Thursday, July 27, 2006

सीढियों के पास वाला कमरा

http://web.archive.org/web/20140419051159/http://hindini.com/fursatiya/archives/181

सीढियों के पास वाला कमरा

[हमने बताया था कि हिंदी की प्रख्यात साहित्यिक पत्रिका वागर्थ के अगस्त ,२००६ अंक में हमारे ब्लागजगत की जानी-पहचानी लेखिका तथा निरंतर की संपादक मंडली की सदस्या प्रत्यक्षा की कहानी छपी है। कुछ लोगों ने इसे पढ़ना चाहा है। वैसे कहने को तो वागर्थ कहने को तो आनलाइन पत्रिका है लेकिन महीनों से पुराना अंक लगा है वहाँ। बहरहाल यहाँ पेश है प्रत्यक्षा जी कहानी-सीढियों के पास वाला कमरा। जानकारी के लिये बता दें कि कहानी में एक जगह अमलताश के फूल लाल बताये गये हैं जिसे वागर्थ वालों ने लाल ही रहने दिया है। यह नमूना है इस बात का कि प्रूफ की गलतियाँकरने का अधिकार सबको है।]
प्रत्यक्षा
प्रत्यक्षा
पीछे से तो बकुल दी ही लगीं . मिती हैरान. इतने सालों बाद , ऐसे ही अचानक . गाडी एकदम उनके बगल में रोकी .
” बकुल दी ”
आवाज़ मे उत्साह छलका पड रहा था . वो अचकचा कर मुडी थीं .
“अरे”
अचानक से जैसे पहचान नहीं पाईं हों . मिती गाडी से उतर गई थी .
“आईये न , बैठ कर बातें करते हैं “, बकुलदी के चेहरे पर असमंजस का भाव तैर गया . फ़िर उसने ही बाँह पकड कर , दूसरी तरफ़ का दरवाज़ा खोल कर उन्हें बैठा दिया . हँसते हुये कहा ,
“क्या अभी भी नहीं पहचाना . मैं मिती ” .
“तू कितनी बडी हो गई है मिती ” बकुल दी उसका हाथ पकड कर हँस दीं .
“लेकिन आप बिलकुल नहीं बदलीं ”
प्रत्यक्षा: २६ अक्टूबर,गया(बिहार)। स्कूली और कालेज की शिक्षा रांची और पटना में। संप्रति-पावरग्रिड कार्पोरेशन,मुख्य प्रबंधक वित्त के रूप में कार्यरत।संपर्क:फ्लैट नं.बी-१/ ४०२,पी.डब्ल्यू. ओ.हाउसिंग काम्प्लेक्स,प्लाट नं.जी.एच.१ए,सेक्टर-४३ ,गुड़गाँव(हरियाणा)
पर ऐसा कहाँ था . बदल तो गई थीं बकुल दी . सस्ती ताँत की साडी ,कलफ़ की हुई. बैगनी रंग का मेल खाता एकदम खराब फ़िटिंग का ब्लाउज़ . पतली कलाईयाँ , उभरी नसें , मोटा लाह का कँगन उनके पतली कलाईयों पर एकदम बेमेल लग रहा था . बाल खींचकर छोटा जूडा बनाया हुआ. गुलाबी लिपस्टिक होंठों के बाहर बह आया था . गोद में भूरे रंग का सस्ता पर्स .एक ही निगाह मे मिती ने सब देख लिया .
“चलिये बकुल दी , आपको घर छोड दूँ . रास्ते में बात भी हो जायेगी “. मिती ने गाडी स्टार्ट करते हुये कहा .
“तू कहाँ है मिती , आजकल “? बकुल दी ने आग्रह किया .
“बस, अ?भी कुछ दिन पहले ही आई हूँ . बैंक में हूँ. शादी हो गई है .
अब आप अपनी बताईये ” एक साँस में मिती कह गई .
बकुल दी चुप .
“बस ,हम तो यहीं हैं ” एक हल्की सी उसाँस लेकर धीरे से उन्होंने कहा .
हाँ , बकुल दी तो यहीं हैं . मिती को याद आ गया . कितने साल बीत गये . उँगलियों पर गिने बिना बताना एकदम सही ,मुश्किल .
उसे याद है जब पापा का तबादला इस शहर में हुआ था. पापा पहले आकर घर तय कर गये थे.
