Tuesday, September 11, 2007

क्या खूब नखरे हैं परवरदिगार के

http://web.archive.org/web/20140419214116/http://hindini.com/fursatiya/archives/338

क्या खूब नखरे हैं परवरदिगार के

[कल की पोस्ट में प्रियंकरजी ने किस्से की सच्चाई के बारे में सवाल किया। सच मानो भाई किस्सा सच्चा है। आलोक पुराणिक कहते हैं कि हम ज्यादा फुरसत में आ गये यहां। यहां शाम के बाद छुट्टी सो नेट सुविधा का लाभ उठा रहे हैं। साथियों ने आग्रह किया सो आगे की कथा कह रहे हैं। पूरी सुनायेंगे जिसमें ब्लागर साथियों से मुलाकात के किस्से भी हैं। फिलहाल बात वहां से जहां कल छूटी थी।]
मामाजी से उनके घर में काफी दिन बाद मुलाकात हो रही थी। बातचीत की शुरुआत तबियत से हुयी। मामाजी की दोनों किडनियां खराब हैं। हफ्ते में दो बार डायलिसिस होती है। मंगलवार और शुक्रवार को। मैंने इस पर मौज लेते हुये कहा- मामाजी, आप बजरंगबली और नमाजअली के सहारे हो। वे हंसने लगे। बोले ठीक कहते हो! :)
इसके बावजूद उनकी जिजीविषा और व्यस्तता में कोई कमी नहीं आई है। मुझे जितना उनका लेखन प्रभावित करता है उससे ज्यादा विपरीत परिस्थितियों में उनकी संघर्ष करने का जज्बा प्रभावित करता है। ७४ साल की उमर में भी वे लगातार काम करते हैं। इधर-उधर जाते-आते रहते हैं।
इधर के दिन उनके लिये कुछ ज्यादा ही भारी रहे। खुद की बीमारी के अलावा मामीजी भी गंभीर रूप से बीमार हैं। जब उनको डाक्टरों को दिखाया तो उन लोगों ने कहा-आपने इनको लाने में बहुत देर कर दी। उस समय की अपनी मन:स्थिति को उन्होंने अपनी एक कविता में व्यक्त किया है। यह कविता उनके आपसी संबंधों के बारे में बहुत
कुछ कहती है-
मैंने पाया है उसे सारा जमाना छोड़कर,
बस समझ लो सांस का आना-जाना छोड़कर।
वो मिला तो जन्नतों की सारी दौलत मिल गयी,
दर्द भागा अपना पुश्तैनी ठिकाना छोड़कर।
वो मेरे अफसाने का मोतबर किरदार है,
मैं उसे जाने नहीं दूंगा फसाना छोड़कर।
पहले इस गजल की आखिरी लाइन थी- वो गया तो मैं भी चल दूंगा फसाना छोड़कर। बाद में
उनको लगा कि ऐसे बिना संघर्ष किये हार मान लेना कमजोरी है तब उन्होंने गजल का अंत बदला।
नंदनजी की कविताओं में ईश्वर का जिक्र पहले भी आता रहा है। लेकिन उस जिक्र में भक्त की दीनता कम, भगवान से उलाहना, शिकायत के स्वर हमेशा से प्रधान रहे हैं-
सब कुछ देखकर समरस बने रहना
ओह कितनी बड़ी सजा है
ऐसा ईश्वर बनकर रहना।
कभी युद्द के मैदान में उपदेश देते भगवान से कहते हैं:

योग और क्षेम के
ये पारलौकिक कवच मुझे मत पहनाओ
अगर हिम्मत है तो खुलकर सामने आओ
और जैसे हमारी जिंदगी दांव पर लगी है
वैसे खुद भी लगाओ।

