Friday, May 18, 2007

आइये घाटा पूरा करें

http://web.archive.org/web/20140419215032/http://hindini.com/fursatiya/archives/276

आइये घाटा पूरा करें

[सरकारी उपक्रम अपनी तमाम अव्यवस्थाऒं के लिये आलोचना का शिकार होते रहे हैं। इन उपक्रमों में नियम-कायदों की जांच के लिये आडिट टीमें होती हैं जो अपनी वार्षिक जांच में अपनी आपत्तियां दर्ज कराती रहती हैं। कुछ आपत्तियों का निराकरण होता है तो कुछ आपत्तियां बड़ी आपत्तियों में बदल जाती हैं। इन उपक्रमों में अनियमितताऒं पर तो आडिट की निगाहें होती ही हैं लेकिन अक्सर सुधारों पर भी उनकी वक्र दृष्टि रहती है। कोई भी उम्दा से उम्दा सुधार करके लाखों, करोडों, अरबों की बचत पर उनका सबसे पहला सवाल होता है -यह सुधार पहले क्यों नहीं हुआ ? इस सुधार को देर से लागू होने के कारण हुये नुकसान के लिये कौन जिम्मेदार है? उसके खिलाफ़ कार्यवाही सुनिश्चित की जाये। इसी तरह के एक झमेले से रूबरू होते हुये यह लेख कुछ साल पहले लिखा गया था। पिछले दिनों जब हमारी भतीजी स्वाति की शादी में हमारे साथ काम करने वाले अब्दुल लतीफ़ जब शाहजहांपुर से आये तो मैंने उनको यह लेख खोजकर भेजने के लिये कहा। उन्होंने लेख भेजा। इससे पहले कि यह लेख इधर से उधर हो मैं इसे आपको पढ़ा देना चाहता हूं। लीजिये प्रस्तुत है लेख -आइये घाटा पूरा करें]
फैक्ट्री से मिलने वाली कुछ परम्परागत सुविधाऒं से वंचित रह गये आडिट आफीसर की निगाहें एक वर्ष पुराने एक आदेश को देखकर चमक उठीं। कपड़े पहने-पहने ही उन्होंने यूरेका, यूरेका ( पा लिया, पा लिया) कहा और उस आदेश को दुबारा-तिबारा पढ़ा। इसके बाद एक बार आंखों से चिपकाकर और एक बार आंखों से ओझल-दूरी तक ले जाकर पढ़ा। उस आदेश में लिखा था-
यदि कोई कर्मचारी कार्य स्थल के आस-पास थूकता पाया गया तो उस पर पांच रुपया जुर्माना किया जायेगा।
आडिट आफ़ीसर ने अपने आडिट-पीरियड के दौरान तमाम हुयी तमाम असुविधाऒं को फिर-फिर स्मरण करते हुये आपत्ति पत्र बनाया-

