Thursday, August 02, 2007

तत्काल एक्सप्रेस और उसके डिब्बे

http://web.archive.org/web/20140419213427/http://hindini.com/fursatiya/archives/313

तत्काल एक्सप्रेस और उसके डिब्बे

हमने अतुल, इंद्र अवस्थी और प्रेम पीयूष की याद की।
अतुल बोले लिखना नियमित करेगे। प्रेम पीयूष ने तो जवाबी पोस्ट भी ठोंक दी। अवस्थी बोले अभी हम तय नहीं कर पाये हैं कि भाव खायें या आलसी कहलायें या लिखने लग जायें। जब तक वे तय करें तब तक आइये आपको एक और चिट्ठाकार के बारे में बतायें।
वैसे दो पोस्ट लिखने से दो चिट्ठाकार वापस आ जायें और एक कहे कि हम भी दिखा देंगे कि हम कम फ़ुरसतिये नहीं है। यह काम भर के लिये काफ़ी है।अनुगंज की शुरुआत भी एक उपलब्धि है। चाहे कोई माने या न माने लेकिन हम कह सकते हैं कि हमारे लेख को पढ़कर ही आलोक ने अनुगूंज का एलान किया।
हालांकि आलोक पुराणिक जी बोले है- ये आप संस्मरणात्मक मोड में इत्ता क्यों चले गये हैं। अवस्थी ने भी एतराज जताया है कहते हुये-एकदम व्यक्ति नहीं संस्था बनते जा रहे। इतना हड़बड़ाना ठीक नही है। कुछ रुक के चलो।
और आप लोग एक बात और देखिये कि आलोक पुराणिक खुद तोअकबर के मोबाइल के किस्से सुनाते हैं,बाबर की रजिस्ट्री कराते हैं और हमसे कहते हैं आप संस्मरणियाते हैं। कित्ती खराब बात है। है कि नहीं आप ही बतायें। हमें लगता है उनको भी फ़ील हुआ होगा अपनी बात की गलती का अहसास इसीलिये आज अपने चैट बाक्स पर लिखे बैठे थे- कल रात शर्म से मर गये। अब इत्ता शरमाना भी क्या! जो हुआ सो हुआ आगे से ख्याल रखियगा। :)
लेकिन हम सोच रहे हैं कि जब बदनाम हो ही गयी तो कायदे से हो इसलिये एक संस्मरण और सही।
विजय ठाकुर ने अपनी तत्काल सेवा नवंबर, 2004 में शुरू की। शुरुआत ब्लागिग के औजार से परिचय की यूरेका टाइप खुशी से की-
हिन्दी चिट्ठा संसार को देखकर अति प्रसन्नता हुयी। वेब-क्रांति के ज़माने में ऐसी कोई चीज बड़ी सिद्दत से ढूँढ रहा था। हनुमानजी संजीवनी पर्वत खोज कर ले ही आये। अब जब संजीवनी मिल ही गयी है तो लगता है जीवन अवश्य लौटेगा। कालेज के दिनों में सभी कवि ह्र्दय हो जाते हैं, मैं भी हो गया था तुकबंदी शुरु हो गयी थी। थोड़ा झेंपता अवश्य था परन्तु दो-चार मित्रों को फाँस हीं लेता था अपनी कवितायें सुनाने को। तुकबन्दी तो खैर आज तलक जारी ही है, अब श्रोताओ की घेराबंदी करने की जरुरत नहीं रहेगी शायद। अब कहाँ जाओगे बच्चू, पहली बार में नहीं तो दूसरी बार में झख मारकर पढोगे। खैर, ब्लाग-सेवा को देखकर दिल्ली के फटफट सेवा की याद हो आयी। पुरानी दिल्ली जब भी जाता था तो दिल खोलकर इस सेवा का प्रयोग करता। वैसे इसका नाम फटफट सेवा तो इसकी आवाज़ की वज़ह से पड़ा था, जैसा कि हमारे इलाक़े में मोटरसायकिल को फटफटिया कहा जाता है लेकिन मुझे इसका फटाफट स्वभाव भी अक्सर देखने को मिला।
शुरुआती दौर में कवितायें भी सुनायी