जब से उनकी तबियत खराब हुयी है तब से उनकी कविताओं में भगवान से उलाहने बढ़ गये हैं। कभी वे लिखते हैं-
हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,
मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।
मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं
उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।
परेशानियां बढ़ीं तो परवरदिगार के प्रति उनकी नाराजगी भी बढ़ी। न्यूयार्क में उन्होंने शायद पहली बार यह कविता पढ़ी थी-
सब पी गये,पूजा, नमाज बोल प्यार के,
क्या खूब नखरे हैं परवरदिगार के।
हमने जब यह बात उनसे कही – आजकल आपकी कविताओं में भगवान के प्रति उलाहने का स्वर ज्यादा दिखता है। उन्होंने कहा- सही कह रहे हो तुम। असल में मैंने कवितायें कम लिखीं हैं। और जब भी लिखीं हैं कोशिश की है कि जो महसूस करता हूं वही लिखूं।
आपने बातचीत के उन्होंने विश्व हिंदी सम्मेलन के किस्से सुनाये। अनूप भार्गवजी से मुलाकात के बारे में जानकारी दी। अनूप भार्गवजी ने ब्लागिंग के बारे में उनको जितना बताया था उसके बारे में भी जिक्र किया। हमने मौका अच्छा जानकर अपनी दो कवितायें सुना दीं और उनकी शाबासी हथिया ली। अब भानजा होने के नाते इतना तो हक बनता है भाई! :)
नाश्ता करते-करते दस बज गये। मुझे उन्होंने अपनी दो किताबें दीं। एक तो उनकी आत्मकथा का पहला भाग
है जिसका शीर्षक है- कहां-कहां से गुजरा। इसमें उन्होंने अपने बचपन से लेकर धर्मयुग में
नौकरी ज्वाइन करने तक के किस्से हैं।
एक बात जो उनके व्यक्तित्व की मुझे बहुत अच्छी लगी वो है उनकी संबंधों की गरिमा बनाये रखने की। उनसे जुड़े लगभग सब लोग जानते हैं कि धर्मयुग के ग्यारह साल के समय में धर्मवीर भारती जी के साथ काम करते हुये उनकों बहुत कुछ झेलना पड़ा। उनके साथ के तमाम लोगों ने उनको इस बारे में ,भारतीजी के खिलाफ लिखने के लिये बहुत उकसाया। लेकिन उन्होंने किसी के उकसावे पर लिखना कभी कुबूल नहीं किया। कुछ लोग इस पर उनसे नाराज भी हो गये। अभी भी वे धर्मवीर भारतीजी के बारे में बहुत सम्मान की भावना रखते हैं लेकिन कहते हैं अब जब भारतीजी नहीं हैं तब इस बारे में और सजग होकर लिखना पड़ेगा।
अपनी आत्मकथा के अलावा उन्होंने मुझे एक और किताब भेंट की। ‘खुशबू का लिबास’ नाम की इस किताब में उनके जीवन से जुड़ी तमाम खुशनुमा यादों के चित्र हैं। दुनिया की तमाम नामचीन हस्तियों के साथ उनके फोटो हैं। लेकिन सबसे अच्छा मुझे उन तस्वीरों का प्रस्तुतिकरण लगा। फोटो के साथ किसी का मजेदार पत्र है। परिचय है। किताब की शुरुआत होती है इस कविता पंक्ति के साथ-
जो बहुत खुद में खास होते हैं,
जिंदगानी के बस वही लमहे
खुशबुओं के लिबास होते हैं।
अपने बारे में लिखते हुये अर्ज किया गया है-
कुछ भी तो नहीं था मेरे पास
सिर्फ मुसीबतों में कड़े होते जाने का अहसास
संघर्षों ने मुझे और कड़ा कर दिया है
धीरे-धीरे अनुभवों की आंच ने पकाया
मुझे और बड़ा कर दिया है।
विश्वनाथ सचदेव की फोटो के बगल में विश्वनाथ सचदेव की नंदनजी के बारे में राय भी दिखती है-

इसमें कोई शक नहीं कि नंदन अवसर का उपयोग करना जानते हैं, पर सच यह भी है कि वे अवसर तलाशते भी हैं और बनाते भी हैं। आप इसे कुछ भी नाम दें, यह तय है कि वे चनौतियों के सामने बौने नहीं पड़े। गुनगुनाना नंदन जी का शौक भी है और अदा भी। प्यारे-प्यारे गीत अपने भी और दूसरों के वे अक्सर गुनगुनाते -सुनाते रहते हैं। टेलीफोन पर भी। सच तो यह है कि कई बार टेलीफोन की घंटी बजती है। आप फोन उठाकर हेलो कहते हैं तो उत्तर में कभी किसी गीत की और कभी किसी कविता की पंक्तियां सुनायी देने लगती हैं। यह कम सिर्फ नंदन जी ही कर कर सकते हैं। पर कविता सुनाने का नंदनजी का अंदाज बड़ा प्यारा है। टेलीफोन पर भी और मंच पर भी। बात करते-करते भी अचानक नंदन कविता की दुनिया में पहुंच जाते हैं। अक्सर बात खत्म होती है उनके इस वाक्य से-क्या कर लोगे?

