Saturday, April 30, 2005

आशा ही जीवन है

वैसे तो यह मान लेने में मुझे कोई एतराज नहीं होना चाहिये कि आशा ही जीवन है.पर जहां मैं सोचता हूं वहीं मामला गड़बड़ा जाता है.आशा ही जीवन है कहना ठीक नहीं लगता.आशा -आशा है,जीवन -जीवन .यह सच है कि आशा का जीवन में बहुत बड़ा योगदान होता है.पर आशा ही जीवन है कहना जीवन के बाकी तत्वों की उपेक्षा करना है.जीवन का तो ऐसा है कि जो भी चीज जरूरी दिखी उसी को कह दिया कि वही जीवन है.जल की कमी हो रही है तो जल बचत करने वाले जलपरियोजना से जुड़े लोग कहते हैं जल ही जीवन है.जो लोग देशप्रेम का झंडा ऊंचा किये रहते हैं जो लोग देश को प्यार नहीं करते वे मरे के समान हैं मतलब देश प्रेम ही जीवन है.लब्बो-लुआब यह कि जिस किसी को भी महत्वपूर्ण बताना हुआ तो कह दिया कि वही जीवन है.
Akshargram Anugunj
आशा ही जीवन है कहना कुछ वैसा ही है जैसे कि कुछ सालों पहले बरुआजी ने इंदिरागांधीजी के लिये कहा था -इंदिरा इज इंडिया.अब इंदिराजी नहीं पर देश टनाटन चल रहा है-वाबजूद तमाम उखाड़-पछाड़ के सो इंदिरा इज इंडिया तो सही नहीं रहा होगा.
आशा जीवन के लिये महत्वपूर्ण हो सकती है.ड्राइविंग सीट पर बैठ कर जीवन की गाड़ी की दिशा निर्धारित कर सकती है पर भइये जैसे ड्राइवर और गाड़ी दो अलग इकाई हैं वैसे ही आशा अलग है जीवन अलग.बहुत लोग बिना किसी आशा के जीवन बिता देते हैं यह कहते हुये:-
सुबह होती है,शाम होती है
जिंदगी तमाम होती है.

बहुत लोग निराशा में ही जीवन बिता देते हैं उनके लिये निराशा ही जीवन है.आप लाख कहते रहो पर कि उनका जीना जीना नहीं है पर अगर वे कहते हैं हमारे लिये निराशा ही जीवन है तो आप अपनी आशा का कितना रंदा चलाओगे उन पर ?तो महाराज पहले तो मेरा यह बयान नोट किया जाये कि आशा ही जीवन है यह बात पूरी तरह सच नहीं है.जीवन में आशा के अलावा भी बहुत कुछ होता है.
यह तो हुआ मंगलाचरण.अब यह बतियाया जाये कि आशा है क्या ? हम बहुत पहले कह चुके हैं कि आशा हमारी पत्नी का नाम नहीं है. पर उस समय हम यह बताना छोड़ दिये थे कि आशा कौन है -किसका नाम है?तो अब वह बताने के प्रयास किया जाये.
आशा स्त्रीलिंग है.खूबसूरत है.आकर्षक है.बिना किसी उम्र-लिंग के भेदभाव के सबकी चहेती है.जीवन को अगर संसद कहा जाये तो आशा मंत्रिमंडल है.जीवन अगर कोई प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है तो आशा वह शेयरधारक है जिसके पास इस कंपनी के सबसे ज्यादा शेयर हैं.जीवन अगर कोई गाड़ी है तो आशा उसकी ड्राईवर.जीवन अगर कोई इंजन है तो आशा उसका ईंधन.
आशा का स्थान बहुत जरूरी है जीवन में.बहुत कुछ होता है जीवन में जब मनचाहा नहीं होता.निराशा होती है.ऐसे समय में आशा एक संजीवनी होती है जिससे जीवन फिर उठ खड़ा होता है.आशा वह बतासा है जो जीवन के मुंह में घुल कर कड़वाहट दूर करता है.मिठाई में केवड़े की सुगन्ध की तरह है आशा की महक .
हमेशा से दुनिया में निराश होने का फैशन रहा है.आप देखिये अगर तो बहुतायत निराश लोगों की है.ये बहुसंख्यक निराश लोग भी अपने आसपास किसी आशा के दीप को जलते देखते हैं तो इनकी भी आंखें रोशनी की मीनार हो जाती हैं.आशा यह तेवर देती है कि हम किसी असफलता से सामना होने पर कह सकें:-
पराजित हैं हम
किंतु सदा के लिये नहीं
कल हम फिर उठेंगे
अधिक शक्तिऔर विवेक के साथ
!
आशा हमें यह खिलंदड़ा उत्साह देती है जो पराजयों के इतिहास को भी अनदेखा करके कह सकें:-
अन्य होंगे चरण हारे,
और हैं जो लौटते ,
दे शूल को संकल्प सारे.

हमारे एक कर्मचारी थे-वजीर अंजुम.वे डायबिटीज से पीड़ित थे.तमाम मध्यवर्गीय बीमारियां उनकी मेहमाननवाजी करतीं थीं. पर वे जब तरन्नुम में गाते :-
हादसे राह भूल जायेंगे,कोई मेरे साथ चले तो सही.
तो लगता कि तमाम अंधेरे में रोशनी की मीनार जल रही हो.वे आज नहीं हैं पर यह गीत उस मंत्र की तरह कानों में गूंजता है जिसको सुनते निराशा के भूत सर पर पैर रखकर नौ दो ग्यारह हो लेते हैं.
बहुत सारे उदाहरण मिल जायेंगे जो आशा का झंडा फहराते हैं.तमाम सूत्र वाक्य मिल जायेंगे पर एक दिन मैंने किसी बोर्ड पर लिखा देखा- सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है. इससे बेहतर आशा का मंत्र मुझे नहीं मिला आजतक.
जीवन में हम तमाम परेशानियों से दो चार होते हैं.जिनसे हम पहले निपट चुके होते हैं उनसे निपटने के तरीके भी हमें पता होते हैं.पर जो नयी चुनौतियां आती हैं उनसे निपटने के नये तरीके भी खोजने होते हैं.पर आशा का लंगर वही होता है .यह स्थायी भाव है .
अब यहां तक काम भर का हो गया.अब लेख समेटा जा सकता है.पर सबसे पहले जो मैंने स्वामीजी का लेख पढ़ा था उसकी पढ़ताल करने का मन कर रहा है.ये बताते हैं आशा कुछ नहीं है.जो कुछ है वह महिमा प्रपंच की है.स्वामीजी बताते हैं आशा ही जीवन नहीं है बल्कि प्रपंच ही जीवन है.सच तो यह है कि न आशा ही जीवन है न प्रपंच ही जीवन हैं.आशा व प्रपंच एक दूसरे की ‘मिरर इमेज’ हैं.आशा किसी शिखर की तरफ बढ़ते हुये के धनात्मक भाव हैं तो प्रपंच शिखर से रपटते हुये किसी के वे कलाबाजियां हैं जो शिखर-पतित येन-केन-प्रकारेण शिखर पर बने रहने के लिये करता है.
आशा का झंडा लहराते शिखर पर चढ़ते के लिये दुनिया वाह-वाह करती है.जबकि शिखर बचाये रखने के लिये प्रपंचरत के लिये दुनिया कहती है-देखो इनकी हवस नहीं गयी.आशावादी के प्रयास हनुमान के प्रयास के प्रयास होते हैं जिनकी सुरसा तक तारीफ करती है जिसे वे धता बताकर निकल आते है.प्रपंचरत के प्रयास को स्वामीजी तक धूर्तता बताते हैं.आशा वरेण्य है,प्रपंच चुभता है.आशा तो सबको साथ लेकर चल सकती है.पर प्रपंच की त्रासदी होती है कि वह अकेला होता है.तमाम छल करने पड़ते हैं प्रपंच को.और जब वह बेनकाब होता है तो सदियों तक हाय वे भी क्या दिन थे कहने के लिये बाध्य होता है.प्रपंच तभी तक कामयाब होता है जब तक आशायें अलग-थलग रहती हैं.आशाओं के गठबंधन को देखकर प्रपंच पतली गली से निकल लेता है .
तो मतलब मेरा यही है कि अगर कोई कहता है आशा ही जीवन है तो आई बेग टु डिफर.पर यह भी सच है कि आशा बहुत बड़ी ताकत है जीवन को दिशा देने में.अगर डायलागियाया जाये तो कहा जा सकता है-आशा जीवन तो नहीं पर जीवन की कसम यह जीवन से कम भी नहीं.
बाकी तो तुलसी बाबा के शब्दों में:-
जाकी रही भावना जैसी,
प्रभु मूरत तिन्ह देखी तैसी
.

