Wednesday, July 12, 2006

देखा मैंने उसे कानपुर पथ पर-

http://web.archive.org/web/20140419051126/http://hindini.com/fursatiya/archives/157

देखा मैंने उसे कानपुर पथ पर-

निराला की प्रसिद्ध कविता तोड़ती पत्थर के अंश हैं:-
वह तोड़ती पत्थर
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर-
वह तोड़ती पत्थर!

नत नतन प्रिय कर्म रत मन
गुरु हथौड़ा हाथ
करती बार -बार प्रहार
!
यह कविता मेरे सामने साकार हुई गत रविवार को। कैसे ?जानने के लिये पहले एक बार फिर लखनऊ चला जाय।
तो हुआ यह कि जब सारे ब्लागर गुलाबी शहर में आंख मलते हुये मिलने के लिये तैयार हो रहे होंगे तब हम अपना सप्ताहांत-सुख ताक पर रखकर लखनऊ के लिये बढ़े चले जा रहे थे। हमें अपने भूतपूर्व वरिष्ठ महाप्रबंधक को अमौसी हवाई अड्डे तक विदा करने के लिये जाना था जो कि पदोन्नत होकर कोलकाता जा रहे थे।
गये तो हम थे टाटा क्वालिस में लेकिन लौटना पडा़ मोपेड से। यह मोपेड हमें लखनऊ से लेकर आनी थी। हमने सोचा कि क्वालिस में आ जायेगी तो धरे चले आयेंगे लेकिन मोपेड ने गाड़ी में प्रवेश करने से मना कर दिया। हमने भी कहा- चल मेरी धन्नो मेरे साथ ही चलो। चला के ले चलेगें तुम्हें।
पेट्रोल भरवाकर जब हम चल इंदिरा नगर से तो हमें याद आया कि हमारे बाल-सखा विकास गंगाधर राव तैलंग पास ही रवीन्द्र पल्ली में रहते हैं। हमने सोचा मिल ही लिया जाय। सो जब उधर जयपुर में ब्लागर हेलो,हाऊ डू यू डू से शुरू करके औपचारिकता की सील तोड़ रहे होंगे तब हम अपने पिछले पंद्रह साल के सारे हिसाब किताब बराबर कर रहे थे। विकास ने हमें एक किताब भी दी जिसमें कानपुर के संगीत-साहित्य के इतिहास से संबंधित ऐतिहासिक जानकारियाँ हैं।
करीब एक घंटा रवीन्द्र पल्ली में बिताने के बाद हम कानपुर की तरफ बढ़े। अमौसी पार करते ही रास्ता खाली सा हो गया। लखनऊ-कानपुर राजमार्ग संख्या २५ अब लखनऊ से उन्नाव तक पूरा चौरस्ता(फोरलेन) हो गया है तथा लखनऊ से कानपुर की दूरी लगभग डेढ़-पौने दो घंटे में तय कर लेते हैं लोग।
अमौसी से कुछ ही आगे बढ़े होंगे हम कि मैंने देखा सड़क की दूसरी तरफ एक ट्रक खड़ा था। ट्रक में एक बड़ा सा सीवर का पाइप लदा था । वो सीवर का अगर सड़क के किनारे पड़ा रहता है तो कम से कम एक परिवार तो उसका अकेलापन बांटने के लिये उसमें रहने ही लगता है।
हमने सड़क के इस पार से देखा कि ट्रक पर लदे सीवर के पाइप का अकेलापन बाँटने के लिये उसमें एक आदमी घुसा हुआ है। उस सीवर के पाइप में घुसे हुये आदमी का सिर ट्रक के नीचे खड़ी एक महिला की चप्पलों से बज रहा था।
