Friday, April 15, 2005

चाय पीना छोड़ दूं ?

चाय के पुराने शौकीन हैं हम. कालेज का आधा समय हमने बेंच पर कैंची की तरह टांगे फंसाये चाय पीते हुये गुजारा.बकिया अपने आप गुजर गया-किसको रोकें,कितना रोके.
बहुत पहले हमने घड़ी बांधना छोड़ दिया था.नैनो टेक्नालाजी के इस युग में भी हमारा समय का न्यूनतम मात्रक दिन है.कैलेंडर पर भरोसा ज्यादा करते हैं घड़ी के मुकाबले.दिन का काम उसी दिन हो जाये यही बहुत बड़ी उपलब्धि मानते हैं हम.ऐसा नहीं कि हम घड़ी देख नहीं पाते पर देखना छोड़ दिया बहत पहले .डायलाग मारने की सुविधा अलग से –हम किसी बंधन में नहीं रहते.
पर ये दोनों पैराग्राफ असंबद्ध लग रहे हैं. लग रहा है जीतेन्दर ,स्वामीजी गलबहियां डाले खड़े हैं.
असल में जब ज्यादा दिन हो जाते हैं लिखने को तो मसाला इतना ज्यादा इकट्ठा हो जाता है कि एक दूसरे को धकिया के निकलना चाहता है.यहीं गड़बड़ हो जाती है तथा अतुल को भी मौका मिलता है कहने का कि इनका (मेरा)लिखा ऊपर से निकल जाता है.(वैसे अतुल के गुरुजी बालगोविंद द्विवेदी जी से मैंने मुलाकात होने पर
पूछा कि आपका चेला ऐसा कहता है तो उन्होनें यह मानने से मना कर दिया .बोले कि ऐसा नहीं हो सकता .मेरा चेला बहुत जहीन है.हमें मानना पड़ा -क्या करते.नागरजी विद्यालय के पास जो थे ,जहां अतुल पढ़े हैं.)
चलो अब काम की बात की जाये.बात शुरु हुयी थी चाय से.तो शौकीन चाय के हम इतने कि शादी में जयमाल के बाद जब विवाह के लिये हमें खोजा जा रहा था तो रात के एक बजे हम बसस्टेशन पर अपने मित्रों के साथ चाय पान तथा कविता गोष्ठी करते पाये गये.फिलहाल मैं सोच रहा हूं कि चाय पीना छोड़ दूं.लोग पूंछेंगे क्यों?क्या पत्नी चाय नहीं बना पाती?क्या डाक्टर ने मना किया है?क्या काफी शुरु करना चाहते हो?क्या खर्चा बचाना चाहते हो?
इन सब सवालों के जवाब न हैं.तो फिर बात क्या है?जानने के लिये सुने संक्षिप्त कथा.कथा है तो मंगलाचरण तो श्लोक से ही होगा. श्लोक में जंजाल है. अर्थ सुने:-
रूपवती पत्नी ,व्यभिचारिणी मां, मूढ़ पुत्र ,कर्जदार बाप दुश्मन के समान होते हैं.(यह श्लोक लगता है किसी पति टाइप आदमी ने लिखे हैं काहे से कि पति की कोई बुराई नहीं है इसमें)
इतनी लंबी भूमिका के बाद कहानी संक्षेप में यह है कि हमारे घर के बगल में एक कर्नल निवास करते थे.वे एक दिन रात को घर से लखनऊ के लिये निकले.सवेरे तक नहीं पहुंचे.सबेरे हल्ला हुआ.तो खोज हुयी.कर्नल कानपुर में ही पाये गये.लाश के रूप में.फिर खोजबीन हुयी.शाम होते-होते यह पाया गया कि कर्नल को उन्हीं की पत्नी ने अपने एक तथाकथित प्रेमी,व्यापारी सहयोगी की मदद से मार दिया. तरीका अपनाया ये कि रात को अपने पति को चाय में नींद की गोली देकर सुला दिया फिर नायलान की रस्सी से गला घोंट के हमेशा के लिये सुला दिया.चूंकि हम पड़ोसी थे अत: हम उनके बारे में कुछ नहीं जानते थे.पर लोगों से पता लगा वो यह कि दोनों ने प्रेम विवाह किया था.फिलहाल कर्नल-पत्नी जेल में है.सहयोगी समेत.
सच क्या है यह कहना मुश्किल है पर कालोनी की महिलाओं के बयान जो हमारे कान में आये बिना नहीं माने वे हैं:-
-अरे वो बेवकूफ थी.उसको कार में डाल के सड़क पर खड़ा करने कीक्या जरूरत थी?यहीं नहर में फेंक देती पता भी न चलता महीनों.
-नहर में क्यों कहीं ले जाती ट्रेन में.वहीं धक्का दे देती.
-अरे मारना था तो बच्चों के एक्जाम हो जाने देती.साल बरबाद हो गया बेचारी का.
-ये देखो कितना खूबसूरत. पति मार दिया इस नौकर जैसी शकल वाले के लिये.मैं तो कभी ऐसा नहीं कर सकती.
-लव मैरिज में यही होता है.पहले तुमसे हुआ.अब किसी और से ये तो होगा ही.कोई कह रहा था दूसरी शादी थी.बहुत अंतर था उम्र में.
बहरहाल जो आमसहमति बनी है कारण में वह यह कि कर्नल-पत्नी बहुत महत्वाकांक्षिणी थी.पैसा खूब पैदा करना चाहती थी.कुत्ते बेचने का काम शुरु किया.उसी पार्टनर के बहकावे में या कहें सलाह से उसने भर्ती कराने के नाम पर लोगों से पैसे लिये.भर्ती का जुगाड़ बन नहीं पाया तो लोगों ने पैसे वापस मांगे.बात कर्नल को पता लगी.उनके
पास जितने पैसे थे तथा कुछ कर्जा लेकर वापस किये उन्होंने.फिर भी पूरे वापस नहीं हो पाये.रोज-रोज की कहा-सुनी से तंग आकर पत्नी ने कर्नल को मार दिया.शायद इसलिये भी कि कुछ तकादगीर अगले दिन आने वाले थे जिनके बारे में कर्नल को पता न था.बाद में पत्नी रोती पायी गयी-हाय ,हमें बचा लो हमसे भूल हो गयी.
मैं सोचता हूं क्या कारण रहे होंगे कि पत्नी को अपने पति को निपटा देना पड़ा?हमें लगता है कि हम जाने-अनजाने पता नहीं किन चक्करों में पड़कर इस नियति तक पहुंच जाते हैं.प्रलोभन या विचलन एक फिसलपट्टी की तरह होते हैं.जिन पर फिसलना शुरु करने तक ही बाजी आपके हाथ में रहती है.फिसलना शुरु करने के बाद की
नियति फिसलपट्टी की ढलान तथा चिकनाहट तय करती हैं.आपके हाथ में कुछ नहीं रहता सिवाय असहाय फिसलने के तबतक जब तक अंतिम परिणति को प्राप्त नहीं हो जाते.
हमारे सोच को ‘आस्टोपोरोसिस’होता जा रहा है.हम कोई सामाजिक,आर्थिक झटका झेल नहीं पाते.यह बात भारत दैट इज इंडिया के लिये ही नहीं पूरे विश्व पर लागू होती है.आदर्श दरकते जा रहे हैं .हम वीरता पूर्वक समर्पण करते जा रहे हैं.महाजनो येन गतं स: पन्थ:
पत्नी मना करने के बावजूद ,आदतन,चाय बना लायी है.मैं चाय पीना छोड़ देने का विचार छोड़ देता हूं.कोई एतराज तो नहीं है?