बुन कुछ ऐसी, अबके चादर
तान के लंबी, बेचूँ घोड़े
बुन लूँ मैं कुछ ख़ाब सुनहरे
ग़र सूरज भी निकले सिर पर
ख़ाब हमारा कभी न पिघले
यार जुलाहे……
विजय ठाकुर के ब्लाग पर ही मैने सबसे पहले मुख्तार माई के बारे मेंपढ़ा और बाद में उसे पूरा पढ़ने के लिये किताब भी खरीदी।पी साईनाथ को इस सालमैगससे पुरस्कार मिला लेकिन उनके बारे में विजय ठाकुर दो साल पहले बता रहे थे और देबाशीष उनकी आईडी पूछ रहे थे।
विजय ठाकुर का सब्से बेहतरीन लेख जो मुझे लगता है वह था पुटुष के फूल। जीतेंद्र केआवाहन पर अपने प्यार के किस्से बताते हुये विजय ठाकुर ने लिखा 
ये बात उस वक्त की है जब मेरी मूछों की पिनकी का भी कोई अता पता नहीं था । जब मैं अपनी छठी-सातवीं कक्षा (यानी अभी बाली उमिर दस्तक दे रही थी) में था तो साथ पढनेवाली लड़कियाँ जरा वक्त मिला नहीं कि स्कूल के पीछे उगी जंगली झाड़ियों की ओर टूट पड़ती थीं। मेरे लिये ये कौतूहल का विषय बन गया था। बाद में उनके अदभुत खजाने का पता मुझे तब लगा जब उनमें से एक मुझे वहाँ ले गयी । पता चला कि सारी की सारी उन झाड़ियों पर उगने वाले छोटे-छोटे पीले और लाल फ़लों की दीवानी थीं। उस फ़ल का स्वाद उनके सिर चढकर बोलता था। झारखंड के आदिवासी उस फ़ल को ‘पुटुष’ कहते हैं। उस पुटुष का अपूर्व स्वाद मेरी ज़ुबान पर भी ऐसा छाया कि मैं भी मास्साब की नज़र चूकते ही अक्सर उनके साथ हो लिया करता।

इसके आगे का उनकी हिटलरी साहिबा का किस्सा आप खुद पढ़ लीजिये। विजय ठाकुर ने समसामयिक साहित्यकारों के अलावा स्थापित रचनाकारों से भी हमारा परिचय कराया। कालेज के किस्से कहानी भी खूब सुनाये। विकिपीडिया के बारे में जानकारी देते हुये विजय ठाकुर ने आवाहन किया था-

भारतीय भाषाओं की कहें तो जहाँ तक मेरी जानकारी है अब तक हिन्दी, बांग्ला, गुजराती, मराठी, तमिल सहित कुछ अन्य भाषाओं में इसकी शुरुआत हो चुकी है। हाँ तो मेरा सभी ब्लागी (ब्लागी शब्द लिखते ही मुझे न जाने क्यूँ भारत के दागी मंत्रियों के नाम याद आने लगते हैं) मेरा मतलब चिट्ठा लिखने वाले भाइयों से निवेदन है कि हम अपनी अपनी ठलुअई से जब भी थोड़ा वक़्त मिले तो अपनी अपनी भाषा में इस पर अपने स्तर पर छोटा ही सही अपना योगदान अवश्य करें।
विजय ठाकुर हिदी अध्यापन से जुड़े थे। अमेरिका में अपने हिंदी चेलों-चेलियों को हिदी पढ़ाते-पढ़ाते उनका हिंदी ब्लाग बनवाया। आरंभ नाम का यह टूटी-फूटी अमेरिकन हिंदी ब्लाग हमारे लिये मनोरंजक और कौतूहल पैदा करने वाला था। इसमें नियति की परेशानी है जो प्रतीक की समझ में उस समय नहीं आई थी :) 
पिछला हफ़ते मैं किसी से मिली, और वह बहुत अच्छा और रूपवान आदमी है। मगर उसी समय इस हफ़ते के दौरान मेरा एक्स-प्रेमी मेरे घर पर आने रहता है। यह बहुत मुशकिल मेरे लिये क्योंकि मैं उस से कहना चाहिती हूँ। अंत में कल मैं ने द्वार खोला और हम चार घंटे के लिये बताये। साफ़-साफ़ रात भर वह मुझे माफ़ करने रहते है, और वह मुझे उसके बहाने दिये। अब मुझे मालूम नहीं।
गांधीगिरी के नाम पर हर शौक के आगे गिरी लगाने का चलन अभी हुआ है लेकिन विजय ठाकुर के एक शिष्य नेकुम्हारगीरी दो साल पहले ही शुरू कर दी थी 
पहले से ही मैं ने आठ-नौ बरतन और दो फूलदान और पांच थालिया बनायी है । तीन दिनों में जब मैं अपने वर्ष-गांठ के लिए सिल्वी से (मेरी प्रेमिका) मिलने जाऊँगा तो मैं उसको ये पाँच थालिया दूँगा ।
इस ब्लाग में एक ग्यारह साल के बच्चे के जंगल जाने की कहानी है जिसमें वह मौत के मुंह से बच जाता है। इसपर बच्चा कहता है:
सुबह जब मैं उठा तब कुत्ता नहीं था। उसकी जगाह मेरे पिता जी पेड़ के नीचे मेरा इन्तज़ार कर रहे थे। उनसे मुझे उतरने का आदेश दिया लेकिन मैं डरा कि वे मुझसे नाराज़ हुए। हर हालत में मैं पेड़ से उतरा। उनके सामने खड़ा हुआ मैंने अपने पिता जी को सब कहानी समझाई – वन में घूमने के शौक के बारे में, जानवरों के बारे में, और ज़रूर बड़े गुस्से हुए कुत्ते के बारे में – और उनसे माफ़ी माँगी। कई लम्बे सेकन्डज़ के बाद उनने मुस्कराया। आँख मारते हुए उनने मुझे प्यार से कहा – मैं सुखी हूँ क्योंकि तू अभी तक ज़िन्दा है। हम साथ साथ घर चल गए।