मैंने देखा कि महिला का कद औसत भारतीय था करीब पांच फिट के दायें-बायें। दूर होने के बावजूद मैं दावे के साथ कह सकता हूँ उसके हाथ में फंसे सैंडिल की ऊँचाई निश्चित तौर पर महिला की ऊँचाई से कुछ कम ही रही होगी। सैंडिल आदमी की चाँद पर बज रहा था। चाँद गंजी होने का नाम नहीं ले रही थी। महिला के पीटने के अंदाज से लग रहा था कि कद की ऊँचाई किसी की पिटाई में आड़े नहीं आती। कद में जो कमी हो उसे इच्छा होने पर उचक-उचक कर तथा सैंडिल का कद बढ़ाकर पूरा किया जा सकता है।
आसपास पान-चाय तंबाकू की दुकाने न होने के कारण यह घटना समुचित दर्शक भले न जुटा पायी हो लेकिन जितने भी दर्शक थे वे कम होने के बावजूद पूरे कस्बाई अंदाज़ में चुपचाप रहते हुये वैसा ही व्यवहार कर रहे थे जैसा वे आमतौर पर बाजार में हत्या करते,धमकाते,पीटते,इज्जत लूटते गुंडों को देखते हुये करते रहते हैं- बिना अपनी जगह से हिले-डुले।आखिर आदत भी कोई चीज होती है। कोई किसी के फटे में क्यों टांग अड़ाये ?
हम चूंकि दूसरी तरफ थे लिहाजा हमें पिटने वाले मानव के बचाव के क्षीण प्रयास ही दिख रहे थे। औरत के साथ भी एक आदमी था जो कि बीच-बीच में अब बहुत हो चुका छोड़ दो वाले अंदाज़ में उसके सैंडिल वाले हाथ पकड़ने का नाटक कर रहा था जिसे वह महिला बार-बार झटक कर फिर से पीटने में जुट जाती।
दूरी की वजह से पिटने वाले की कोई आवाज नहीं सुनाई दे रही थी न कोई वार्तालाप । अगर वह कुछ बोल भी रहा होगा तो चप्पलों की आवाज उसकी आवाज को दबा देती होगी। इससे मुझे लगा कि जो कभी-कभी बोलता है वह बहुत जोर-शोर से बोलता है।
कारण तो तमाम हो सकते हैं लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी कारण मुझे यही लगा कि हो न हो महिला को अकेले देखकर आदमी ने उसका अकेलापन बाँटने के जबरियन प्रयास किया हो। लेकिन महिला ने उसके प्रयास की सद्‌भावना की उपेक्षा करके शांति भंग करना ज्यादा जरूरी समझा तथा उसकी चांद बजा दी।
आमतौर पर महिलायें मर्दों को पीटने में ज्यादा मेहनत करते नहीं पाई जाती हैं। थोडा़ मारपीट कर नारियल नुमा फोड़ देती हैं । बाद का काम सर्वव्यापी हनुमान भक्त स्वयंसेवक संभाल लेते हैं। लेकिन यहाँ लगता है कि वह महिला अपनी सैंडिलों से छुटकारा पाना चाहती हो जिसको तोड़ने के उसने छेड़छाड़ से मिले मौके का फायदा उठाते हुये उपलब्ध चांद के सहारे सैंडिल को तोड़ देना चाहती हो तथा बाद में खुश होकर गाती-
मोहे आई न जग से लाज
मैं इतना जोर से पीटी आज
कि सैंडिल टूट गये।
वहीं सड़क के दूसरी तरफ से मुझे निराला की कविता की तर्ज पर पैरोडी याद आ रही थी:-


