Wednesday, May 23, 2007

फ़ुरसतिया टाइम्स का पहला अंक

http://web.archive.org/web/20140419213208/http://hindini.com/fursatiya/archives/280

फ़ुरसतिया टाइम्स का पहला अंक

हम रोज-रोज सुनते-सुनते तंग आ गये कि फलाने का लेख अखबार में छपा। इसने ये लिखा उसने वो छपवाया। हमने सोचा हम भी काहे न अखबार निकालें। जब कोई किसी अखबार में किसी का लेख छपने की बात करेगा हम भी तड़ से अपने अखबार में अपना फोटू सहित लेख छाप देंगे। आपको भी छपाना है तो बताओ।
हां, ई बता दें कि हमें छापाखाना के बारे में उतनी ही जानकारी है जितनी जीतेंन्दर को ब्लागिंग के बारे में। इसलिये तमाम बेवकूफियां हुयी हैं। राजीवटंडनजी का नाम जानबूझकर नहीं डाले नहीं तो वो गुस्साते हैं कि कहां ई आउट आफ डेट तकनीक में पांव फंसा रहे हो। देखा-देखा सब लोग इंक-ब्लागिंग के तालाब में छपाक से कूद पड़ेंगे। वैसे सच तो है लोग कूदने तो लगे हैं। आज ही समीरजी अपनी ब्लाग-पोस्ट पर जो ग्राफ़ चिपकाये उसमें इंक-ब्लागिंग की तरफ़ बढ़े हुये कदम हैं।
बहरहाल आज सरसरा के ई अखबार बांचिये। ई ड्राफ्ट है। कल इसको सजा-संवार के फिर से दिखायेंगे। तब तक बताइये आप कैसा लगा।
और हां! कोई भैया, बहिनी, दोस्त, सहेली गुस्से की तोप न चलाना। काहे से कहा गया है-जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो। तो अखबार हम पहिले ही निकाल दिये। अब तोप काहे निकालते हो- बहुत भारी होती है। है कि नहीं?
इसके प्रकाशन में समीरलालजीमृणाल ने आधी रात को हमारा दूसरा पन्ना हमें इस रूप में सौंपा। इस तरह यह अखबार कानपुर, कलकत्ता और कनाडा की खुराफ़ात है। रचनाजी का भी सहयोग रहा। उन्होंने कुछ टाइटिल सुझाये थे। लोग अनुमान लगायें कि कौन सा टाइटिल उन्होंने दिया। अब इन लोगों धन्यवाद देंगे तब तो निकल चुका अखबार! है कि नहीं:)
फिलहाल तो आप अखबार बांचिये और अपनी प्रतिक्रिया अखबार दांये-बांये करने के पहले बता दीजिये तो अच्छा है। वर्ना हम पता तो कर ही लेंगे। :)

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59 responses to “फ़ुरसतिया टाइम्स का पहला अंक”

  1. चने की झाड़ पर ..घोड़े ..और चिट्ठाकार ! « हम भी हैं लाइन में
    [...] हम समझ गये कि ये पक्का बद्रीनाथ,केदारनाथ का असर है वरना हम यदि चर्चा में ही होते तो क्या टाइम्स मैगजीन में जगह ना पाते.अरे चिट्ठाजगत की टाइम्स मैगजीन फुरसतिया टाइम्स. लेकिन वो चढ़ाते रहे और हम चढ़ते रहे चने के झाड़ पर. [...]
  2. फुरसतिया » इंक ब्लागिंग, अखबार और कार्टून
    [...] हमारी इंक-ब्लागिंग और फिर फ़ुरसतिया टाइम्स को साथियों ने कुछ ज्यादा ही पसंद कर लिया। अखबार निकालने की तो ऐसी मांग हुयी कि हम अखबार के लिये आफिस, प्रिंटिंग प्रेस, कम्पोजीटर, प्रूफरीडर जुटाने की सोचने लगे। आखिर सोचने में कौन पैसा लगता है। जब प्रमोदजी बीस साल बाद रवीश कुमार के हाल सोच सकते हैं तो हम अपने अखबार के काहे न सोंचें! [...]
  3. सृजन शिल्पी
    एतना धांसू टाइप अख़बार निकाले हैं। हम तो बहुते लेट हो गए इसको पढ़ने में, लेकिन मजा आ गया।
    फुरसतिया टाइम्स के नए-नए अंकों का उत्सुकता से इंतजार रहेगा।
  4. कौतुक
    अखबार चनाचूर बेचने के लिए बहुत ही अच्छा है, फुर्सत में लोग चने खाने के बाद फुरसतिया टाईम्स के कतरन पढ़ कर समय बिताएंगे. बोले तो पब्लिक का पूरा पैसा वसूल. चनाचूर के साथ फुरसतिया टाईम्स के रोचक लेख और विज्ञापन मुफ्त.
    हम कालेज के ज़माने में चनाचूर खाने के बाद उसकी कतरनों में से कभी नायिकाओं के आधे-पूरे, ढके-छुपे तस्वीरें निहार लिया करते थे. इसलिए आप फुरसतिया टाईम्स में कुछ तस्वीरें भी जरूर शामिल करें.
    फुरसतिया टाईम्स में हमारा भी जिक्र होना चाहिए, कही नहीं तो उभरते हुए बकवासकारों में.
    सारांश में: बधाई हो, और आभार कि हम इस समय के साक्षी हुए.
  5. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] कनाडा-अमेरिका न जाओ श्याम पैंया पड़ूं… फ़ुरसतिया टाइम्स का पहला अंक ‘टेंशन नहीं लेना बेटा’ बना एनर्जी [...]
  6. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] फ़ुरसतिया टाइम्स का पहला अंक [...]
  7. recommended you read
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    My own continually rests at the bottom from the shortlist and does not report whenever i write-up love it does for other individuals, yet in my friend’s blogs and forums they have got extra me for their webpage rolls. Is this a atmosphere that I have to transformation or perhaps is this a selection that they have crafted? .
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