“घर तुमलोग को पसंद आयेगा ”
और घर सचमुच सबको पसंद आया था. खूब बडे बडे कमरे, ऊँची छतें , सामने खूब चौडा बरामदा , बडा सा अहाता, लॊन . गेट के पास दो अमलतास के पेड, जिनके नीचे गर्मियों में ढेर सारे लाल पीले फ़ूल गिरते रह्ते ,फ़िर धीरे धीरे सूख जाते.
पीछे की ओर आँगन और आँगन में अमरूद का पेड . जाली से घिरा पीछे का बरामदा इसी आँगन में खुलता था. आँगन के दूर वाले सिरे पर चार कमरे एक लगातार में ,रेल के डब्बों से. दो परिवार थे ,चपरासियों के जो मकान मालिक सान्याल साहब के दफ़्तर में काम करते थे .
शायद अमलतास के पेडों की वजह से घर का नाम भी अमलतास पडा था . मिती को अच्छी तरह याद है गर्मियों के दिन थे ,जब वे लोग इस मकान में आये थे. ऊपर वाले तल्ले पर सान्याल साहब का परिवार था. खुद सान्याल साहब वकील थे . उनकी पत्नी , दुबली पतली, खूब गोरी, एकदम पीली सी . बाल एकदम चट काले. एक बेटा था खोकोन, शायद मिती के ही उम्र का. बेहद शर्मीला. बकुल दी ,सान्याल साहब की बेटी थीं. शादी शुदा, ससुराल में. पर तब बकुल दी से कहाँ परिचय था. परिचय तो तब दीदी से भी नहीं था . दीदी सान्याल साहब की विधवा बडी बहन थीं. सब उन्हें दीदी ही कहते थे.
दीदी से पहला परिचय भी मिती का ही हुआ था.मकान में शिफ़्ट करने के एक दो दिन बाद दीदी बाहर वाले बरामदे के सीढियों पर बैठी मिली थीं . मटमैली सी साडी , बदरंग ब्लाउज़ ,खिचडी बाल कंधे तक , उजाड फ़हराये हुये . निर्विकार चेहरे पर झुर्रियों का जाल . बाद में पता चला था सान्याल साहब से उनका रिश्ता .
शुरु के कुछ दिन तो उनको नये घर में व्यवस्थित होने में लगे .पापा का दफ़्तर शुरु हो गया था . घर में माँ थीं , सरू दी थीं और मिती थी .गर्मी की छुट्टियाँ थीं .स्कूल में एडमिशन छुट्टियों के बाद होता . मिती के मज़े थे . मज़े तो सरू दी के भी थे . इन्टर की परीक्षा देकर आईं थीं इसलिये अभी तो छुट्टी ही थी . अगल बगल की सारी खबरें घर में पहले मिती ही लाती . पीछे आउटहाउस था जिसमें मंडल नामका चपरासी अपने बेटे के साथ एक कमरे में रहता.दो कमरे दूसरे परिवार को मिले हुये थे . बाप सान्याल साहब के दफ़्तर में था . बेटा किसी प्राइवेट दफ़्तर में. घर में सास थी , बहु थी और दो बच्चे . चौथा कमरा ताला लगा हुआ था .
मिती ने ही एकाध बार खोज करते दरारों से झाँक कर जरा मायूस होते रिपोर्ट दी कि कुछ खास नहीं सिर्फ़ सामान भरा पडा है, शायद सब कबाड .
पीछे जो बूढी थी वो काफ़ी दबंग किस्म की सास थी . खूब लंबी चौडी , साफ़ खुलता रंग ,पर चेचक के निशान से भरा . खूब बडा टीका लगाती , माँग में लहलह सिंदूर. पैरों में बिछिया आलता. बडे रंगीन छापे वाली साडी पहनती . बहू बेचारी एक हाथ के घूँघट में छिपी , सास से त्रस्त रहती . साडी में लिपटी जो ज़रा सा दिखता वो खूब गोरा. लंबी छरहरी . मिती को लगता कि वो बहुत सुंदर होगी.
बहु का रूपरंग भी चर्चा का विषय रहता . सरू दी का कहना था कि बस भरपेट गोरी ही है. जरूर शक्ल अच्छी नहीं तभी छुपाये रखती है . बेचारी सरू दी जो खुद साँवली थीं , उन्हें गोरे रंग का बडा काम्प्लेक्स था .