वह मारती चप्पल
देखा मैंने उसे कानपुर पथ पर-
वह मारती चप्पल! क्रोधित नयन,जकड़े हुये गरदन,
मोटी सैंडिल हाथ
करती बार-बार प्रहार
चांद सिसकती हर बार
अब बस भी करो यार!

मैं आगे कुछ सोच न सका। मेरा दिमाग वैसे ही बंद हो गया जैसे टीवी पर पहलवानों की एकतरफा कुश्ती देखते हो जाता है।
लेकिन जैसा कि कहा गया है कि परिवर्तन संसार का नियम है। सो इसी नियम का सहारा लेकर हालात में बदलाव आये। महिला पीटते-पीटते या तो थक गई था या बोर हो गई थी । पिटने वाले ने भी वचाव की प्रक्रिया बंद कर दी थी तथा बचाने वाले ने भी बचाने का नाटक करना खतम कर दिया।जो भी हुआ हो सड़क पर फिर सन्नाटे का साम्राज्य हो गया।
ट्रक मय सीवर पाइप लाइन के पिटे हुये को व्यक्ति को लेकर लखनऊ की तरफ चला गया। पीटने वाली महिला अपने पति नुमा साथी के साथ ट्रक की विपरीत दिशा में पैदल चलने लगी। दूर जाते हुये ट्रक पर दूर से दिख रहा था बशीर बद्र का शेर:-


मुसाफिर हैं हम भी,मुसाफिर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी।

पिटने वाले के दर्द के बारे में सोचते हुये हमने सामने निगाह की तो सामने से आते ट्रक पर लिखा चमक रहा था:-


