Tuesday, August 13, 2013

जितना खिड़की से दिखता है बस उतना ही सावन मेरा है



हमारे कमरे के बाहर से ऐसी दिखती है सडक। कविता याद आ गयी-
जितना खिड़की से दिखता है
बस उतना ही सावन मेरा है।

निर्वसना नीम खड़ी बाहर
जब धारोधार नहाती है
यह देह न जाने कब,कैसे
पत्ती-पत्ती बिछ जाती है।

मन से जितना छू लेती हूं
बस उतना ही घन मेरा है।

श्रंगार किये गहने पहने
जिस दिन से घर में उतरी हूं
पायल बजती ही रहती है
कमरों-कमरों में बिखरी हूं।

कमरे से चौके तक फ़ैला,
बस इतना ही आंगन मेरा है।

जगमग पैरों से बूटों को
हर रात खोलना मजबूरी
बिन बोले देह सौंप देना
मन से हो कितनी भी दूरी।

हैं जहां नहीं नीले निशान
बस उतना ही तन मेरा है।

जितना खिड़की से दिखता है
बस उतना ही सावन मेरा है।

अवध बिहारी श्रीवास्तव, कानपुर

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