Wednesday, May 31, 2006

हम,वे और भीड़

http://web.archive.org/web/20110926115256/http://hindini.com/fursatiya/archives/136

हम,वे और भीड़

हरिशंकर परसाई का लेख ‘आवारा भीड़ के खतरे’ पढ़ने के बाद की ‘भारत भूषण तिवारीजी’ प्रतिक्रिया थी-
अब इसी कडी में ‘हम,वे और भीड’ भी पोस्ट कर दें तो बडी कृपा होगी
हरिशंकर परसाई
हरिशंकर परसाई
मैं तुरंत तो लेख पोस्ट नहीं कर पाया । लेकिन आज मौका मिला तो यह फरमाइश पूरी कर रहा हूँ। हरिशंकर परसाई का लेख- हम,वे और भीड़ किसी साल की शुरुआत में लिखा गया होगा। लेकिन लेख पढ़ने के बाद लगता है कि यह आज भी सार्थक है।

हम,वे और भीड़

जनवरी के नोट्‌स
एक कैलेण्डर और बेकार हो गया। पन्ना-पन्ना मैला हो गया और हर तस्वीर का रंग उड़ गया। हर साल ऐसा होता है। जनवरी में दीवार पर चमकीली तसवीरों का एक कैलेण्डर टंग जाता है और दिसम्बर तक तस्वीर की चमक उड़ जाती है। हर तस्वीर बारह महीनों में बदरंग हो जाती है।
पुराने कैलेण्डर की तस्वीर बच्चे काट लेते हैं और उसे कहीं चिपका देते हैं। हम सोचते हैं ,बच्चों का मन बहलता है, पर यह उनके साथ कितना बड़ा धोखा है। साल-दर-साल हम उनसे कहते हैं ,लो बेटों ,जो साल हमने बिगाड़ दिया,उसे लो। उसकी तस्वीर से मन बहलाओ। बीते हुये की बदरंग मुरझाई तस्वीरें हैं ये। आगत की कोई चमकीली तसवीर हम तुम्हें नहीं दे सकते। हम उसमें खुद धोखा खा चुके हैं और खाते रहेंगे। देने वाले हमें भी तो हर साल के शुरू में रंगीन तसवीर देते हैं कि लो अभागों ,रोओ मत। आगामी साल की यह रंगीन तसवीर है। मगर वह कच्चे रंग की होती है। साल बीतते वह भद्दी हो जाती है। धोखा, जो हमें विरासत में मिला, हम तुम्हें देते हैं। किसी दिन तुम इन बदरंग तसवीरों को हमारे सामने ही फाड़कर फेंक दोगे और हमारे मुँह पर थूकोगे।
नया साल आ गया। पहले मैं १५ अगस्त से नया साल गिनता था। अब वैसा करते डर लगता है। मन में दर्द उठता है कि हाय , इतने साल हो गये फिर भी! जवाब मिलता है कोई जादू थोड़े ही है। पर तरह-तरह के जादू तो हो रहे हैं। यही क्यों नही होता? अफसर के इतने बडे़ मकान बन जाते हैं कि वह राष्ट्रपति को किराये पर देने का हौसला रखता है। किस जादू से गोदाम में रखे गेहूँ का हर दाना सोने का हो गया? इसे बो दिया जायेगा ,तो फिर सोने की फसल कट जायेगी।
अफसर के इतने बडे़ मकान बन जाते हैं कि वह राष्ट्रपति को किराये पर देने का हौसला रखता है।
जनवरी से साल बदलने में दर्द न उठता , न हाय होती और न ‘फिर भी’ का सवाल उठता। आखिरी हफ्ते में कुछ यादें जरूर होती हैं। २३ जनवरी याद दिलाती है कि सुभाष बाबू ने कहा था- ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।’ खून तो हमने दे दिया ,मगर आजादी किन्हें दे दी गयी? फिर भी २४ या २५ तारीख को लाल किले पर सर्वभाषा कवि सम्मेलन होता है जिसमें बडे़-बड़े कवि मेहनत करके घटिया कविता लिखकर लाते हैं और छोटे कवि मेहनत से और घटिया अनुवाद करते हैं। हिन्दी और उर्दू के कवि खास तौर से उचक्कापन और ओवरएक्टिंग करते हैं। यों इन भाषाओं की सारी समकालीन कविता घटिया हीरो की ओवरएक्टिंग है। फिर २६ जनवरी को गणतन्त्र दिवस होता है और हम संविधान की प्रति निकालकर गणतन्त्र के निर्देशक सिद्धान्त और बुनियादी अधिकारो का पाठ करते हैं। इसी वक्त गुरू गोलवरकर की वाणी सुनाई देती है कि यह राष्ट्र तो सिर्फ हिन्दुओं का है-मुसलमान ,पारसी,ईसाई वगैरह विदेशी हैं और खासकर मुसलमान तो देशद्रोही हैं। मगर जो सुरक्षा सम्बन्धी गुप्त बातें पाकिस्तान को देते पकड़े गये,वे शुद्ध ब्राह्मण हैं। यह भी जादू है।
सुभाष बाबू ने कहा था- ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।’ खून तो हमने दे दिया ,मगर आजादी किन्हें दे दी गयी?
फिर ३० जनवरी…।
हमारे बापों से कहा जाता था कि आजादी की घास गुलामी के घी से अच्छी होती है। हम तब बच्चे थे,मगर हमने भी इसे सुना ,समझा और स्वीकारा।
आजाद हो गये,तो हमने कहा-अच्छा अब हम गौरव के साथ घास भी खा लेंगे।
नारा लगाने वालों से यह पूछना भूल गये कि कब तक खायेंगे।
मगर हमने देखा कि कुछ लोग अपनी काली-काली भैंसे आजादी की घास पर छोड़ दी और घास उनके पेट में जाने लगी। तब भैंस वालों ने उन्हें दुह लिया और दूध का घी बनाकर हमारे सामने पीने लगे।
धोखा ही हुआ न! हमें और हमारे बापों को बताया ही नहीं गया था कि आजादी की घास तो होगी ,पर कुछ के पास कभी-कभी भैंसे भी होंगी।
अब हम उनसे कहते हैं-यारों तुम भी आजादी की घास खाओ न!
वे जवाब देते हैं-खा तो रहे हैं। तुम घास सीधे खा लेते हो और हम भैंसों की मारफत खाते हैं। वह अगर घी बन जाती है ,तो हम क्या करें?
और हम अपने बाप को कोसते हैं कि तुमने तभी इस बारे में साफ बातें क्यों नहीं कर लीं।वह काली भैंसों वाली शर्त क्यों मान ली? क्या हक था तुम्हें हमारी तरफ से सौदा करने का?
सोशलिस्ट अर्थशाष्त्री से पूछते हैं तो वह अपनी उलझी हुई दाढ़ी पर हाथ फेरकर कहता है-कम्पल्शंस आफ ए बैकवर्ड इकानामी! पिछड़ी अर्थव्यवस्था की बाध्यताएँ हैं ये।
हैं तो। घर से दुकान तक पहुँचते भाव बढ़ जाते हैं।
देश एक कतार में बदल गया है। चलती-फिरती कतार है-कभी चावल की दूकान पर खड़ी होती है,फिर सरककर शक्कर की दूकान पर चली जाती है। आधी जिन्दगी कतार में खड़े-खड़े बीत रही है।
‘शस्य श्यामला’ भूमि के वासी ‘भारत भाग्य विधाता’ से प्रार्थना करते हैं कि इस साल अमेरिका में गेहूँ खूब पैदा हो और जापान में चावल।
हम ‘मदरलैण्ड’ न कहकर ‘फादरलैण्ड’ कहने लगें तो ठीक होगा। रोटी माँ से माँगी जाती है ,बाप से नहीं। ‘फादरलैण्ड ‘ कहने लगेंगे , तो ये माँगें और शिकायतें नहीं होंगी।
मैं फिर भीड़ के चक्कर में पड़ गया।
मेरा एक मित्र सही कहता है- परसाई,तुम पर भीड़ हावी है। तुम हमेशा भीड़ की बात भीड़ के लिये लिखते हो। देखते नहीं , अच्छे लेखकों की चिंता यह है कि भीड़ के दबाव से कैसे बचा जाये।
छोटा आदमी हमेशा भीड़ से कतराता है। एक तो उसे अपने वैशिष्ट्य के लोप हो जाने का डर रहता है,दूसरे कुचल जाने का। जो छोटा है और अपनी विशिष्टता को हमेशा उजागर रखना चाहता है,उसे सचमुच भीड़ में नहीं घुसना चाहिये। लघुता को बहुत लोग इस गौरव से धारण करते हैं,जैसे छोटे होने के लिये उन्हें बहुत बड़ी तपस्या करनी पड़ी है। उन्हें भीड़ में खो जाने का डर बना रहता है।
