Thursday, July 06, 2006

थोड़ा कहा बहुत समझना

http://web.archive.org/web/20110925221441/http://hindini.com/fursatiya/archives/155

थोड़ा कहा बहुत समझना

लो कल्लो बात!
इधर हम अपने जीतेंदर को कपड़े की तरह फींच कर साफ सुथरा करके सबके सामने रखें और उधर से अतुल बोलें -भइये मज़ा नहीं आया।
इधर प्रत्यक्षा कहें कि


मुलाकात के बावजूद खिंचाई ,निहायत नाइंसाफी है।

उधर से रोजनामचा के पिताजी कहें भइये कुछ और होना चाहिये। इधर अतुल के ताजे-ताजे दुबारा मिले साथी राजीव टंडन कहते हैं :-


हास्य के सम्पुट, कनपुरिया लहज़ा और आपके द्वारा दी हुई चुनिन्दा उपमाओं ने इस वृतांत को रोचक बना दिया ।

दूसरी तरफ उन्हीं के कनपुरिया साथी तेज सड़क पर गाड़ी दौड़ाते हुये लिखते हैं:-


जिस अनौपचारिकता यानि कि ठलुहई के दर्शन मुझे अस्सी के दशक मे होते थे कानपुर मे, वह आज के कानपुर और इस लेख दोनो से नदारद दिख रहे हैं

अउर तो अउर नई चिट्ठाकार निधि ,जिनके बिंदास लेखन के हम फैन से हो गये हैं तथा आशा है कि वे रोचक आपबीती के बाद नियमित रूप से जगबीती भी लिखती रहेंगी, भी लिखती हैं:-


बहुत खूब अनूप जी । बडा़ ही मज़ेदार लिखा है । आपका ये ‘हें हें हें’ लेखन अतुलनीय है ।

उसी अतुलनीय लेखन पर डंडी मारते हुये हमारे अतुल कहते है:-


मेरा यह मानने को दिल नही करता कि आप दोनो के मध्य कुछ भी हास्यपरक, चुटकियों और विनोदवार्ता का आदानप्रदान नही हुआ।