अपने अमेरिका में रहने वाले नाती अंकित की फोटुओं के साथ उसकी चिट्ठी की फोटो भी है। चिट्ठी में नाना, अंकित और अपने भाई के रेखाचित्र भी हैं। चिट्ठी कुछ यों है-
नामस्तं नाना।
वहां का मौसम कैसा है?
या का मौसम गरम होता जाता है।
मैं बोत चिठी लिखन्गा। कविता भी।
कविता
आप कब आओगे हमारे पास
आप कब आओगे हमारे पास
नहीं तो मैं हो जाउन्गा ऊदास।

यह तो मैंने जानकारी दी उस किताब , खुशबू का लिबास के बारे में जिसका असली आनन्द उसे देखकर ही उठाया जाता है , जिसे मुझे देते हुये मामाजी ने किताब पर लिखा- प्रियवर अनूप को ,मेरे जीवन की तमाम-तमाम यादों के साथ, जिनकी साक्षी मेरी प्यारी बहन बिटेऊ है…प्यार और आदर सहित।
यह मात्र संयोग है कि नंदनजी मेरे मामा हैं। लेकिन मैं जब भी उनके बारे में सोचता हूं तो एक ऐसे व्यक्ति के रूप में सोचता हूं जिसने अपने तमाम अभावों के वावजूद अपनी मेहनत,लगन से सफलताओं के शीर्ष छुये। अदम्य जिजीविषा है उनमें जो खुद बीमार होने के बावजूद आपकी खैरियत पहले पूछते हैं। वे मेरे लिये इसलिये आदरणीय हैं कि ७४ साल की उमर में भी वे जितनी मेहनत करते हैं इतनी लोग भरी जवानी में नहीं कर पाते। इसलिये वंदनीय हैं कि जिसको अपना आदरणीय माना उसके बारे में ओछे बयान कभी नहीं दिये। ये विरल गुण हैं जो दिन पर दिन दुर्लभ होते जा रहे हैं।
आज तो जिसे देखो अभिव्यक्ति की आजादी का झंडा लहराते हुये जिसकी मन आये छीछालेदर करते बहादुरी दिखा रहा है।
बात करते-करते दस बज गये। मुझे लेने के लिये अरुण अरोरा आ गये थे। अरुण अरोरा और सृजन शिल्पी मामाजी से मिलने के लिये उत्सुक थे। इसलिये मैंने उनसे कहा कि आप भी चलिये। वे जाने को उत्सुक न थे क्योंकि घर में मामीजी की तबियत खराब थी। बाद में थोड़ी देर के लिये आने के लिये राजी हो गये। हम सिरिल और अरुण अरोरा के साथ चल दिये। पास में ही मैथिलीजी अपने आफिस में मेरा इंतजार कर रहे थे।
मेरी पसंद
मैंने तुम्हें पुकारा लेकिन पास न आ जाना
किसी एक आशा में चहका मन
तो ताड़ गयी
एक उदासी झाड़ू लेकर
सारी खुशियां झाड़ गयी
वही उदासी तुमको छुये
यह मुझको नहीं गवारा
मैंने तुम्हें पुकारा लेकिन पास न आ जाना।
मौसम ने सीटी दे दे
मुझको बहुत छला
मैं अभाव का राजा बेटा
पीड़ायें निगला
भटके बादल की प्यासों सा
दहका हुआ अंगारा
मैंने तुम्हे पुकारा लेकिन पास न आ जाना।
कन्हैयालाल नंदन

22 responses to “क्या खूब नखरे हैं परवरदिगार के”