बहु के रूप का अन्वेषण भी मिती ने ही किया . चूल्हे की आग पर बैंगन भरता पकाने के लिये मिती उनके घर से घिरे बरामदे के कोने में, जहाँ उनकी रसोई पकती , गई थी .
“इसे ज़रा आग पर पका दीजिये . माँ ने कहा है ”
बहु ने खट से पहले चेहरे को आँचल से ढका था फ़िर अपनी कढाई उतार कर बैंगन पकाने लगी थी .मिती ने ही बाद में सरू दी को हँसते हुये बताया था ,
“तुम ठीक कहती थी दी , बस गोरी है . आँख नाक भी तीखे , नुकीले . बस ज़रा सा दाँत ही तो ” उसने आँख मटकायी थी बडी बूढियों की तरह .
दीदी के बारे में , उन्हें बूढी सास ने बताया था . कभी कभी बरामदे की सीढी पर आ बैठ जातीं . दीदी ब्याही थीं किसी बहुत बडे खानदानी परिवार में . खूब सुखी जीवन था . एक बेटी थी . एक बार रात कहीं से लौटते , किसी भिखारी के शव पर पैर पड गया था . बस शायद तभी से दिमाग गडबडा गया था . पति बाद में नहीं रहे . बेटी का अपना घर संसार है . पगली बहन की देखभाल ,सान्याल साहब ही कर रहे हैं .
मिती आँखें फ़ाडे, हैरान कहानियों की तरह किस्से सुनती . माँ कभी कभी बहुत गुस्सा होतीं
“तुम इन चीज़ों में क्यों पडती हो . छोटी हो. जाओ, अपने कमरे में पढाई करो ” पर मिती को इन किस्से कहानियों में बहुत मज़ा आता .
सान्याल साहब और उनकी पत्नी अपनी दुनिया में मगन रहते . कभी कभार ही नीचे दिखते . दीदी ही थीं जो सुबह , दोपहर , शाम सामने के बरामदे पर बैठी रहतीं . उनका कमरा नीचे ही था, सीढियों के बगल में. मिती देख आई थी . एक पलंग , एक टूटा सा बक्सा , टेबल पर कुछ बरतन वगैरह . तीनों समय ऊपर से दीदी का खाना नीचे आ जाता . इसके अलावा ऊपर और दीदी की दुनिया में कोई और संपर्क का तार नहीं था . बी?च बीच में कभी उनको दौरा पडता तब एकदम वायलैंट हो जातीं .सूई देकर उन्हें सुलाया जाता . डाक्टर आता . बाकी समय एकदम चुपचाप बाहर बैठी रहतीं .
मिती उनके पास बैठती कभी कभार . अपनी टूटी फ़ूटी बांगला मिश्रित हिंदी में दीदी उससे बात करती. कुछ पूछने पर ज़रा सा मुस्कुरा कर सिर्फ़ हैं गो, कहतीं . कभी मूड में रहतीं तो अपने ससुराल के वैभव के किस्से सुनाती . पर ऐसा कभी कभी ही होता .
मिती बैठकर बहुत सोचती . दीदी पर उसे बहुत दया आती और सान्याल परिवार पर गुस्सा . अगर वो लोग इनको साथ रखें तो शायद वे ठीक हो जाएं . उसका किशोर मन द्वंद मचाता .
कभी श्रीमति सान्याल ने ही माँ के सामने दुखडा रोया था .
“हमारे माथे पड गईं . बेटी को ज़रा भी ख्याल नहीं इनका . अडोस पडोस में जाकर चाय खाना माँगती रहती हैं , जैसे हम देते नहीं . जीवन भर निभाना पडे तब लोगों को पता चले ”
उनका स्वर कडवा हो गया था . कभी-कभी दीदी उनका दरवाज़ा भी समय-कुसमय खटखटा देतीं,
“सुबह से कुछ खाया नहीं . एक कप चाय देगा “? वो कातर स्वर में विनती करती . सान्याल साहब आकर पकड कर ले जाते.
” माफ़ करिये, आपको तकलीफ़ हुई . अभी खाना खाया है .इन्हें याद नहीं रहता “.