हमें यह समझ में नहीं आ रहा है कि किसे सच मानूँ? इसे या उसे? अब चूंकि अतुल हमसे पहले से लिख रहे हैं ,हमारे ब्लाग सीनियर हैं,और उन्होंने हमारे हर लेख को पढ़ा है उन्होंने लिहाजा उनकी बात मजबूरी में ,न चाहते हुये भी, माननी पड़ रही है। मानने में मजबूरी का कारण यह है कि जानने वाले जानते हैं कि ये हमारे अतुल सागर चंद नाहर से कम पसडू़ नहीं हैं। ब्लाग जगत में सबसे ज्यादा पंगे लेने के कीर्तिमान का अगर कोई हिसाब-किताब लगाया जाय तो वो इन्हीं के पल्ले जायेगा। और यह अंदर की बात बता दें कि जिससे इनका पंगा हो गया समझो उसकी लाटरी लग गयी। जिससे भिड़ेंगे कुछ दिन बाद सबसे ज्यादा उसी से लड़ियायेंगे।
तो तमाम लोगों के पेट में पड़े बल के मुकाबले अतुल की मजा नहीं आया टिप्पणी की सफाई सबसे ज्यादा जरूरी है। तो जनाब ,यहां पेश है अतुल की ये दिल मांगे मोर टिप्पणी के बारे में सफाई:-
जैसा कि हमने बताया हमारी मुलाकात बहुत संक्षिप्त रही। दस बजे मिलना था, हम ग्यारह बजे पहुंचे। जीतू ने कहा था कि निकलने के पहले फोन करेंगे लेकिन वे निकलने के बाद दुकान से फोनियाये। हम आराम से थे जीतू परेशान से थे। हमारा खाना हमारे घर था। जीतू का दोस्त के घर। सो वे घड़ी से काम कर रहे थे हम कैलेंडर से।
दूसरी बातों के अलावा यह भी कि जीतेंदर को तमाम लोगों से मिलना था ,हमें सिर्फ उनसे मिलना था। लिहाजा उनका समय बंटा-बंटा सा था सो ज्यादा बातें नहीं छांट पाये। फिर से याद दिलाया जाय कि जैसे मुन्ना भाई एम बी बी एस में सर्किट कहता है -ये भाई , ये तो कमरा शुरू होते ही खतम हो गया वैसे ही हमारी मीटिंग शुरू होते ही खतम हो गयी।कारण जीतेंदर के पास समय नामक उस तत्व की कमी थी जिसे वे वैसे बहुत बरवाद करते हैं। हमने दूसरी चाय के लिये भी बोला था लेकिन वो बोले ,यार जाना है दोस्त के यहाँ।
जो कुछ और बातें हुईं वे बताने लायक नहीं हैं। अब यह कोई बताने लायक तो बात है नहीं कि जब सागर के ब्लागजगत छोड़ने के बारे में बात शुरू तो स्वत: स्फूर्त वाक्य निकला था-”अरे यार स्वामी तो बड़ा ‘लफंडूस‘ है। दिल का अच्छा है लेकिन हर एक की आंखों में तो ईसीजी फिट नहीं होता कि दिल तक पहुंच जाय।” सागर को सीधा बताया गया लेकिन यह भी कहा गया कि “ये क्या बचकाना पन है।” लेकिन यह विश्वास था कि वो वापस आयेंगे सो वे अपना बचपना समेट के फिर आ गये हैं मैदान में। वैसे हमसे सलाह लेते तो हम यह कहते कि मैं तो मजाक कर रहा था कि जगह वे लिखते कि मैं एक सर्वे/शोध कर रहा था कि हिदी चिट्ठा जगत में कितने लोग दूसरों का ख्याल रखते हैं। इससे वाह-वाह और होती । जलवा अलग से। लेकिन जैसा बताया न ,सागर भाई सीधे हैं।
