Wednesday, August 29, 2007

जहं-जहं चरण पड़े संतन के तहं-तहं बंटाधार

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जहं-जहं चरण पड़े संतन के तहं-तहं बंटाधार


प्रेमेन्द्र ,ताराचन्द
पांच दिन निकल गये हमने कोई पोस्ट नहीं लिखी। क्या मौज है। :)
इस बीच प्रमोदजी के चीन यात्रा के किस्से पढ़ डाले। इकट्ठे। कल समाचार भी देखा एक अखबार में कि चीन तेजी से बुढ़ाता जा रहा है। कुछ सालों में चार बुढ़ऊ लोगों के बीच में एक जवान बचेगा वहां। फिर क्या करने जा रहे हैं प्रमोदजी वहां! पतनशील प्रयाणगीत क्या चीन में नयी आशाऒं का संचार करेगा?
आज ही एक और बयान पढ़ा। एक चीनी नेता का था। बोलिस – भारत और चीन का २००० साल का साथ रहा है। दो-तीन साल लफ़ड़े के रहे। इत्ती रगड़-घसड़ तो चलती रहती है। :) हम सोचे कि हम क्या कहें इस पर। चीन में हैं प्रमोदजी खुदै बतिया लेगें, फ़रिया लेगें।
चीन पुराण के बाद रवीशजी का कन्यापुराण बांचा पूरा। हमें पहली बार अपने छात्रावास में रहकर पढ़ने का अफ़सोस हुआ। बरसाती का बालक-बालिका अनुपात निश्चित तौर पर हमारे छात्रावासों के मुकाबले बेहतर था। अब आगे और अफ़सोस के साथ यह बालिका पुराण बांचने का इंतजार कर रहे हैं।
रवीशकुमार को पहली बार चक दे इंडिया के बहाने भारतीय समाज के बारे में बारे बाते करते हुये एन.डी.टी.वी. पर कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुये देखा। सपरिवार। भूतपूर्व हाकी कप्तान जफ़र इकबाल और फिल्म की महिला कलाकारों से बातचीत करते हुये उनको देखना अच्छा अनुभव रहा। :)
और तमाम लेख बांचे इस बीच। ज्ञानजी पता नहीं कहे इत्ता तकनीकी हो गये। कल फ़ीड-वीड के बारे में न जाने क्या बताये हमारे पल्ले ही न पड़ा। हम भी सोचे मटियाऒ। फ़ीड-वीड मैं क्या जानू रे।
आज देखा तो समीरलाल जी के जगह-जगह संदेश बिखरे हुये थे-तीन दिन के अवकाश (विवाह की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में) एवं कम्प्यूटर पर वायरस के अटैक के कारण टिप्पणी नहीं कर पाने का क्षमापार्थी हूँ. मगर आपको पढ़ रहा हूँ. अच्छा लग रहा है. अब इसका क्या अर्थ लगाया जाये? विवाह वर्षगांठ पर अवकाश कैसा? उस समय कौन से वायरस का हमला हुआ? टिप्पणी करते हुये टिप्पणी न कर पाने का अपराध बोध का क्या मतलब? और फिर इसमें अच्छा क्या लगना? तमाम सवाल हैं जिनके जवाब शायद समीरजी ही दे सकें जब विवाह-वर्षगांठ के झमेले से उबरें। :)

प्रेमेन्द्र ,अनूप व ताराचन्द