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

5 responses to “आशा ही जीवन है”

  1. eswami
    हां सही बात है, आशा धनात्मक है और प्रपन्च नकारात्मक का नकारात्मक है नीचे नही जाना इस डर से उपर चढते रहने का जुगाड! आज कल प्रपंच फेशन मे क्यों है?
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Thursday, April 21, 2005

वियोगी होगा पहला कवि

मैं आमतौर पर खुशमिज़ाज इंसान के रूप में बदनाम हूं.किसी किसिम की चिरकुट-चिंता से मुक्त.पर कभी-कभी कुछ-कुछ होने लगता है.क्या होता है बताना मुश्किल है. पर ‘ट्राई’मारने में क्या हर्जा ?
जब कभी मैं अपने तकनीकी वीरों को खुल्लमखुल्ला तकनीकी सूचनाओं का आदान-प्रदान करते देखता हूं तो अफसोस होता है कि मैं उनको बूझने लायक भी नहीं.आगे सुझाव देना तो दूर.जब कोई नया तकनीकी सगूफा उछलता है तो मुझे वह बाउन्सर की तरह लगता है जिसे मैं हड़बड़ाकर डग कर देता हूं.कभी-कभी लगता है कि मैं भी सीखूं यह सब तो तमाम किताबें उठा के शुरु हो जाता हूं पर जल्द ही सोचता हूं यार आराम से देखेंगे.यह आराम पता नहीं कब नसीब होगा.पर होगा यह लगता है.
दूसरा अफसोस मुझे होता जब मैं तमाम स्वानमधन्य साथियों की कवितायें देखता हूं.मैं शर्म महसूस करता कि हाय हम काहे न लिख पाये.कविता-कानन में हम क्यों न टहल पाये?इतनी धांसू कवितायें देखता हूं कि शर्म से जमीन में धंस जाता हूं.कोशिश करता हूं कि मैं भी लिखूं पर वे प्रयास इतने बचकाने लगते हैं कि मैं सोचता हूं कि इससे तो हम बिना कविता के ही अच्छे.
एक बार परसाईजी के पास एक उम्रदराज युवा कवि आये.अपनी कवितायें दिखाईं.कहा -मैं जीवन में सब कुछ कर चुका हूं. अब साहित्य सेवा करना चाहता हूं.ये देखें मैंने कुछ लिखा है.बतायें मैं कैसे साहित्य सेवा कर सकता हूं?परसाईजी ने रचनायें देखीं और कहा-यदि आप सचमुच साहित्य सेवा करना चाहते हैं तो अनुरोध है कि आप इन कविताओं को छपाने की इच्छा का त्याग कर दें तथा संभव हो लिखना भी छोड़ दें.
यह बात तो मजाक में कही गयी होगी पर मैं जब भी कभी लिखता हूं-खासकर कविता तो लगता है कि शायद यह मेरे जैसों के लिये ही कही गई होगी.
बहरहाल मैं जब भी कोई कविता देखता हूं किसी ब्लाग में तो मन बहुतबेचैन होता है.हूक सी उठती है मन में-काश हम भी लिख पाते कुछ कविता -सविता.पर उस हूक को हम समझदारी से जबरियन दबा देते हैं.तब हमें अहसास होता है कि विद्रोह कैसे कुचले जाते होंगे.
पर सब कुछ अपने हाथ में नहीं होता.आजकल बच्चे बड़े समझदार हो गये हैं.मेरा बच्चा रोज मुझे देखता रहता.कोई नई कविता पढ़ने के बाद झोले की लटक जाता मुंह देखता.एक दिन उसने मुझे उदास होते रंगे हाथों पकड़ लिया.पूछा-पापा,आप उदास क्यों हैं?क्या कोई कविता पढ़ी.हमें लगा कि जिस बात को हम खुद से छिपाते रहे उसे मेरा बच्चा बता रहा है.हमने किसी घपले का खुलासा होते ही उसे दबाने के के प्रयासों की तत्परता से कहा -नहीं बेटा,ऐसी कोई बात नहीं है.पर वह माना नहीं.बोला-आप छुपा रहें हैं.पर मैं जानता हूं कि इसके पीछे कविता का दुख है.मैं बोला-नहीं, ऐसा कुछ नहीं है.पर वह माना नहीं तो मुझे उसकी बात माननी पड़ी.मैंने अपने जुर्म का इकबाल कर लिया.कहा-हां,मैं कविता के कारण दुखी हूं.
फिर तो वह मौज लेने लगा.बोला-यह आप उल्टी गंगा बहा रहे हैं.मैंने तो पढ़ा है कि कविता दुख से उपजती है.पहली कविता का जन्म ही आह से हुआ था.कहा गया है:-
वियोगी होगा पहला कवि,आह से उपजा होगा गान,
उमड़कर आखों से चुपचाप,बही होगी कविता अनजान.

बहरहाल हमें हमारे बच्चे ने आगे समझाया कि अगर आपको इस बात से दुख होता है कि आप कविता लिख नहीं पाते तो फटाक से शुरु कर दीजिये लिखना.कुछ दिन में हाथ रवां हो जायेगा तो धक्काड़े से लिखने लगेंगे फिर आपको रोकना पड़ेगा. मैंने कहा -नहीं यार नहीं होता अपुन से.
पर वह तुल गया समझाने पर.बोला -पहले जब आपने ब्लाग लिखना शुरु किया था तो कहां लिख पाते थे ?धीरे-धीरे सीखे न.वैसा ही यह भी होगा.मेरी हिचक देख के वह बोला अच्छा लाइये मैं बताता हूं कैसे लिखते है.दिखाइये वे ब्लाग जिनकी कवितायें पढ़कर मन बेचैन हो जाता है.मैंने सारे कविता-रस पगे ब्लाग उसे दिखाये.एक जगह वह चौंका -पापा ,यह क्या यहां पूंछ ऊपर है,मूंछ नीचे.मेरे मुंह से निकल गया-हर आदमी अपनी सबसे खास चीज को सबसे ऊपर रखता है.यहां क्या बुरा है.वह ,पापा आप भी हमेशा अपनी अकल लगाते हो, कहते हुये सारे कविता से लदे-फदे ब्लाग सरसरी तौर पर देख गया . फिर बोला -आप ,इन कविताओं की नकल करके कुछ लिखिये.पुत्र की सलाह मानने पर मजबूर होना पड़ा मुझे.मैंने जो लिखा वह नीचे दिया जा रहा है.अच्छा लगे तो मेरे प्रयास की तारीफ करियेगा.बुरा लगे तो उनको कोसियेगा जिनकी कविता की देखा-देखी हमने यहां शब्दों की गठबंधन सरकार बनायी:-
मैं
हवाई जहाज में
खाने के इंतजार में हूं
एअर होस्टेस आती है
पूंछती है -क्या लेंगे आप ?
मैं कहता हूं
मेरी मां के हाथ की बनी
बुकनू ले आओ.
वह चौंककर कहती है-
यहां हवाई जहाज में बुकनू कहां?
यहां तो इम्पोर्टेड नमक मिलता है.
मैं कैसे बताऊं-कितना जरूरी है मेरे लिये
इम्पोर्टेड नमक के मुकाबले
भोजन में मां के हाथ की बुकनू होना.

लड़के ने चार-पांच बार वाह-वाह किया फिर बोला अब एक इंकलाबी गजल लिख मारिये.हम बोले -कहां हम,कहां इंकलाब!पर वह जिद पर अड़ा रहा.मुझे लिखना पड़ा:-
या खुदा ये कैसे-कैसे मंजर नजर आने लगे,
जो रुकने को आये थे,उठ -उठ के जाने लगे.

बात तो साथ हरहाल में निभाने की हुई थी लेकिन
ये क्या हुआ कि खास अपने आंखें चुराने लगे.
जिनके हाथों में था रहबरी का आलिम खिताब,
वे सरे राह रहजनों के साथ नजर आने लगे.
देश की अब क्या सुनायें दास्तां ऐ मेरे दोस्त,
जो बहुत जागरूक थे वे भी तो जम्हुआने लगे.