कुछ और लिखने से पहले जीतू की बात खतम कर लूं। और विस्तार से न लिखने का सबसे महत्वपूर्ण कारण जिसकी वजह से जीतू उदास और थके दिख रहे थे वह यह था कि वे परेशान थे कि हम मुलाकात करके सारा विवरण तुरंत अपने ब्लाग पर लिख देंगे तो उनके पास कुछ बचेगा ही नहीं लिखने को। तो हमने उनको वचन दिया कि हम कुछ नहीं लिखेंगे विशेष।तुम जाकर बताना सारा विवरण। सो जरा इंतजार करें । जीतू को पहुंचने तो दें कुवैत!
आलोक ,जो कि हमारे आदि चिट्ठाकार हैं,ने अपनी टिप्पणियों में कुछ बुनियादी सवाल उठाये हैं। नंदनजी जी कविताओं पर टिप्पणी करते हुये उन्होंने पूछा कि क्या इसके लिये लेखक या प्रकाशक से पूछ लिया गया है? नंदनजी की रचनाओं के बारे में तो बता दूँ कि वे हमारे मामा हैं। उन्होंने हमें कह रखा है कि जो रचना मन करे छापो। बल्कि उन्होंने तो अपनी साइट बनाने के लिये भी कहा है।
बाकी के रचनाकारों से भी बिना उनकी अनुमति के उनके लेख, कवितायें, कहानियां छापना अनुचित है लेकिन कवितायें हम इस विश्वास से बिना अनुमति पोस्ट कर देते हैं क्योंकि:-
१. हम उन्हें लेखकों के नाम से छापते हैं।इस प्रकार हम उनके ही श्रेष्ठ साहित्य का प्रचार करते रहते हैं।
२.हम किसी भी तरह से बड़े लेखकों के लेख का व्यवसायिक उपयोग नहीं करते हैं।
३.उपरोक्त दो बातों के अलावा यह सोच भी है कि जब कोई टोकेगा तो हटा देंगे पोस्ट!जरूरी हुआ तो अफसोस जाहिर कर देंगे। और लफड़ा हुआ तो जो होगा झेलेंगे।
यही कारण हैं कि हम कापीराइट वाली कवितायें अधिकतर बिना अनुमति के पोस्ट करते रहते हैं। दूसरी बात आलोक ने सागर के ब्लाग पर टिप्पणी करते हुये पूछी। आलोक ने संकेत किया कि बिना अनुमति के दूसरों की मेल सार्वजनिक करने से पहले संबंधित व्यक्ति से पूछना चाहिये। इस बारे में मुझे लगता है कि उनकी बात कुछ हद तक सही है।ऐसा हो सकता है कि व्यक्तिगत बातचीत में कोई मुखर होकर लिखे लेकिन अपनी मुखरता सार्वजनिक नहीं करना चाहता। संभव है कि कोई अकेले में भावुकता दिखाये लेकिन पब्लिक में उसकी इमेज कुछ और उसकी सूची ऊलग हो। इस बात का ख्‍याल रखने से भला रहता है।
दूसरी बात आलोक ने सागर के ब्लाग पर टिप्पणी करते हुये पूछी। आलोक ने संकेत किया कि बिना अनुमति के दूसरों की मेल सार्वजनिक करने से पहले संबंधित व्यक्ति से पूछना चाहिये। इस बारे में मुझे लगता है कि उनकी बात कुछ हद तक सही है।ऐसा हो सकता है कि व्यक्तिगत बातचीत में कोई मुखर होकर लिखे लेकिन अपनी मुखरता सार्वजनिक नहीं करना चाहता। संभव है कि कोई अकेले में भावुकता दिखाये लेकिन पब्लिक में उसकी इमेज कुछ और हो। तथा वो व्यक्तिगत बातें सार्वजनिक न करना चाहता हो। वैसे हम तो यह मानते हैं कि जो बात दो लोगों के बीच होती है वह दुनिया भर को पता हो जाती है लेकिन फिर भी इस बात का ख्‍याल रखने से भला रहता है कि पूछताछ कर ली जाय या यह भरोसा हो कि हम कुछ भी असहज सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं।
