Sunday, November 10, 2013

लोहिया नेहरू के पास छोटे भाई की तरह आये थे

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लोहिया नेहरू के पास छोटे भाई की तरह आये थे

मधु लिमयेआज चंचल जी की वाल पर एक चर्चा देखी। उसमें शेष नाराय़ण सिंह जी के एक लेख का लिंक था – जवाहर लाल नेहरू के शिष्य थे डॉ राम मनोहर लोहिया । लेख मधु लिमये जी के लेखन के हवाले से लिखा गया था। फ़ेसबुक पर हुई बातचीत में यह बात भी आयी कि डॉ. लोहिया सरीखा व्यक्ति नेहरू जी का शिष्य नहीं हो सकता।
मुझे इस सिलसिले में समाजवादी पार्टी की पत्रिका में मधु लिमये जी द्वारा लोहिया जी पर लिखा लेख याद आया। इस लेख में लोहिया जी की खूबियों- खामियों का विस्तार से जिक्र किया था। लोहिया जी की एक बात जो मुझे याद आ रही है उसका लब्बो-लुआब यह था कि :
हम भारतीय सदियों से दबे -पराजित रहे हैं। जरा सी बात से खुश हो जाते हैं। जरा से पराक्रम पर वीर पूजा करने लगते हैं। हमारा देश हजार सालों के खंड-खंड जीवन के बाद एक राष्ट्र के रूप में हमें मिला है। हमें इसका महत्व समझना चाहिये।
नेहरू के साथ अपना राजनैतिक जीवन शुरु करने वाले लोहिया जी बाद में नेहरू जी के कट्टर विरोधी बने। इस बारे में परसाई जी की राय थी:

डॉक्टर लोहिया का कुल मिलाकर एक ही वाद रह गया- नेहरू तथा उनकी पुत्री का हर मामले में विरोध। यह विरोध कार्यक्रमों को लेकर होता तो एक बात थी। इस विरोध का मूल वाक्य था -नेहरू ने देश का नाश कर दिया। नेहरू की खानदानी सल्तनत को मिटाओ।
इस विरोध के क्या कारण थे इस बारे में लोगों की अलग-अलग धारणायें हैं। लेकिन मधु लिमये जी ने अपने लेख में लोहिया जी की नेहरू ग्रंथि की तरफ़ इशारा भी किया है। लोहिया जी प्रखर विद्वान थे। बु्द्दिमान थे। पढे-लिखे थे। देश की बारे में नीतियों में उनका नेहरू जी से मतभेद रहा होगा। लेकिन यह वह समय था जब नेहरू की लोकप्रियता चरम पर थी। उनके प्रखर व्यक्तिगत विरोध के बावजूद नेहरू जी की लोकप्रियता में कोई फ़र्क नहीं पड़ा। नेहरू का कद बहुत ऊंचा था उस समय। लोहिया जी नेहरू जी के प्रति इसीलिये और आक्रामक होते गये। उनके विरोध में नेहरू ग्रंथि की खीझ भी थी।
बकौल परसाईजी :