यह इंकलाबी तेवर वाली गजल हम पांच मिनट में टाइप करके हांफने लगे तब तक लड़के ने वाह-वाह करके हमें चौंका दिया. वो तारीफ की हमें मजा आने लगा.अब हम भी सोचे कि एक प्रेम कविता पर भी ट्राई मारें नहीं तो पंकज बोलेंगे -हमारे लिये कुछ नहीं लिखा.तो जो ट्राई मारा वह यह है:-
ये खिला हुआ चांद कहां कुछ कहता है,
पर कुछ है यह जो मेरे मन में बहता है.

वैसे तो हमेशा ही हंसते रहते हैं हम,
अब कैसे कहूं दिल कितना दुखता है.
फिर देखने का मन है तुमको लेकिन,
लंबा बहुत तुम्हारे घर का रस्ता है.
औरों के तो नखरे भी होंगे लेकिन,
ले लेना दिल मेरा ये सबसे सस्ता है.

लड़का बोला -थोड़ा और जरा लुटा-पिटा लिखो.मैं बोला -क्या कारवां गुजार दूं ?नीरज की तरह लिखूं.वह नीरज को जानता नहीं है फिर भी बोला -तब क्या.बेवकूफी करना है तो कायदे से करें.मैंने फिर अर्ज किया:-
आंसू,जिल्लत,गम-न जाने क्या-क्या पी गये?
मजाक ही मजाक में हम जिंदगी जी गये.

सोचा था कभी सुकून से गुजारेंगे जिंदगी,
पर बेकरार,हड़बड़ी में जिंदगी जी गये.
ख्वाब में हमनें तुमको था देखना शुरु किया,
क्या हो रहा गुरु,सुना और हम सिहर गये.
कैसे बतायें थी जिंदगी कितनी कामयाब,
बेकरार- बेखुदी में सब हिसाब भूल गये.

पांच मिनट प्रति कविता की दर से चार कविता लिखने के बाद हमने गरदन अकड़ाकर लड़के की तरफ देखा.सोचा अब यह और तारीफ करेगा.पर वह तारीफ छोड़कर चुनौती वाले अंदाज में बोला.कोई व्यंग्य कविता लिख के दिखायें.मैंने कहा -कैसे लिखूं.बोला -जैसे ये लिखी.मैंने चुनौती स्वीकार की.लिखा:-
प्रेम विवाह करके
दंपति गति को प्राप्त पत्नी
बुढ़ापे में पति से बोली -
ये मुई जुड़वां लड़कियों की शादी कैसे होगी ?
पति चिंता मुक्त होकर बोला,
अभी भी लड़के काफी वेबकूफ हैं
जैसे तुमने भागकर शादी की थी
वैसे ये भी कर लेगी
हमें इस चिंता से मुक्त कर देगी.

मैंने कविता की खेती के कारण उपजे श्रम सीकर सुखाते हुये अपने लड़के की तरफ देखा.वह मुस्कराता हुआ बोला -पिकअप तो अच्छा है पर अब मुझे डर लग रहा है कि कहीं लोग आपकी तुकबंदियों की तारीफ न करने लगें और आप गलतफहमी के शिकार न हो जायें.

10 responses to “वियोगी होगा पहला कवि”

  1. पंकज नरुला
    छा गए शुक्ली जी। हर कविता में एक नया शटाईल क्या बात है। मेरी पसंद
    जैसे तुमने भागकर शादी की थी
    वैसे ये भी कर लेगी
    हमें इस चिंता से मुक्त कर देगी.
    पंकज
  2. eswami
    मजेदार बात तो ये है की आपकी पाँच मिनिट में एक की गति से छापी गई तुकबंदी, स्वयंभू कवियों की “कविता” से ज्यादा सही जा रही है.
    मेरी पसंद –
    देश की अब क्या सुनायें दास्तां ऐ मेरे दोस्त,
    जो बहुत जागरूक थे वे भी तो जम्हुआने लगे.
    रवि भाई मेरे विचार में इस वाले की जमीन पे एक घाकड व्यंजल बन सकती है! :)
  3. जीतू
    “या खुदा ये कैसे-कैसे मंजर नजर आने लगे,
    जो रुकने को आये थे,उठ -उठ के जाने लगे.
    बात तो साथ हरहाल में निभाने की हुई थी लेकिन
    ये क्या हुआ कि खास अपने आंखें चुराने लगे.”
    मेरे ख्याल से फुरसतिया जी,आपने ने ये गजल अपने पाठको और श्रोताओ का रियेक्शन देखकर लिखी होगी,क्यों है ना सही?
    हा हा…अरे भई मै तो मजाक कर रहा था, वैसे गुरु मान गये, हर विद्या मे माहिर हो, फिर ये गीत,कविता,गज़ल क्या चीज है, आपके सामने. बहुत अच्छा लिखे हो, दो चार बार पढूँगा तो समझ मे भी आ ही जायेगा, नही भी समझ मे आयेगा तो, आप तो ही व्याख्या करके बताने वाले.आगे भी आपकी कविताओ का इन्तजार रहेगा, बस हाइकू वगैरहा मत लिखना
  4. Debashish
    हाईकू को लेक मुझे टॉंट मार रहे हैं जीतू भाई ;) रवि की व्यंजल का इंतज़ार रहेगा।
  5. जीतू
    अरे नही देबू भाई,
    ये तो फुरसतिया से इतना प्रेम है कि इनकी पोस्ट पर कमेन्ट मे, मै कोई लिहाज नही करता, आखिर फुरसतिया जी हमारे शहर के ही है, आज से पचास सौ साल बाद, इनका नाम कानपुर के इतिहास मे अमर रहेगा
    अब हाइकु का भी समझ लो, अमां जब तक कविता समझ मे आये, कविता ही खत्म हो जाती है, फिर पढो, फिर खत्त्म, ये सिलसिला चलता ही रहता है. हाइकु कविता तो एकदम ऐसी लगती है, जैसे सुक्खी दारू पी कर स्कूटर चला रहा हो और मै उसके पीछे दुबक के बैठा हूँ, कहाँ मोड़ेगा, कहाँ ब्रेक लगायेगा पता ही नही चलता.
  6. फुरसतिया » नियमित ब्लागिंग करने के कुछ सुगम उपाय
    [...] ५.कविता-सविता सिद्धान्त: नियमित कविता लेखन करते हुये आप नियमित ब्लाग लेखन कर सकते हैं। कविता लिखने का एक फ़ायदा यह भी है कि न उसका मतलब न लिखने वाले को समझने की जरूरत जरूरत होती है न पड़ने वाले की। आप कुछ भी लिखिये उसे कविता कहकर पोस्ट कर दीजिये। अगर आप कविता लिखने में बिल्कुल अपाहिज हैं जैसे की फ़ुरसतिया कोई भी कायदे की बात नहीं कर सकते तो आप अपने गद्य को ही खूबसूरत कविता का रूप दे सकते हैं। इसके तरीके यहां बताये गये हैं। इस तरह की पोस्ट आजकल प्रख्यात हिंदी ब्लागर दिलीप भारतीय इस तकनीक का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। [...]
  7. puja upadhyay
    पहले तो आप सच्ची सच्ची बताइए कि कविता नहीं आपने बच्चे से तो नहीं लिखवाई थी? वाकई कवितायेँ बहुत अच्छी हैं.
  8. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 1.अति सूधो सनेह को मारग है 2.हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती 3.आपका संकल्प क्या है? 4.वनन में बागन में बगर्‌यो बसंत है 5.मेरे अब्बा मुझे चैन से पढ़ने नहीं देते 6.जेहि पर जाकर सत्य सनेहू [...]
  9. J. L. SINGH
    बहुत अच्छा लगा और प्रेरणा भी मिली!
    धन्यवाद.

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Friday, April 15, 2005

इतने भी आजाद नहीं हैं हम साथी

मैंने सैकड़ों कवि सम्मेलन सुने होंगे.अक्सर ऐसा होता है कि एकाध कवि ही कविसम्मेलन में जमते हैं.बाकी कवि या तो हूट हो जाते हैं या जनता की उपेक्षा से फूट जाते हैं.दो महीने पहले मैंने कानपुर के लाजपत भवन में एक कवि सम्मेलन में कवितायें सुनी.पूरे समय कवि छाये रहे.शुरु से लेकर अंत तक एक से एक कवितायें सुनने को मिलीं.

इतना शानदार कविसम्मेलन मैंने उसके पहले कभी नहीं सुना था.सोमठाकुर,कन्हैयालालनंदन,रामेन्द्र त्रिपाठी ,गोविन्द व्यास,
,विजय किशोर मानव,सरिता शर्मा,अंसार कंबरी ,प्रमोद तिवारी आदि सब अपने पूरे मूड में अपनी सबसे बेहतरीन रचनायें पढ़ रहे थे.सबकी कविताओं का जिक्र फिर कभी मौके पर.

