Saturday, May 20, 2006

आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार

http://web.archive.org/web/20120730203158/http://hindini.com/fursatiya/archives/131

आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार

स्वामीजी मुझसे बहुत दिन से कह रहे हैं-आरक्षण पर लेख लिखने के लिये। मैं सोच रहा हूँ क्या लिखूँ! आजकल सारे देश में लगभग हर मँच पर आरक्षण पर बहस हो रही है। लोग अपने-अपने तर्क पेश कर रहे हैं। ब्लागर भाइयों ने भी अपने-अपने ब्लाग पर आरक्षण विरोध का ‘लोगो’ लगा रखा है।
आरक्षण के बारे में जब मैं अपने विचार लिखने का प्रयास कर रहा हूँ तो कोशिश यह है कि मैं किसी तार्किक जुगलबंदी से बचा रहूँ। सच तो यह है कि मैं आरक्षण के पक्ष या विपक्ष में कोई तर्क नहीं पेश करने जा रहा हूँ। मेरी कोशिश है कि जो महसूस करता हूँ वह लिख सकूँ।
जैसा कि पता है कि सरकार द्वारा उच्च शिक्षा में अन्य पिछड़ी जातियों के आरक्षण के विरोध का प्रभावित लोगों द्वारा लोगों विरोध किया जा रहा है। विरोध के कारणों में प्रतिभा की उपेक्षा, गुणवत्ता में गिरावट का डर तथा समाज को पिछड़ेपन के कुयें में ढकेल देने व विकास की गति में नकारात्मक प्रभाव आदि-इत्यादि बताये गये हैं।
यह सच है कि समाज में जब किसी भी वर्ग को मिलने वाली सुविधाओं से वंचित होना पड़ता है या किसी दूसरे वर्ग को ज्यादा सुविधायें मिलतीं हैं तो खलता है। बुरा लगता है। जाति पर आधारित आरक्षण से यह प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। जो जातियाँ प्रभावित होती हैं उनकी सहज प्रतिक्रिया होती है कि पुरखों के पापों का दंड हम क्यों भरें?यह कहां का न्याय है कि हमसे कम सक्षम व्यक्ति सिर्फ इस आधार पर ज्यादा पाये कि अनुसूचित जाति-जनजाति का है या फिर पिछड़ी जाति का है।
जो वर्ग या जाति प्रभावित होता है वह यह महसूस करने की हालत में नहीं होता कि जिस वर्ग या जाति को कुछ सुविधायें दी जा रही हैं वे कितने मजबूर हैं,कितने उपेक्षित हैं ,किस हालत में जी रहे हैं। तुलना करते समय लोग ‘संदर्भ पटल’ फ्रेम आफ रेफेरेन्स अपनी सुविधा के अनुसार चुनते हैं।
जाति तथा वर्ग तो बहुत बड़ी बात है। एक ही परिवार में पले लोग इस शिकायत से बच नहीं पाते कि दूसरे के मुकाबले उनको कम सुविधा ,तरजीह मिली। जिन लोगों ने ‘ब्लैक ‘ पिक्चर देखी है उनको शायद याद हो कि किस तरह मिशेल(रानी मुखर्जी) की बहन अपनी शादी के अवसर पर अपनी अपाहिज बहन के मुकाबले मिली उपेक्षा का जिक्र करती है। तुलना करते समय वह अपनी अपाहिज बहन की असहायता भूल जाती है, उसकी तकलीफें भूल जाती है। उसे सिर्फ यह याद रह पाता है कि उसके घर में सदा उसकी अपाहिज बहन की चर्चा होती रही।
सच तो यह है किसी भी समाज में आरक्षण होना कलंक की बात है। किसी समाज के लिये यह शर्मनाक है कि समाज की हालत ऐसी है कि आगे बढ़ने के लिये समाज के किसी वर्ग को आरक्षण देना पड़े। इस लिहाज से भारत में आरक्षण का होना शर्मनाक है । आरक्षण तुरंत खत्म हो जाना चाहिये।
लेकिन बात इतनी सरल नहीं है। न मेरे चाहने से आरक्षण पर कोई फरक पड़ेगा। लिहाजा,फिलहाल आरक्षण से जुड़े कुछ ‘मिथ’ के बारे में मैं अपने अनुभव बताना चाहूँगा।
पहला भ्रम तो यह है कि आरक्षण से आरक्षित वर्ग अपाहिज ही बना रहता है। आजकल समाज में ‘आरक्षण की बैसाखी’ के सहारे आरक्षित जातियां अनारक्षित जातियों को चुनौती देने लगी हैं। जानकारी के लिये बता दूँ कि सरकारी नौकरियों में आजकल आरक्षित जातियाँ अनारक्षित जातियों के प्रत्याशियों को चुनौती देने लगी हैं।
