Saturday, August 11, 2007

आज हमारी भी छुट्टी

http://web.archive.org/web/20140419213652/http://hindini.com/fursatiya/archives/320

आज हमारी भी छुट्टी

आज पांडेयजी छुट्टी मार गये।
महाजनों येन गत: स: पन्था मानते हुये हम भी सबेरे की छुट्टी मार देते हैं।
तब तक आप पढ़ें मेरी दो पसंदीदा कवितायें। इनमें पहली न्यूयार्क के कवि सम्मेलन में पढ़ी गयी- इसका लिंक है-http://www.youtube.com/watch?v=Wx8IlgqaArc
१.आपद धर्म
अंगारे को तुमने छुआ
और हाथ में फ़फ़ोला नहीं हुआ
इतनी सी बात पर अंगारे को तोहमत मत लगाओ
जरा तह तक जाओ
आग भी कभी-कभी आपद धर्म निभाती है
अपनी ऊष्मा को अपने में पचाती है
और जलने वाली की झमता को देखकर जलाती है।
२.खारे पन का एहसास
खारे पन का एहसास
मुझे था पहले से
पर विश्वासों का दोना सहसा बिछल गया।
कल
मेरा एक समंदर गहरा-गहरा से
मेरी आंखों के आगे उथला निकल गया
डा. कन्हैया लाल नंदन

7 responses to “आज हमारी भी छुट्टी”

  1. समीर लाल
    दोनों कवितायें कहीं दूर जाकर चोट कर रही हैं, मैं अहसास सका. आप माने न माने. हमेशा नहीं याद आती ऐसी मारक कवितायें. आज तो मौका भी है, दस्तूर भी और रस्में इनायत भी. :) बहुत खूब.
  2. अभय तिवारी
    भाई हमारा तो ख्याल था कि आप छुट्टी के रोज़ ही ब्लॉगियाते (बौडि़याने के तर्ज पर) थे.. ये रोज़ रोज़ ब्लॉगियाने का रोग कैसे लगा लिया.. सँभालिये..
  3. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    कविता छूती है. गद्य समझाता है तर्क के साथ. कभी-कभी कविता से गद्य और गद्य से कविता का काम लिया जाता है. आज छुट्टी है तो कविता ही सही!
  4. Sanjeet Tripathi
    बढ़िया!!
    छुट्टी के बाद तरोताज़ा होकर लौटें और तब “खालिस फ़ुरसतियाई” पोस्ट पढ़वाएं!!
  5. प्रमेन्‍द्र
    बढि़याँ
  6. प्रियंकर
    गद्य से पहुंचे या पद्य से, बात प्रभावी रूप से सही जगह पहुंचनी चाहिए .
  7. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] आज हमारी भी छुट्टी [...]

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