मंच पर सोमठाकुर जैसे कवि विराजमान थे.सोमठाकुर हिंदी के श्रेष्ठतम सक्रिय गीतकारों में से एक माने जाते है.वे कवि सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे थे.

विनोद श्रीवास्तव युवा गीतकार हैं.उन्होंने दो गीत पढ़े.बहुत जमें.बहुत दिन बाद मैंने इतना अच्छा गीत सुना था इतनी बेहतरीन आवाज में.जब विनोद श्रीवास्तव ने खत्म किया पढ़ना तो हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था.मैंने सैकड़ों कवि सम्मेलन सुने होंगे.अक्सर ऐसा होता है कि एकाध कवि ही कविसम्मेलन में जमते हैं.बाकी कवि या तो हूट हो जाते हैं या जनता की उपेक्षा से फूट जाते हैं. विनोद श्रीवास्तव युवा गीतकार हैं.उन्होंने दो मुक्तक पढ़े:-

1.धर्म छोटे-बड़े नहीं होते ,
जानते तो लड़े नहीं होते.
चोट तो फूल से भी लगती है,
सिर्फ पत्थर कड़े नहीं होते.


2.मैं अगर रूठ भी गया तो क्या,
मैं अगर छूट भी गया तो क्या,
तुमको मिल जायेंगे कई दर्पन,
मैं अगर टूट भी गया तो क्या.


इसके बाद विनोद ने एक गीत पढा:-

जैसे तुम सोच रहे साथी,
वैसे आजाद नहीं हैं हम.


विनोद बहुत जमें.बहुत दिन बाद मैंने इतना अच्छा गीत सुना था इतनी बेहतरीन आवाज में.

जब विनोद श्रीवास्तव ने खत्म किया पढ़ना तो हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था.विनोद श्रीवास्तव श्रोताओं को विनम्रता पूर्वक हाथ जोड़कर बैठने ही वाले थे कि सोमठाकर उठे.विनोद को लगभग अपने से लिपटा लिया ,माइक पर आये .बोले:-

मैं पिछले काफी समय से युवा पीढ़ी से निराश सा हो रहा था.कुछ नया ऐसा देखने में नहीं आ रहा था कि मैं आगे गीत के प्रति आश्वस्त हो सकूं.पर आज इस नौजवान गीतकार को सुनकर मुझे आश्वस्ति हुयी कि हिंदी गीत का भविष्य उज्जवल है.

विनोद श्रीवास्तव कानपुर के ही रहने वाले है . हाल फिर तालियों से गूंजने लगा.

सोमठाकुर आगे बोले -मैं विनोद की कविता से अविभूत हूं.मैं ५२ वर्षों से आपके बीच हूं.वैसे तो कोई साधना नहीं है पर अगर कुछ है तो उसका फल इस नयी पीढी को लगे.मैं एक ही बात कहना चाहता हूं कि साधना करते हुये अपने स्वाभिमान की रक्षा करना और हमारी आबरू रखना यह माला जो आपने मुझे पहनायी उसको उतरन मैं इसके गले में नहीं पहना सकता .पर अपनी यह माला मैं विनोद के चरणों में डालता हूं .उसकी कविता को यह मेरा नमन है.

यह कहकर सोमजी ने अपनी माला विनोद के पैरों में डाल दी.अपनी जगह बैठ गये.विनोद की आंखों में आंसू थे.वे भी सोम ठाकुर के चरण छूकर अपनी जगह बैठ गये.पूरे हाल में पहले सन्नाटा सा छा गया.फिर सभी श्रोता खडे होकर बहुत देर तक तालियां बजाते रहे.

मैंने सालों कवियों के तमाम लटके-झटके देखे हैं.नये कवि पुरानों की चापलूसी करते हैं.पुराने, नयों को आशीष देते हैं.नये-पुराने श्रोताओं से ध्यान,तवज्जो,आशीर्वाद चाहते हैं.पर यह अनुभव मेरे लिये अभूतपूर्व था.मैं भावुक था,अभी भी हूं याद
करके सारा प्रकरण.

सोमठाकुर लटके-झटके वाले कवि नहीं माने जाते.विनोद न उनके शहर के हैं न जाति के.कविता में नये-पुराने का संबंध है केवल.वे बहुत बढ़े माने जाते हैं गीतविधा में विनोद की तुलना में.ऐसे में अगर वे विनोद की कविता को नमन करने के लिये अपनी गले की माला उनके चरणों मे डालते हैं तो उनका कद और ऊंचा होता है.गीत को नयी प्राणवायु मिलती है.हमें नजीर मिलती है -देखो ,काबिल छोटों को सम्मानित करके खुद का कद कितना ऊंचा होता है .पर कितने लोग इन 'चोंचलों' में पड़ते हैं!यह तब और प्रासंगिक है जब समाज के हर क्षेत्र में लोग दूसरों को धकियाकर,टंगड़ी मारकर आगे बढ़ने की आपाधापी में लगे हों.

मैं यहां लिखना बंद कर चुका था.पर आज मन किया कि कुछ लिखूं कानपुर पर.मैं कानपुर के बारे में लिखना चाहता हूं.बहुत कुछ.मेरा मन है कि कानपुर के बारे में यहीं लिखता रहूं.आशा है स्वामीजी मेरी बात का बुरा नहीं मानेंगे-माफ कर देंगे.बाकी सारे लेख मैं वायदे के अनुरूप वहीं स्वामीजी के आश्रम में लिखता रहूंगा.नियमित.बार-बार,लगातार.

मेरी पसंद

जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम.

पिंजरे जैसी इस दुनिया में, पंछी जैसा ही रहना है,
भर पेट मिले दाना-पानी,लेकिन मन ही मन दहना है,
जैसे तुम सोच रहे साथी, वैसे संवाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी, वैसे आजाद नहीं हैं हम.

आगे बढ़नें की कोशिश में ,रिश्ते-नाते सब छूट गये,
तन को जितना गढ़ना चाहा,मन से उतना ही टूट गये,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आबाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम.

पलकों ने लौटाये सपने, आंखे बोली अब मत आना,
आना ही तो सच में आना,आकर फिर लौट नहीं जाना,
जितना तुम सोच रहे साथी,उतना बरबाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम.

आओ भी साथ चलें हम-तुम,मिल-जुल कर ढूंढें राह नई,
संघर्ष भरा पथ है तो क्या, है संग हमारे चाह नई
जैसी तुम सोच रहे साथी,वैसी फरियाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम.

-विनोद श्रीवास्तव

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चाय पीना छोड़ दूं ?