उदाहरण के लिये यदि किसी विभाग में कुल दस पद खाली हैं जिनमें से मान लीजिये ३ आरक्षित हैं तथा ७ पद अनारक्षित हैं। तो ऐसा संभव है कि जब अंतिम चयन हो तो आरक्षित वर्ग के कुल पाँच प्रत्याशी तथा अनारक्षित वर्ग के पाँच प्रत्याशी चुने जाय । इसका कारण यह है कि आरक्षित वर्ग के दो प्रत्याशी ऐसे रहे जिन्होंने सामान्य वर्ग की मेरिट लिस्ट के सात प्रत्याशियों में स्थान ग्रहण किया। इस तरह तीन की जगह पाँच प्रत्याशी आरक्षित वर्ग के चुने गये। तीन अपने आरक्षण के कारण तथा दो अपनी प्रतिभा के कारण।
उपरोक्त उदाहरण में यह कहा जा सकता है कि यह तो प्रतिभा को हताश करना ,उसका हिस्सा मारना हुआ। इसके तमाम तर्क हो सकते हैं लेकिन इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि आरक्षित वर्ग के कम से कम दो प्रत्याशी ऐसे हैं जो प्रतिभा में सामान्य वर्ग से कम नहीं हैं।
सिविल सेवा २००६ के परीक्षा परिणामों के बारे में जानकारी देते हुये योजना आयोग के सदस्य ने बताया कि इस वर्ष पहले १०० में से २५% प्रत्याशी आरक्षित वर्ग के थे। यह भी बताया कि हर साल आरक्षित तथा अनारक्षित वर्ग के प्रत्याशियों के अंको का अंतर कम होता जा रहा है।
कल मैं एक विद्यालय के वार्षिकोत्सव में गया था । वहाँ प्रतिभावान विद्यार्थियों को पुरुस्कार दिये जा रहे थे। मैं पुकारे जा रहे नामों पर गौर कर रहा था। करीब ४०% बच्चे जिन्होंने प्रथम,द्वितीय,तृतीय स्थान पाये वे अनुसूचित जाति,जनजाति तथा पिछड़े वर्गों से थे।
दिन-प्रतिदिन आरक्षित वर्ग के बच्चे आगे आते जा रहे हैं।यह बात गलत साबित हो रही है कि आरक्षित वर्ग सदा ही गैरप्रतिभावान बना रहेगा।
ऐसा संभव हो पाया आरक्षण के कारण ही। अगर इन बच्चों के माँ-बाप को आरक्षण की बैसाखी न मिली होती तो ये बच्चे सरपट दौड़ने के लिये अपने को तैयार न कर पाते।
तो यह कहना बचकानापन तथा सच से मुंह चुराना होगा कि गधे,गधे ही बने रहेंगे। आरक्षण या प्रशिक्षण से उन्हें घोड़ा नहीं बनाया जा सकता । गुणवत्ता जन्मजात नहीं होती । सुविधा,संरक्षण तथा प्रशिक्षण से गुणवत्ता को निखारा जा सकता है।
आरक्षण के विरोधी तर्क देते हैं कि सरकार आरक्षित वर्ग को सुविधायें दे,स्कालरशिप दे,फीस माफ करे। लेकिन यह क्या कि भर्ती में कोटा कर दिया।काबिल हो जायें तो नौकरी तथा उच्च शिक्षा में आने दे। सरकार का सोचना है कि आरक्षण के द्वारा वंचितों का आत्मविश्वास तथा सामाजिक स्तर ऊँचा किया जा सकता है।
ये दो बातें तैरना सीखने के बाद पानी में उतारने की तथा पानी में उतरेंगे तो सीख ही जायेंगे जैसी हैं।
जिन अनुसूचित ,दलित लोगों ने अपने अनुभव लिखे हैं उनसे पता लगता है कि कितनी विषम परिस्थितियों से गुजरकर इन लोगों ने अपना रास्ता बनाया है। केवल गरीबी ही बाधक नहीं होती। अपने समाज में जो हालत दलितों की रही है उसके चलते एक गरीब दलित को गैरदलित गरीब के मुकाबले बहुत अधिक झेलना पड़ता है आगे बढ़ने के लिये। आप कितने भी प्रतिभावान हों अगर कोई आपकी क्षमता का उपहास उड़ाये तो सारी प्रतिभा कपूर बन जाती है। दयापवार,ओमप्रकाश वाल्मीक,शिवमूर्ति वगैरह की आत्मकथाओं से झलक मिलती है इस बात की कि कितना कठिन सफर है दलितों का । अगर इनको आरक्षण की बैसाखी न मिली होती तो जितना भी विकास हुआ है इनका ,न हुआ होता।
हरिजन उत्पीड़न एक्ट का बहुत दुरुपयोग भी होता है लेकिन यह भी सच है कि अगर इस तरह के कानून न हों तो अभी तक हरिजन गरियाये,जुतियाये,लतियाये जा रहे होते।
कोई भी समाज केवल सदिच्छा से हरिजनों की थाली में रोटी नहीं डालता। अगर कानून न हो तो समर्थ वर्ग उनको पहाड़ा पढ़ाता रहता।