छोटा आदमी हमेशा भीड़ से कतराता है। एक तो उसे अपने वैशिष्ट्य के लोप हो जाने का डर रहता है,दूसरे कुचल जाने का।
एक तरकीब है,जिससे छोटा आदमी भी भीड़ में विशिष्ट और सबके ध्यान का केंद्र बन सकता है -उसे बकरे या कुत्ते की बोली बोलने लगना चाहिये। भीड़ का उद्धेश्य जब सस्ता अनाज लेने का हो,वह इसके लिये आगे बढ़ रही हो, उसका ध्येय ,एक मन:स्थिति और एक गति हो -तब यदि छोटा आदमी बकरे की बोली बोल उठे , तो वह एकदम विशिष्ट हो जायेगा और सबका ध्यान खींच लेगा।
लोग मुझसे कहीं होशियार हैं। मेरे बताये बिना भी वे यह तरकीब जानते हैं और भूखों की भीड़ में बकरे की बोली बोल रहे हैं।
बड़ा डर है कि भीड़ हमें यानि स्वतंत्र चिन्तकों और लेखकों को दबोच रही है।
वे नहीं जानते या छिपाते हैं कि भीड़ से अलग करके भी किसी एकान्त में दबोचे जाते हैं। लेखकों की चोरी करने वाले कई गिरोह हैं। वे भीड़ में शिकार को ताड़ते रहते हैं और उसे भीड़ से अलग करके ,अपने साथ किसी अँधेरी कोठरी में ले जाते हैं। वहाँ उसके हाथ-पाँव बाँधकर मुँह में कपड़ा ठूँस देते हैं। तब स्वतंत्र चिंतक सिर्फ ‘घों-घों’ की आवाज निकाल सकता है। गिरोहवाले उस ‘घों-घों’ में सौन्दर्यशाष्त्रीय मूल्य ढ़ूँढ़कर बता देते हैं। उसे तत्व ज्ञान सिद्ध कर देते हैं।
जिसकी अनाज की थैली लेकर दूसरा कोई कतार में खड़ा हो ,वह भीड़ से घृणा कर सकता है। जिसका थैला अपने ही हाथ में हो ,वह क्या करे?
भीड़ से बचने का एक तरीका और है। एक मीनार खड़ी करो। उस पर बैठ जाओ। एक लम्बी रस्सी में खाने का डिब्बा बाँधकर नीचे लटकाओ और ऊपर से रोओ। कोई दया करके डब्बे में दाल -रोटी रख देगा। डिब्बा ऊपर खींचकर रोटी खा लो और ऊपर से भीड़ पर थूको।
जिसकी अनाज की थैली लेकर दूसरा कोई कतार में खड़ा हो ,वह भीड़ से घृणा कर सकता है। जिसका थैला अपने ही हाथ में हो ,वह क्या करे?
लेखक की हालत खस्ता है। वह सोचता है कि मेरा अलग से कुछ हो जाये। सबके साथ होने में विशिष्टता मारी जाती है। दिन-भर पेट भरने के लिये उसके जूते घिसते हैं और शाम को काफी हाउस में बैठकर वह कहता है कि हमें कोई भीड़ से बचाओ।
उधर भीड़ कहती है कि कोई हमें इनसे बचाओ।
राजनीति की बू आती है , इन बातों से । है न!
लेखन को तो मनुष्य से मतलब है,राजनीति वगैरह से क्या?
मगर मनुष्य की नियति तय करने वाली एक राजनीति भी है।
लेखक दम्भ से कहता है,पहली बार हमने जीवन को उसके पूर्ण और यथार्थ रूप में स्वीकारा है।
तूने भाई, किसका जीवन स्वीकारा है? जीवन तो अर्थमंत्री के बदलने से भी प्रभावित हो रहा है और अमरिकी चुनाव से भी।
कल अगर फासिस्ट तानाशाही आ गयी , तो हे स्वतंत्र चिंतक ,हे भीड़ द्वेषी, तेरे स्वतंत्र चिंतन का क्या होगा? फिर तो तेरा गला दबाया जायेगा और तूने अपनी इच्छा से कोई आवाज निकालने की कोशिश की तो गला ही कट जायेगा।
आज तू यह सोंचने में झेंपता है और ऊपर से कहता है- आज हम जीवन से सम्पृक्त हैं।
कल अगर फासिस्ट