इस फैक्ट्री की दीवारें और फर्श देखकर साफ पता चलता है कि यहां थू-थू की पुरानी परम्परा है। गत वर्ष यहां कार्य स्थल के आस-पास थूकते हुये पाये जाने पर पांच रुपये का जुर्माना किये जाने का आदेश किया गया था। जबकि चारो तरफ़ देखकर यह साफ पता चलता है कि यहां कार्य-स्थल के आस-पास थूकने की परम्परा काफ़ी पुरानी है। अत: थूकने पर ज्रुर्माना लगाने का आदेश पहले न किया जाना फैक्ट्री के राजकोष में हानि का कारण रहा। यदि माना जाये कि फैक्ट्री के एक चौथाई कर्मचारियों को कार्यस्थल के आस-पास औसतन दिन में दस बार थूकने की आदत है तो थूकने पर जुर्माना न किये जाने का एक वर्ष का राजकोषीय घाटा निम्नवत होगा:-
कर्मचारियों की औसत प्रतिदिन उपस्थिति- 6000
प्रतिदिन थूकने वाले कर्मचारियों की औसत संख्या-6000×1/4= 1500
औसतन दस बार थूकने पर प्रति कर्मचारी प्रतिदिन जुर्माना राशि- 10×5= 50/- रुपये
फैक्ट्री के कर्मचारियों पर प्रतिदिन कुल जुर्माना राशि – 1500x 50= 75,000/- रुपये
प्रतिवर्ष कुल जुर्माना राशि (300 कार्य दिवस) -75,000x 300= 2,25,000,00/- रुपये= 2.25 करोड़ रुपये
उपरोक्त गणना से स्पष्ट है कि यह फैक्ट्री आर्ड्रर पहले न करके 2.25 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष की राजकोषीय आय की सम्भावना को क्षीण किया गया। थूकने पर जुर्माने से सम्बन्धित आदेश होने के बाद भी गत वर्ष थूकने के कारण लगाये गये जुर्माने का कोई धन खजाने में नहीं जमा कराया गया जबकि कारखाने की दीवारें और फर्श पर्याप्त रंगे हुये हैं। ऐसी रंगाई या तो कलात्मक पेंटिंग से सम्भव है या श्रद्धापूर्वक थूकने से। यदि यह कार्य (रंगाई) कलात्मक पेंटिग से कराई गयी तो उसका भुगतान किस मद से कराया गया? उसका अनुमोदन कहां है? अनुमोदन यदि है तो उसे अवलोकनार्थ प्रस्तुत किया जाये। यदि ऐसा थुकाई से सम्भव हुआ तो उसका जुर्माना क्यों नहीं कराया गया? इस सन्दर्भ में निम्न बिन्दुऒं के जवाब अविलम्ब प्रस्तुत किये जायें-