जहाँ तक मुझे जानकारी है कि कुछ सालों तक यह होता रहा कि नौकरियों में चयन के लिये आरक्षित वर्ग के समुचित प्रतिनिधि न पाये जाने की स्थिति में सामान्य वर्ग के लोग लिये जाते रहे। आरक्षित वर्ग के लोग रह जाते रहे। जब इसका विरोध हुआ तो सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि आरक्षित की सीटों पर सामान्य वर्ग के लोगों का चयन नहीं होगा।अगर यह व्यवस्था न होती तो शायद अभी भी समुचित प्रत्याशी न मिलने की बात कहकर सामान्य लोग चयनित किये जाते रहते।
अब इसे चाहे भला कहें या बुरा लेकिन यह सच है कि अगर कोटा न होता तो आज जितने आगे आये हैं आरक्षित वर्ग के लोग उतने आगे नहीं होते।
प्रोफेशनल कालेज में आरक्षण के कारण सामान्य छात्रों का हक मारे जाने का हौवा खड़ा करने वालों की जानकारी के लिये बताना चाहता हूँ कि आज से बीस साल पहले उप्र में केवल आठ इंजीनियरिंग कालेज थे। आज कम से कम अस्सी इंजीनियरिंग कालेज हैं उप्र में। दस गुना कालजे बढ़े हैं। सीटें तो कम से कम बीस गुना बढ़ी होंगी। भारत भर का आंकड़ा लिया जाय तो यह गुना कम से कम पचीस से ज्यादा ही होगा।
जिस सामान्य वर्ग के बच्चे आतंकित हैं आरक्षण से उनके माता-पिता ने भी बच्चे घास-पतवार की तरह नहीं पैदा किये।वे बहुत पहले ही छोटे परिवार का महत्व समझ गये हैं।तो ऐसा कोई पहाड़ नहीं टूट रहा है अगर कुछ सीटें बंट रहीं हैं।जितनी घटिया शिक्षा तुम पाओगे उतनी घटिया वे भी पायेंगे। शिक्षा का स्तर गिर रहा है- हर जगह। जो बच्चे बमुश्किल इंटर की परीक्षा पास कर पाते हैं वे किसी न किसी इंजीनियरिंग कालेज में घुस जाते हैं किसी न किसी तरह से।
आरक्षण के द्वारा गैरप्रतिभावान लोगों के द्वारा जबरदस्ती काबिल लोगों का हक मारने की बात करते समय यह भी सोचना जरूरी है कि अनारक्षित वर्ग के वे बच्चे कितने प्रतिभाशाली हैं जिनकी फौज डोनेशन वाले कालेजों से निकल रही है?
आरक्षण हर देश-काल में किसी न किसी रूप में रहा है। अपने देश में ही प्राइवेट कंपनियाँ सरकार से इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाने की गुजारिश करती हैं। विकसित देश अपने किसानों कोसब्सिडी देते हैं। तमाम तरह से अपने लोगों के हक सुरक्षित रखे जाते हैं। विकसित देशों में भी काले लोगों की सुविधाओं के लिये जरूर कुछ कानून होंगे। वे भी तो जन्म के आधार पर होते हैं।
जिन तमाम लोगों के ब्लाग पर आरक्षण विरोध का लोगो चिपका है वे सरकार की ही मेहरबानी से बेहदकम पैसों में अभियंता/डाक्टर होकर बेहतर जिंदगी जी रहे हैं। यह भी एक किस्म का आरक्षण ही है। प्रतिभा को फलने-फूलने का मौका देने का। सरकार अगर अपनी आबादी के एक बड़े हिस्से को सुरक्षित रखने का प्रयास करती है तो कौन बड़ा अपराध करती है।
कहा जाता है कि आरक्षण जाति के आधार पर नहीं होना चाहिये। दूसरे देशों के हवाले दिये जाते हैं। अब चूंकि यहां जाति है इसलिये जाति ही आधार माना गया। जाति अपने यहां डी.एन.ए. टेस्ट की तरह होती है। कभी पीछा नहीं छोड़ती। आप भले ही न मानो जात-पाँत लेकिन जाति आपसे चिपकी रहेगी। बहुत कम लोग अपने को जाति से अलग कर पाते हैं।
हर जाति का अपनी सभा होती है। ब्राह्मण सभा, कान्यकुब्ज सभा, कायस्थ सभा, ठाकुर सभा ,सिंधी समाज तथा और न जाने क्या-क्या। सब अपने-अपने जाति कुल के लोगों को आगे बढ़ाने की कोशिश करतीं हैं। तो सरकार अगर अपना कल्याणकारी रूप बनाये रखने के लिये अपने देश की आबादी के एक हिस्से के लिये आरक्षण करती है तो क्या बुरा करती है!
