Thursday, May 14, 2009

मिल्खा सिंह, रिक्शा चालक और दृष्टिहीन अध्यापिका

http://web.archive.org/web/20140419215542/http://hindini.com/fursatiya/archives/613

30 responses to “मिल्खा सिंह, रिक्शा चालक और दृष्टिहीन अध्यापिका”

  1. कुश
    बुजुर्गियत को इस झांसे में आकर नकारना नादानी है।
    इसे मैं सेल्फ डीफेंस तो नहीं समझु ना ?
    कुछ लड़कियां आइसक्रीम चूसती हुयी आपस में बतिया/मुस्करा रहीं थी।
    आप उन्हें क्यों देख रहे थे?
    अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं ।
    अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ: ॥

    लिख कर रखने लायक श्लोक है..
    वैसे गूगल ट्रांसलेटर सीता को sita नहीं करता.. इसके लिए तो quiilpad type कोई साईट काम करेगी ना.. ?
    देखते है अब आगे क्या हुआ ?
    अरे एक बात पूछना तो भूल ही गए.. आपको वो मकई वाला बुढा मिला या नहीं ?
  2. बरकत चच्चा

    दऊआ, हमका चीन्ह नहिं पायो ?
    ऊई मिल्खा सिंह का रिक्शा जमा करे का टैम होत रहा,
    एहि बित रिक्शा हन्न ऊआ जोति डारा ।
    मुला फोटू नक्सा अऊर हवाल चकाचक दिहौ आय ।