  1. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    नन्दन जी की गोविन्द से जो इक्वेशन है; वह मुझे बहुत जमी. मैं भी दैन्य भाव छोड़ता हूं. बहुत ठेल चुके वे. अब यह नया समीकरण ट्राई करता हूं.
    अच्छा किया नन्दन जी के निमित्त यह बताया आपने. उनके नाम में भी तो गोविन्द हैं!
    नन्दन जी को चरण स्पर्श.
  2. Jagdish Bhatia
    नंदन जी से मिलने के बाद उनके शब्द और भी अधिक दिल पर असर कर रहे हैं।
    ’मैंने तुम्हें पुकारा लेकिन पास न आ जाना
    किसी एक आशा में चहका मन
    तो ताड़ गयी
    एक उदासी झाड़ू लेकर
    सारी खुशियां झाड़ गयी
    वही उदासी तुमको छुये
    यह मुझको नहीं गवारा
    मैंने तुम्हें पुकारा लेकिन पास न आ जाना”
    दिल को छू गये।
  3. राकेश खंडेलवाल
    मेरी पसन्द के लेखक हैं नन्दन जी. उनकी कुछ पंक्तियां भुलाये नहीम भूलती
    ज़मीन का दामन थामकर दौड़ते हुए भी
    अपनी यात्रा के हर पड़ाव पर नयी ज़मीन से ही पड़ा है पाला
    ज़मीन जिसे अपनी कह सकें,
    उसने कोई रास्ता नहीं निकाला।
    कैसे कहूँ कि
    विरसे में मैंने यात्राएँ ही पाया है
  4. रजनी भार्गव
    नंदन जी का विवरण पढ़ कर बहुत अच्छा लगा.इस लेख में आपका उनके प्रति प्यार व सम्मान झलकता है.हम भी जब उनसे मिले थे तो वो बहुत अपनेपन से मिले थे.उनकी कविताएँ अनूठी हैं.हमारा प्रणाम कहिए और आशा करते हैं कि वो जल्दी स्वस्थ हो जाएँ.
  5. समीर लाल
    बस इतना कहेंगे कि ऐसा लगा जल्दी खत्म हो गया. इतना बेहतरीन बहाव चल रहा था कि लगा पढ़ते ही जायें. बहुत खूब. मामा जी को प्रणाम कहें और मामी जी को स्वास्थय लाभ के लिये शुभकामनायें.
  6. आलोक पुराणिक
    क्या बाकी ब्लागरों के लिए इस टाइप की ट्रेनिंग की जुगाड़ करवा सकते हैं क्या।
  7. arun
    आप सभी लोगो को बताना चाहूंगा की फ़ुरसतिया जी यहा अपने नाम के ठीक उलटे,बिना फ़ुरसत के आये थे..यहा उन्हे केवल अपने आगमन,गमन के साधनो मे परिवर्तन करना था,मतलब आप यू समझिये.कि आपने रेलवे स्टेशन पर उतर कर दूसरी ट्रेन पकडनी थी .तो उन ट्रेनो के बीच का वक्त ही वो फ़ुरसत के क्षण थे जो फ़ुरसतिया जी ने यहा मामाजी और हमारे साथ व्यतीत किये..वे इस समय पूना मे उपलब्ध है..इसलिये आप सबकी मामाजी के प्रति दी गई शुभ कामनाये और चरण स्पर्श पहुचाने की जुम्मेदारी मेरी रही जी,मै खुद पहुचा कल पहुचा दूगा..वहा पर मामाजी ने बताया था की फ़ुरसतियाजी काफ़ी सारे लड्डू भी छॊड गये है,उन्होने लड्डुओ को खराब होने से बचाने की जुम्मेदारी भी मुझे ही सोप दी है..वो भी निभानी है..:)
  8. संजय बेंगाणी
    अरूणजी अपनी जिम्मेदारी बहुत ही जिम्मेदारी से निभाए, हमारी शुभकामनाएं.
  9. अभय तिवारी
    नंदन जी को बचपन से जानता हूँ.. हमारी पराग के सम्पादक जो थे..
    जिनसे सम्बन्ध नहीं बने उनके प्रति भी ऒछी बात न कहना सचमुच विरल गुण है..
    उन्हे मेरी शुभकामनाएं..
  10. प्रियंकर
    अरे भाई!
