Wednesday, May 13, 2009

होइहै सोई जो ब्लाग रचि राखा

http://web.archive.org/web/20110925213706/http://hindini.com/fursatiya/archives/612

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

34 responses to “होइहै सोई जो ब्लाग रचि राखा”

  1. dhiru singh
    आपकी इलाहाबाद की रोचक यात्रा और जूता स्टैंड दोनों ही अच्छे लगे . वहा की मिटटी की कहानी का इंतज़ार
  2. दिनेशराय द्विवेदी
    जनरल डब्बे का सफर ऐसा ही होता है। हम कानून पढ़ते टाइम तीन साल किए हैं। पर उस ट्रेन में जनरल के अलावा कोई डब्बा नहीं होता था। पंखा जूतों के लिए आदर्श स्थान है। इस से यात्रियों को उन की गंध भी मिलती रहती है। जूतों का संकट बैठ कर जीमने वाली ज्योनार में भी होता है। जीमते वक्त सारा ध्यान जूतों में रहता है और अक्सर बदहजमी हो जाती है।
  3. yunus
    राजाबेटा बने, टिपियाए, उचके, चिंति‍त हुए, घबराए । साढ़े तीन घंटों में पूरी शाहरूख की पिच्‍चर हो गई जी । इसके सीक्‍वेल का इंतजार है ।
  4. ताऊ रामपुरिया
    मुझे बताया कि इलाहाबाद की सरजमी की मिट्टी हमारा इंतजार कर रही है तब हम और घबड़ाये। हे भगवान ये क्या लफ़ड़ा करवा रहे हो? पहले जूते दिखाये अब वहां मिट्टी इंतजार कर रही है। लेकिन अब किया क्या जा सकता था? टिकट के पैसे खर्च चुके थे। लौटते तो घर वाले पूछते लौट काहे आये? इलाहाबाद वाले पूछते आये काहे नहीं?
    वाह जी आज कई दिनों बाद असली फ़ुरसतिया खुराक मिली. सुबह के नाश्ते के लिये धन्यवाद. वैसे चिठ्ठा चर्चा मे भी नाश्ता ही मिल रहा है और यहां भी नाश्ता ही है?
    फ़ुल लंच कब मिलेगा? घणे दिन होलिये इब तो.
    रामराम.
  5. mahendra mishra
    वाह राजा बेटा बन कर गए . रेल में जूता स्टैंड क्या कहने . फोटो देखकर लगता है कि चलने वाले है . इलाहाबाद कि सरजमीं पर आपने विचार भी बांटे . बढ़िया संस्मरण पूर्ण आलेख .
  6. जीतू
    अच्छा हुआ, तुम समीर भाई के झांसे मे नही आए, वो खुद तो दुनिया जहान मे घूमते रहते है, (एम्स्टर्डम, पता नही कौन कौन सी एडल्ट सिटी मे…और दूसरे को कानपुर से इलाहाबाद जाने से मना करते है। बहुत नाइंसाफी है ये…..
    अच्छा है, लद-फद कर तुम इलाहाबाद तक तो पहुँच गए। (कम से कम कानपुर की टेंशन तो थोड़ी कम हुई)। अच्छा किए कि बिना सोर्स के जनरल डिब्बे मे बैठे, ज्ञान जी के आदमी बोलकर बैठते तो, खांमखा गार्ड के साथ बैठना पड़ता, चाय नाश्ता (वेस्ट) होता सो अलग से। रेलवे की बचत कराओ भई, हम सभी का पैसा लगा है उसमे।
    फिर इलाहाबाद मे क्या क्या हुआ, नेतराम की कचौड़ियों पर हाथ साफ किया कि नही, लिखना….
  7. संजय बेंगाणी
    सामान्य डिब्बे में अहमदाबाद-सूरत की बहुत यात्राएं हुई है, होती है. हमें लगा जूते पंखे पर रखना, उपर बैठना वगेरे यहीं की संस्कृती है. मगर यह तो अखिल भारतीय है. :) रोचक विवरण.
  8. LOVELY
    वाह!! ..आज पुरे रंग में दिखे फुरसतिया जी..आगे की कहानी का इन्तिज़ार है
  9. Shiv Kumar Mishra
    बहुत बढ़िया विवरण.
    ब्लागर के ऊपर पनही पड़ने का समय अभी बहुत दूर है. कम से कम साथ साल तो लगेंगे ही. जिन्हें पड़ रहे हैं उन्हें पड़ने में साथ साल लग गए….:-)
  10. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    यूं सबके सामने दिल खोलकर बात नहीं करते,
    बड़ी चालाक दुनिया है जरा समझा करो यारो।