विजय ठाकुर आजकल न जाने कहां हैं। जब वे भारत लौट रहे थे तो उन्होंने दनादन पोस्टें लिखीं थी। पिछले एक साल से उनकी कोई पोस्ट नही दिखी। न अतापता। सुना यह भी कि शायद उनकी तबियत कुछ खराब थी। लिखना स्थगित करने के कुछ दिन पहले विजय ठाकुर ने लिखा था: 
चिट्ठा लिखना एक तरह से मेरे सबसे अज़ीज़ कामों में शुमार हो गया था; लेकिन क्या करें बहुत चाहते हुए भी इतने दिनों अपने (और अन्य) चिट्ठे को देखने तक वापस नहीं आ सका। वक़्त ही कुछ बुरा चल रिया है। ख़ैर अब सोचा है वक़्त चाहे जैसा भी चले जब भी मौका मिला चिट्ठा लिखने से नहीं चूकना। इस बीच हिन्दी चिट्ठा जगत ने लगता है काफी छलांगे भरी हैं, कई चिट्ठाकारों ने शुरुआत मे हिन्दी चिट्ठाकारी को संशय की दृष्टि से देखा था, मुझे भी कुछ-कुछ ऐसा ही लगता था। परंतु अब इतने सारे रंग देखकर कहा जा सकता है कि वसंत दूर नहीं।

आज जब हम नित नये चिट्ठाकारों को हिंदी ब्लागिंग से जुड़ते देखते है तो हमें तत्काल एक्सप्रेस और उससे जुड़ेडिब्बों की याद आती है।
बसंत के आने के पहले हमें पुटुष के फूल वाले प्रेमी का इंतजार है।

मेरी पसंद

रिश्ता 
बूढी विधवा और जवान बेटी पर
मुनीमजी को ऐसी दया आयी
उनकी भूख भगाई, हाथ बढाया
रोटी और बेटी का रिश्ता निभाया ।।
ॠतु-चक्र
बड़ी सहजता से माँ ने बताया
वत्स – मैं पतझड़, तू है वसंत,
अतिशीघ्र ही तू होगा पतझड़,
और तेरा अंश– होगा वसंत ॥
नियति
विधी का सरौता, करे फाँक-फाँक
चाहे-अनचाहे, छिटक-छिटक जाता हूँ
लाल सुर्ख होठों से काल फिर चबाता है
कुछ निगलता जाता है, बाकी थूक देता है॥
सीख
बेकारगी के मारे
दिल छोटा क्यूँ करे है
करना है कुछ जो छोटा
तू जेब छोटी कर ले ।।
-विजय ठाकुर