यह वास्तव में अपने समाज की बड़ी विडम्बना है कि आजादी के साठ साल बाद भी समाज में सामाजिक,आर्थिक समानता लाने के लिये आरक्षण का सहारा लिया जा रहा है।शायद हमारे नीति-निर्माता सही आकलन नहीं कर पाये होंगे-समाज का। यह भी सही है कि जितने प्रयास होने चाहिये समानता लाने के लिये वे नहीं हो पाये होंगे।
आरक्षण की प्रक्रिया के लागू करने के प्रयास में भी तमाम गड़बड़ियां हुईं। जिस तरह तमाम लुटियाचोर आजादी के समय में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बन गये उसी तरह तमाम संपन्न, विकसित जातियां भी आरक्षित वर्ग में घुस गयीं। राजस्थान की कुछ जातियाँ जो राजकाज में थीं तथा जिनके पास सैंकड़ों बीघे जमीन थी वे पिछवाड़े से जनजाति के चबूतरे पर जा बैठे ।वे दूसरों का हक मार रहे हैं तथा वंचितों का माखौल उड़ा रहे हैं।
पिछड़ी जातियों का भी मामला निराला है। सुनते हैं कि पिछड़ी जातियों का निर्धारण सन् १९३१ की जनगणना के आधार पर हुआ है । एक समाचार(एनएसएस द्वारा कराये एक सर्वे के मुताबिक) के अनुसार देश में पिछड़ों की कुल आबादी की ३६%फीसदी (अगर मुस्लिम ओबीसी को निकाल दें ३२%) है।जबकि प्रस्तावित २७% प्रतिशत आरक्षण का आधार यह है कि पिछड़ों की आबादी कुल आबादी की ५२% है।देश की ३२ फीसदी आबादी के लिये २७% आरक्षण का क्या औचित्य है?
इस पिछड़ी जातियों की आबादी में तमाम संपन्न जातियां शामिल हैं जिनके लिये शिक्षा कभी मुश्किल नहीं रही। न पढ़ाई-लिखाई की उनको कोई जरूरत ही नहीं थी ऐसे ही खाते-पीते मस्त थे। पिछड़ेपन के नाम पर जब तोंदवाले आरक्षण पायेंगे ,चाहें वे मात्रा में कितने ही कम क्यों न हों तो आरक्षण से वंचित वर्ग का खीझना स्वाभाविक है।
वैसे भी किसी वस्तु को पाने वाले के सुख से कई गुना ज्यादा दुख वस्तु से वंचित रह जाने वाले को होता है।
यह सही में बहुत भ्रामक धारणा है कि आरक्षित जाति के लोग काम के मामले में कमतर या कामचोर होते हैं। मेरे साथ तमाम लोग काम करते हैं। कामचोरी,काबिलियत का जाति से कुछ लेना देना नहीं होता। खासतौर से रूटीन के काम में। कई मामलों में तो सामान्य जातियों के लोग असामान्य रूप से काहिली का मुजाहिरा करते हैं।जबकि आरक्षित जाति के लोग अपनी कमजोरी को मेहनत से पाटने का प्रयास करते हैं।
मजे की बात है कि आरक्षित वर्ग में भी ब्राह्मणवादी संस्कार होते हैं। जैसे ही वह आरक्षण की बैसाखी लगाकर ऊपर उठ जाता है फिर वह अपने वर्ग से दूर हटने का प्रयास करता है। अपने को किसी ऊँची जाति के वंशज से जोड़ने का प्रयास करता है। यह स्वाभाविक हीनभावना से ऊबरने का प्रयास होता है।यह बिडम्बना है कि वह उस वर्ग के उत्थान के लिये सार्थक प्रयास नहीं करता है जिससे वह आया है। वह अपनी जाति पर तमाम ऊँची जातियों का मुलम्मा चढ़ाने का प्रयास करता है।
यह कुछ इसी तरह से है जैसे कि हरिजन कल्याण विकास कार्यक्रम के तहत सस्ते मकान लेने के लिये तमाम तथाकथित ऊँची जाति वाले लोग अपनी जाति का टाईटल उखाड़ के फेंक देते हैं।
यह भी विवाद का विषय है कि आरक्षण आखिर कब तक? यह पता नहीं कब थमेगा। लेकिन यह तय है कि कोई भी व्यक्ति चाहे जितना क्रीमी लेयर का क्यों न हो तब तक आरक्षण का फायदा लेना नहीं छोड़ेगा जब तक कि इस पर पाबंदी न लगा दी जाये।
