलन में कवितायें सुनी.पूरे समय कवि छाये रहे.शुरु से लेकर अंत तक एक से एक कवितायें सुनने को मिलीं.

इतना शानदार कविसम्मेलन मैंने उसके पहले कभी नहीं सुना था.सोमठाकुर,कन्हैयालालनंदन,रामेन्द्र त्रिपाठी ,गोविन्द व्यास,
,विजय किशोर मानव,सरिता शर्मा,अंसार कंबरी ,प्रमोद तिवारी आदि सब अपने पूरे मूड में अपनी सबसे बेहतरीन रचनायें पढ़ रहे थे.सबकी कविताओं का जिक्र फिर कभी मौके पर.

मंच पर सोमठाकुर जैसे कवि विराजमान थे.सोमठाकुर हिंदी के श्रेष्ठतम सक्रिय गीतकारों में से एक माने जाते है.वे कवि सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे थे.

विनोद श्रीवास्तव युवा गीतकार हैं.उन्होंने दो गीत पढ़े.बहुत जमें.बहुत दिन बाद मैंने इतना अच्छा गीत सुना था इतनी बेहतरीन आवाज में.जब विनोद श्रीवास्तव ने खत्म किया पढ़ना तो हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था.मैंने सैकड़ों कवि सम्मेलन सुने होंगे.अक्सर ऐसा होता है कि एकाध कवि ही कविसम्मेलन में जमते हैं.बाकी कवि या तो हूट हो जाते हैं या जनता की उपेक्षा से फूट जाते हैं. विनोद श्रीवास्तव युवा गीतकार हैं.उन्होंने दो मुक्तक पढ़े:-

1.धर्म छोटे-बड़े नहीं होते ,
जानते तो लड़े नहीं होते.
चोट तो फूल से भी लगती है,
सिर्फ पत्थर कड़े नहीं होते.


2.मैं अगर रूठ भी गया तो क्या,
मैं अगर छूट भी गया तो क्या,
तुमको मिल जायेंगे कई दर्पन,
मैं अगर टूट भी गया तो क्या.


इसके बाद विनोद ने एक गीत पढा:-

जैसे तुम सोच रहे साथी,
वैसे आजाद नहीं हैं हम.


विनोद बहुत जमें.बहुत दिन बाद मैंने इतना अच्छा गीत सुना था इतनी बेहतरीन आवाज में.

जब विनोद श्रीवास्तव ने खत्म किया पढ़ना तो हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था.विनोद श्रीवास्तव श्रोताओं को विनम्रता पूर्वक हाथ जोड़कर बैठने ही वाले थे कि सोमठाकर उठे.विनोद को लगभग अपने से लिपटा लिया ,माइक पर आये .बोले:-

मैं पिछले काफी समय से युवा पीढ़ी से निराश सा हो रहा था.कुछ नया ऐसा देखने में नहीं आ रहा था कि मैं आगे गीत के प्रति आश्वस्त हो सकूं.पर आज इस नौजवान गीतकार को सुनकर मुझे आश्वस्ति हुयी कि हिंदी गीत का भविष्य उज्जवल है.

विनोद श्रीवास्तव कानपुर के ही रहने वाले है . हाल फिर तालियों से गूंजने लगा.

सोमठाकुर आगे बोले -मैं विनोद की कविता से अविभूत हूं.मैं ५२ वर्षों से आपके बीच हूं.वैसे तो कोई साधना नहीं है पर अगर कुछ है तो उसका फल इस नयी पीढी को लगे.मैं एक ही बात कहना चाहता हूं कि साधना करते हुये अपने स्वाभिमान की रक्षा करना और हमारी आबरू रखना यह माला जो आपने मुझे पहनायी उसको उतरन मैं इसके गले में नहीं पहना सकता .पर अपनी यह माला मैं विनोद के चरणों में डालता हूं .उसकी कविता को यह मेरा नमन है.

यह कहकर सोमजी ने अपनी माला विनोद के पैरों में डाल दी.अपनी जगह बैठ गये.विनोद की आंखों में आंसू थे.वे भी सोम ठाकुर के चरण छूकर अपनी जगह बैठ गये.पूरे हाल में पहले सन्नाटा सा छा गया.फिर सभी श्रोता खडे होकर बहुत देर तक तालियां बजाते रहे.

मैंने सालों कवियों के तमाम लटके-झटके देखे हैं.नये कवि पुरानों की चापलूसी करते हैं.पुराने, नयों को आशीष देते हैं.नये-पुराने श्रोताओं से ध्यान,तवज्जो,आशीर्वाद चाहते हैं.पर यह अनुभव मेरे लिये अभूतपूर्व था.मैं भावुक था,अभी भी हूं याद
करके सारा प्रकरण.