इधर देखा कि देबाशीष अपने ब्लाग जगत की तस्लीमा नसरीन बने हुये हैं। जो आता है इनके खिलाफ़ फ़तवा देकर चला जाता है। कल चिट्ठाचर्चा में इन्होंने अशोक चक्रधर की पोस्ट की कुछ मौज ली। इस पर अभिनय बोले-चक्रधर तो इस सम्मेलन की हस्ती रहे है। उनसे तो लगता है गलती से कुछ छूट गया और भाई लोग मेरे मजाक को ले उड़े। देबाशीष तो हर बात में पहला ढूंढने के चक्कर में रहते हैं अभय भाई। देबाशीष के पास भी आजकल टाइम काफ़ी है सो वे सफ़ाई भी देने को प्रस्तुत हो गये।
वैसे आजकल अरुण अरोरा भी देबाशीष के ऊपर काफ़ी मेहरबान हैं। हचक के मेहनत करते हैं। देबाशीष की महिमा का वर्णन करते हुयेलेख (कमेंट गायब ! :) टिप्पणियां लिखते रहते हैं।
एक दिन सबेरे-सबेरे हम आन लाइन हुये। उधर पंगेबाज अपनी नयी ताजी पोस्ट लिख के चढ़ाने जा रहे थे। नमस्ते हुयी। बोले -आप दिख गये अब उसको (देबू महिमा पुराण) पोस्ट नहीं कर पायेंगे। लोग आज भी बिल्लियों को देखकर यात्रायें स्थगित कर देते हैं। हमें लगा कि हम भी बिल्ली की तरह लगे पंगेबाज को कि हमको देखकर अपनी पोस्ट यात्रा स्थगित कर दी। बिल्ली वाली बात इसलिये भी प्रासंगिक है कि एकाध बार तो हमें इतना कस के हड़काया गया कि हमें भीगी बिल्ली बन जाना पड़ा। :)
बाद में हालांकि फोन करके अरुण अरोरा ने अपनी पंगेबाजी का सौन्दर्य शास्त्र भी बताया और उस दिन हमें पहली बार अपनी इस अल्प बुद्धि पर गर्व हुआ कि जटिल चीजें हमें आसानी से समझ नहीं आतीं। :)
बहरहाल, आज देबू से बात हुयी तो बता रहे थे कि मजाक करना भी बबाले जान हो गया है। सांड के साथ होने का शायद कुछ फ़ायदा हो। :)
कल ही की तो बात है। सुबह-सबेरे जल्दी उठकर नेट कनेक्ट कर रहे थे। लेकिन कनेक्शन गठबंधन राजनीति की तरह बार-बार टूट जा रहा था। फोन बजा। उधर से प्रेमेंद्र बोल रहे थे। बोले गोविंदपुरी स्टेशन( कानपुर) से बोल रहा हूं। हम बोले थोड़ा और पास आ जाओ। यहीं से बोलो आकर। वे आने के लिये तैयार भी हो गये।
प्रेमेंन्द्र ब्लागर दिग्विजय जैसी करके आये थे। दिल्ली में कई लोगों से मिले। बहुतों से बतियाये। हालत यह हो गयी कि आगरा जाना पड़ा। वहां प्रतीक से मिलकर ठीक-ठाक होकर कानपुर आ रहे थे। रेल कुछ देरी से चल रही थी इसलिये लेट हो गये। शायद रात हो जाने के कारण पाण्डेयजी को बताये नहीं वर्ना रेलवे वालों की आफ़त हो जाती।
बहरहाल, हम नहा धोकर राजा बेटा बनकर प्रेमेन्द्र का इंतजार करते रहे। बीच-बीच में नेट कनेक्ट करने का असफ़ल प्रयास करते रहे।
प्रेमेन्द्र अपने मित्र ताराचन्द के साथ आये। दोनों बबुआ पसीने से तथपथ। लगा भागते चले आ रहे हैं बुधिया की तरह। पता चला किसी ने कांक्रीट रोड की बजाय मिडिल रोड की तरफ़ टहला दिया था। मिडिल पाथ में यही लोचा है, आदमी गंतव्य तक पहुंच भले जाये लेकिन पसीना निकल जाता है। लेकिन यह संतोष भी रहता है कि जान बच जाती है।

प्रेमेन्द्र ,ताराचन्द