यह विश्वास करना बड़ा मुश्किल होता है उनके लिये कि वे बिना बैसाखी के चल पायेंगे। वैसे भी किसी को भी अपनी प्रतिभा पर इतना भरोसा नहीं होता कि बिना सुरक्षित हुये चलने का जोखिम खुशी-खुशी उठाना चाहे।यहाँ तक की आई.आई.टी. का टापर भी पहले आई.आई.टी. में टाप करता है। फिर एम.बी.ए. करता है। फिर किसी कम्पनी में बिक्री करता है। इस प्रक्रिया में वह उस विषय को भूलता है जिसमें उसने टाप किया होता है।अगर प्रतिभा को अपने पर इतना ही भरोसा होता तो किसी दूसरे की एक सीट न मारकर सीधे एम.बी.ए. की परीक्षा देता। लेकिन फैशन के दौर में गारण्टी की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
अक्सर आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात की जाती है। यह होना चाहिये। लेकिन कौन गरीब है इसकी पहचान बहुत मुश्किल काम है। सरकारी नौकरी में तो तनख्वाह के आधार पर बताया जा सकता है कि कितना गरीब है व्यक्ति लेकिन इसके अलावा गरीबी के बारे में तय करना बहुत मुश्किल है। फिर तमाम लखपति भी अपने को गरीब साबित कर देंगे। जैसा काले धन की पहचान नहीं हो पाती ,गरीबों की पहचान में भी घालमेल होने का खतरा है। कुछ ऐसा ही जैसा कि ‘लैंड सीलिंग एक्ट’ लागू होने पर तमाम जमींदारों ने अपनी हजारों एकड़ जमीन अपने अपने कुत्ते,बिल्लियों तक के नाम करा दी तथा भूदान आन्दोलन में तमाम लोगों ने अपनी बंजर जमीन दान में दे दी। अपना पाया अधिकार छोड़ दे, ऐसा बिरले लोग करते हैं।
यह भी एक विडम्बना ही है कि पिछड़ी जातियों के आरक्षण के बारे में जब भी विचार हुआ,उसमें पिछड़ों को आगे बढ़ाने का विचार कम ,तात्कालिक राजनीति ज्यादा हावी रही।
जैसा कि मैंने कहा कि आरक्षण का मुद्दा ऐसा है कि इसके पक्ष-विपक्ष में बहुत कुछ लिखा जा सकता है। अंतहीन बहस की जा सकती है।
लब्बोलुआबन मेरे विचार निम्नवत हैं:-
१.आरक्षण देश के वंचित लोगों को आगे लाने के लिये जरूरी है। दलित,वंचित लोग अभी भी बहुत पिछ़डे हैं।अभी भी देश में अन्याय,अत्याचार का शिकार दलित ही सबसे ज्यादा हैं। देश में बलात्कार, मारपीट की सबसे ज्यादा घटनायें अनुसूचित जातियों,जनजातियों के साथ ही होती हैं। अनुसूचित जाति-जनजाति की स्कूलों से ‘ड्रापआउट’ दर ९०% से अधिक है। गाँवों में रहने वाले तमाम दलित लोगों को अभी तक उनके लिये मिलने वाली सुविधाओं के बारे में ही नहीं पता।
२. आरक्षण के प्रतिशत पर पुनर्विचार होना चाहिये। जिन लोगों को एक बार आरक्षण का लाभ मिल चुका है उनको पहचानने तथा उनको आरक्षण से बाहर रखने की प्रक्रिया पर विचार तथा अमल होना चाहिये। अगर क्रीमी लेयर वाले लोग आरक्षण के दायरे से बाहर कर दिया जायें तो अनारक्षित वर्ग का आक्रोश बहुत कम हो जायेगा। शहरों में रहने वाले आरक्षित वर्ग के डाक्टर,इंजीनियर,अधिकारी जब अपने बच्चों के लिये आरक्षण का फायदा लेते हैं तो समाज के दूसरे वर्ग की कुंठा सहज है।
३. जो जातियाँ आरक्षण का नाजायज फायदा ले रहीं हैं उनकी पहचान के प्रयास तथा उनको बाहर करने के उपाय होने चाहिये। यह बहुत कठिन काम है। लेकिन जरूरत है इसकी।
४.पिछड़ी जातियों की गणना आज के परिप्रेक्ष्य में होनी चाहिये। जो जातियाँ सम्पन्न हैं उनको इसका फायदा नहीं मिलना चाहिये। यह मुद्दा सबसे ज्यादा संवेदनशील है। हरियाणा,उ.प्र.,बिहार,म.प्र. की जो तमाम जातियाँ पिछड़ी जातियों मे शामिल हैं उनमें से बहुत सी जातियाँ बहुत सम्पन्न तथा प्रभावशाली हैं।इनको आरक्षण देने से समाज में वैमनस्यता तथा भेदभाव बढे़गा।अनारक्षित वर्ग के लिये यह पचा पाना मुश्किल हो जाता है कि हर तरह से उसके बराबर तथा कहीं से ऊँची सामाजिक स्थिति वाला उसका साथी आरक्षण के नाम पर उसके आगे निकल जाता है।