तानाशाही आ गयी , तो हे स्वतंत्र चिंतक ,हे भीड़ द्वेषी, तेरे स्वतंत्र चिंतन का क्या होगा?
भीड़ की बात छोड़ें। लेखकों की बात करें।
‘अज्ञेय’ को ‘आँगन से पार द्वार’ पर अकादमी -पुरस्कार मिल गया। पहले क्यों नहीं मिला? उम्र कम थी। आम मत है कि ‘आँगन के पार द्वार’ से पहले के संग्रहों की कवितायें अच्छी हैं।
फिर उन पर क्यों पुरस्कार नहीं मिला? तब उम्र कम थी और अच्छी रचना को पुरस्कृत करने की कोई परम्परा नहीं है।
पं. माखनलाल चतुर्वेदी का सम्मान हुआ और थैली भेंट की गयी। पहले क्यों नहीं हुआ? उम्र उनकी भी कम थी।
जानसन ने लार्ड चैस्टरफील्ड को चिट्ठी में लिखा था कि माई लार्ड , क्या ‘पेट्रन’ वह होता है जो किनारे पर खड़ा-खड़ा आदमी को डूबते देखता रहे और जब वह किसी तरह बचकर बाहर निकल आये, तो वह उसे गले लगा ले।
पुरस्कार और आर्थिक सहायता रचना करने के लिये मिलते हैं या रचना बंद करने के लिये?
मैं देने वालों के पास जाऊँ और कहूँ- सर,मैं लिखना बन्द कर रहा हूँ-इस उपलक्ष्य में आप मुझे क्या देते हैं?
सर पूछेगा- कब से बन्द कर रहे हो?
-अगली पहली तारीख से।
सर कहेगा- तुम कल ही से बन्द कर दो तो मैं कल ही से तुम्हारी मासिक सहायता बाँध देता हूँ। खबरदार,लिखा तो बन्द कर दूँगा।
मैं कहूँगा-ऐसा है तो मैं आज से ही बन्द कर दूँगा। आज से ही तनखा बाँध दीजिये।
एक वृद्ध गरीब लेखक बेचाराइधर शहर में घूम रहा है। उसे दो ‘प्रतिष्ठित’ आदमियों से दरिद्रता के सर्टिफिकेट चाहिये। उसने सहायता के लिये दरख्वास्त दी है। उसमें नत्थी करेगा। तब कलेक्टर जाँच करके सिफारिश करेगा कि हाँ,यह लेखक सचमुच दरिद्र है,दीन है। दीन नहीं है, ऐसे दो बेईमान चन्दा खानेवालों ने इसकी दरिद्रता प्रमाणित की है।
क्या मतलब है इन शब्दों का- स्वतंत्रचेता, द्रष्टा,विशिष्ट,आत्मा के प्रति प्रतिबद्द ,आत्मा का अन्वेषी?
जिसने हमें क्रान्ति सिखायी थी औरजो कहता था कि मेरी आत्मा में हिमालय घुस गया है, उसे मैंने अभी देखा।
जिसने ज्वाला धधकाने की बात की थी उसे भी अभी देखा।
जो सन्त कवियों की ‘स्पिरिट’ को आत्मसात किये है, उसे भी देखा।
कहाँ देखा?
मुख्यमंत्री के आसपास। तीनों में प्रतिस्पर्धा चल रही थी कि कौन किस जेब में घुस जाये। कोट की दो जेबों में दो घुस गये।
तीसरे ने कहा-हाय,अगर मुख्यमंत्री पतलून पहने होते तो , तो मैं उसकी जेब में घुस जाता। तीनों ‘एम्प्लायमेण्ट एक्सचेंज’ से कार्ड बनवाकर जेब में रखे हैं। किसी को कुछ होना है,किसी को कुछ।
कहानी पर बात करना व्यर्थ है। मैं पिछले दो महीने से व्यूह- रचना के सम्पर्क में नहीं हूँ। उसे जाने बिना मूल्यों की बात नहीं हो सकती। दिल्ली जाकर चार तरह के लेखकों से मिलूँगा। वे चार तरह के कौन? काफी हाउस वाले,टी हाउस वाले, शालीमार वाले और फोन पर हेलो वाले।
साहित्य की सबसे बड़ी समस्या इस समय यह है कि डा. नामवार सिंह ने एक लेख में श्रीकान्त वर्मा को ‘कोट’ किया है और तारीफ तथा सहमति के साथ किया है। यह चकित करने वाली बात है।
हम सबके लिये आगामी माह का ‘असाइनमेंट ‘ यही है कि हम इस रहस्य का पता लगायें। तब कुछ पढ़ें -लिखें।
-हरिशंकर परसाई