१. थूकने पर जुर्माना जमा न किये जाने पर राजकोषीय घाटे की गणना सही है? कृपया पुष्टि करें।
२.कारखाने की दीवारों/ फर्शों की रंगाई कलात्मक पेंटिंग से हुई या श्रद्धापूर्वक थूकने से? यदि थूकने हुई तो थूकने वालों से जुर्माना क्यों नहीं वसूल किया गया?
३.कार्यस्थल के आस-पास थूकने पर जुर्माना किये जाने का आर्डर होने के बाद थूकने की दर में क्या परिवर्तन हुआ? थूकने की दर कम हुई याअ बढ़ी?
४. गत वर्ष जुर्माना जमा न कराये जाने का राजकोषीय घाटा किस तरह पूरा किये जाने की योजना है?
५. यह नियम पहले क्यों नहीं लागू किया गया? यदि यह नियम दस वर्ष पहले लागू किया जाता तो अब तक 22.50 करोड़ रुपये राजकोष में जमा हो गये होते।
यह आपत्ति पत्र पाते ही कारखाने के मैनेजर ने सबसे पहले उस अधिकारी की लानत-मलानत की जिसके जिम्मे आडिट आधिकारी की देखभाल का जिम्मा था। डांटने-फटकारने के बाद उससे सारे ब्योरे लेने के बाद यह समझने का प्रयास किया कि किन सुविधाऒं की कमी होने के कारण आडिट अधिकारी ने आपत्ति पत्र बनाने में इतनी मेहनत कर डाली। उन सुविधाऒं को आडिट अधिकारी को प्रदान किया गया। इसके बाद आपत्ति पत्र के जबाव बनाने के लिये एक अनुभवी आधिकारी को लगा दिया गया।
अधिकारी ने सबसे पहला जवाब लिखते हुये लिखा- ये आपत्तियां इस विभाग से सम्बंधित नहीं हैं। इसके बाद आडिट आधिकारी से पूछ कर बिन्दुवार जवाब भेजे गये। बिन्दुवार जवाब निम्नवत थे-
१. प्रति कर्मचारी प्रतिदिन थूकने की संख्या पांच से पचास तक परिवर्तित होती रहती है। परन्तु कार्यस्थल के आसपास थूकने वाले कर्मचारियों का औसत दस ही बैठता है। रात्रि पाली में एक बार सो जाने पर सिर्फ़ थूकने के लिये उठने की परम्परा नहीं है। परन्तु इससे औसत में कोई फर्क नहीं पड़ता। अत: पुष्टि की जाती है कि थूकने पर जुर्माना जमा न किये जाने पर राजकोषीय घाटे की गणना सही है। हालांकि इस सन्दर्भ में यह विचार भी उल्लेखनीय है कि यदि जुर्माना जमा कराया जाता तो प्रति कर्मचारी थूकने का औसत तथा थूकने वाले कर्मचारियों की संख्या में भारी कमी हो जाती।
२. दीवारों/फर्श की रंगाई श्रद्धापूर्वक थूकने से हुई है न कि कलात्मक पेंटिग से। थूकने वालों से जुर्माना वसूल न कर पाने का मुख्य कारण कर्मचारी भाइयों में आपसी एकता और भाईचारा रहा। एक चौथाई लोग थूकने का और तीन चौथाई लोग देखने का मजा लेते रहे। एक चौथाई सक्रिय रहे और तीन चौथाई निष्क्रिय। जुर्माना वसूल न कर पाने का तकनीकी कारण भी रहा। थूकने वालों की सुविधा एवं कार्यस्थल की साफ-सफाई के लिहाज से हर बेंच के पास एक ‘डस्टबिन’ रखवाया गया था। लेकिन ‘कर्म ही पूजा’ मानने वाले लोग पूजा करते-करते ही डस्ट बिन में थूकते रहे। तमाम लोग पान-मसाला खाते थे। इससे दीवारें तथा फर्श रंग गयीं। पकड़े जाने पर थूकने वालों ने अपने बचाव में तर्क पेश किया- साहब, जब एक फुट दूरी