प्रेमेन्द्र और उनके साथी को झोले में अपना सामान बटोरे मिलन यात्रा पर निकला देखकर बरबस अपने साइकिल यात्रा के दिन याद आ गये जब हम नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे बने जिज्ञासु यायावर टहलते रहे पूरे तीन महीने। मुझे अच्छा लगा कि यह मिलन लालसा किसी न किसी रूप में बनी हुयी। मेरे सीने में न सही तो तेरे सीने में सही टाइप। :)एक बार फिर यह इरादा बनाने का मन किया कि एक बार भारत भ्रमण किया जाये -मोटर साइकिल पर। :)
आने के बाद प्रेमेन्द्र ने अपने दिल्ली यात्रा के पराक्रमों की कमेन्ट्री सुनानी शुरू कर दी। मैं और उनके साथी ताराचन्द श्रोता धर्म निबाहते रहे। बीच-बीच में हम भी अपनी आहुति डालते रहे।
प्रेमेन्द्र ने जब ब्लागिंग शुरू की थी तब शुरुआत में ही कुछ लफ़ड़े हुये। बेचारे परेशान हुये। ब्लागिंग से निराश टाइप हो गये थे। हमने तब इनसे फोन पर बात की थी। घर में भी इनके भैया से बतियाये थे। इनके घर वाले इनको बहुत प्यार करते हैं। शुरुआत में कुछ अनजाने में जो हुआ वह लाड़-प्यार से अलग का मामला था। इससे इनका मन उचट गया। लेकिन बाद में ये जम गये। और अब तो खुद ही कहते हैं- जो हमसे टकरायेगा, चूर-चूर हो जायेगा।
इनके ब्लाग पर टेनिस सुन्दरियां अक्सर दिखती हैं। कारण पूछने पर इन्होंने बताया कि ये टेनिस खेलते रहे हैं इसलिये टेनिस में इनकी रुचि है। हालांकि मेरे इस सवाल का जवाब प्रेमेन्द्र ने कोई माकूल जबाब नहीं दिया कि टेनिस में रुचि की बात से टेनिस सुन्दरियां कैसे जुड गयीं? सुन्दरियों में रुचि के कारणॊं का खुलासा
करना अभी बाकी है। :)
प्रेमेन्द्र के ब्लाग की पंच लाइन है -जो हमसे टकरायेगा, चूर-चूर हो जायेगा। बातचीत की शुरुआत में हमें लगा कि चूर-चूर होने का समय आ ही गया समझो। हुआ यह कि प्रेमेन्द्र ने अर्ज किया कि मैंने उनके नाम प्रमेन्द्र की जगहप्रेमेन्द्र का प्रचार किया है। हमें लगा कि आगे यह कहा जायेगा कि यह मुझे अच्छा नहीं लगा। लेकिन प्रेमेन्द्र ने कहा कि उनको यह नया नामकरण अच्छा लगता है। हमारा चूर-चूर होने का डर दूर-दूर हो गया तो हमने उनको इस नाम को तरह-तरह से अच्छा बताया (प्रेमेन्द्र माने प्रेम का इन्द्र) जिसे उदारता पूर्वक स्वीकार कर लिया गया।
दिल्ली के ब्लागर मीट के किस्से प्रेमेन्द्र ने विस्तार से बताये। ब्लाग पर भी जल्द ही बतायेंगे। यह भी बताया उन्होंने कि दिल्ली में कुछ दिन रहने के बाद ही अपने घर की याद बुरी तरह से आ रही थी। कानपुर जब पहुंचे तब भी वो उसी बुरी स्थिति में ही थे। तमाम बार हमने उनको रुकने के लिये कहा। लेकिन वे जाने के पक्के इरादे के साथ ही आये थे। उनका इरादा फ़ौलाद की तरह पक्का देखकर हमने और तमाम बार उनको रुकने के आग्रह की औपचारिकता पूरी की।