छुट्टियाँ खत्म हो गई थीं . मिती स्कूल जाने लगी थी . सरू दी ने भी बी. ए . में नाम लिखा कर कालेज जाना शुरु कर दिया था. माँ ने बोरियत से बचने के लिये पास में ही एक स्कूल ज्वाइन कर लिया था बतौर हेडमिस्ट्रेस . किसी के पास अब दीदी से बात करने या पीछे की सास बहु के बारे में चर्चा करने का समय नहीं था . जीवन एक निश्चित गति से चल रहा था .
इसी बीच एक रात , लगभग तीन चार बजे अल्ल सुबह को खूब आवाज़ें , बहुत शोर . पापा उठ कर गये थे देखने . मिती डर कर माँ के पास आ गई थी . पापा लौट आये थे
“सो जाओ , कुछ खास नहीं ”
बाहर शोर थम गया था . माँ से सट कर मिती फ़िर सो गई थी . अगले दिन पापा माँ की बातचीत से पता चला कि सान्याल साहब की शादी शुदा बेटी को उसके ससुराल वाले मायके पटक गये थे .
ऊपर एक दम सन्नाटा था . हफ़्ते दस दिन तक एक पत्ता भी नहीं खडका . आमतौर पर खोकोन दोपहर में , स्कूल से लौट कर रौलर स्केट्स चलाता , जिससे नीचे एक अजब से खरड -खरड की आवाज़ होती . बडा नागावार लगता पर मकान उनका था, कुछ कहा भी नहीं जा सकता था . इधर वो आवाज़ भी बंद थी .
फ़िर एक दिन बकुल दी ही नीचे आईं थीं , फ़ोन करने . उनका फ़ोन खराब था . मिती को बकुल दी बहुत प्यारी लगी थीं . चेहरे पर पानी था . खूब बडी बडी तरल आँखें. छोटी सी , दुबली पतली थीं . एकदम बच्ची सी लगतीं . दिन महीने बीत रहे थे . बकुल दी कभी कभी नीचे आ जातीं . बातें करतीं पर अपने पति या ससुराल का कोई ज़िक्र नहीं करतीं .
फ़िर आया था , तलाक का कागज़ . उस दिन नीचे ही बैठी थीं .लिफ़ाफ़ा खोलते ही उनका चेहरा सफ़ेद पड गया था . मिती एकदम घबडा गई थी . सरू दी ने पानी लाने भेजा था . पानी का ग्लास लेकर लौटी तो बकुल दी को सरू दी के कँधे पर सर रख कर फ़फ़क ,फ़फ़क कर रोते देखा था , मिती ने . टूटे अस्फ़ुट स्वर थे . चरित्रहीनता का लाँछन था , बाँझ होने का भी दोष लगाया था उन्होंने .
“ईश्वर गवाह है , लोगों ने तो सीता को भी नहीं बख्शा था ”
उनकी आवाज़ अंदर से टूट कर आ रही थी . इतने दिनों तक ऊपर से शांत स्थिर बनी रही थीं . पर अंदर, दुख का लावा फ़ट रहा था .
मिती बहुत कुछ नहीं समझ पाई थी पर ये जरूर समझा था कि कहीं बहुत गलत हुआ है बकुल दी के साथ . पर उस दिन के बाद फ़िर कभी ,मिती ने बकुल दी को उदास या दुखी नहीं देखा . वो गाहे बगाहे नीचे आतीं सरू दी से गप करने , मिती से किताबें माँग कर पढने . मिती भी जब तब बकुल दी का सहारा लेकर ऊपर चली जाती , ” बकुल दी , आज कुछ अच्छी सी किताब दीजिये ” . और बकुल दी भी खोज खोज कर कभी अगाथा क्रिस्टी , कभी वुड हाउस , कभी विक्टोरिया होल्ट ,निकाल? कर उसे देतीं .
उसी घर से? सरू दी की शादी हुई . घर में अब सिर्फ़ तीन प्राणी रह गये थे . मिती सरू दी को बेतरह मिस करती . इसी बीच पापा का तबादला हो गया . शहर छूटने का जितना दुख था उससे ज्यादा बकुल दी छूट जायेंगी , इसका मलाल था . सरू दी की शादी के बाद बकुल दी ही मिती की राजदार थीं .
शहर छूटा और बकुल दी भी छूट गईं .
आज इतने सालों बाद मिती यहीं , इसी शहर आ? जायेगी तब कहाँ सोचा था . यहाँ ज्वायन किये महीना भर ही तो हुआ है . बीरेन का तबादला भी लगभग थ्रू ही है . तब तक? अकेले रहना है .