आगे के लिये मुझे लगता है कि जैसी कि अपने देश की परम्परा रही है उससे मुझे नहीं लगता कि कुछ खास फरक पड़ेगा-आरक्षण विरोधयों के हल्ले-गुल्ले से। सरकार ने नौकरियों में आरक्षण कर ही दिया है।शिक्षा में भी कर ही देगी। आज नहीं तो कल,कल नहीं तो परसों। कुछ विरोध होगा लेकिन आरक्षण होकर रहेगा। शायद कुछ आरक्षण आर्थिक स्थिति के आधार पर भी हो जाय।
इससे अनारक्षित वर्ग में आक्रोश होगा। कुछ दिन धरना,आन्दोलन होगा फिर सब शान्त हो जायेगा। ज्यादा दिन कुछ नहीं होगा क्योंकि माँग तथा आपूर्ति के नियम का पालन करते हुये धुँआधार इंजीनियरिंग मेडिकल कालेज खुलते जायेंगे। सीटें बढाने का विकल्प अच्छा है लेकिन वह उस दर्द का इलाज नहीं कर पायेगा जिसमें कोई अनारक्षित बच्चा अपने से कम अंक वाले आरक्षित बच्चे को चयनिते होते देखेगा।
नौकरी के स्तर पर कुछ खास फरक नहीं पड़ेगा। सरकारी नौकरियाँ लगातार कम हो रहीं हैं ।निजी कंपनियों में नौकरी में एक इंजीनियरिंग ग्रेजुएट की कीमत आज कुछ हजार रुपये प्रति माह से लेकर लाखों रुपये प्रतिमाह है। वहाँ प्रतिभा का कोई विकल्प नहीं है। प्राइवेट कंपनियाँ अपना घाटा उठा के आरक्षण नहीं करेंगीं। वे हर सरकारी व्यवस्था की काट खोज के केवल उन्हीं लोगों को चुनेंगी जो उनके काम का हो। कान्ट्रैक्ट पर नौकरियाँ शुरू हो ही गयी हैं।
यह लेख मैंने चार दिन पहले लिखा था। नेट के नखरे के कारण पोस्ट न कर सका। इस बीच आरक्षण समर्थक भी सड़क पर आ गये हैं। विरोधी तथा समर्थकों को पुलिस समान भाव से पीट रही है। बवाल बढ़ता जा रहा है। देश के कर्णधार सोच रहे हैं कि क्या किया जाय।
बहरहाल,हमारे विचार जैसे थे वैसे ही हैं। उनमें कोई बदलाव नहीं आया है ।
मुझे तो जो लगता है मैंने बता दिया अब आगे-आगे देखिये क्या होता है ।
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14 responses to “आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार”

  1. सृजन शिल्पी
    बहुत संतुलित और सहज भाव से आपने यह लेख लिखा है अनूप भाई। बिना उत्तेजित हुए सच बयान कर सकने और विरोधी पक्ष को भी सहमत कर लेने की क्षमता है आपके लेखन में। आप तो जानते ही हैं कि ‘परिचर्चा’ पर जीतू भाई इस विषय पर बहस छेड़े हुए हैं। मेरा खयाल है कि आपका यह लेख सबको आरक्षण के संदर्भ में संतुलित रूप से सोचने के लिए प्रेरित करेगा।
  2. प्रेमलता पांडे
    सामाजिक ज़िम्मेदारी के साथ लेख सधा हुआ है, तथ्यात्मक है। तेज जलते चूल्हे में सीली लकड़ी का कार्य करेगा जिसकी बहुत ज़रुरत है। नौजवान भिड़ने की मुद्रा में हैं जबकि आवश्यकता मिलकर प्रगति करने की है। गतानुगतः लोकः से दूर ले जाएगा। सभी को सोचने को विवश करेगा। धंयवाद।
    प्रेमलता पांडे
  3. anunad
    अनूप भाई, आप जितने विशालहृदय हैं, उतने ही महामना भी हैं | मेरा भी यही विचार है कि आरक्षण का विरोध न किया जाय बल्कि आरक्षण को लागू करने के तरीके में सुधार की माँग की जानी चाहिये | आरक्षण का फायदा यदि सम्पन्न जातियाँ और पिछडी जातियों के सम्पन्न लोग लेते हैं तो यह दोहरा संकट है – इससे अनारक्षितों को तो घाटा होता ही है, असली घाटा असल में पिछडे लोगों को ही होता है; क्योंकि आरक्षण के बावजूद वे बंचित रह जाते हैं |
    इसलिये आरक्षण लागू करते समय “क्रीमी लेयर” और सम्पन्न जातियों को इसके दायरे से बाहर रखा ही हजाना चाहिये |
  4. मनीष
    आरक्षण के विविध पहलुओं पर बेहद संतुलित लहजे में आपने अपने विचार रखे हैं . आपके इस लेख के निचोड़ से मैं पूरी तरह सहमत हूँ । पर एक सवाल मन को परेशान करता रहता है कि क्या कभी हमारी भावी पीढ़ियाँ आरक्षण मुक्त समाज में जन्म ले सकेंगी ?