६३ के फूल ,३६ की माला
बुरी नजर वाले का मुंह काला।

हम आगे बढ़ लिये। हमें अफसोस हो रहा था कि हमारे पास कैमरा नहीं था वर्ना इसका फोटो खींच के सबको दिखाते। लेकिन हमने यह भी सोचा कि ऐसा सोचना ठीक नहीं है। कोई पिटे और हम उसका फोटो खींचें यह ठीक नहीं।अब यह आप लोग सोचो कि हमारा कौन सा सोच ठीक था।
हम खरामा -खरामा बढ़े जा रहे थे।मोपेड होने की वजह से अधिकतम गति सीमा ४० किमी का मजबूरन पालन करते हुये। हमें लगा कि अगर सच में किसी को किसी देश के बारे में जानना हो तो उसकी यात्रा सड़क मार्ग से करनी चाहिये। हवाई अड्डे-हवाई अड्डे देखकर जो दिखता है उसके मुकाबले बहुत कुछ छूट जाता है। इसी धुन में मैंने यह भी सोचा कि जिस गति से भारत में नौजवानों में खासतौर पर ब्लागिंग का प्रचार हो रहा है उसमें अचरज नहीं कि कोई इस तरह का कार्यक्रम बने कि कोई सिरफिरा ब्लागर पूरे भारत की यात्रा पर निकल पड़े सारे ब्लागरों से मिलने के लिये। रुकने के लिये हर शहर में जुगाड़ होगा ही। हर शहर में पहुँच रास्ते की रिपोर्टिंग करे।
आशीष अभी अपनी बहन की शादी में व्यस्त हैं। उसे निपटा के काहे नहीं निकल लेते अपनी फटफटिया लेकर। कानपुर आने पर रहने का जुगाड़ तथा २०० किमी की यात्रा में साथ रहने का हमारा वायदा है। क्या पता इस यात्रा में कोई हमेशा साथ रहने वाला मिल जाये!
बहरहाल हम कुछ आगे बढ़े तो नींद सी आने लगी। सोचा किसी ढाबे में बैठ के कुछ देर चायपान करते हुये आराम कर लें। लेकिन बहुत दूर तक कुछ न दिखा तथा आंखे थकान के कारण मुंदने सी लगीं तो एक पुलिया के पास रुक गया। वहीं मोपेड पर बैठे-बैठे आंखें मूदकर आराम सा करने लगा।
कुछ देर में वहीं पास से एक बच्चा नुमा लड़का पास आकर खड़ा हो गया। वह हमें देखने लगा तथा हम उसे देखने लगे। अब वह कोई ब्लागर तो था नहीं कि उसका तुरंत स्वागत करता तथा दूरी को ईमेल की दूरी के बराबर कर लेता। बहरहाल हमें जब कुछ समझ नहीं आया तो पूछताछ शुरू कर दी:-
-तुम्हारा नाम क्या है बेटा?
-प्रकाश चंद यादव।
-स्कूल जाते हो?
-जात हते । पढ़ाई ढील दई। (जाता था । पढा़ई छोड़ दी)
-कितने तक पढ़े हो?
–दुइ तक पढ़े हैं।(दो तक पढ़ा हूँ)
-अब क्यों नहीं जाते?
-अइसेइ नाईं जात। अब फिरकत्ति जैइहैं।(ऐसे ही नहीं जाता । अब फिर से जाऊँगा)
-अभी क्या करते हो?
-हरहा चराउत हैं।( जानवर चराते हैं)
-कितने जानवर हैं?
-एक गइया,दुई बैल।
-गिनती कितने तक आती है?
-सौ तक।
-और पहाड़ा कितने तक आता है?
-बारह तक।
-अच्छा बारह का पहाड़ा सुनाओ?
-बारह का बारह,बारह दूनी….बारह दहम एक सौ बीस।
बच्चे ने बिना रुके बारह का पहाड़ा पूरा सुना दिया। हमें लगा कि लोग सही कहते हैं-है हिंदुस्तान कहाँ बसा ,वह बसा हमारे गांवों में।