” बकुल दी आप? अब भी उसी मकान में हैं ?”
“हाँ , खोकोन की शादी हो गई? , नौकरी हो गई . बाबा , माँ नहीं रहे . दीदी भी “.
उनकी अवाज़ में अजीब सी उदासी थी .
“स्कूल में पढाती हूँ . अपने लिये खर्च निकल जाता है . अब जीवन में और रखा क्या है ” हल्की उसाँस लेकर उन्होंने कहा .
“बस मिती यहीं उतार दे मुझे . आगे रोड बन रहा है . गाडी शायद नहीं जा पायेगी ”
उसका हाथ अपने हाथ में लेकर हल्का सा दबा दिया .
” आना जरूर ”
बकुल दी उतर गईं थी . उसके माथे को सहलाया, हँसी और फ़िर तेज़ी से मुड कर बढ गईं . दो कदम चलकर फ़िर लौटीं .
“मिती , आना तो नीचे ही आना . दीदी वाला कमरा अब मेरा है “.
मिती उन्हें तब तक? देखती रही जबतक कि अगली मोड से मुडकर वो ओझल नहीं हो गई. अनायास अमलतास के सूखे नीचे गिरे फ़ूलों की याद मिती के मन को दहका गई.
प्रत्यक्षा

10 responses to “सीढियों के पास वाला कमरा”

  1. जगदीश भटिया
    बहुत ही अच्छी कहानी है प्रत्यक्षा जी की।
    धन्यवाद अनुप जी इस तरह की सामग्री देने के लिये।
  2. समीर लाल
    पुन: अनूप भाई, आपको यह कहानी यहां पेश करने के लिये धन्यवाद और प्रत्यक्षा जी को बेहतरीन कहानी के लिये बधाई.
  3. सागर चन्द नाहर
    ये फ़ुरसतिया जी का टाईप किया हुआ नहीं हो सकता! प्रूफ़ में इतनी सारी गल्तियाँ की कहानी पढ़ने का मन ही नहीं हुआ। पढ़ी भी नहीं
  4. प्रेमलता पांडे
    अच्छी कहानी है।
  5. फ़ुरसतिया » प्रत्यक्षा- जन्मदिन के बहाने बातचीत
    [...] हिंदी ब्लाग जगत में प्रत्यक्षा के बारे में कुछ बताना तो सूरज को दिया दिखाना है या फिर ऐसा कहें कि पूरे पढ़े लेख के नीचे उसका लिंक देना है। वे कवियत्री है, कथाकार है, चित्रकार हैं, मूर्तिकार हैं, धुरंधर पाठिका हैं, संगीतप्रेमी हैं और चिट्ठाकार तो खैर हैं हीं। उनकी रुचियों और क्षमताऒं की सूची बड़ी लंबी है। वो तो कहो उनके ऊपर आलस्य का ठिठौना लगा है वर्ना मानव सभ्यता के सबसे काबिल लोगों में उनका नाम शामिल करने की मुहिम शुरू हो गयी होती। प्रत्यक्षा की कहानियां-कवितायें, लेख नेट पर तो अर्से से उपलब्ध हैं लेकिन अब पिछले माह से वे प्रिंट मीडिया की भी धाकड़ लेखिका बनने की राह पर चल डगरी हैं। संपादकगण उनसे कहानी मांगकर छाप रहे हैं यह सब प्रत्यक्षा को नया-नया और खुशनुमा लग रहा है आजकल। [...]
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  8. Alok Prakash
    प्रत्यक्षा जी को पिछले २२ वर्षों से जानता हूँ परन्तु उनको एक लेखिका के रूप में आज ही जाना . कार्यालय में हिंदी पुस्तकों की खरीद के लिए हम एक साथ गए तब भी केवल एक समझदार पाठक के रूप में ही पहचान बनी थी परन्तु वह कब एक परिपक्व लेखिका में परिवर्तित हो गयीं पता ही नहीं चला.
    आलोक प्रकाश
    मुख्य प्रबंधक पावरग्रिड
    नई दिल्ली
  9. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] देकर हड्डियों में समा जाता है. 21. सीढियों के पास वाला कमरा 22. परदे के पीछे-कौन है बे? 23. मरना कोई [...]

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