चाय के पुराने शौकीन हैं हम. कालेज का आधा समय हमने बेंच पर कैंची की तरह टांगे फंसाये चाय पीते हुये गुजारा.बकिया अपने आप गुजर गया-किसको रोकें,कितना रोके.
बहुत पहले हमने घड़ी बांधना छोड़ दिया था.नैनो टेक्नालाजी के इस युग में भी हमारा समय का न्यूनतम मात्रक दिन है.कैलेंडर पर भरोसा ज्यादा करते हैं घड़ी के मुकाबले.दिन का काम उसी दिन हो जाये यही बहुत बड़ी उपलब्धि मानते हैं हम.ऐसा नहीं कि हम घड़ी देख नहीं पाते पर देखना छोड़ दिया बहत पहले .डायलाग मारने की सुविधा अलग से –हम किसी बंधन में नहीं रहते.
पर ये दोनों पैराग्राफ असंबद्ध लग रहे हैं. लग रहा है जीतेन्दर ,स्वामीजी गलबहियां डाले खड़े हैं.
असल में जब ज्यादा दिन हो जाते हैं लिखने को तो मसाला इतना ज्यादा इकट्ठा हो जाता है कि एक दूसरे को धकिया के निकलना चाहता है.यहीं गड़बड़ हो जाती है तथा अतुल को भी मौका मिलता है कहने का कि इनका (मेरा)लिखा ऊपर से निकल जाता है.(वैसे अतुल के गुरुजी बालगोविंद द्विवेदी जी से मैंने मुलाकात होने पर
पूछा कि आपका चेला ऐसा कहता है तो उन्होनें यह मानने से मना कर दिया .बोले कि ऐसा नहीं हो सकता .मेरा चेला बहुत जहीन है.हमें मानना पड़ा -क्या करते.नागरजी विद्यालय के पास जो थे ,जहां अतुल पढ़े हैं.)
चलो अब काम की बात की जाये.बात शुरु हुयी थी चाय से.तो शौकीन चाय के हम इतने कि शादी में जयमाल के बाद जब विवाह के लिये हमें खोजा जा रहा था तो रात के एक बजे हम बसस्टेशन पर अपने मित्रों के साथ चाय पान तथा कविता गोष्ठी करते पाये गये.फिलहाल मैं सोच रहा हूं कि चाय पीना छोड़ दूं.लोग पूंछेंगे क्यों?क्या पत्नी चाय नहीं बना पाती?क्या डाक्टर ने मना किया है?क्या काफी शुरु करना चाहते हो?क्या खर्चा बचाना चाहते हो?
इन सब सवालों के जवाब न हैं.तो फिर बात क्या है?जानने के लिये सुने संक्षिप्त कथा.कथा है तो मंगलाचरण तो श्लोक से ही होगा. श्लोक में जंजाल है. अर्थ सुने:-
रूपवती पत्नी ,व्यभिचारिणी मां, मूढ़ पुत्र ,कर्जदार बाप दुश्मन के समान होते हैं.(यह श्लोक लगता है किसी पति टाइप आदमी ने लिखे हैं काहे से कि पति की कोई बुराई नहीं है इसमें)
इतनी लंबी भूमिका के बाद कहानी संक्षेप में यह है कि हमारे घर के बगल में एक कर्नल निवास करते थे.वे एक दिन रात को घर से लखनऊ के लिये निकले.सवेरे तक नहीं पहुंचे.सबेरे हल्ला हुआ.तो खोज हुयी.कर्नल कानपुर में ही पाये गये.लाश के रूप में.फिर खोजबीन हुयी.शाम होते-होते यह पाया गया कि कर्नल को उन्हीं की पत्नी ने अपने एक तथाकथित प्रेमी,व्यापारी सहयोगी की मदद से मार दिया. तरीका अपनाया ये कि रात को अपने पति को चाय में नींद की गोली देकर सुला दिया फिर नायलान की रस्सी से गला घोंट के हमेशा के लिये सुला दिया.चूंकि हम पड़ोसी थे अत: हम उनके बारे में कुछ नहीं जानते थे.पर लोगों से पता लगा वो यह कि दोनों ने प्रेम विवाह किया था.फिलहाल कर्नल-पत्नी जेल में है.सहयोगी समेत.
सच क्या है यह कहना मुश्किल है पर कालोनी की महिलाओं के बयान जो हमारे कान में आये बिना नहीं माने वे हैं:-
-अरे वो बेवकूफ थी.उसको कार में डाल के सड़क पर खड़ा करने कीक्या जरूरत थी?यहीं नहर में फेंक देती पता भी न चलता महीनों.
-नहर में क्यों कहीं ले जाती ट्रेन में.वहीं धक्का दे देती.
-अरे मारना था तो बच्चों के एक्जाम हो जाने देती.साल बरबाद हो गया बेचारी का.
-ये देखो कितना खूबसूरत. पति मार दिया इस नौकर जैसी शकल वाले के लिये.मैं तो कभी ऐसा नहीं कर सकती.
-लव मैरिज में यही होता है.पहले तुमसे हुआ.अब किसी और से ये तो होगा ही.कोई कह रहा था दूसरी शादी थी.बहुत अंतर था उम्र में.
बहरहाल जो आमसहमति बनी है कारण में वह यह कि कर्नल-पत्नी बहुत महत्वाकांक्षिणी थी.पैसा खूब पैदा करना चाहती थी.कुत्ते बेचने का काम शुरु किया.उसी पार्टनर के बहकावे में या कहें सलाह से उसने भर्ती कराने के नाम पर लोगों से पैसे लिये.भर्ती का जुगाड़ बन नहीं पाया तो लोगों ने पैसे वापस मांगे.बात कर्नल को पता लगी.उनके
पास जितने पैसे थे तथा कुछ कर्जा लेकर वापस किये उन्होंने.फिर भी पूरे वापस नहीं हो पाये.रोज-रोज की कहा-सुनी से तंग आकर पत्नी ने कर्नल को मार दिया.शायद इसलिये भी कि कुछ तकादगीर अगले दिन आने वाले थे जिनके बारे में कर्नल को पता न था.बाद में पत्नी रोती पायी गयी-हाय ,हमें बचा लो हमसे भूल हो गयी.
मैं सोचता हूं क्या कारण रहे होंगे कि पत्नी को अपने पति को निपटा देना पड़ा?हमें लगता है कि हम जाने-अनजाने पता नहीं किन चक्करों में पड़कर इस नियति तक पहुंच जाते हैं.प्रलोभन या विचलन एक फिसलपट्टी की तरह होते हैं.जिन पर फिसलना शुरु करने तक ही बाजी आपके हाथ में रहती है.फिसलना शुरु करने के बाद की
नियति फिसलपट्टी की ढलान तथा चिकनाहट तय करती हैं.आपके हाथ में कुछ नहीं रहता सिवाय असहाय फिसलने के तबतक जब तक अंतिम परिणति को प्राप्त नहीं हो जाते.
हमारे सोच को ‘आस्टोपोरोसिस’होता जा रहा है.हम कोई सामाजिक,आर्थिक झटका झेल नहीं पाते.यह बात भारत दैट इज इंडिया के लिये ही नहीं पूरे विश्व पर लागू होती है.आदर्श दरकते जा रहे हैं .हम वीरता पूर्वक समर्पण करते जा रहे हैं.महाजनो येन गतं स: पन्थ:
पत्नी मना करने के बावजूद ,आदतन,चाय बना लायी है.मैं चाय पीना छोड़ देने का विचार छोड़ देता हूं.कोई एतराज तो नहीं है?

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

11 responses to “चाय पीना छोड़ दूं ?”

  1. विजय ठाकुर
    अब मरना ही है तो चाय पीकर मरिये, स्वर्ग के कैंटीन की चाय कुल्हड़ की चाय से क्या टक्कर लेगी भला । हाँ, देखिएगा कहीं ये न हो कि भाभीजी आपका चिट्ठा पढकर कुत्ते बेचने का शौक पाल ले ।
  2. पंकज
    शुक्ला जी, श्लोक भी लिख देते तो मेरे जैसे छद्म पोंगा पंडित जो केवल संस्कृत पढ़ कर बिना मतलब जाने खुश हो जाते हैं ज्यादा प्रसन्न हो जाते।
    पंकज
  3. anunad
    Do you mean a beautiFOOL patnee is a TOY for neighbour ?
  4. पंकज
    शुक्रिया अनूप जी। अभी कल शादी की दूसरी वर्षगाँठ थी। मैंने अपनी रुपवती को कल ही आपके श्लोक को सुनाने का खतरा मोल नहीं लिया अभी तक। आज सुनाता हूँ चाय पानी के बंद होने का खतरा है।
    पंकज
  5. जीतू
    भइये,
    हम तो अभी तक नही समझ सकें कि आपकी चाय के बीच मे कर्नल और उसकी बीबी कहाँ से आ गयी, तनिक खुलासा किया जाय.
    अब तो अतुल के साथ साथ हमे भी कहना पड़ेगा कि बाउन्सर फेंकते हो. भइया, तनिक सीधी साधी भाषा मे बताया जाय, जब तक तुम लिखो, तब तक हमऊ भी चाय पी कर आते है.
  6. आशीष
    बहुत मजेदार कथा कही । कहानी सुन कर एक कटिंग पीने का मन कर गया ।
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    free casino But, again, if Giovanni dislodged roosted involved in a quarrel so serious as to deserue the spade-shaped of sensorium, some

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इतने भी आजाद नहीं हैं हम साथी

मैंने सैकड़ों कवि सम्मेलन सुने होंगे.अक्सर ऐसा होता है कि एकाध कवि ही कविसम्मेलन में जमते हैं.बाकी कवि या तो हूट हो जाते हैं या जनता की उपेक्षा से फूट जाते हैं.दो महीने पहले मैंने कानपुर के लाजपत भवन में एक कवि सम्मेलन में कवितायें सुनी.पूरे समय कवि छाये रहे.शुरु से लेकर अंत तक एक से एक कवितायें सुनने को मिलीं.

इतना शानदार कविसम्मेलन मैंने उसके पहले कभी नहीं सुना था.सोमठाकुर,कन्हैयालालनंदन,रामेन्द्र त्रिपाठी ,गोविन्द व्यास,
,विजय किशोर मानव,सरिता शर्मा,अंसार कंबरी ,प्रमोद तिवारी आदि सब अपने पूरे मूड में अपनी सबसे बेहतरीन रचनायें पढ़ रहे थे.सबकी कविताओं का जिक्र फिर कभी मौके पर.

