Saturday, May 23, 2009

इलाहाबाद के सच्चे किस्से

http://web.archive.org/web/20140419215703/http://hindini.com/fursatiya/archives/635

29 responses to “इलाहाबाद के सच्चे किस्से”

  1. Anonymous
    कैलेन्डर सत्य है, घड़ी मिथ्या है। जय हो फुरसतिया महाराज :)
  2. Abhishek
    कैलेन्डर सत्य है, घड़ी मिथ्या है। जय हो फुरसतिया महाराज :)
  3. amit
    हम जो बोल नहीं पाये उसका कोई अफ़सोस नहीं है मुझे।
    कोई बात नहीं, अफ़सोस होना भी नहीं चाहिए, आगे मौके बहुत मिलेंगे आपको, श्रोता भी नए होंगे!! :)
    मैं अपने और बाद के साथी वक्ताओं की भलाई का ख्याल करते हुये अच्छे वक्ता की तरह समय पर बैठ गया। श्रोताओं ने भी ताली बजाते हुये अपनी खुशी का इजहार किया।
    हम्म, आपके बोलने पर खुशी ज़ाहिर की या आपके बैठ जाने पर, ज़रा खुलासा करके बताना था, ही ही ही!! :D
    बाकी रपट चकाचक है, आप लिखे हैं तो सच ही मान लेते हैं, समीर जी को उद्धृत किया जाए तो – आखिर क्रेडिबिलिटी भी कोई चीज़ है! ;)
  4. समीर लाल
    बहुत सच्ची सच्ची लिख गये सब..कविता जी और ज्ञान जी के सच्चे किस्से के बिना कैसे श्रृंखला खतम होगी भाई..
    मजेदार रही…किस्सागोहि…
    पसंद वाली कविता पसंद आई.
  5. RC Mishra
    शुकुल जी इलाहाबाद आ के हमसे बिना मिले चले गये :(
  6. प्रवीण त्रिवेदी ...प्राइमरी का मास्टर
    अभी तक आप ब्लॉग्गिंग ( जो खतरे से खाली नहीं?)घटनास्थल से सीधा प्रसारण देख रहे थे /
    धन्यवाद!!!