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

11 responses to “चाय पीना छोड़ दूं ?”

  1. विजय ठाकुर
    अब मरना ही है तो चाय पीकर मरिये, स्वर्ग के कैंटीन की चाय कुल्हड़ की चाय से क्या टक्कर लेगी भला । हाँ, देखिएगा कहीं ये न हो कि भाभीजी आपका चिट्ठा पढकर कुत्ते बेचने का शौक पाल ले ।
  2. पंकज
    शुक्ला जी, श्लोक भी लिख देते तो मेरे जैसे छद्म पोंगा पंडित जो केवल संस्कृत पढ़ कर बिना मतलब जाने खुश हो जाते हैं ज्यादा प्रसन्न हो जाते।
    पंकज
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    Do you mean a beautiFOOL patnee is a TOY for neighbour ?
  4. पंकज
    शुक्रिया अनूप जी। अभी कल शादी की दूसरी वर्षगाँठ थी। मैंने अपनी रुपवती को कल ही आपके श्लोक को सुनाने का खतरा मोल नहीं लिया अभी तक। आज सुनाता हूँ चाय पानी के बंद होने का खतरा है।
    पंकज
  5. जीतू
    भइये,
    हम तो अभी तक नही समझ सकें कि आपकी चाय के बीच मे कर्नल और उसकी बीबी कहाँ से आ गयी, तनिक खुलासा किया जाय.
    अब तो अतुल के साथ साथ हमे भी कहना पड़ेगा कि बाउन्सर फेंकते हो. भइया, तनिक सीधी साधी भाषा मे बताया जाय, जब तक तुम लिखो, तब तक हमऊ भी चाय पी कर आते है.
  6. आशीष
    बहुत मजेदार कथा कही । कहानी सुन कर एक कटिंग पीने का मन कर गया ।
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