    हमारा भी अभिवादन कहिएगा उन्हें .हमारी पत्रिका ‘समकालीन सृजन’ के प्रबंध सम्पादक और कवि मानिक जी को परम्परा सम्मान के अवसर पर कोलकाता में उनके साथ एक-दो दिन समय बिताने-बतियाने और खाना-दाना साथ करने का अवसर मिला था . उन्होंने खुद के द्वारा सम्पादिक एक पुस्तक भी बहुत स्नेह के साथ भेंट की थी . नंदन जी की जिजीविषा जबर्दस्त है . उनके बारे में अपने एक गुरु अशोक शुक्ल (फ़तेहपुर,उप्र और अलवर,राज.)से भी जानने का मौका मिला था जो रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ के परिवार से सम्बन्ध रखते थे .
    नंदन जी फ़ुरसतिया के मामा है इसलिए फ़ुरसतिया की ही तरह अजातशत्रु हैं .उल्टा लिख गया . फ़ुरसतिया भी अपने मामा जी की ही तरह अजातशत्रु हैं . मामा-भांजे की यह जोड़ी सलामत रहे .
  11. Sanjeet Tripathi
    बहुत बढ़िया!! अखर रहा है कि आप किश्तों में लिख रहे हो !!
    निखालिस कितबियानुमा फ़ुरसतिया पोस्ट होती यह तो भी नही अखरता
  12. अनूप भार्गव
    नन्दन जी से मिलना हमेशा उपलब्धि होती है । अभी विश्व हिन्दी सम्मेलन में उन से दूसरी बार मिलना हुई । एक बहुत ही आत्मीयता, अपनापन और सरलता सी है उनके व्यक्तित्व में । मुझे याद है Unites Nations में उद्घघाटन समारोह के बाद वापस आते हुए जब बस में मिले तो काफ़ी देर तक मेरा हाथ पकड़ कर बैठे रहे । वहां के कवि सम्मेलन का वीडियो शायद आप ने पहले भी दिया हो , एक बार फ़िर से दे रहा हूँ :
    http://wms17.streamhoster.com/vhs2007/vhs-09.wmv
    अगली बार दिल्ली गया तो उन की आत्मकथा और ‘खुशबु का लिबास’ ज़रूर अपनी साथ लाना चाहूँगा ।
    नन्दन जी और आप की मामी जी के स्वास्थय की शुभ कामनाओं के साथ।
  13. अनूप भार्गव
    नन्दन जी की एक कविता जो मैनें कवि सम्मेलन स्मारिका के लिये टाइप की थी और जो मुझे बहुत पसन्द है , दे रहा हूँ:
    परवरदिगार से एक गुफ़्तगू
    ==================
    मुहब्बत का सौदा है यह
    मुहब्बत जो मेरे पूरे जनम की कमाई है
    जिसे पाने में , और फ़िर ?
    फ़िर उसकी अदा को
    स्कूल के पहाड़े की तरह याद करनें
    सांसों में बसानें में
    आधी से ज्यादा उमर गँवाई है
    धड़कन की तरह जिसे लगाकर
    रखना पड़ता है सीने से
    जिसे छुपा कर हर साँस के साथ
    जीता रहा करीने से ।
    **
    आप को याद दिलाऊँ
    कि आपको मंदिर में एक बार
    घेर कर देर तक स्तुति गाई थी
    आप चाहें तो कह लें की थी चापलूसी
    परसाद-वरसाद भी चढाया था
    तब जाकर आपको थोड़ा तरस आया था
    और आपनें मुहब्बत का ये जज़्बा मुझ पर अता फ़रमाया था
    ***
    थोड़ा सा जेहन पर जोर डालें
    तो याद आ जायेगी सारी बात
    उसी से जुड़ी हुई दिख जायेगी मेरी यह सौगात
    जिससे जुड़ गई है अब पूरी ये कायनात !
    दर्ज होगी ज़रूर दर्ज होगी
    आपके यहाँ रजिस्टर में
    यह सारी वारदात
    सच मानो, इतना खुश था मैं ..
    इतना खुश था कि
    नहीं सो पाया था सारी रात ।
    **
    होगी आपके लिये यह घटना मामूली
    मगर मुझे तो आज तक नहीं भूली
    **
    अब देखो कि ..
    जिसे इतना लम्बा समय लगा हो पाने में
    कम से कम उतना समय तो लगेगा
    उसे भुलानें में
    **
    हिसाब लगायें
    कि इसके लिये साँसो का सिर्फ़ एक झटका
    और पूरी स्लेट साफ़ ! ..
    यह हिसाब नाकाफ़ी है !
    इसे शिकायत न समझें परवरदिगार
    यह बराबर का सौदा नहीं हुआ
    पानें और भुलानें का अनुपात
    सचमुच में नाकाफ़ी है
    इसे सुधारिये !
    ये न्यायप्रियता ईश्वरीयता में दाग़ है