मंच पर सोमठाकुर जैसे कवि विराजमान थे.सोमठाकुर हिंदी के श्रेष्ठतम सक्रिय गीतकारों में से एक माने जाते है.वे कवि सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे थे.

विनोद श्रीवास्तव युवा गीतकार हैं.उन्होंने दो गीत पढ़े.बहुत जमें.बहुत दिन बाद मैंने इतना अच्छा गीत सुना था इतनी बेहतरीन आवाज में.जब विनोद श्रीवास्तव ने खत्म किया पढ़ना तो हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था.मैंने सैकड़ों कवि सम्मेलन सुने होंगे.अक्सर ऐसा होता है कि एकाध कवि ही कविसम्मेलन में जमते हैं.बाकी कवि या तो हूट हो जाते हैं या जनता की उपेक्षा से फूट जाते हैं. विनोद श्रीवास्तव युवा गीतकार हैं.उन्होंने दो मुक्तक पढ़े:-

1.धर्म छोटे-बड़े नहीं होते ,
जानते तो लड़े नहीं होते.
चोट तो फूल से भी लगती है,
सिर्फ पत्थर कड़े नहीं होते.


2.मैं अगर रूठ भी गया तो क्या,
मैं अगर छूट भी गया तो क्या,
तुमको मिल जायेंगे कई दर्पन,
मैं अगर टूट भी गया तो क्या.


इसके बाद विनोद ने एक गीत पढा:-

जैसे तुम सोच रहे साथी,
वैसे आजाद नहीं हैं हम.


विनोद बहुत जमें.बहुत दिन बाद मैंने इतना अच्छा गीत सुना था इतनी बेहतरीन आवाज में.

जब विनोद श्रीवास्तव ने खत्म किया पढ़ना तो हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था.विनोद श्रीवास्तव श्रोताओं को विनम्रता पूर्वक हाथ जोड़कर बैठने ही वाले थे कि सोमठाकर उठे.विनोद को लगभग अपने से लिपटा लिया ,माइक पर आये .बोले:-

मैं पिछले काफी समय से युवा पीढ़ी से निराश सा हो रहा था.कुछ नया ऐसा देखने में नहीं आ रहा था कि मैं आगे गीत के प्रति आश्वस्त हो सकूं.पर आज इस नौजवान गीतकार को सुनकर मुझे आश्वस्ति हुयी कि हिंदी गीत का भविष्य उज्जवल है.

विनोद श्रीवास्तव कानपुर के ही रहने वाले है . हाल फिर तालियों से गूंजने लगा.

सोमठाकुर आगे बोले -मैं विनोद की कविता से अविभूत हूं.मैं ५२ वर्षों से आपके बीच हूं.वैसे तो कोई साधना नहीं है पर अगर कुछ है तो उसका फल इस नयी पीढी को लगे.मैं एक ही बात कहना चाहता हूं कि साधना करते हुये अपने स्वाभिमान की रक्षा करना और हमारी आबरू रखना यह माला जो आपने मुझे पहनायी उसको उतरन मैं इसके गले में नहीं पहना सकता .पर अपनी यह माला मैं विनोद के चरणों में डालता हूं .उसकी कविता को यह मेरा नमन है.

यह कहकर सोमजी ने अपनी माला विनोद के पैरों में डाल दी.अपनी जगह बैठ गये.विनोद की आंखों में आंसू थे.वे भी सोम ठाकुर के चरण छूकर अपनी जगह बैठ गये.पूरे हाल में पहले सन्नाटा सा छा गया.फिर सभी श्रोता खडे होकर बहुत देर तक तालियां बजाते रहे.

मैंने सालों कवियों के तमाम लटके-झटके देखे हैं.नये कवि पुरानों की चापलूसी करते हैं.पुराने, नयों को आशीष देते हैं.नये-पुराने श्रोताओं से ध्यान,तवज्जो,आशीर्वाद चाहते हैं.पर यह अनुभव मेरे लिये अभूतपूर्व था.मैं भावुक था,अभी भी हूं याद
करके सारा प्रकरण.

सोमठाकुर लटके-झटके वाले कवि नहीं माने जाते.विनोद न उनके शहर के हैं न जाति के.कविता में नये-पुराने का संबंध है केवल.वे बहुत बढ़े माने जाते हैं गीतविधा में विनोद की तुलना में.ऐसे में अगर वे विनोद की कविता को नमन करने के लिये अपनी गले की माला उनके चरणों मे डालते हैं तो उनका कद और ऊंचा होता है.गीत को नयी प्राणवायु मिलती है.हमें नजीर मिलती है -देखो ,काबिल छोटों को सम्मानित करके खुद का कद कितना ऊंचा होता है .पर कितने लोग इन 'चोंचलों' में पड़ते हैं!यह तब और प्रासंगिक है जब समाज के हर क्षेत्र में लोग दूसरों को धकियाकर,टंगड़ी मारकर आगे बढ़ने की आपाधापी में लगे हों.

मैं यहां लिखना बंद कर चुका था.पर आज मन किया कि कुछ लिखूं कानपुर पर.मैं कानपुर के बारे में लिखना चाहता हूं.बहुत कुछ.मेरा मन है कि कानपुर के बारे में यहीं लिखता रहूं.आशा है स्वामीजी मेरी बात का बुरा नहीं मानेंगे-माफ कर देंगे.बाकी सारे लेख मैं वायदे के अनुरूप वहीं स्वामीजी के आश्रम में लिखता रहूंगा.नियमित.बार-बार,लगातार.

मेरी पसंद

जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम.

पिंजरे जैसी इस दुनिया में, पंछी जैसा ही रहना है,
भर पेट मिले दाना-पानी,लेकिन मन ही मन दहना है,
जैसे तुम सोच रहे साथी, वैसे संवाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी, वैसे आजाद नहीं हैं हम.

आगे बढ़नें की कोशिश में ,रिश्ते-नाते सब छूट गये,
तन को जितना गढ़ना चाहा,मन से उतना ही टूट गये,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आबाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम.

पलकों ने लौटाये सपने, आंखे बोली अब मत आना,
आना ही तो सच में आना,आकर फिर लौट नहीं जाना,
जितना तुम सोच रहे साथी,उतना बरबाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम.

आओ भी साथ चलें हम-तुम,मिल-जुल कर ढूंढें राह नई,
संघर्ष भरा पथ है तो क्या, है संग हमारे चाह नई
जैसी तुम सोच रहे साथी,वैसी फरियाद नहीं हैं हम,
जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम.

-विनोद श्रीवास्तव

10 Comments:

  • At 4:42 AM , Blogger eSwami said...
    प्रभु मेरे,

    क्यों ना पूरे इंटरनेट पर बिखेर दो अपने लेख - ८-१० और अकाउन्ट बना डालो २ मिनट तो लगते हैं -एक सलीकेदार बरगद से १०० कुकुरमुत्ते भले - है ना! बुर नही मान रहा - मैं तो बहुत खुश हो रिया हूं - ब्लाग्स की खेती हो री है.

    आप मुझ को ही अब इन नए लेखों मेसे भी चुन कर श्रेणियां बनानी पडेंगी सही से पुरालेखों को जमाने, बनाने के लिए, २ दिन का काम तो है नही! आपका क्या बोल देना - "जो पसंद है चुनते बैठो" - सही कहा है किसी नी - कद्र करने वालों की कोई कद्र नही है भैया!

    इसीलिए बोला था सुपरहिट लेखों को पहले छांट-छाट कर अलग करेंगे प्यार से बाकी की लिंक देंगे या हिट काउण्ट देख कर इन्क्लूड करेंगे - सेपरेट वेब पेज के थ्रू वो तो अब तक शुरु हुआ नही और...! (और ज्यादा खुशी और प्रसन्नता वाले इमोटिकान की घुसेड - :) )

    लगेहाथ - "कानपुर की पाती" लिखी थी नीरज ने .. अगर आपके कलेक्शन में हो तो २-४ कविताएं चुन के डाल दीजिएगा - प्लीज़ वो क्या है, ब्लागमंडल मे "कवियों" का पेलवाद फ़ैला हुआ है आजकल बहुत त्रास है सच्ची - कुछ महुआ पिलाओ प्रभू! *(हा हा! - प्रसन्नचित्त इत्यादी)

    (जैसा की दीख ही रहा है)
    आपका अति आनंदित
    ई-"स्वामी"(?!)