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

6 responses to “हम,वे और भीड़”

  1. आशीष
    परसाई जी के व्यंग्य हंसाते कम चुभते ज्यादा है|
  2. भारत भूषण तिवारी
    पहली टिप्पणी करके कृतज्ञता व्यक्त कर रहा हूँ.फरमाइश इतनी जल्दी पूरी करने हेतु धन्यवाद.
  3. समीर लाल
    बेहतरीन साहित्य पढवा रहे हैं, अनूप भाई. जारी रखें.बधाई हो.
  4. अनूप भार्गव
    परसाई जी एक ‘राष्ट्रीय निधी’ थे , उन की यह रचना पहुँचानें के लिये धन्यवाद.
  5. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 1.छीरसागर में एक दिन 2.शंकरजी बोले- तथास्तु 3.धूमिल की कवितायें 4.थेथरई मलाई तथा धूमिल की कविता 5.आरक्षण-कुछ बेतरतीब विचार 6.आवारा भीड़ के खतरे 7.अति सर्वत्र वर्जयेत्‌ 8.एक पोस्ट हवाई अड्डे से 9.अथ पूना ब्लागर भेंटवार्ता कथा… 10.हम,वे और भीड़ [...]
  6. चंदन कुमार मिश्र
    ‘डा. नामवार सिंह ने एक लेख में श्रीकान्त वर्मा को ‘कोट’ किया है और तारीफ तथा सहमति के साथ किया है। यह चकित करने वाली बात है।’—वाह जी। अजीब सवाला उठाया इन्होंने। अब होये और यह बात कहते तो बालीवुडी-मीडिया पीछे पड़ के कई धाँसू एपिसोड दिखा चुका होता…हमेशा की तरह बेहतर…

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