से सिलाई करते हैं तो एक-दो सेमी सिलाई इधर-उधर हो जाने पर कोई टोंकता नहीं है। जब हमें एक फुट दूर से सिलाई करने पर एक सेमी मार्जिन (छूट) मिलता है तो पांच-दस फीट की दूरी से थूकने पर कम से कम एकाध फीट का मार्जिन तो मिलना ही चाहिये। खासकर तब जबकि हम सिलाई मजबूरी में आंख खोलकर करते हैं जबकि थुकाई आख मींचकर (आनन्दातिरेक में) करते हैं। और साहब यह हमसे नहीं हो सकता कि सिर्फ़ थूकने के लिये डस्टबिन तक जायें। नहीं तो हमें थूकने का रेट (मजदूरी) दीजिये, हम थूकने लगेंगे डस्टबिन में। तार्किक दृष्टि से यह बात सही थी अत: हमें सारे केस उसी तरह छोड़ देने पड़े जिस तरह सबेरे किसी दंबग दरोगा द्वारा हवालात में बंद किया गया कोई छुटभैया अपराधी शाम तक किसी मंत्री का आदमी निकल जाने पर छोड़ दिया जाता है। क्या करें, करना पड़ता है!
३. थूकने पर जुर्माना लगाने का आदेश किये जाने के बाद ऐसा देखा गया है कि कुछ लोग तो जुर्माने के डर से अपना थूक गटकने लगे वहीं कुछ लोग इस मामले में ज्यादा उदार हो गये। थूक गटकने वाले सोचते हैं कि इस तरह वे जुर्माने के पैसे बचा रहे हैं। वहीं ज्यादा थूकने वालों का विचार है कि थूकने के बावजूद जुर्माना न देकर वे अपनी कमाई बढ़ा रहे हैं। इस तरह कुल मिलाकर देखा जाये तो थूकने पर जुर्माना करने का आदेश होने से थूकने की औसत दर में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं हुआ है। सिर्फ़ पहले के निर्लिप्त प्रयास के साथ बचत/कमाई की भावना जुड़ गयी है।
४.गतवर्ष का राजकोषीय घाटा, इस वर्ष गत वर्ष की तुलना में दोगुने लोगों थूकने के लिये प्रोत्साहित करके उनसे जुर्माना वसूल करके पूरा करने का विचार है। विचार यह भी है कि थूक कर इस तरह कलात्मक रंगाई की कला को पेटेंट करा लिया जाये। फिर दुनिया में जहां भी को इस तरह दीवाल/फर्श पर थूकते पाया जाया उससे तड़ से पेटेंट के कानून के अनुसार थूकने की फीस वसूल ली जाये। विचार यह भी है कि रंगी दीवारों और फर्श की आर्ट गैलरी की तरह प्रदर्शनी की जाये। इस तरह हुयी आमदनी से राजकोष का घाटा पूरा किये जाने की योजना है।
५. पहले यह नियम यही सोचकर नहीं बनाया/लागू किया गया था कि इससे इसी तरह के फालतू के सवाल उठेंगे। वही हुआ भी।
आशा है आप हमारे इन जवाबों से सन्तुष्ट होंगे और सारी आपत्तियां निरस्त कर देंगे।
चूंकि जवाब आडिट आफीसर से ही विचार-विमर्श करके तैयार किये गये थे तथा इस बीच आडिट आफीसर को वे सभी बाजिव-गैरबाजिब सुविधायें प्रदान की जा चुकीं थी जिनके अभाव में उन्होंने आपत्तियां उठाईं थी, लिहाजा आडिट अफसर इन जवाबों से संतुष्ट हो गये। फैक्ट्री की तरफ़ से भी गत वर्ष का राजकोषीय घाटा पूरा करने की योजना पर पूरी श्रद्धा पूर्वक अमल हो रहा है। दीवारों/फर्शों की रंगाई दोगुनी रफ़्तार से जारी है।
आइये घाटा पूरा करने के इस यज्ञ में आप भी अपनी आहुति दें।