सोमठाकुर लटके-झटके वाले कवि नहीं माने जाते.विनोद न उनके शहर के हैं न जाति के.कविता में नये-पुराने का संबंध है केवल.वे बहुत बढ़े माने जाते हैं गीतविधा में विनोद की तुलना में.ऐसे में अगर वे विनोद की कविता को नमन करने के लिये अपनी गले की माला उनके चरणों मे डालते हैं तो उनका कद और ऊंचा होता है.गीत को नयी प्राणवायु मिलती है.हमें नजीर मिलती है -देखो ,काबिल छोटों को सम्मानित करके खुद का कद कितना ऊंचा होता है .पर कितने लोग इन 'चोंचलों' में पड़ते हैं!यह तब और प्रासंगिक है जब समाज के हर क्षेत्र में लोग दूसरों को धकियाकर,टंगड़ी मारकर आगे बढ़ने की आपाधापी में लगे हों.

मैं यहां लिखना बंद कर चुका था.पर आज मन किया कि कुछ लिखूं कानपुर पर.मैं कानपुर के बारे में लिखना चाहता हूं.बहुत कुछ.मेरा मन है कि कानपुर के बारे में यहीं लिखता रहूं.आशा है स्वामीजी मेरी बात का बुरा नहीं मानेंगे-माफ कर देंगे.बाकी सारे लेख मैं वायदे के अनुरूप वहीं स्वामीजी के आश्रम में लिखता रहूंगा.नियमित.बार-बार,लगातार.

मेरी पसंद

जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम.

पिंजरे जैसी इस दुनिया में, पंछी जैसा ही रहना है,
भर पेट मिले दाना-पानी,लेकिन मन ही मन दहना है,
जैसे तुम सोच रहे साथी, वैसे संवाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी, वैसे आजाद नहीं हैं हम.

आगे बढ़नें की कोशिश में ,रिश्ते-नाते सब छूट गये,
तन को जितना गढ़ना चाहा,मन से उतना ही टूट गये,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आबाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम.

पलकों ने लौटाये सपने, आंखे बोली अब मत आना,
आना ही तो सच में आना,आकर फिर लौट नहीं जाना,
जितना तुम सोच रहे साथी,उतना बरबाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम.

आओ भी साथ चलें हम-तुम,मिल-जुल कर ढूंढें राह नई,
संघर्ष भरा पथ है तो क्या, है संग हमारे चाह नई
जैसी तुम सोच रहे साथी,वैसी फरियाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम.

-विनोद श्रीवास्तव

10 Comments:

  • At 4:42 AM , Blogger eSwami said...
    प्रभु मेरे,

    क्यों ना पूरे इंटरनेट पर बिखेर दो अपने लेख - ८-१० और अकाउन्ट बना डालो २ मिनट तो लगते हैं -एक सलीकेदार बरगद से १०० कुकुरमुत्ते भले - है ना! बुर नही मान रहा - मैं तो बहुत खुश हो रिया हूं - ब्लाग्स की खेती हो री है.

    आप मुझ को ही अब इन नए लेखों मेसे भी चुन कर श्रेणियां बनानी पडेंगी सही से पुरालेखों को जमाने, बनाने के लिए, २ दिन का काम तो है नही! आपका क्या बोल देना - "जो पसंद है चुनते बैठो" - सही कहा है किसी नी - कद्र करने वालों की कोई कद्र नही है भैया!

    इसीलिए बोला था सुपरहिट लेखों को पहले छांट-छाट कर अलग करेंगे प्यार से बाकी की लिंक देंगे या हिट काउण्ट देख कर इन्क्लूड करेंगे - सेपरेट वेब पेज के थ्रू वो तो अब तक शुरु हुआ नही और...! (और ज्यादा खुशी और प्रसन्नता वाले इमोटिकान की घुसेड - :) )

    लगेहाथ - "कानपुर की पाती" लिखी थी नीरज ने .. अगर आपके कलेक्शन में हो तो २-४ कविताएं चुन के डाल दीजिएगा - प्लीज़ वो क्या है, ब्लागमंडल मे "कवियों" का पेलवाद फ़ैला हुआ है आजकल बहुत त्रास है सच्ची - कुछ महुआ पिलाओ प्रभू! *(हा हा! - प्रसन्नचित्त इत्यादी)

    (जैसा की दीख ही रहा है)
    आपका अति आनंदित
    ई-"स्वामी"(?!)

    :-)
  • पेलवान स्वामीजी,
    लिखने के मामले ये ब्लाग मेरा मायका है यहीं से मेरा लिखना शुरु हुआ.इससे मोह हो गया है.अभी स्वामी वैरागी नहीं हो पाया जो सारा मोह-माया त्याग दूं.वैसे भी बरगद फैलने से पहले कुकुरमुत्ता जितना ही होता है.बरगद और कुकुरमुत्ते आकार के अलावा भी फर्क होता है.कुकुरमुत्ते साथ में बढ़ते-फलते-फूलते-मरते-मिटते-खपते-मुरझाते-खाये जाते हैं जबकि बरगद अपने नीचे घास तक नही जमने देता.