  3. रवि
    “…लेकिन ऐसा साफ़्टवेयर क्या कोई है जो कि हिंदी में टाइप की हुई सामग्री को सुन सकने लायक आडियो फ़ाइल में बदल सके।…”
    ऐसे तो एक नहीं, कोई तीन-चार सॉफ़्टवेयर हैं. एक तो ऑनलाइन सेवा है. कुछ कड़ियाँ -
    http://vozme.com/index.php?lang=hi
    ये कड़ी रचनाकार के बाजू पट्टी में भी है. लगता है आप रचनाकार ध्यान से नहीं पढ़ते :(
    तथा इस बारे में मेरी एक प्रविष्टि भी है -
    http://raviratlami.blogspot.com/2007/01/blog-post_12.html
    लगता है कि आप मेरा ब्लॉग तो कतई नहीं पढ़ते (अन्यथा आपको याद रहता, क्योंकि आपकी याददाश्त तो लाजवाब है?) :(
  4. mahendra mishra
    बहुत ही बढ़िया सचित्र यात्रा संस्मरण और रिक्शे की सवारी खूब रही होगी . जबलपुर में तो कई रिक्शे में धचके खाने का अनुभव प्राप्त शायद आपको भी प्राप्त हुआ होगा. इलाहाबाद में मीट में आपकी उपस्थिति ने निश्चय ही ब्लागरो में नई उर्जा और जान फूंक दी होगी . जानकारी देने के लिए धन्यवाद.
  5. संजय बेंगाणी
    हमें तो श्लोक पसन्द आया.
    रिक्शे का अनुभव जोरदार रहा होगा… :) रिक्शे में फार्मूला वन रेस का मजा…क्या बात है ..
  6. dr anurag
    ..उन नेत्रहीन अध्यापिका की जिज्ञासा का शायद समाधान विशेषग निकाल सके यही कामना करता हूँ
  7. रंजन
    इलाहबाद में इतनी बातें हुई, आज पता चला….
    “रास्ता दिमाग से उतर गया था…” शुक्र है…
  8. omताऊ रामपुरिया
    सच में हम बल-बाल बचे। हमने रिक्शे वाले से कहा- इत्ती जल्दी भी नहीं है कि निपट ही जायें। आराम से देखदाख के चलो भाई।
    अब इनमे बैठना तो छॊडिये..कही हड्डी पसली चटका गई तो फ़िर इस उम्र में जुडने वाली नही है. फ़िर हम कहां से ये फ़ुरसतनामें पढेंगें?
    रामराम.
  9. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    वाह, रविरतलामी का वोजमी का लिंक तो मस्त है।
    मैने उसकी तख्ती मैं भरा “उल्लू का पठ्ठा” और उसने अपनी कम्प्यूटरीय मेटेलिक टोन में वही सुनाया!
    मजे की बात है कि उसकी एमपी३ फाइल भी डाउनलोड की जा सकती है।
    आपके ब्लॉग पर रविरतलामी का जयकारा लगायें तो आप जल भुन तो न जायेंगे!
  10. Dr.Arvind Mishra
    कुछ लड़कियां आइसक्रीम चूसती हुयी आपस में बतिया/मुस्करा रहीं थी।
    बस पूरे वृत्तांत -२ में यही आकर्षक लगा ! बाकी हम इलाहाबाद में कुल फजीहत करा चुके हैं -आप तो गिरे नहीं हम गिर कर पैंट तक phatvaa चुके हैं !
    रिक्शा सिविल लाईन्स से विज्ञान परिषद् तक गुरुत्व वेग से चलता है चालाक और सवार निमित्त मात्र रहते हैं -अब इस भौगोलिक तथ्य से आप परिचित हो भी तो कैसे ? इस बार भी नहीं हो पाए -बता दे रहा हूँ ! आगे सावधान रहिएगा पूरे रास्ते के ढलान पर ! कविता जी फिर आयेगीं और आप फिर जायेंगें ! विज्ञान परिषद् में जो एक बार घुस जाता है सात समुद्र पार से आता है बार बार -भले ही वहां कुछ नहीं है !
  11. ajit ji wadnerkar saheb
    रविरतलामी…जिंदाबाद
    अनूपजी, ज्ञान जी द्वारा माइक्रों फाइनांस किए रिक्शे में बैठने के तो हम भी तलबगार हैं….
  12. दिनेशराय द्विवेदी
    हम जमीन पर ही रहते हैं
    अंबर पास चला आता है।
    इस में सब समा जाता है
  13. Abhishek Ojha
    ‘मिल के न दिया।’ एक अरसे बाद ये वाक्य मिला मज्जा आया पढ़ के.
  14. रंजना
    आप जिस निराले अंदाज में लिखते हैं ,साधारण बातें भी असाधारण रोचक हो जाते हैं….
    आपका यह संस्मरण बड़ा ही रोचक आनंद दायक लगा.
  15. मीनाक्षी
    निराला अन्दाज़ ही संस्मरण को रोचक बनाता है…कुश के सवालों का जवाब ज़रूर दीजिएगा..हम भी जानना चाहते हैं….!!
  16. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    मेरे साथ आप घण्टों रहे लेकिन रिक्शा वाला एडवेन्चर नहीं बताए? खैर बड़ा रोचक किस्सा लिख दिया आपने। मेरी पत्नी कविता जी का लेक्चर देता हुआ फोटो देखकर अचानक जोर से हँस पड़ीं। मैने हैरत से इसका कारण पूछा तो बोलीं कि देखिए न इनकी मुद्रा तो ‘डान्स’ वाली लग रही है।
    अब आपलोग भी दुबारा देख कर बताएं। मैं तो घरवाली से सहमत हूँ।
  17. ranju
    रोचक रहा यह भी .. ..:)
  18. सैयद अकबर
    ‘फ़ोनियाया’ अच्छा शब्द है….
  19. समीर लाल
    एक तो बेचारा गरमी में भगा भगा कर पहुँचाया और उस पर से ये??
    श्लोक बहुत जमा!!
    अब आगे की सुनायें..
  20. Prabhat Tiwari
    इलाहाबाद की मिट्टी ने आपको घिग्घी बंध जाने जैसे लुप्तप्राय हो चले शब्द से रूबरु कराया यह जानकर अच्छा लगा……
    कुछ भी हो आपके साथ घटी घटना अत्यन्त रोचक रही,आपकी लेखनी का यही आकर्षण मुझे आपकी रचनाओं के माध्यम से आपसे रूबरु होने का मौका देता है….
    आशा है यह सिलसिला अनवरत चलता रहेगा…..
  21. amit
    रोचक रहा मामला, बाकी सब छोड़िए रिक्शे की सवारी आपकी जबरजस्त रही, ही ही!! ;)
    अनुनाद जी के ब्लॉग वाला श्लोक तो वाकई धांसू सा है!
    मैने उसकी तख्ती मैं भरा “उल्लू का पठ्ठा” और उसने अपनी कम्प्यूटरीय मेटेलिक टोन में वही सुनाया!
    वाकई मस्त है जी, गालियों का भी सही उच्चारण करता है, ही ही ही!! ;)
  22. - लावण्या
    कविता जी की विद्वता यहाँ भी झलक रही है – श्लोक बहुत सारगर्भित है
    रवि भाई का तकनीकी ज्ञान भी तो लाजवाब है !
    और आपकी लेखन शैली विलक्षण !
    एक से बढकर एक —
    – लावण्या
  23. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह
    घरवाली से सहमत होना ही पड़ता है :) कविता जी की छवि बहुत कुछ कह रही है कल्‍पनाओं का संसार होना चाहिये।
    बढि़या पोस्‍ट, आपका इलाहाबाद आना तो हुआ
  24. हंसती, खिलखिलाती, बतियाती हुई लड़कियां
    [...] कल की पोस्ट में कुश ने सवाल किये थे, सवाल क्या मौज ली थी मुझसे। उनके सवाल थे- बुजुर्गियत को इस झांसे में आकर नकारना नादानी है। [...]
  25. kanchan
    हम न हिमालय की ऊंचाई,
    नहीं मील के हम पत्थर हैं
    अपनी छाया के बाढे़ हम,
    जैसे भी हैं हम सुंदर हैं।