  5. जीतू
    अनूप भाई के अपने विचार है, कोई जरुरी नही है कि हम एक दूसरे के विचारों से सहमत हों।अनूप भाई ने अपने विचार प्रभावशाली तरीके से रखे है, हो सकता है जीवन से उनके जो साक्षात्कार हुए हो, मेरे ना हुए हों। मेरा अब भी मानना है, आरक्षण सही नही है।जब आप उन्हे शिक्षा मे आरक्षण दे रहे है, नौकरियों मे आरक्षण दे रहे है तो पेन्शन भी शुरु करवा दीजिए, मै तो कहता हो, चमम्च से मूँह मे निवाला देने से तो अच्छा है उन्हे अपनी जीविका चलाने लायक बनाइये, जब तक आरक्षण रहेगा तब तक उन्हे प्रतियोगी नही बनाया जा सकता। हाँ यदि आरक्षण देना ही है तो सबसे आर्थिक स्थिति का आकलन करके आरक्षणं दीजिए, वो भी एक लिमिटेड समय तक।उसके बाद आरक्षण बन्द।लेकिन बदकिस्मती से अपने देश मे ऐसा होता नही है,वोट की क्षुद्र राजनीति की वजह से नेता आरक्षण हटाते नही।
    सरकारी नीतियां कितनी नीचे के लेवल तक पहुँचती है, वो हम सभी जानते है, इस प्रोपोस्ड आरक्षण का भी क्रीमी लेयर ही फायदा उठाएगी, ये पक्का है।
    स्रूजनशिल्पी जी,रहा सवाल परिचर्चा पर चर्चा का, मै स्वस्थ चर्चा मे विश्वास रखता हूँ, जो लोकतन्त्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, यदि उस पर भी आपको शिकायत है तो मै नही मानता है आप लोकतन्त्रीय परम्परा मे विश्वास रखते है।
  6. समीर लाल
    बहुत बढियां, तार्किक जुगलबंदी से बचते हुये अपने अहसासों को बेहद बखूबी व्यक्त किया है, अनूप जी.वाकई,आगे-आगे देखिये क्या होता है. शायद कुछ अच्छा ही हो…
  7. ratna
    मैं जीतू जी के विचारों से सहमत हूँ ।
  8. eswami
    “तो यह कहना बचकानापन तथा सच से मुंह चुराना होगा कि गधे,गधे ही बने रहेंगे। आरक्षण या प्रशिक्षण से उन्हें घोड़ा नहीं बनाया जा सकता । गुणवत्ता जन्मजात नहीं होती । सुविधा,संरक्षण तथा प्रशिक्षण से गुणवत्ता को निखारा जा सकता है।”
    गुरुदेव,
    मेरे अनुरोध पर यह लेख लिखने के लिए आभारी हूं! आपके संतुलित विचार पढ कर बहुत प्रसन्न भी हूं!
    मोटे तौर पे लाजिकल टेबिल बनाने पर आठ तरह के केंडिडेट हैं आपके पास –
    १) सामान्य वर्ग वाला संपन्न गुणी
    २) सामान्य वर्ग वाला असंपन्न गुणी
    ३) सामान्य वर्ग वाला संपन्न कम गुणी
    ४) सामान्य वर्ग वाला असंपन्न कम गुणी
    ५) पिछडे वर्ग वाला संपन्न गुणी
    ६) पिछडे वर्ग वाला असंपन्न गुणी
    ७) पिछडे वर्ग वाला संपन्न कम गुणी
    ८) पिछडे वर्ग वाला असंपन्न कम गुणी
    यदी गुणवत्ता जन्मजात नही होती तो आरक्षण का आधार जातियां तो होना ही नही चाहिए – गुणी चाहे असंपन्न हो चाहे संपन्न हो, वो चाहे सामान्य वर्ग मे हो या पिछडे वाले में – वो अपना स्थान बना लेगा!चाहो तो पिछडे वर्ग के असंपन्न गुणी को छात्रवृत्तीयां दो ना हम विरोध कहां कर रहे हैं?
    अब रही की कम गुणी को मौका देने की बात – तो आरक्षण के आधार पर पिछडा संपन्नवर्ग जो है वो सामान्य वर्ग के असंपन्न गुणी का हक क्यों छीन रहा है?
    बाकी आसान कांबिनेशन आप भी इंजीनियर हो – लगा के देख लो की आरक्षण के तौर तरीके अन्यायपूर्ण हैं और तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति को बढावा देने के लिए ही गढे गए हैं.
    ओवर आल मैं जीतू की बात का समर्थन करता हूं!