है कि नहीं आलोकजी!
हंस में अभिनव ओझाजी लेखकों की वर्तनी दुरुस्त करते रहते हैं। कभी-कभी लोग उनको दुरुस्त कर देते हैं। हमारे आलोक अब यह भूमिका निभाना शुरू किया है। वैसे सच है कि हमारे बहुत से साथी धड़ल्ले से बिंदास वर्तनी की गलतियाँ करते रहते हैं। कठिन शब्द की बात अलग है,नुक्ता,शीन,काफ़ तो बड़ी बातें हैं लेकिन बहुत से साथी छाती ठोंककर दिजिये, लिजिये, पिजिये , लीखते ,रहाते ,हें। मुझे कोई कोफ्त नहीं होती ,मैं सार-सार ग्रहण कर लेता हूँ लेकिन आशा है कि थोथे के मात्रा समय के साथ कम होती जायेगी। यहाँ उल्लेखनीय है हमारे स्वामीजी की वर्तनी पहले मासाअल्लाह माशा अल्लाह हुआ करती थीं लेकिन अब उन्होंने बहुत ध्यान दिया है इसे सुधारने के लिये।
कानपुर के राजीव टंडन जैसा कि पता चला है कि अतुल के कुछ दिन गुरू रह चुके हैं। अतुल को पढ़ाया है उन्होंने। अब हालात यह है कि अतुल उनको पढ़ाते हैं(अपना ब्लाग) उनके लिये ताज्जुब का विषय है कि खामोश सा दिखने वाले लड़का इतना लफ्फाज़ कैसे हो गया। तो जिन लोगों को न पता हो उनको बता दें कि अतुल के पिताजी श्रीश्रीनाथ अरोराजी कानपुर के प्रख्यात जनवादी कथाकार के रूप में जाने जाते हैं। उनकी लंबी प्रेमकथानुमा कहानी सिलबिल्लो ,हमारी पसंदीदा कहानी है।कुछ दिनों से प्रकाशन जगत में गुटबाजी (तुम हमारी तारीफ करो हम तुम्हें महान बतायें)के कारण उनका लेखन फिलहाल बंद सा है। लेकिन जैसा कि हमारे मित्र कथाकार मित्र गोविंद उपाध्याय बताते हैं ,उन दिनों लगभग दस -पन्द्रह वर्ष पहले कथाकारों के घरों में कथापाठ हुआ करते थे। गर्मागर्म समीक्षायें होतीं थीं। लोग जम कर खिंचाई-तारीफ भी करते थे। तो अतुल यह सब सुनते,गुनते तथा कथाकार अंकलों को पानी-चाय पिलाते हुये बड़े हुये हैं। सो आज वे हमारे सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले लोकप्रिय ब्लागर हैं तो इसमें किमआश्चर्यम्‌?
लेकिन आश्चर्य यह है कि चेले, अतुल के लेख पढ़ने के बावजूद अभी तक गुरू,राजीव टंडन जी अभी तक केवल ब्लाग पढ़ने तथा टिप्पणी करने तक सीमित किये हैं अपने को। कब कूदेंगे इस ब्लागजगत में?
लगता है कि ब्लागर लोग अब जयपुर जाये बिना मानेंगे नहीं। सो सभी ब्लागरों को गुलाबी शुभकामनायें।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