    —————-
    बिल्कुल सही। कम बोलना और जूते संभाल कर रखना चाहिये!
  11. dr anurag
    ससुरी ब्लोगिंग बड़ी खतरनाक चीज है….जहाँ मौका लगे वहां फोटो दाब दी…..अब तो ये जमाना आ गया की कल एक साहब खड़े चौराहे की फोटो खींच रहे थे .हमने आव देखा न ताव फ़ौरन ब्रेक लगाए …..क्यों भाई ब्लोगर हो क्या ?अरे नहीं साहब सड़क बनवा रहे है….ये कैमरा नहीं है……
    पंखो का सदुपयोग भारतीय परम्परा है ….चलती रहेगी….
  12. महामंत्री तस्‍लीम
    प्रमोद जी की गजल बढिया है। इलाहाबाद यात्रा का वर्णन भी मजेदार है।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }
  13. आलोक पुराणिक
    क्या केने क्या केने। इधर इलाहाबाद में बहूत ब्लागरमीट होण लाग री हैं। सब ठीक तो है।
  14. Dr.Arvind Mishra
    इरफ़ान नहीं इमरान ?
    इलाहाबाद यात्रा प्रथम चरणे सम्पन्न भवेत् ( व्याकरण अशुद्धि जो होगी ही के लिए क्षमा ) आगे का इंतज़ार है !
    देख कर तो नहीं लगा था की रास्ते भर धकिवाये गए हैं !
  15. Abhishek Ojha
    आप कानपुर से इलाहबाद तक जनरल में गए और इतने कम में निपटा दिया? कहीं बीच में आप झपकी तो नहीं लेने लग गए… :-)
  16. कुश
    आपके स्टाइल को प्रणाम..! जो खिलखिला के हंसा हूँ कि अडोसी पडोसी पूछ रहे है पगलाए गए हो का?
  17. anitakumar
    राजा बेटा इस उम्र में स्प्रिंग एक्शन से उछल कर ऊपर की बर्थ पर चढ़े? गनीमत है चोट वोट नहीं लगी, इस उम्र में ऐसी उछल कूद नहीं करनी चाहिए न्। जनरल डिब्बे में क्युं गये, इलाहाबाद यूनीवर्स्टी वाले रेल भाड़ा नहीं दे रहे थे क्या? इलाहाबाद की सरजमी पर क्या हुआ जानने के लिए बेताब हैँ?
  18. सैयद अकबर
    ऐसे जूता स्टेंड का इस्तेमाल हमने भी खूब किया है.
    ..रोचक विवरण
  19. जि‍तेन्‍द्र भगत
    गजब रही यात्रा,
    (फोटो में जेनरल बॉगी भी हवाई जहाज लग रहा है:)
    आपकी पसंद मुझे भी पसंद आई,
  20. नीरज रोहिल्ला
    हाय दईया कहाँ गये वो लोग,
    जनरल किलास के डिब्बे में ऊपर की सीट पर इस अंदाज से उचकते हुये चढना कि नीचे की सीट पर बैठे लोगों के चेहरे के सामने से लेकिन बिना छुये चरण पादुकायें अजदकी मुद्रा में ऊपर समकोण बनाती हुयी पंहुच जायें। उसके बाद अगला काम जूते उतारकर पंखे पर टिकाना। अगर पंखा घूम न रहा हो तो टिकट (उस जमाने में दफ़्ती वाली भूरे रंग की टिकट होती थी) से उसे हिलाकर चलाने की कोशिश करना। मजे की बात कभी कभी वो ऐसे घुमाने से चल भी पडता था।
    पोस्ट अधूरी छोड दी आपने, इलाहाबाद में क्या हुआ? :-)
  21. ranju
    बहुत हँसाने वाला यात्रा वर्णन है :) रोचक लगा आपका लिखने का अंदाज़
  22. समीर लाल
    फाईनली तोहफा पाये की नहीं..हम तो आपके सेलिब्रेटी बनने का इन्तजार ही करते रहे.