    बहुत खूब…!
    हम भी कभ कभी ऐसे रिक्शे वालों से कहते हैं कि ,“भईया आफिस ही पहुँचाना..हॉस्पटल नही” :)
  26. Sanjeet Tripathi
    इलाहाबाद के रिक्शे का अनुभव अपन को भी है, साथ ही बनारस के रिक्शे का भी।
    और अपने शहर के रिक्शे का भी। कुल मिलाकर सभी जगह के रिक्शा चालक एक सा ही चलाते हैं ;)
    बाकी ये आईस्क्रीम वाले लोकेशन का पता हमका दिया जाए। अगले प्रवास में पहुंचेंगे जरुर उहां। ;)
  27. venus kesari
    रोचक, अति रोचक
    मजा आ गया आपकी यात्रा वृत्तांत को पढ़ के
    सुना है आप फिर से इलाहाबाद आने वाले है
    (ज्ञान जी की चाय की दूकान वाली पोस्ट पर भी ध्यान दीजियेगा :)
    आपका वीनस केसरी
  28. कविता वाचक्नवी
    ये दृष्टिहीन अध्यापिका परिषद् के शीर्ष पदाधिकारी जी की पुत्री हैं। ५-६ माह पूर्व जब इस व्याख्यान को प्रायोजित/ आमन्त्रित करने की इच्छा संस्था ने दिखाई थी, तभी इन अध्यापिका का उल्लेख व इन्हें दृष्टि में अखते हुए सहायक संसाधनों की जानकारी की अपेक्षा भी व्यक्त उन्होंने की थी। तदर्थ उन्हें लगभग ८-९ संसाधनों व एक दृष्टिहीनों -मात्र के लिए चलाई जा रही प्रयोगशाला (लैब/ ट्रैनिंग सेंटर) की जानकारी उन्हीं के लिए एकत्रित करके उन्हें दी गई। उसका विशद वर्णन यद्यपि मुख्य व्याख्यान में नहीं किया गया, किन्तु कार्यक्रम के पश्चात् चायपान के समय जिस समय का यह चित्र है, उस समय उन्होंने (अध्यापिका के पिताजी ने) साथ बिठाकर स्वयं वह सारी जानकारी/संसाधन आदि लिखित रूप से ले ली थी। उसमें वे सभी संसाधन भी मुख्यत: सम्मिलित हैं, जिनका TTS के लिए रवि भाई ने विधिवत् आलेखबद्ध प्रकाशन किया था। साथ ही अन्य कुछ व्यक्तिगत बातें भी हुईं (क्योंकि विज्ञानपरिषद् से हमारे संबन्ध ३० वर्ष से भी अधिक पुराने हैं, और कई संबन्धितों की निजी स्मृतियाँ हम लोगों की साँझी हैं)।
    अनूप जी इस समय सम्भवत: चित्रकारी,चायपान, मेलजोल एवं सभागार में दिग्गजों के चित्रों का आनन्द ले रहे थे। बीच में उन्होंने हमें भी क्लिकाया भी यहाँ देख ही लिया है। धन्यवाद अनूप जी, आपने मेरे प्रात: के कार्यक्रम की इस लिखित रिपोर्ट का सुख दिया है, ब्लॊगजगत् में जिसके साक्षी केवल आप ही थे।
  29. राजीव
    किस्सा रोचक है, यह श्लोक बहुत अच्छा लगा, सरगर्भित और स्मरण रखने योग्य
    अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं ।
    अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ: ॥
  30. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] मिल्खा सिंह, रिक्शा चालक और दृष्टिहीन … [...]

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