    :-)
  • पेलवान स्वामीजी,
    लिखने के मामले ये ब्लाग मेरा मायका है यहीं से मेरा लिखना शुरु हुआ.इससे मोह हो गया है.अभी स्वामी वैरागी नहीं हो पाया जो सारा मोह-माया त्याग दूं.वैसे भी बरगद फैलने से पहले कुकुरमुत्ता जितना ही होता है.बरगद और कुकुरमुत्ते आकार के अलावा भी फर्क होता है.कुकुरमुत्ते साथ में बढ़ते-फलते-फूलते-मरते-मिटते-खपते-मुरझाते-खाये जाते हैं जबकि बरगद अपने नीचे घास तक नही जमने देता.

    'नीरज की पाती' भी आयेगी जल्द ही तुम्हारे आश्रम में.मेरे सुपरहिट लेख छांटो .मेहनत से मत डरो महाराज.इस बीच हिंदी में जो दूसरे लोगों ने सुपर-डुपर हिट ब्लाग लिखे है उनको मैं छांट रहा हूं ताकि दुबारा जिसे मन में आये पढ़ सके.
  • At 11:11 AM , Blogger Vijay Thakur said...
    मैं तो सोच रहा था कि कवि-सम्मेलनों की परंपरा मर रही है लेकिन अब लगता है कानपुर जैसे औद्योगिक शहर का हृदय निपट देहाती है। पिछली बार गर्मियों में भारत में था तो "सब-टीवी" पर "वाह-वाह" देख-देखकर उबाल खाता रहता था पर फ़िर उसकी कहीं "स्कोलेस्टिक व्याख़्या" सुनी कि आगे आनेवाले समय में ये वाचिक परंपरा टीवी के माध्यम से ही ज़िंदा रहेगा। मैंने कहा वाह गुरु हर चीज़ की क्या सटीक व्याख्या होती है। पर अब शुकुलजी के इस रिपोर्ट से लगता है टीवी-सीवी से बोर होकर लोग लौट लौट उधर ही देखेंगे, श्रोता और कवि आमने सामने।

    कानपुर के बारे में और लेखों और संस्मरणों का इंतज़ार रहेगा।
  • अरे फुरसतिया जी,
    यदि हो सके तो राजेश श्रीवास्तव की रचनाओ को उनकी सहमति से एक एक करके अपने ब्लाग पर छापो, बहुत अच्छा रहेगा.

    1.धर्म छोटे-बड़े नहीं होते ,
    जानते तो लड़े नहीं होते.

    ये वाली तो जरूर ही छाप दो, यदि कोई कविता संग्रह भी हो इनका तो परेशानी नही, बाकी लोग मिलकर टाइप कर देंगे. बाकी राजेश भाई से मिलकर हो सके तो उनको भी ब्लाग लिखने के लिये प्रेरित करो.
  • विजयजी,
    इसी कवि सम्मेलन में कन्हैयालाल नंदन को सम्मानित किया गया.उन्होंने अपने शहर कानपुर के बारे में कहा:-भई ,देखो अपने शहर की तारीफ करना अच्छी बात नहीं होती लेकिन यार, मैं क्या करूं मेरे अन्दर यह टहलता है.मैंने बहुत पहले ये कहीं लिखा है कि यह शहर बिफरता है तो चटकते सूरज की तरह बिफरता है और बिछता है तो गन्धफूल की तरह बिछता है.कविता के बारे में होंगी
    गलतफहमिंया लोगों को लेकिन इस शहर में जिस तरह कविता सुनी जाती है वह सोना है.

    जीतेन्द्रजी,गलती से विनोद की जगह नाम राजेश लिख गया था.जो कवितायें मेरे पास मिलीं उस दिन की वे मैंने लिख दीं.मजा लो.आज मैंने यह गीत पचीस-तीस बार सुना.
  • मुनिवर/पूज्‍यवर/गुरुवर/हृदयवर,
    अभी भी,आप के लेख में,विनोद और राजेश,दोनों ही मंच पर ,एक ही स्‍थान पर विराजमान हैं।एक को ,तो,मंच पर से उतारिये ताकि,रचनाकार का नाम और सम्‍मान सही व्‍यक्ति से ही जुड़े।और,पाठक भी व्‍यर्थ में भ्रमित होने से बचा रहे।
    -राजेश
    (सुमात्रा)
  • At 10:27 AM , Blogger आशीष said...
    शुक्ल जी, मुझे तो हवा ही नहीं लगी कि कब ये कवि सम्मेलन आया और चला गया, भैया आगे से कुछ पता चले तो खबर कर दीजियेगा। अकेले अकेले ही रसास्वादन कर लिये। फुनवा घुमाते हैं आपको आज-कल में।
  • At 6:39 PM , Blogger Atul Arora said...
    अति सुँदर| यह शहर मेरे भीतर टहलता है| यह हर कानपुरवासी महसूस करता है चाहे वह कानपुर में चाहे गैर प्रदेश या फिर विदेश में| शायद यही बात किसी बि दूसरे शहर पर लागू होती है| किसी अपने ने जो ताजिंदगी कानपुर में ही रहे हैं और कभी कभार काम के लिए दो चार दिन को कानपुर से बाहर जाते है पिछले दिनो कुछ यह बयान किया "अतुल भाई, चाहे लखनऊ भी चले जाओ एक दिन को , पर शाम को जब जाजमऊ के पुल से बस गंगा की ओर बड़ती है तो लगता है अब अपने वतन आ गये, क्या सुकून मिलता है|" मैं मन ही मन सोच रहा था वह क्षण जब ईंदिरागाँधी एयरपोर्ट पर उतरते ही धरती को छुआ था और शताब्दी पर बैठे हुए २४ घँटे से ज्यादा जगी आँखे एक एक पल दिमाग को कैद कर लेने को बेताब थी , गाँवो की पँगडंडिया , मालरोड का पुल , सेंट्रल....
  • At 6:20 AM , Blogger Tarun said...
    वाह जनाब वाह आपने तो पुरा ही कवि सम्‍मेलन यहाँ उतार दिया। बड़े अच्‍छे।
  • At 5:40 AM , Anonymous Anonymous said...
    विकिपीडिया हिन्दी में योगदान करना न भूलें

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Tuesday, April 05, 2005

हम आज फजलगंज से घर की तरफ आ रहे थे-सपत्नीक.सामने से से एक सांड आता दिखा.आता क्या -भागता सा.मेरे मुंह से अचानक निकल – स्वामीजी यहां कैसे.पर वह सांड सीधा था,बिना रुके ,उचके भागता चला गया.
यह हायकू (संक्षिप्त) दर्शन हुये आज सांड के.हायकू कविता पढ़ी आज स्वामीजी की.जो हायकू कविता सबसे पहले मैंने सुनी थी वह कहती थी:-
अतीत- यादें ,और यादें, और यादें,
वर्तमान -इरादे,और इरादे और इरादे,
भविष्य -वायदे ,और वायदे ,और वायदे.

पता किया कि हायकू कविता जापानी कविता होती है.छोटी कविता.जिन्होंने बताया था उन्होंने तीन लाइन की कविता को हायकू कविता बताया था.हमें बहुत अफसोस हुआ था उस समय क्योंकि मैं बचपन की अन्य कुटेवों की तर्ज पर उस समय तक कई चार लाइन की तुकबंदियां गढ़ चुका था.मुझे अफसोस हो रहा था पहले पता होता तो चार लाइन की तीन कविताओं के जगह पर चार हायकू होते.मैनें काफी कोशिश की तीनों कविताओं को फुसलाकर चौथी कविता में लाने की.पर लाइनें नहीं मानी.वे कोई निर्दलीय विधायक तो थी नहीं जो सरकार बनाने चली आतीं.
फिर हमने दूसरी बार हायकू कविता सुनी एक दक्षिण भारतीय साथी से.वे सुनाते:-
बकरी चढ़ी पहाड़ पर ,
बकरी चढ़ी पहाड़ पर,
और उतर गई.

तथा
मेढक ने पानी में कूदा,
मेढक ने पानी में कूदा,
छपाक.