16 responses to “आइये घाटा पूरा करें”

  1. हिंदी ब्लॉगर
    नौकरशाही की जीती-जागती तस्वीर बना गई यह रचना. अब्दुल लतीफ़ साहब को धन्यवाद इस कृति को ढूंढ निकालने के लिए. उम्मीद करता हूँ इसके लिखे जाने, और अब इसके पुनर्प्रकाशन के बीच के लंबे अंतराल में नौकरशाही में कुछ सकारात्मक बदलाव आए होंगे.
  2. समीर लाल
    हा हा, आनन्द आ गया महाराज!! बड़ा दुख होता अगर ये आलेख खो जाता…
    कौन सुनाता हमें:
    साहब यह हमसे नहीं हो सकता कि सिर्फ़ थूकने के लिये डस्टबिन तक जायें। नहीं तो हमें थूकने का रेट (मजदूरी) दीजिये, हम थूकने लगेंगे डस्टबिन में। तार्किक दृष्टि से यह बात सही थी अत: हमें सारे केस उसी तरह छोड़ देने पड़े जिस तरह सबेरे किसी दंबग दरोगा द्वारा हवालात में बंद किया गया कोई छुटभैया अपराधी शाम तक किसी मंत्री का आदमी निकल जाने पर छोड़ दिया जाता है।
    —-वाह वाह, नौकरशाही की चित्र प्रदर्शनी इससे बेहतर कहीं नहीं देखी. मैं खुद भी स्वयं सरकारी उपक्रमों के ऑडिट पर सी एण्ड ए जी की तरफ से अपांइटेड रहा हूँ…काफी हद तक समझ पाया सभी बातों को….बस ३०० दिन का औसत समझ नहीं आया…थोड़ा तो कम करो सारे अवकाश का औसत लेकर…या कुछ वजन धरो कि इसे सही मान लें. :)
  3. रवि
    “…फैक्ट्री से मिलने वाली कुछ परम्परागत सुविधाऒं से वंचित रह गये आडिट आफीसर की निगाहें एक वर्ष पुराने एक आदेश को देखकर चमक उठीं। कपड़े पहने-पहने ही उन्होंने यूरेका, यूरेका ( पा लिया, पा लिया) कहा और …”
    पहली लाइन में ही व्यंग्य का पूरा भोज हो गया और बाद का उबलक में
  4. हरिराम
    वाह क्या आइडिया मिला है– एक समस्या के समाधान के लिए दूसरी समस्या सृजित करनी होगी।
    पहले कम्प्यूटर वायरस सृजित कर फैलाएँ, तभी तो एण्टी वायरस बिकेंगे। पहले बीमारी फैलाएँ, तभी तो डॉक्टरों की पूछ होगी।
  5. अरुण
    भाई साहब ये नियम मैने भी बनाया था थूकने पर १० रुपये जुर्माना अब टिपियाउगा बाद मे पहले मै भी स्टाफ़ से हिसाब मांग लू ध्यान दिलाने के लिये शुक्रिया,बहुत पैसा वसूल करना है
  6. नीरज दीवान
    (गुटखे की थूक की पिचकारी डस्टबिन में उड़ेलते हुए कह रहा हूं).. हम्म.. ये फ़ैक्ट्री वालों को पेटेंट हासिल नहीं होने दिया जाएगा. ये श्रद्धापूर्वक तमाम कार्यवाहियां करते हुए अपना राजकोषीय घाटा पूरा कर लें लेकिन थूक से दीवारों पर कलात्मक पेटिंग बनाने का पेटेंट ये कैसे हासिल कर सकते हैं?
    थूक के पीचकारना हमारा राष्ट्रीय अधिकार है. जो जितनी ऊंची पिचकारी छोड़ता है वह व्यवस्था के प्रति अपना क्षोभ उतनी ही हिम्मत से जताता है. थूक और क्षोभ एक दूसरे के पर्याय हैं. इस तरह थूकना अभियव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी जुड़ा मसला है. अब चूंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमें संविधान से मिली है लिहाज़ा संवैधानिक उपबंधों के मुताबिक़ थूकना भी मौलिक अधिकार के अंतर्गत आता है.
    थूककर चाटने के बारे मे भी पेटेंट करने के प्रयास भी न किए जाएं क्योंकि इससे देश के तमाम राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी पेटेंट नियमों से बंध जाएँगे और अपना मौलिक स्वरूप खो देंगे.
    यह आलेख पठनीय है. गहरा कटाक्ष हमारी ऑडिट प्रणाली पर. फुरसतिया जी को हार्दिक बधाई और साधुवाद.
  7. sujata
    बहुत सही ।
    वैसे थूक टैक्स पर सरकार को विचार करना चाहिये । फिर अर्थशास्त्र गुरु उस टैक्स को बचाने के उपाय बताएँगे । फिर थूक टैक्स की चोरी होगी । छापे पडॆंगे संसद मे थूकने कर टैक्स ना देने वाले सांसदो के घर ।
    खैर इस पर अलग पोस्ट बनती है जो शुक्ल जी ही बना सकते है । :)
  8. सचिन त्रिपाठी
    धासू गुरु बहुत धासू …सरकारी व्यवस्था का असके प्रस्तावों का बडा ही सजीव चित्रण और उसका उसी की भाषा मे जबाव.. मसलन-(थुकाई आख मींचकर (आनन्दातिरेक में) करते हैं। और साहब यह हमसे नहीं हो सकता कि सिर्फ़ थूकने के लिये डस्टबिन तक जायें। नहीं तो हमें थूकने का रेट (मजदूरी) दीजिये, हम थूकने लगेंगे डस्टबिन में।) .. धन्यवाद.
  9. रचना
    :) :)
  10. अनुराग मिश्र
    आsssssssक थू। कित्ता चैन है इस प्रक्रिया में। क्यों बेवजह इस पर टैक्स का विचार किया जा रहा है। जो इस पर टैक्स लगाएगा, उस पर आsssssssssssssssssssssss
  11. मनीष
    मैं तो शीर्षक देख विषय कुछ और ही समझ बेठा था । बेहद मनोरंजक प्रकरण सामने लाए हैं आप !
  12. धुरविरोधी
    :)
  13. आइये घाटा पूरा करें और सुखी हो जायें
    [...] सूचना ऐसे अन्य लेखआइये घाटा पूरा करें [...]
  14. आइये घाटा पूरा करें और सुखी हो जायें
    [...] हमें अपना एक ठो लेख याद आ गया जिसे हम काफ़ी पहिले लिखे थे। [...]
  15. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] आइये घाटा पूरा करें [...]

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