हमारा नेट कनेन्ट नहीं हो रहा था यह सुनकर प्रेमेन्द्र ने बताया कि वे जहां-जहां गये वहां-वहां ऐसा ही हुआ। हमें याद आया- जहं-जहं चरण पड़े संतन के तहं-तहं बंटाधार। लगा तो हमें यह भी कि ये मोबाइल जैमर तो सुने थे लेकिन ये नेट जैमर भी होता है आज पता चला। आगे शायद जहां नेट कनेक्शन की समस्या हो वहां लोग कहें – लगता है प्रेमेन्द्र शहर में आ गये हैं।
करीब एक घंटा हम लोग ब्लाग जगत के बारे में बतियाते रहे। सबेरे का समय होने के कारण ज्यादा बुराई नहीं हो पायी। बुराइयां भी अंधेरे में सक्रिय होती हैं। सूरज से मुंह चुराती हैं। :)
चलने का समय आया तो प्रेमेन्द्र ने एक और भेद खोला कि इत्ती जगह गये लेकिन कहीं फोटोगिरी नहीं हुई। हमने सोचा यह गर्व तो चूर ही कर दें बालक का। सो हमने फिर मोबाइल से फोटो ले लिये। फोटो ज्यादा साफ़ नहीं हैं। लेकिन इसे कलात्मकता के नजरिये से देखा जाना चाहिये क्योंकि फोटो हमारी श्रीमतीजी ने लिये हैं। :)
हमने प्रेमेन्द्र को सबेरे साढे आठ बजे विदा दिया। शाम को वे इलाहाबाद पहुंचे। हमने फोनियाया शाम को तो उनका इरादा जमकर सोने का था। तब तक सोने का जब तक नींद पूरी न हो जाये।
नींद पूरी होने के बाद वे लिखेंगे अपने ब्लागिंग यात्रा के किस्से। तब तक आप इंतजार करिये।

12 responses to “जहं-जहं चरण पड़े संतन के तहं-तहं बंटाधार”

  1. ज्ञान दत्त पाण्डेय
    हमें यही अच्छा लगा कि चीन बुढ़ाता जा रहा है. अजदक वहां से लौटेंगे तो सठियातत्व से पूर्णत: सराबोर होंगे. और अपने यहां तो प्रमेन्द्र/प्रेमेन्द्र चिर युवा हैं जिनसे क्या टकरायेंगे चीन प्रेमी! :)
  2. समीर लाल
    सही तो है जंह जंह पैर पडे संतन के…तह तह बंटा धार…..हमारा प्रमेन्द्र कोई कम थोडे ही है…चूर चूर करके रख देगा…कर ही रहा है..वाह और शाबाश, बालक प्रमेन्द्र…जारी रहो और सबको हिलाते रहो…,,,, बाकि आपके द्वारा मांगे जबाब अलग से दे दूँ तो चलेगा क्या? :)जरा बताना तो..!!!
  3. अभय तिवारी
    फोटो शानदार हैं..
  4. aroonarora
    अरे भाइ जी हम कहा हिंदी जगत के पितामह पर मेहनत कर सकते है,,असली मेहनत तो वह खुद करता है.हमे मेल भेजना,सुझाव देना की कैट स्कैन कराले.(जिसका हर हफ़्ते डा. कैट स्कैन करते हो उसे ये सब के लिये जरूरी लग सकता है,पर बंधु हम मे आप जितना फ़ालतू दिमाग नही है ,इसलिये हमे इसकी जरूरत भी नही है,हमे इतने अपनत्व से राय देने के लिये साधुवाद) अपने ब्लोग पर हिट पाने के लिये हमारा नाम प्रयोग करने की नई नई तरकीबे ढूढना,(ये भी पहली बार उसने ही खोज और प्रयोग की )हर जगह हर बात मे खुद को पहला सिद्ध करना..?बहुत मेहनत का कार्य है जी हम भी मानते है.