15 responses to “थोड़ा कहा बहुत समझना”

  1. अतुल
    अब तबीयत प्रसन्न। जीतू की रपट का इंतजार।
  2. उन्मुक्त
    मेरे विचार में निम्न बातें सही हैं हांलाकि इसकी पुष्टि कानून विशेषज्ञ ही कर सकता है|
    १. किसी कि private ई-मेल या पत्र लेखक का कौपी-राईट है और बिना बिना लिखने वाले की अनुमति के प्रकाशित करना अनुचित है| जहां तक मुझे याद पड़ता है कि हरिवंश राय बच्चन और एक अन्य साहित्यकार के बीच इस बारे मे काफी विवाद हो चुका है|
    २. किसी भी कौपी-राईटेड कार्य की ‘fair dealing’ कौपी राइट का उल्लंघन नही होता है और जब किसी लेख के संदर्भ मे कोई कविता छापी जाती है तो शायद यह ‘fair dealing’ के अन्दर आता है|
  3. प्रत्यक्षा
    अब तो जीतू जी ही बतायेंगे, कितना छोडा कितना लिखा
  4. सागर चन्द नाहर
    आलोक भाई सा. एवं विजय भाई के संकेत के बाद मुझे लगा कि बात वाकई सही है सो मैंने उस चिठ्ठे से उन सारे पत्रों को हटा लिया है।
    कॉपीराईट वाली बात पर याद आया कुछ दिनों पहले मैने “अम्मा एक कथा गीत प्रकाशित किया था जो हिन्दी मिलाप में प्रकाशित हुआ था, प्रकाशन के बाद मैने हिन्दी मिलाप को को सूचित किया तो उन्होने जवाब दिया आप सहर्ष हिन्दी मिलाफ के किसी भी मैटर को छाप सकते है। चूँकि मैने कविता मूल लेखक के नाम से छापी थी इस वजह से उन्हें कोई आपत्ति नहीं हुई।
    हमारे स्वामीजी की वर्तनी पहले मासाअल्लाह हुआ करती थीं लेकिन अब उन्होंने बहुत ध्यान दिया है इसे सुधारने के लिये।
    मासाअल्लाह नहीं माशाअल्लाह होना चाहिये!
  5. सागर चन्द नाहर
    माफ़ कीजिये
    हिन्दी मिलाफ़ कि जगह हिन्दी मिलाप पढ़ें।
  6. आलोक
    वे हमारे मामा हैं। उन्होंने हमें कह रखा है कि जो रचना मन करे छापो। बल्कि उन्होंने तो अपनी साइट बनाने के लिये भी कहा है।
    हाँ, यह मैंने टिप्पणी लिखने के बाद पढ़ा था। वाह। फिर तो मैं भी मूँगफली में दाना बचा के रखूँगा।
    नन्दन जी की साइट – बहुत बढ़िया। कोई मदद चाहिए हो तो बताएँ।
  7. रवि
    ………..१. हम उन्हें लेखकों के नाम से छापते हैं।इस प्रकार हम उनके ही श्रेष्ठ साहित्य का प्रचार करते रहते हैं।
    २.हम किसी भी तरह से बड़े लेखकों के लेख का व्यवसायिक उपयोग नहीं करते हैं।
    ३.उपरोक्त दो बातों के अलावा यह सोच भी है कि जब कोई टोकेगा तो हटा देंगे पोस्ट!जरूरी हुआ तो अफसोस जाहिर कर देंगे। और लफड़ा हुआ तो जो होगा झेलेंगे।
    यही कारण हैं कि हम कापीराइट वाली कवितायें अधिकतर बिना अनुमति के पोस्ट करते रहते हैं।…………..
    रचनाकार के लिए मैंने जितने भी लेखकों से संपर्क किया उन सभी का मानना है कि वे लिखते ही छपने और पढ़े जाने के लिए हैं. तो रचनाकार को पुनर्प्रकाशन की अनुमति वे खुशी खुशी देते हैं.
    जिनसे संपर्क नहीं हो पाता ऐसी अच्छी रचनाओं को साभार प्रकाशित किया जाता है. इसमें भी उनका ही प्रचार प्रसार होता है और आमतौर पर वे प्रसन्न ही होते हैं – जब तक कि उनके व्यावसायिक हितों को नुकसान नहीं पहुँचता हो.
    और, कोई गरियाए गुस्साए कि उसका लिखा क्यों छाप दिया तो ब्लॉग में डिलीट बटन भी भाइयों ने बना रखा है :)
  8. निधि
    अनूप जी, आपने सीनियर लोगों की सुनी, ठीक किया शायद । हम तो अभी निहायत नौसिखिये हैं । हमें पढ़ के मज़ा आया सो लिख दिया । वैसे आप हम जैसे पाठकों का भी ध्यान रखियेगा । आपके मामा जी की रचनायें भी पढी़ं । दिल को छू गयीं ।
  9. विजय वडनेरे
    हो हो हो…!!
    आज पकड़े गये आप…!!
    अब समझे कि आपकी पोस्ट इतनी लम्बी कैसे हो जाती है. ये सब जलवा कापी पेस्ट का है.
    “यही कारण हैं कि हम कापीराइट वाली कवितायें अधिकतर बिना अनुमति के पोस्ट करते रहते हैं। दूसरी बात आलोक ….”