लड़का बिना किसी डर के जानवर चरा रहा था। पढा़ई छूटने के बारे में किसी चिंता से दूर। कपड़े के नाम पर उसके कमर पर जांघिया नुमा कुछ कपड़ा फंसा था। बाकी पूरा बदन दिगम्बर था। उसे शायद नहीं पता कि उच्च शिक्षा में उसके लिये आरक्षण पर पूरे देश में जूता-लात,बंद अनशन हो रहे हैं।
यह वाकया प्रदेश की राजधानी से मात्र तीस किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित एक गांव का है। जब राजधानी के एकदम बगल में एक बच्चा शिक्षा विभाग की सारी योजनाओं को धता बताते हुये जानवर चरा रहा है तो उन इलाकों के क्या हाल होंगे जहाँ आने-जाने के रास्ते नहीं हैं।
लड़का हमारे सोच से बेखबर पुलिया पर बैठा जानवर को हांकने के लिये अपने हाथ के डंडे से अपने पैर के पास की जमीन खोद रहा था। कुछ देर में वहां से बारिश का पानी मिट्टी को हटाकर ऊपर आ गया। वह निर्लिप्त भाव से जमीन में खोदे गढ्ढे को चौडा़ करता रहा। जमीन का पानी ऊपर आता रहा। हमें अपने शायर दोस्त शाहिद रज़ा का शेर याद आया:-
जरा सा पानी मिला और जमीन जाग उठी,
लगता है अपनी मिट्टी में अभी जान बाकी है।
कुछ देर बाद मैं आगे बढ़ा। कानपुर लखनऊ के रास्ते में लगभग बीच में जगज्जननी स्वीट हाउस पड़ता है।वहां के पेड़े बहुत प्रसिद्घ हैं। हमने वहाँ चाय पी। फिर जो वहाँ से चले हैं तो मिलिटरी चाल में चलते हुये सीधे गंगा के पुल पर ही आकर दम लिया।
लखनऊ से दो बजे चले।गंगा पुल पर हम शाम के करीब पांच बजे आ गये थे। वहां से अतुल का घर पास ही पड़ता है।मन किया कि चला जाय तथा वहाँ के हालचाल लिये जायें। लेकिन पता याद नहीं था तथा केवल एक बार देखने के कारण घर का रास्ता भी भूल गया था। सोचा कि किसी कैफे में अपनी गूगल मेल सर्च करके देखा जाय अतुल का पता मिल जायेगा।
फिर सोचा कि किसी कैफे क्या जायें? किसी दोस्त के यहाँ चलकर चाय भी पी लें तथा वहीं से पता भी ले लेंगे। सो हमने फिर अपने हाईस्कूल तक एक दूसरे दोस्त का मोबाइल बजाया। जयदेवमुखर्जी हमारे साथ पांच साल पढ़े हैं। बहुत दिन से जिद कर रहे थे कि आओ न!
सो हम उनकी जिद पूरी करने पहुंच ही गये।
जयदेव के घर पहुंचे तो पता चला कि उसने हमारे बारे में तमाम अफवाहें अपने घर में फैला रखी थीं। पहुंचते ही जिस तरह से उसने अपने बच्चों से बताया कि देखो कौन आया है तो हमें लगा कि किसी और के बारे में बता रहा है। कुछ ही देर में हमने मेहनत करके अपने बारे में तमाम तारीफों के पुल तोड़ दिये हम लोग बीच के पंद्रह बीस सालों का हिसाब किताब बराबर करने लगे।
वहीं हमें महसूस हुआ कि दोस्ती तथा ब्लागिंग के मामले में एक समानता है कि दोनों की नियमितता बरकरार रखनी चाहिये।
इस बीच शाम हो गयी हम फिर घर की तरफ चल दिये।रामादेवी का चौराहा पार करते हुये हमें याद आया कि हम अतुल के घर जाने के लिये पता लेना तो भूल ही गये।
हम भी क्या बौड़म हैं यार!