    और जी अब दूसरी बात ये उस स्वंयभू पितामह जैसे जीव ने हमारे उस पोस्ट पर खुद को और जीतू भाई को एंव उनके परिवार को लेकर जॊ ऊंट पटांग लिख मारा था..(ये उगंली कटा कर नही वो तो बहुत बडा हिम्मत वाला काम है ,उंगली पर सास लगाकर शहीद बनने जैसी हरकत थी )इस कारण हमने सारी टिप्पणिया हाईड कर दी है..हा अगर कुछ और जानकारी चाहिये तो आप हमे पुन: फ़ोन कर चरचा कर सकते है..:)आपके लिये हम हमेशा फ़ुरसत मे है जी :)
  5. आलोक पुराणिक
    इतना लंबा गायब होना ठीक बात नहीं है।
  6. Shiv Kumar Mishra
    हॉकी की बात चलाकर ठीक ही किया आपने.फोटो भी उसी के हिसाब से है.लग रहा है सेंटर फारवर्ड दो डिफ़ेन्डर्स से घिरा हुआ है.सामने होते तो टकराने का ख़तरा रहता.
    अच्छा हुआ कि प्रमेंद्र को आपका दिया हुआ नाम ठीक-ठाक लगा.वैसे भी कालिदास ने कहा है कि नाम में क्या रखा है….कालिदास ने कहा है! शायद और किसी ने कहा है….लेकिन छोड़िये, जब नाम कुछ रखा ही नहीं तो कालिदास कहें या फिर कोई और.क्या फरक पड़ता है.
  7. संजय बेंगाणी
    प्रेमेन्द्र से प्रेम भरी मुलाकात हुई तो आपको लिखने की फुरसत तो मिली.
    भाभीजी में अच्छे फोटोग्राफर के सारे गुण है. आगे से यह काम उन्ही के हवाले कर फुरसत से लिखते रहें.
  8. tara chandra PARWAZ
    GAZAB! YATRA VRITANT T0 RASBHARI KAR DIYA AAPNE.
    KHAIR MIDIL ROD ME MARNE SE BACH GAYE, LOG MAR JATE HAIN YEH PATA CHAL GAYA. YAKINAN AAPKA BANTADHAR NAHI BALKI LAMBADHAR HUA HOGA. LEKIN VIDA KARNE K TIME AAPNE GALAT DAL DIYA HI.
    FURSATIYA JI KO SADAR CHARN SPARS. BAHUT MAzA AAYA. DHERON BADHAIYAN………………………………
  9. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह
    बहुत ही अच्‍छा विवरण दिया है। पढ़ कर अच्‍छा लगा, एक एक बात याद आ गई।
    वैसे तो हमने अपने उत्‍तर भारत भ्रमण के सुबूत कहीं नही छोंड़े थे ताकि कोई यह न कह पाये कि मै उनसे नही मिला,पर कानपुर में पकड़ लिये गयें। अखिर में आपने फोटों छाप ही दी। :(
    आपके द्वारा लिखा गया, पढ़ने में अच्‍छा लगता है। मै भी अपने आपकों सारा वृतांत लिखने के लिये मानसिक रूप से तैयार कर रहा हूँ। क्‍योकि इतनी यात्रा हो गई है क्‍या लिखूँ क्‍या नही, समझ में नही आ रहा है? प्रथमिकता किसकों दूँ?
    मै भी जल्‍दी लिखता हूँ।
  10. Sanjeet Tripathi
    शुक्रिया इस बढ़िया विवरण के लिए!!
    फोटो अच्छे तो आएं हैं।
  11. श्रीश शर्मा
    लगा तो हमें यह भी कि ये मोबाइल जैमर तो सुने थे लेकिन ये नेट जैमर भी होता है आज पता चला।
    देखिए कहीं ये जैमर आपकी ब्लॉगिंग से तंग आकर भाभी जी ने तो नहीं लगवाया।
  12. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] [...]

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