    'नीरज की पाती' भी आयेगी जल्द ही तुम्हारे आश्रम में.मेरे सुपरहिट लेख छांटो .मेहनत से मत डरो महाराज.इस बीच हिंदी में जो दूसरे लोगों ने सुपर-डुपर हिट ब्लाग लिखे है उनको मैं छांट रहा हूं ताकि दुबारा जिसे मन में आये पढ़ सके.
  • At 11:11 AM , Blogger Vijay Thakur said...
    मैं तो सोच रहा था कि कवि-सम्मेलनों की परंपरा मर रही है लेकिन अब लगता है कानपुर जैसे औद्योगिक शहर का हृदय निपट देहाती है। पिछली बार गर्मियों में भारत में था तो "सब-टीवी" पर "वाह-वाह" देख-देखकर उबाल खाता रहता था पर फ़िर उसकी कहीं "स्कोलेस्टिक व्याख़्या" सुनी कि आगे आनेवाले समय में ये वाचिक परंपरा टीवी के माध्यम से ही ज़िंदा रहेगा। मैंने कहा वाह गुरु हर चीज़ की क्या सटीक व्याख्या होती है। पर अब शुकुलजी के इस रिपोर्ट से लगता है टीवी-सीवी से बोर होकर लोग लौट लौट उधर ही देखेंगे, श्रोता और कवि आमने सामने।

    कानपुर के बारे में और लेखों और संस्मरणों का इंतज़ार रहेगा।
  • अरे फुरसतिया जी,
    यदि हो सके तो राजेश श्रीवास्तव की रचनाओ को उनकी सहमति से एक एक करके अपने ब्लाग पर छापो, बहुत अच्छा रहेगा.

    1.धर्म छोटे-बड़े नहीं होते ,
    जानते तो लड़े नहीं होते.

    ये वाली तो जरूर ही छाप दो, यदि कोई कविता संग्रह भी हो इनका तो परेशानी नही, बाकी लोग मिलकर टाइप कर देंगे. बाकी राजेश भाई से मिलकर हो सके तो उनको भी ब्लाग लिखने के लिये प्रेरित करो.
  • विजयजी,
    इसी कवि सम्मेलन में कन्हैयालाल नंदन को सम्मानित किया गया.उन्होंने अपने शहर कानपुर के बारे में कहा:-भई ,देखो अपने शहर की तारीफ करना अच्छी बात नहीं होती लेकिन यार, मैं क्या करूं मेरे अन्दर यह टहलता है.मैंने बहुत पहले ये कहीं लिखा है कि यह शहर बिफरता है तो चटकते सूरज की तरह बिफरता है और बिछता है तो गन्धफूल की तरह बिछता है.कविता के बारे में होंगी
    गलतफहमिंया लोगों को लेकिन इस शहर में जिस तरह कविता सुनी जाती है वह सोना है.

    जीतेन्द्रजी,गलती से विनोद की जगह नाम राजेश लिख गया था.जो कवितायें मेरे पास मिलीं उस दिन की वे मैंने लिख दीं.मजा लो.आज मैंने यह गीत पचीस-तीस बार सुना.
  • मुनिवर/पूज्‍यवर/गुरुवर/हृदयवर,
    अभी भी,आप के लेख में,विनोद और राजेश,दोनों ही मंच पर ,एक ही स्‍थान पर विराजमान हैं।एक को ,तो,मंच पर से उतारिये ताकि,रचनाकार का नाम और सम्‍मान सही व्‍यक्ति से ही जुड़े।और,पाठक भी व्‍यर्थ में भ्रमित होने से बचा रहे।
    -राजेश
    (सुमात्रा)
  • At 10:27 AM , Blogger आशीष said...
    शुक्ल जी, मुझे तो हवा ही नहीं लगी कि कब ये कवि सम्मेलन आया और चला गया, भैया आगे से कुछ पता चले तो खबर कर दीजियेगा। अकेले अकेले ही रसास्वादन कर लिये। फुनवा घुमाते हैं आपको आज-कल में।
  • At 6:39 PM , Blogger Atul Arora said...
    अति सुँदर| यह शहर मेरे भीतर टहलता है| यह हर कानपुरवासी महसूस करता है चाहे वह कानपुर में चाहे गैर प्रदेश या फिर विदेश में| शायद यही बात किसी बि दूसरे शहर पर लागू होती है| किसी अपने ने जो ताजिंदगी कानपुर में ही रहे हैं और कभी कभार काम के लिए दो चार दिन को कानपुर से बाहर जाते है पिछले दिनो कुछ यह बयान किया "अतुल भाई, चाहे लखनऊ भी चले जाओ एक दिन को , पर शाम को जब जाजमऊ के पुल से बस गंगा की ओर बड़ती है तो लगता है अब अपने वतन आ गये, क्या सुकून मिलता है|" मैं मन ही मन सोच रहा था वह क्षण जब ईंदिरागाँधी एयरपोर्ट पर उतरते ही धरती को छुआ था और शताब्दी पर बैठे हुए २४ घँटे से ज्यादा जगी आँखे एक एक पल दिमाग को कैद कर लेने को बेताब थी , गाँवो की पँगडंडिया , मालरोड का पुल , सेंट्रल....
  • At 6:20 AM , Blogger Tarun said...
    वाह जनाब वाह आपने तो पुरा ही कवि सम्‍मेलन यहाँ उतार दिया। बड़े अच्‍छे।
  • At 5:40 AM , Anonymous Anonymous said...
    विकिपीडिया हिन्दी में योगदान करना न भूलें

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