12 responses to “देखा मैंने उसे कानपुर पथ पर-”

  1. eshadow
    बौडम नही, अरे ऐसा तो होगा ही, १५-२० सालों बाद दोस्तों से मिलेंगे तो कुछ याद रहेगा क्या?
  2. राम चन्द्र मिश्र
    फ़ुरसतिया जी नमस्कार,
    मज़ा आ गया…पूरे परिवार के साथ पढा़।
    हम जब २ दिन कान्पुर मे थे तो आपकी याद आयी थी, लेकिन जीतू जी ने आपका फोन नम्बर बताया नही और हम इतने आलसी कि कभी आपसे पूछ्ने की जहमत नही उठायी।
  3. आशीष
    आशीष अभी अपनी बहन की शादी में व्यस्त हैं। उसे निपटा के काहे नहीं निकल लेते अपनी फटफटिया लेकर।
    हम्म … आईडीया अच्छा है, सोचता हूं इस पर ! इरादा तो पक्का है, लेकिन कब ये थोडा तेढा टेढ़ा सवाल है ? लेकिन ज्यादा दूर नही निकट भविष्य मे ही ।
  4. प्रत्यक्षा
    क्वालिस से लौटते तो यह पोस्ट कैसे लिखते. मोपेड यात्रा में बहुत स्कोप है ये तो अब पता चल गया
  5. ratna
    सफ़र के दौरान कई रोचक किस्से होते है ।एक ऐसा ही किस्सा मैंने देखा इलाहाबाद-लखनऊ के पथ पर जो आम किस्सों से बहुत अलग,दिलचस्प और हैरान करने वाला था ,कुछ लम्बा है सो ब्लोग पर पेस्ट करूंगीं। कानपुर तक का सफ़र मज़ेदार रहा ।
  6. प्रेमलता पांडे
    वर्णन बहुत बढ़िया। बच्चे की बात ने द्रवित किया।
    -प्रेमलता पांडे
  7. अतुल
    कहिये तो घर का नं दुबारा भेजूँ ईमेलपर।
    वैसे मोपेड यात्रा ने बेफिक्र नौजवानी के दिन याद दिला दिये। ऐसे ही साईकिल स्कूटर पर दूर दूर निकल जाना , शहर की भीड़ भगदड़ से दूर। है बड़े सुकून की चीज, यह आवारगी भी। कहीं पढ़ा था, प्रसिद्ध पँजाबी गायक हँस राज हँस भी कुछ समय पहले ऐसे ही चट गये तेजरफ्ता जिंदगी से। महीनो तक मजारो, गाँवो घूमते रहे, बिना सेलफोन , घड़ी साथ रखे। उनका कहना था कि यह जिंदगी से जुड़ने का असली तरीका है। हमारे पिताजी का भी कहना है कि ड्राइंग रूम में बैठकर सूखी रोटी खाकर आप क्या खाक “होरी” लिखेंगे?
  8. अन्तर्मन
    भाई क्या बढ़िया अनुभव है‍ और क्या वर्णन है! आप तो हिन्दी चिट्ठाकार-कम-रिपोर्टर हो गये! मन कर रहा है कि फ़्लाइट पकड़ कर लखनऊ पहुंचूं और लखनऊ-कानपुर मार्ग की सड़्कों पर बेफ़िक्री से टहलूं! दिल ढूंढ्ता है..फ़िर वही..फ़ुर्सत के रात दिन…!
  9. नीरज त्रिपाठी
    अपने शहर के बारे में पढ़कर बहुत अच्छा लगा।
    कानपुर लखनऊ के रास्ते में लगभग बीच में जगज्जननी स्वीट हाउस पड़ता है।वहां के पेड़े बहुत प्रसिद्घ हैं। हमने वहाँ चाय पी। ये बात कुछ समझ में नहीं आयी कि जब पेड़े बहुत प्रसिद्घ थे तो वहां पेड़े की जगह चाय क्यों…… :-)
    सैंडिल आदमी की चाँद पर बज रहा था। चाँद गंजी होने का नाम नहीं ले रही थी।
    अगर वह कुछ बोल भी रहा होगा तो चप्पलों की आवाज उसकी आवाज को दबा देती होगी।
    मोहे आई न जग से लाज
    मैं इतना जोर से पीटी आज
    कि सैंडिल टूट गये।
    मुसाफिर हैं हम भी,मुसाफिर हो तुम भी
    किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी।
    कपड़े के नाम पर उसके कमर पर जांघिया नुमा कुछ कपड़ा फंसा था। बाकी पूरा बदन दिगम्बर था।
    कुछ ही देर में हमने मेहनत करके अपने बारे में तमाम तारीफों के पुल तोड़ दिये हम लोग बीच के पंद्रह बीस सालों का हिसाब किताब बराबर करने लगे।
    ६३ के फूल ,३६ की माला
    बुरी नजर वाले का मुंह काला।
    मजा आ गया …..
  10. जीतू
    अमां यार! मोपेड पर बैठने से पहले ये भी ना सोचा कि उस गरीब पर क्या बीतेगी।ईश्वर मोपेड की आत्मा को शान्ति प्रदान करें। मै शहीद मोपेड को श्रृद्दांजिली अर्पित करता हूँ।
    अब रही बात कानपुर लखनऊ मार्ग की, सुने तो हम भी है चार लेन वाला हो गया है लेकिन पिछली बार जब गए थे, हर पाँच किलोमीटर पर दो लेन मे तब्दील हो जाता था।
    लेख अच्छा लिखे हो टाइटिल होना चाहिए ” मोपेड की व्यथा कथा”
    बकिया चकाचक
  11. फ़ुरसतिया » अनुगूंज २१-कुछ चुटकुले
    [...] kali on धूमिल की कवितायेंजीतू on देखा मैंने उसे कानपुर पथ पर-नीरज त्रिपाठी on देखा मैंने उसे कानपुर पथ पर-अन्तर्मन on देखा मैंने उसे कानपुर पथ पर-मितुल on कन्हैयालाल नंदन- मेरे बंबई वाले मामा [...]
  12. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] कहा बहुत समझना 6.एक पत्रकार दो अखबार 7.देखा मैंने उसे कानपुर पथ पर- 8.अनुगूंज २१-कुछ चुटकुले 9.एक मीट [...]

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