कुछ लोगों ने इन कविताओं को हायकू कविता मानने से इन्कार कर दिया यह कहकर कि इनकी पहली और दूसरी लाइन में एक ही शब्द है.पर तय पाया गया कि चूंकि लाइनें अलग-अलग हैं इसलिये इसे हायकू मानने के अलावा कोई चारा नहीं है.
फिर आयी ठेलुहा नरेश की एक छोटी कविता.जब मैंने वह पढ़ी तो हायकू कविता के बारे में सब कुछ भूल गया था.उसे पढ़कर यह भाव आया -हो न हो इसे कहीं देखा है.जानी-पहचानी चीज लगती है.फिर जैसे लोग रामदयाल को दीनानाथ कहकर नमस्ते कर देते है,वैसे मैंने उसे हायकू मान के टिपियाया. नतीजा यह हुआ कि चार लाइन की कविता पचास लाइन के कमेंट को ढो रही है.वैसे विस्वस्त सूत्रों से पता चला है कि इनकी पहली कविता हायकू टाइप ही थी:-
मेरे घर के,
सामने है ये सीढ़ी,
मत पी बीड़ी.

फिर पूर्णिमा जी कीजल की बूंदों में पुरानी सारी कवितायें घुल गयीं.वहीं से पता चला कि हायकू कविता में तीन लाइनों में
कुल 17 अक्षर
होते हैं.पहली में पांच,दूसरी में सात तथा तीसरी में पांच. पहले की सारी कवितायें ‘नान हायकू’ करार करनीं पढ़ीं,जैसे किसी रिकार्डधारी का रिकार्ड स्टेराइड पाजिटिव पाये जाने पर खारिज कर दिया जाये.हमारी चार लाइन की कविताओं पर फिर ऐंठ के बौर आ गये.
पहले जब हम विजय ठाकुर की कवितायें पढ़े तो लगा यह भी कुछ हायकूनुमा है.पर जब देखा कि वे पांच लाइना क्षणिकायें हैं तो हमने सोचा रहन दो.पहले मन किया कि टिप्पणी करें कि पहली लाइन में मतलब साफ होते हुये भी नहीं होता पर फिर आलसिया गये.मटिया दिये
आज जब स्वामीजी की कविता हायकूनुमा पढ़ी तो लगा कि इनकी हालत ठीक है.काहे से कि इनकी अवधूती भाषा बरकरार है.मेरा मन किया कि हायकू कविता पर कमेंट भी हायकू टाइप होने चाहिये.सो प्रयास करता हूं-मां सरस्वती को प्रणाम निवेदित करते हुये:-

दौड़ता हुआ
सांड़, सांड़ ही तो है
नही -दूसरा.

सिद्ध है सिद्ध
देख रहा है गिद्ध
नहीं बेचारा.
कुत्ते हैं भौंके
सांड़ चले मस्त
या गया सिरा ?
सिक्के खोटे
चलेंगे क्या सोंटे?
मरा ससुरा.
पूंछ पकड़ी
उचकेगा वो सांड
अबे ये गिरा..

सांड के पीछे-पीछे भागते-भागते मैं थका तो बैठ गया.बैठा तो लगा अच्छा लगा.लालच आ गया.सोचा कुछ और अच्छा लगे.फिर सोचा कुछ मोहब्बत की बातें की जायें.तो मन की हार्डडिस्क मेंसर्फिंग करके कुछ शेर निकाले :-

मोहब्बत में बुरी नीयत से कुछ भी सोचा नहीं जाता ,
कहा जाता है उसे बेवफा, बेवफा समझा नहीं जाता.(वसीम बरेलवी)
ये जो नफरत है उसे लम्हों में दुनिया जान लेती है,
मोहब्बत का पता लगते , जमाने बीत जाते है.
अगर तू इश्क में बरबाद नहीं हो सकता,
जा तुझे कोई सबक याद नहीं हो सकता. (वाली असी)

बरबादी की जहां बात आयी हम फूट लिये बिना पतली गली खोजे.हमें लगा कहीं फजलगंज में दिखा सांड़ भी न इसी डर से भागा हो कि कहीं कोई उससे प्रेमनिवेदन करके बरवाद न कर दे.निर्द्वंद बरबादी करना अलग बात है पर अपनी बरबादी से सांड भी डरते हैं – **

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

13 responses to “मोहब्बत में बुरी नीयत से कुछ भी सोचा नहीं जाता”

  1. eswami
    गुरुदेव,
    निःश्छल के क्रोध में भी एक सौंदर्य होता है, प्रतिक्रियात्मक आवेश तो होता है पर क्रियात्मक आवेग नहीं होता. मेरे विचार में सांड १०० मेसे ९९ बार सींग दिखाता है पर मारता नहीं, क्रोध आता है और चला जाता है फ़िर क्रोध का आवेश खुद को दिख जाता होगा हंसी आ जाती होगी अपने प्रतिक्रियात्मक आवेश पर!
    हायकू के बारे मे जानकारी देने के लिए आभार!
    साण्ड का ये चित्र कितना सुंदर है!
  2. जीतू
    अरे यार, तुमने तो अपने अच्छे भले स्वामी जी को साँड ही बना दिया,
    मेरा तो बस इतना ही कहना है, साँड को साँड ही रहने दो, कोई नाम ना दो,
    अब तुमने कमेन्ट के लिये डन्डा कर ही दिया है तो मेरा हाइकू मे कमेन्ट भी झेलो.
    तुमने लिखी कविता हाइकू
    सबने झेली ऐसी कविता
    काहे कू
    अब ये हाइकू है कि नही, ये मै नही जानता.
  3. Debashish
    Yaar koi Nirantar ki samsya purti mein ek aadh haiku kyon nahi kihd deta, Swamiji aap bhi haath aajmayein to aur log aayenge maidan mein :)
  4. आशीष
    लगता है स्वामी जी से आपको काफ़ी मोहब्बत है जो आपने उनको घसीट लिया यहां।
  5. हरिराम पन्सारी
    साँड शुद्ध शाकाहारी होता है. शुद्ध शाकाहारी गायों का परमेश्वर होता है. साँड ही असली पौरुषवाला होता है. एकाध को ही साँड छोड़ कर शेष बछड़ों को तो बैल बना दिया जाता है. साँड से न तो बैलगाड़ी चलवाई जा सकती है, न हल में लगा खेत जोता जा सकता है. साँड तो मस्त और स्वतन्त्र होता है. उसे कौन बाँध सकता है? सिर्फ भगवान शिव ही उस पर सवारी कर सकते हैं. वह भी बिना कोई नकेल बाँधे, बिना कोई काठी लगाए. साँड अर्थात् नन्दीश्वर स्वयं चाहें तभी शिव को स्वयं पर सवार होने देते हैं. पार्वती का वाहन सिंह भी साँड के शौर्य-वीर्य से डरा रहता है. जय साँड बाबा की.
    हम भी यदि हर शनिवार को साँड को एक मुट्ठी अरुवा चावल और एक केला खिलाएँ, तो साँड बाबा की कृपा होगी और सही हिन्दी हाइकु लिख पाएँगे. तीन लाइनों वाली अर्थात् तीन पहियोंवाले कॉनकार्ड या जेट विमान से झट उड़कर संसार की सैर कर पाएँगे. नहीं तो बैल की तरह बँधे रहकर हिन्दी की बैलगाड़ी ही खींचते रहेंगे.
    हरिराम
  6. रामु अग्रवाल
    साँड गोवंश रक्षक हैं. यदि साँड नहीं होते तो सम्पूर्ण गोवंश ही लोप हो जाता. मुक्त निर्बन्ध मस्त पुरुषों को भी साँड कहकर पुकारा जाता है. कभी जमाना था कि गायों के पीछे साँड पड़ता था, आजकल तो गायें साँड के पीछे पड़ी रहती दिखाई देती हैं.
    क्या केवल भारत में साँड बन्धनमुक्त रख कर घूमन्तु रखने की परम्परा है. क्या विदेशों में भी साँड इसी तरह परम मुक्त रहते हैं? या उन्हें कहीं बाँध कर रखा जाता है? क्यां भारत के बाहर विदेशी परिवेशों में वहाँ के साँडों से कुछ काम करवाया जाता है?
    कृपया प्रवासी भारतीय बन्धु इस सम्बन्ध में प्रकाश डालें तो बड़ी कृपा होगी.
    रामु
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  10. anitakumar
    आज कल ज्ञानियों को सड़क पर चलते सांड बहुत दिख रहे हैं। सांड की संख्या बढ़ गयी या नजरों का फ़ेर है कि हर तरफ़ सांड ही सांड दिखते हैं कभी सरकारी मुलाजिम के रूप में तो कभी देखने वाले को कवितामयी बना देते हैं। बेचारी गायें…:)
  11. फुरसतिया » आवश्यकता है डिजाइनर सांडों की
    [...] दो साल पहले मैंने सांड़ के बहाने कुछ हायकू लिखे थे। फिर से देखिये- दौड़ता हुआ सांड़, सांड़ ही तो है नही -दूसरा

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