    सरासर नाइंसाफ़ी है
    चलनें को तो जब कहोगे, चल दूँगा
    मुसाफ़िर हूँ , मुसलसल सफ़र में हूँ
    लेकिन पहले हिसाब तो बराबर करो
    जब बराबर हो जायें तो बता देना
    ज़ल्दी क्या है, अभी तो सुकून से अपनें घर में हूँ ।
    ——————————-
  14. फुरसतिया » ब्लागर मीट बोले तो जनवासे में बराती
    [...] नंदनजीउधौ मोहि ब्रज बिसरत नाहीं। [...]
  15. फुरसतिया » ब्लागर मीट बोले तो जनवासे में बरात
    [...] नंदनजीके घर से मुझे लेने के लिये मैथिलीजी के सुपुत्र सिरिल और अरुण अरोरा आ गये। हम उनके साथ मैथिलीजी के आफिस की तरफ चल दिये। पास ही उनका आफिस था। इतवार को वैसे बंद रहता है लेकिन वे मुझसे मिलने आये। मुझे कुछ अफसोस भी हुआ कि मेरे चक्कर में सबका इतवार खराब हो गया। [...]
  16. Dinesh Rai Dwivedi
    इस पोस्‍ट में प्रियंकर की टिप्‍पणी में अशोक शुक्‍ल का उल्‍लेख है। वे मेरे गुरू ओर साथी रहे हैं, मैं वर्षों से उन की तलाश में हूं। यदि उन का वर्तमान पता, टेलीफोन नम्‍बर, ई-मेल पता या कोई सम्‍पर्क किसी को भी जानकारी में हो तो मुझे मेल करने का अनुग्रह करे, मैं अत्‍यन्‍त आभारी रहूंगा। वैसे उन का पता कन्‍हैया लाल नन्‍दन भी बता सकते हैं। पर मुझे उनका भी सम्‍पर्क पता नहीं है। .. दिनेशराय द्विवेदी, 117, प्रताप नगर, दादाबाड़ी, कोटा-324 009
  17. फुरसतिया » ब्लागिंग् के साइड् इफ़ेक्ट्…
    [...] अभी हाल ही में द्विवेदी जी अपने पुराने जानपहचान वाले गुरू ओर साथी श्री अशोक शुक्ल से बजरिये मेरी एक पोस्ट और प्रियंकरजी के सौजन्य से फिर से मुलाकात की। यही नहीं दिनेश राय द्विवेदजी ने अपना ब्लाग तीसरा खंबा भी शुरू कर दिया। [...]
  18. फुरसतिया » मुन्नी पोस्ट के बहाने फ़ुरसतिया पोस्ट
    [...] जिंदादिली का नाम है बस यूं हीPopularity: 1% [?]Share This (No Ratings Yet)  Loading …  [...]
  19. anitakumar
    आप के मामा जी की कविताएं और परवरदिगार से उल्लाहने सब बड़े अपने से लगे। उनकी आत्मकथा खरीदने की कौशिश करेगें। अनूप भार्गव जी ने जो लिंक दिया कवि सम्मेलन का वो हमारे पी सी में तो नहीं खुला । इस लिए उसमें दी कविताएं सुनवाने की कृपा करें। हम भी यही कहेगें मामा- भांजे की जोड़ी सलामत रहे
  20. : मेरी ख्वाबगाह में नंदन- ज्ञानरंजन
    [...] नई दुनिया, दिल्ली के 26 सितंबर के अंक से साभार! संबंधित कड़ियां: १.कन्हैयालाल नंदन- मेरे बंबई वाले मामा २.कन्हैयालाल नंदन जी की कवितायें ३.बुझाने के लिये पागल हवायें रोज़ आती हैं- कन्हैयालाल नंदन जी का आत्मकथ्य ४. क्या खूब नखरे हैं परवरदिगार के [...]
  21. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI
    कोशिश कर रहा हूँ कि नंदन जी के जीवन पर जितना हो सके …जानकारी ठेल सकूं !….पब्लिश करने के पहले आपको सटीकता और सत्यता की जांच करने के लिए मेल करूँगा ….आखिर आप भांजे जो ठहरे ?
    प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI की हालिया प्रविष्टी..हम हैं तो आखिर वही सड़ी मिडिल क्लास मेंटेलिटी वाले
  22. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] क्या खूब नखरे हैं परवरदिगार के [...]

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