Thursday, October 09, 2008

मनुष्य खत्म हो रहे हैं.. वस्तुयें खिली हुई हैं (२)- अखिलेश

http://web.archive.org/web/20140419215247/http://hindini.com/fursatiya/archives/541

16 responses to “मनुष्य खत्म हो रहे हैं.. वस्तुयें खिली हुई हैं (२)- अखिलेश”

  1. समीर लाल 'उड़न तश्तरी वाले'
    विजय दशमी पर्व की बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.
  2. rachna
    यदि नहीं मिलती हैं तो पवित्र नफरत और गुस्से भरी सामूहिक गतिविधि।
    sahii kehaa
  3. दिनेशराय द्विवेदी
    अखिलेश का आलेख सामयिक है। लेकिन लंबा है। ब्लाग में उस की पठनीयता कम रहेगी। इस का कारण भी है कि यह ब्लाग के फार्मेट को सोच कर लिखा नहीं गया है। पत्रिका के लिए तो वह सही है। ब्लाग में इतनी लम्बी बात कम से कम पांच टुकडों में कही जाए और सारे टुकड़े स्वतंत्र भी हों। जैसे सूरज का सातवां घोड़ा उपन्यास था।
    इस आलेख में मार्क्सवाद का उल्लेख है। मार्क्सवाद हमने नाम दे दिया है क्योंकि उस दर्शन को सर्वप्रथम व्यवस्थित रूप से मार्क्स ने रखा। वस्तुतः वह द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दर्शन है जो जगत को उसी तरह परिभाषित करता है जैसा वह है। जगत एक वास्तविकता है, वह अजन्मा है इसलिए मरेगा भी नहीं। इस कारण मार्क्सवाद की मृत्यु असंभव है। हाँ वह भविष्य को देखने का अवसर देता है। हम उसे देखते हैं और शीघ्र उसे लाने का प्रयत्न करते हैं। लेकिन जगत और उस का हिस्सा मानव समाज तो परिस्थितियाँ बनने पर अपने समय से ही बदलेंगे। परिवर्तन के पहले जितने कष्ट मानवजाति को देखने हैं देखने ही पड़ेंगे। हाँ हम परिस्थितियाँ पकाने में अपना योगदान कर सकते हैं।
    आम लोग इसीलिए कहते हैं- होहिहीं वही जो राम रचि राखा।
  4. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    उद्वेलित कर रहा है यह लेख। और सब बातें न तो स्वीकारने का मन हो रहा है न सब अस्वीकारने का। असल में विचारों को समय-काल से डिटैच कर परखना कठिन होता है।
    और अपनी विश्लेषणात्मक क्षमता की सीमायें भी नजर आती हैं।
    बहुत अच्छा लिखा है।
  5. ताऊ रामपुरिया
    शुक्ल जी दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं ! इस लेख को पढ़ना शुरू किया , बस पढ़ता ही गया ! रचना की लम्बाई यहाँ बाधा नही बनी ! एक बार लय पकडी तो पूरा पढ़े बिना रुक नही पाया ! इस रचना को यहाँ प्रस्तुत करने के लिए आपका बहुत आभार !
  6. Lovely
    इस आलेख के एक- एक शब्द से सहमत हूँ.विजयादसमी की हार्दिक शुभकामनायें
  7. डा. अमर कुमार
    “इस समय के लिये भी लेखक भी असह्य हैं !”
    वाकई सचबयानी एक बहुत ही बड़ा ज़ोखिम बनता जा रहा है ।
    एक दूसरी त्रासदी इस स्थिति को और भी भयावह बना रही है, वह यह कि..
    सुविधाप्रद लेखन को मान्यता ही नहीं, बल्कि प्रोत्साहन मिलता जा रहा है !
    बेचैन कर देने वाला यह एक आलेख प्रस्तुत कर, आपने मेरा एक अनाम आदर पुनः अर्जित किया है ! अभिवादन लें !

  8. seema gupta
    विजय दशमी पर्व की बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं..
    regards
  9. भूतनाथ
    बहुत सुंदर आलेख ! आपको इसके लिए बहुत बधाई !
  10. Dr .Anurag
    विजय दशमी पर्व की बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं…….
    लेखक की सोच अच्छी है ……एक बार फ़िर उनसे मिलवाने का शुक्रिया
  11. Raj Sinh (rajsinhasan vale)
    JHOOTH AUR SAUNDARYA HATYA KE KHILAF DATA EK VYAKTI NAHEEN ‘TADBHAV’ KA SANSTHAN KHADA HAI. BAHUT HEE VICHAR GAMBHEERATA AUR UTTEJAK VIMARSH. KALAM THAMNE KEE JAROORAT AUR JIMMEDAREE DONO KEE ANIVARYATA BATATA LEKH.
    PRASTUTI KE LIYE DHANYAVAD.
    VIJAY DASHMEE KEE BADHAYEE.
    AKHILESH JEE ! VIJAYEE BHAV. TADBHAV.
  12. Raj Sinh (rajsinhasan vale)
    BANDHU-E-FURSAT !
    GURU AAPKE YAHAN YE MAST MUKHAUTE KAUN LAGATA HAI ?
    YAHAN TAK KEE MERA BHEE CHAUKHATA SUNDAR NAJAR AATA HAI !
  13. Abhishek
    दोनों भाग की लम्बाई देख कर डर तो लगा… भगा-भगा के पढ़ रहा था, पर विचारणीय है… थोडी देर में स्पीड अपने आप कम हो गई.
  14. ml gurjar
    aapko sadhuwad
  15. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] [...]
  16. saagar
    शुक्रिया ! आपने कुछ दवा दे दी.
    saagar की हालिया प्रविष्टी..कुछ तो नाज़ुक मिजाज़ हम भी, और ये चोट नई है अभी

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