  9. रजनीश मंगला
    ये सारी चर्चा बहुत शिक्षाप्रद रही। क्या आरक्षण की चर्चा नक्सलवादियों के संदर्भ में की जा सकती है?
  10. सृजन शिल्पी
    जीतू जी की इस टिप्पणी के संदर्भ में कि
    “सृजनशिल्पी जी, रहा सवाल परिचर्चा पर चर्चा का, मै स्वस्थ चर्चा मे विश्वास रखता हूँ, जो लोकतन्त्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, यदि उस पर भी आपको शिकायत है तो मै नही मानता है आप लोकतन्त्रीय परम्परा मे विश्वास रखते है”
    मेरा उनसे यह स्पष्टीकरण है कि स्वस्थ चर्चा में मेरा भी विश्वास है। मुझे कतई शिकायत नहीं है आरक्षण पर किसी बहस से। इसीलिए मैंने उत्साहपूर्वक परिचर्चा में भाग भी लिया और उठाए गए मुद्दों पर विस्तार से टिप्पणी भी की। ऊपर मैंने सिर्फ उस बहस का जिक्र भर किया था। आप तो नाहक ही नाराज हो गए।
  11. e-shadow
    जीतू भैया को मेरा भी पूरा समर्थन।
  12. अशोक
    सर्वप्रथम मैं श्रीमान् जीतू एवं श्रीमान् ईस्‍वामी को उनके ज्‍वलंत एवं तथ्‍यात्‍मक विचारों को प्रस्‍तुत करने हेतु धन्‍यवाद ज्ञापित करना चाहूँगा। वहीं श्रीमान् अनूप जी भी इस बात से पूर्णतया सहमत हैं कि इस मुद्दे पर पक्ष या विपक्ष में कहने को उनके पास भी बहुत कुछ है। मैं अपने शहर की एक घटना का वर्णन कर रहा हूँ। आज से ग्‍यारह वर्ष पहले एक युवक का आरक्षण के आधार पर (व़ह भी ॠणात्‍मक अंक प्राप्‍त करने पर) शासकीय मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की शिक्षा के लिए चयन हो गया (दुर्भाग्‍यवश)। अब चूँकि उस युवक का बौद्धि‍क‍ स्‍तर किसी चिकिस्‍तक का कंपाउण्‍डर बनने के लायक भी नहीं था, उस युवक ने चार वर्षीय पाठ्यक्रम को पूरा करने में अपनी लगन, मेहनत और सहनशीलता का परिचय देते हुए पूरे दस वर्ष च‍िकित्‍सक बनने के प्रयास में लगाए। यह उसका दुर्भाग्‍य (?) था कि ग्‍यारहवें वर्ष उसे न्‍यायालय की शरण में जाना पड़ा, यह कहते हुए कि उसे जानबूझकर उत्‍तीर्ण नहीं किया जाता है। न्‍यायालय में प्रकरण की जॉंच में यह स्‍पष्‍ट हो गया कि जब छात्र कॉपी में लिखेगा ही नहीं, तो वह उत्‍तीर्ण होने के स्‍वप्‍न कैसे देख सकता है।
    सिर्फ़ एक इसी प्रकरण से अब आप सोचें कि अयोग्‍य जन को आरक्षण सुविधा देना कितना खतरनाक साबित हो सकता है। अगर वह युवक मुन्‍नाभाई की स्‍टाईल में डॉक्‍टर बन जाता तो ? और भी आगे सोचिए, अगर आप बीमार पड़ने की अवस्‍था में ऐसे ही किसी चिकित्‍सक के पास इलाज कराने पहुँचते। बेहतर होता कि उस युवक को प्राथमिक कक्षा से ही नि:शुल्‍क पुस्‍तकें, कपड़े आदि ईमानदारी से मुहैया कराए जाते, तो शायद वह युवक कम से कम कम्‍पाऊन्‍डर तो बनने की प्रवेश परीक्षा में मेरिट में आ सकता था। यही नहीं, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति में में कोई क्रीमीलेयर वर्ग की श्रेणी न होने से किसी कलेक्‍टर, एसडीएम यानि वर्ग एक अधिकारी के पाल्‍य भी आरक्षण सुविधा का लुत्‍फ उठाते हैं। यह तो अन्‍याय है। आप ज्रबरन ही किसी को जम्‍प कराकर किसी संवैधानिक पद पर बिठाऍंगे तो क्‍या वास्‍तविक तरक्‍की मिल पाना संभव है ? बौद्धिक विकास एक सतत् प्रक्रिया का फल है, यदि विकास कराना ही है तो बौद्धिक विकास हो, ऐसा प्रयास करें।
    अंत में यही कहना चाहूँगा, आरक्षण से विकास तो कतई नहीं हो सकता।
    (लेखक स्‍वयं अन्‍य पिछड़ा वर्ग से संबंध रखता है एवं आरक्षण के लाभ से कोसों दूर रहने में ही देशहित को देखता है)
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