    “…दूसरी बात आलोक ने सागर के ब्लाग पर टिप्पणी करते हुये पूछी। आलोक ने संकेत किया कि बिना अनुमति के…”
    उपर दिये गये पहले पैरा में सिर्फ़ एक लाईन है, और बाकी की लाईनें वैसी कि वैसी दूसरे पैरा में चेप दी गई है या यूँ कहना चाहिये कि दूसरा पैरा ही बना दिया गया है.
    ये राज की बात आज समझे हम कि बाकी लोग यूँ ही फ़ोकट में आपकी पोस्टों के मजे लेते हैं. पढते तो हैं नहीं पुरी..आज हिम्मत कर के हमने पढी पुरी की पुरी (आक्खी) तब टीपी कि मामला क्या है, और क्यों आपकी पोस्ट “अमिताभी” (बकौल सागर भाई) हो जाती है.
    वैसे मुझे आज यह पढते हुए, बचपन की हिन्दी की परीक्षा याद आ गई, जब निबंध लिखा करते थे, और लम्बी लम्बी छोडते थे, कभी कभी तो निबंध का साईज बढाने के चक्कर में एक ही पैरा २-३ बार चिपका देते थे. ;)
    बाई द वे: “मासाअल्लाह”, जैसा कि आपने लिखा है, ठीक है, या “माशाअल्लाह”?
  10. Amit
    सो सभी ब्लागरों को गुलाबी शुभकामनायें।
    आपको ग़ुलाबी धन्यवाद आकर दिया जाएगा!! ;)
  11. राजीव
    जी हां, मैंने अतुल का ब्लॉग अवश्य पढ़ा है। वह हमारे ही संगणक विभाग में विद्यार्थी था परंतु मैंने उसकी कक्षा विशेष को कभी पढ़ाया या नहीं यह मुझे नहीं याद – हां मैं उस समय संस्थान में शिक्षण तो करता था। कालांतर में जब मैं व्यवसाय में आया और अतुल भी सम-व्यवसाय में थे तब उनसे अपेक्षाकृत अधिक भेंट हुई। उनकी, पिता जी के साहित्यकार होने के कारण स्वाभाविक रूप से गृहीत हिन्दी के प्रति अभिरुचिं के बारे में उनके चिठ्ठे में ही पढ़ा था।
    अनूप जी, मुझे आपसे एक शिकायत अवश्य है ;) अपने लेख में आपने मुझे अतुल के गुरू के रूप में उल्लिखित किया है। आप ज़रा इसकी वर्तनी पर ध्यान दें। वैसे तो इस प्रकार की अनेक त्रुटियाँ मुझसे भी होती हैं, जैसा कि मैंने आपके नाम में ही एक बार की थी परंतु यहां तो मामला ही बिगड़ जायगा। स्वयं के प्रति अपनी इमेज (छवि) जो ताक पर है! अपने समाज में अब तो दोनों ही शब्द प्रचलित और सर्वमान्य हैं – गुरु और गुरू और इन दोनों शब्दों को भिन्न उच्चारण द्वारा हम परस्पर भिन्न (या विपरीत) अर्थों में आत्मसात् करते हैं। अब आप जैसे परिपक्व कनपुरिया और हिन्दी-ज्ञानी को और क्या बताना। अपने यहां तो बहुत से गुरू होतें हैं, और गुरु भी। कृपया सुधी पाठकों को स्पष्ट करें, अन्यथा शायद आपका संबोधन ठीक ही हो – मैं ही अपने प्रति ग़लतफ़हमी में हूं क्या? यह पढ़्कर अतुल कहेंग मेरे बारे में – बहुत परछिद्रांवेषी निकला यह तो। ;)
    अब इस बात (त्रुटि?) को इंगित करने के बाद मुझे बहुत सतर्क रहना होगा। आप जैसे गुणी चिठ्ठाकार के लेखन में इस प्रकार की टिप्पणी के बाद कोई भी समझदार(मैं) व्यक्ति ब्लॉग लिखने की हिम्मत करगा क्या। यह तो वही बात हुई कि एक कमज़ोर व्यक्ति किसी माने-जाने पहलवान को भला-बुरा कहने के बाद क्या स्वयं कुश्ती में कूदने का प्रयास भी करेगा ?
    अभी तो टिप्पणियों में ही स्वतंत्रता पूर्वक खिंचाई/प्रशंसा और टीका का उचित/अनुचित आनन्द प्राप्त कर रहा हूं और लेखन के आवर्ती उत्तरदायित्व से मुक्त! वरना कौन जाने वक्त-बे-वक्त मुझको ही टीप (टिप्पणियों द्वारा) पड़्ने लगें।
    वैसे यह ख़तरा तो अब बना ही रहेगा ।
  12. अन्तर्मन
    यह आपके पिछ्ले लेख के बारे में है…नंदन जी के बारे में इतनी जानकारी भरा लेख पहली बार पढने को मिला| वैसे यह उनके लिये बहुत ही अच्छी बात है कि वे ‘आपके’ मामा हैं| :-)
  13. विजय वडनेरे
    हमने यह कहावत सुनी थी – चोर की दाढी में तिनका – मतलब अब जाके कुछ समझ में आया है.
    ही ही ही!!
    हमने यह तो नहीं कहा कि आपने -कहीं और से काटा और चिपकाया है-!!
    आपको ऐसा लगा क्या?? ;)
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