12 responses to “तत्काल एक्सप्रेस और उसके डिब्बे”

  1. जीतू
    सही पकड़े शुकुल, ताने रहो, विजय ठाकुर को।
    ताजा समाचार मिलने तक, विजय ठाकुर, अच्छे बच्चे की तरह अमरीका से भारत वापस आ गए है, आजकल दिल्ली मे ही है। हमारे ’टच’ मे है, पिछ्ली दिल्ली मीट मे आने की सोचे थे, लेकिन शायद आखिरी वक्त मे कौनो काम पड़ गया। एक और बात, विजय ठाकुर सिर्फ़ ब्लॉग ही नही लिखते थे, बाकायदा ब्लॉगनाद पर इनकी आवाज भी रिकार्ड है, कभी मौका लगे तो सुन भी लिया जाए।
    विजय भाई, अगर तुम फुरसतिया का ब्लॉग पढ रहे हो तो जवाबी फायरिंग कर दो, बाकी जो होगा देखा जाएगा।
    शुकुल, अभी कुछ लोग और छूट गए है, कालीचरण (स्वयंभू भगवान) , विजय वडनेरे (सिंगापुरी) और भी है लाइन में…धीरे धीरे करके बताते है। ’टच’ मे बने रहो।
  2. Sanjeet Tripathi
    कितनी बार वाह लेंगे हुजुर इस अंदाज़ में लिख लिख कर्।
    अतना सारा मटेरियल दे देते है आप पढ़ने के लिए, मजा आ जाता है।
    शुक्रिया!!
  3. Isht Deo Sankrityaayan
    आलोक जी के कहने में न आएं. आप बेखाटक संस्मरणियाते रहें. आप के इस संस्मरण से कई नई जानकारियां मिलीं. धन्यवाद.
  4. समीर लाल
    अब विजय ठाकुर जी को पूरा पढ़ा जायेगा. विजय जी की कवितायें बहुत पसंद आई. बहुत आभार.
  5. alok puranik
    भई वाह वाह।
  6. ज्ञान दत्त पाण्डेय
    बढ़िया है, कभी-कभी हम अपनी पुरानी डायरियां पढ़ते हैं तो भी ऐसी सुखद अनुभूति होती है कि देखो हम कित्ता बढ़िया सोचने-लिखने वाले हुआ करते थे. यदा-कदा पुरानी डायरियां खोलना बहुत जरूरी होता है बैटरी रीचार्ज करने को.
    पर अभी पिछली पोस्ट पर की उद्धृत सामग्री पूरी पढ़ नहीं पाये कि यह नयी बौछार :)
  7. Sanjeeva Tiwari
    हमें हिन्‍दी चिट्ठाजगत के इतिहास के संबंध में अच्‍छी जानकारी मिल रही है, धन्‍यवाद । भईया विजय भाई नें जो अमेरिकन बच्‍चों की ब्‍ला्ग बनवाई थी उसका नाम प्रारंभ था, यू आर एल भी प्रारंभ से है ।
  8. अभय तिवारी
    आप तो भयंकर गुलज़ार टाइप फ़्लैशबैक मोड में चले गए हैं..प्लीज़ कट बैक/ डिज़ाल्व बैक/वाईप बैक टु प्रज़ेन्ट..
  9. श्रीश शर्मा
    अरे वाह फुरसतिया चाचू। लगे रहो, हमें इस तरह की स‌ंस्मरणात्मक ऎतिहासिक टाइप की पोस्टें बहुत पसंद हैं। आप इस‌ी तरह पुराने गुमशुदा और वांटेड चिट्ठाकारों के बारे में बताते रहिए।
    मजा आ रहा है। :)
  10. pramod singh
    सही है..
  11. फुरसतिया » आओ ठग्गू के लड्डू खिलायें…
    [...] अमेरिका से ही एक और सुखद समाचार मिला। अपनी तत्काल एक्स्प्रेस जिसका जिक्र मैंने कुछ दिन पहले किया था अव फिर चलने लगी है। विजय ठाकुर अब एक बार फिर से मैदान में आ गये हैं लेखन के। आशा है यह एक्सप्रेस अपने डिब्बों को साथ में लेकर हिंदी ब्लाग पटरी पर नयी मंजिले हासिल करेगी। [...]
  12. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] तत्काल एक्सप्रेस और उसके डिब्बे [...]

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