    मस्त यात्रा विवरण.
    प्रमोद तिवारी जी की कुछ रचनाऐं उनकी आवाज में पॉडकास्ट की जायें. एक बस सुनी: आज तक आवाज कानों में बसी है–राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं….ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं.
  23. - लावण्या
    बेहद मस्त रहा आज का यात्रा विवरण मय चित्र व कविता -
    आगे क्या हुआ ? वो भी तो कहीये
    - लावण्या
  24. Kajal Kumar
    ओह…
    जब तक पंखे पर जूते की बात तक नहीं पहुँच था..तब तक समझ रहा था कि शायद आपने थैलों कि ब्लॉग्गिंग का फोटो लगाया है पोस्ट में…समां बाँधने के लिए..
    में तो बैठे ठाले ही पप्पू बन गया :) )
  25. E-Guru Rajeev
    हिंदी की ब्लॉगर सभा और हमें नहीं बुलाया गया.
    अच्छा किया, वर्ना हमारे घर-घुसना होने का राज़ खुल जाता.
    ;-)
  26. मीनाक्षी
    सफ़र का रोचक वर्णन और बीच बीच में छोटी छोटी चुटकियाँ लेना भी एक खासियत है …आगे के वृत्तांत का इंतज़ार है…
  27. venus kesari
    आपका जिस तरह का भव्य स्वागत हुआ हमने तो सोंचा था पर्सनल जेट की व्यवस्था होगी आपके पास हमको का पता की एक महान ब्लॉगर भी अपने टाईप के होते है
    आपका वीनस केसरी
  28. मिल्खा सिंह, रिक्शा चालक और दृष्टिहीन अध्यापिका
    [...] पहुंचते-पहुंचते साढ़े ग्यारह बज गये थे। इसी समय [...]
  29. Prabhat Tiwari
    गदराय और टिपियाना शब्द का रोचक इस्तेमाल अच्छा लगा………..
    यात्रा वृत्तांत अच्छा लगा…….
  30. amit
    खूब, वाकई अच्छा हुआ के आपके साहब ब्लॉगर नहीं हैं और न ही ब्लॉग पढ़ते हैं वर्ना उनको पता लग जाता कि आप ब्लॉगर मीट के लिए छुट्टी लेकर इलाहाबाद जा रहे थे! ;)
    जूते सलामत बच गए आपके कि कोई ले गया? यह तो लिखे नहीं! :)
    और पुराणिक जी ठीक कै रिये हैं, इलाहाबाद में बहुत ब्लॉगर मीट होने लाग री हैं, के बात है!
  31. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह
    बेहतरीन पोस्‍ट, ऐसी यात्राओं में बहुत कुछ देखने को मिल जाता है
  32. kanchan
    यूं सबके सामने दिल खोलकर बात नहीं करते,
    बड़ी चालाक दुनिया है जरा समझा करो यारो।
    अरे आजकल रोज हमें यही सझाया जाता है….! और हम हैं कि बतियाये जाते हैं, बतियाये जाते हैं :)
  33. Sanjeet Tripathi
    आज मेरा साप्ताहिक अवकाश है इसलिए फुर्सत में बैठकर ‘फुरसतिया’ की पोस्टें पढ़ रहा हूं।
    आप इतनी मौज में कैसे लिख लेते हैं यही सवाल कौंधता रहता है।
  34. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] होइहै सोई जो ब्लाग रचि राखा [...]

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