  7. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    खालिस चौबीस कैरेट के सच्चे किस्से हैं।
  8. vijay gaur
    रिपोर्ट यदि दिलचस्पी से लिखी गई हो तो पढने का अपना ही मजा है। यूं चलताऊ तरह से लिखी जाने वाली अखबारू रिपोर्टस की भी अपनी ज़रूरत है।
    आपकी यह रिपोर्ट दिलचस्प किस्से की तरह है। पढने में मजा आया।
  9. Manoshi
    बेहद सुंदर पसंद।
  10. दिनेशराय द्विवेदी
    तो अब तक सिद्धार्थ हमें दफ्तरिया रिपोर्ट पढ़ा रहे थे। ये हुई फुरसतिया पोस्ट असली रिपोर्टिंग। इस में मजा भी आया, कुछ सीखा भी और बहुत सारे सच भी दिखे। संक्षेप में कहें तो सुंदरम् शिवम् और सत्यम्।
  11. Sanjeet Tripathi
    ‘ कैलेन्डर सत्य है, घड़ी मिथ्या है। ‘
    एकदम सटीक लाईन।
    आप हर पोस्ट में कुछ लाईन्स ऐसी लिख देते हैं जो वाकई सटीक होती हैं।
  12. Kajal Kumar
    हम्म…ये हुई न फुल रिपोर्ट :)
  13. Dr.Arvind Mishra
    बहुत खूब -बहुत बारीक प्रेक्षण ! सुई की नोक भी नजर आ जाए !
    मुझे भी डर तो लगा कि
    बाहों में भरते हो लेकिन
    अन्दर तो बेगानापन है
    मगर यहाँ भी शेरअदूली ही हुयी -हम अंकवार भर मिले -सहज भाव से !
    इस बार की कविता तो दम तोडू है !
  14. कविता वाचक्नवी
    वाह-वाह,वाह-वाह,वाह-वाह!
    Full चकाचक!
  15. कविता वाचक्नवी
    “आठ मई की शाम को नियत समय शाम साढ़े पांच से कुछ मिनट बाद ही हम (मैं और कविताजी) घटनास्थल पर पहुंच गये।”
    ये {‘घटनास्थल’ पर पहुँचे} तो ऐसे लग रहा है, जैसे पोलिस हत्या वाले स्थान पर तफ़्तीश करने पहुँची हो।
  16. ताऊ रामपुरिया
    वाह आज कई दिनों बाद आई है असली फ़ुरसतिया पोस्ट..बस आनन्द आगया. एक बार शुरु से अंत तक बांच चुके हैं और एक बार पढने का दिल कर रहा है. एक दम जैसे जसदेव सिंह हाकी का आंखों देखा हाल सुनाया करते थे, बिल्कुल वैसा ही है.
    रामराम.
  17. गौतम राजरिशी
    क्या सचमुच ये सब हुआ?
    ब्लौगिंग को लेकर?
  18. Satish Pancham
    अच्छा है कि सभागार का नाम निराला था और निराले श्रोता मिले….कही सभागार का नाम कवि ‘अकेला’ होता तो स्थिति दुर्गम होती :)
    अच्छी रिपोर्टिंग ।
  19. Darpan Sah
    कोई हाथ भी न मिलायेगा, जो गले मिलोगे तपाक से
    ये नये मिजाज का शहर है, जरा फ़ासले से मिला करो।…
    “Matlab jo samjhe mere sandesh ka…
    ..Is Desh main hai kya koi mere desh ka?”
  20. इलाहाबाद के बाकी किस्से
    [...] मुख्य अतिथि के बाद कविताजी का नम्बर आया और उन्होंने आते-जाते श्रोताओं को हिन्दी कम्प्यूटिंग से संबंधित जानकारी विस्तार से दी। कविताजी सुबह इसी विषय पर विज्ञान परिषद में व्याख्यान दे चुकी थीं। वहां कम से कम उनके पास एक धीमा डायल अप से चलने वाला इंटरनेट कनेक्शन मौजूद था जिसकी सहायता से वे देर से और धीरे-धीरे ही सही जिन साइट्स और सुविधाओं के बारे में बता रहीं थीं उनको नेट पर दिखाती जा रही हैं। लेकिन ब्लागिंग के दिग्गजों के व्याख्यान में इस तरह की किसी औपचारिकता की व्यवस्था नहीं हो पायी थी शायद इसलिये सब कुछ मासूम श्रोताऒं की कल्पनाशीलता पर निर्भर था कि वे व्याख्यान को किस अर्थ में ग्रहण करते हैं। [...]
  21. anitakumar
    मैंने जब महसूस किया कि हमारे बोलने में दोहराव हो रहा है और कुछ नया ध्यान में नहीं आ रहा है तो मैं अपने और बाद के साथी वक्ताओं की भलाई का ख्याल करते हुये अच्छे वक्ता की तरह समय पर बैठ गया।
    पहले से तैयार नहीं किया था क्या बोलेगें? बिना तैयारी किए मंच पर उतरने के लिए तो हिम्मत चाहिए।
    बाकी चकाचक मजेदार रिपोर्टिंग
  22. क्नॉट प्लेस टू चांदनी चौक ….. | दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!
    [...] इलाहाबाद और आसपास के लोग एक के बाद एक ब्लॉगर मीट ठेले जा [...]
  23. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह
    सच्‍चे किस्‍से पढ़कर और भी आनंद आया, ऊर्जा संचय का ही परिणाम था कि बोले और खूब बोले
  24. GOOGEL SPEEDY CASH
    hey very good bhut accha likahte ho tum
  25. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] इलाहाबाद के सच्चे किस्से [...]
  26. Manees pandey
    बहुत अच्छा लगा।
    आँखो देखा हाल पढ़कर।
  27. Makeda Galacio
    thank you for sharing
  28. go
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