पहले ही आम चुनाव में समाजवादियों की बुरी तरह हार हुई। तब नेहरू ने उनसे कहा कि तुम लोग कांग्रेस में आ जाओ तो मुझे ताकत मिलेगी। हम मिलकर दक्षिणपन्थियों से लड़ लेंगे। तब जयप्रकाश नारायण ने कार्यक्रमों की लिस्ट दी जिसे नेहरू ने मान लिया। तब जयप्रकाश नारायण अपने चार साथियों के साथ नेहरू मंत्रिमंडल में जाने को राजी हो गये थे। इसमें लोहिया भी थे। पर डॉ. लोहिया के हठ के कारण यह समझौता टूट गया।
ऐसे होता तो क्या होता के तमाम कयास लगाये जाते हैं। एक कयास यह भी लगाया जाना चाहिये कि अगर जयप्रकाश नारायण, लोहिया आदि प्रखर राजनीतिज्ञ नेहरू जी के साथ रहते और देश के निर्माण में सहयोग देते तो देश की दिशा क्या होती? तब शायद हालत अलग होते। शायद वंशवाद भी इतने विकट रूप में न होता। शायद आपातकाल भी न होता। शायद……..।
बहरहाल आप पढिये परसाई जी से पूछे एक सवाल का जबाब जिसमें उन्होंने नेहरू-लोहिया सबंधों पर अपी राय दी है।
प्रश्न: कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन के बाद डॉ. राममनोहर लोहिया को नेहरू क्यों अपने घर इलाहाबाद ले गये, उन्हें अपने घर कई दिनों तक क्यों रखा? वे दोनों एक-दूसरे को किन-किन बातों में चाहते थे, किन-किन बातों में मतभेद था? दोनों के समाजवाद में क्या अन्तर था?
क्या कारण थे कि पं. नेहरू के शासनकाल में डॉ. राममनोहर लोहिया को अनेक बार जेल जाना पड़ा। क्या मणिपुर जेल में डॉ. लोहिया को कई दिनों तक यातना सहनी पड़ी, क्या पं. नेहरू ने यातना की खबर लगने पर हस्तक्षेप किया था?—कटोरातालाब रायपुर से ’कविराज’
उत्तर- मुझे पता नही, आप किस कलकत्ता अधिवेशन की बात कर रहे हैं। अगर पंडित नेहरू डॉ. लोहिया को घर ले गये, तो यह कुछ विचित्र नहीं था। जर्मनी से जब डॉ. लोहिया डाक्टरेट लेकर लौटे थे, तब उनकी उम्र 27-28 साल की थी। वे बहुत प्रतिभावान थे। वे नेहरू के पास छोटे भाई की तरह आये थे। वे आनन्द भवन लोहियामें नेहरू परिवार में काफ़ी रहे भी थे। उन्हें कांग्रेस के विदेश विभाग का सचिव बनाया गया था। वे लगातार नेहरू के निर्देश पर उनके साथ काम करते रहे थे। वे लोकतांत्रिक समाजवाद जर्मनी से ही सीखकर आये थे। जर्मनी में ही ’ सोशलिस्ट इंटरनेशनल ’ का प्रधान ऑफ़िस रहा है। अभी भी है। यह याद रखना चाहिये कि ये लोकतांत्रिक समाजवादी साम्यवाद विरोधी होते हैं। इन्हीं की मदद से हिटलर जीता था और भयंकर तानाशाह बना था। उसने कम्युनिस्टों का कत्लेआम कराया था । समाजवादी समझते थे कि हिटलर उन्हें बक्स देगा। यह उनका भ्रम था, हिटलर ने समाजवादियों को भी पीटा।
यह मैंने डॉ. लोहिया के समाजवाद की पृष्ठभूमि बताने के लिये लिखा।
कांग्रेस में जयप्रकाश नारायण वामपन्थ के नेता थे। इनके साथ लोहिया, अशोक मेहता भी थे। नेहरू खुद समाजवादी थे। पर नेहरू का समाजवाद यह जर्मनी वाला समाजवाद नहीं था। नेहरू का विश्वास कार्ल मार्क्स में भी था। वे ’वैज्ञानिक समाजवाद’ मानते थे, यह उन्होंने खुद कई जगह लिखा है। कांग्रेस में दक्षिणपन्थ के नेता सरदार पटेल और राजेन्द्र प्रसाद थे। पंडित नेहरू की स्थिति इन सबसे ऊपर थी। पर वे समर्थन समाजवादियों का करते थे। 1947 में जयप्रकाश और लोहिया के नेतृत्व में समाजवादी कांग्रेस से बाहर आ गये। इन्होंने समाजवादी दल बनाया। दक्षिणपन्थियों में आचार्य कृपलानी भी अपने साथियों को लेकर बाहर आ गये। उन्होंने ’कृषक मजदूर प्रजा पार्टी’ बनाई। बाद में दोनों मिलीं और ’प्रजा समाजवादी पार्टी’ बनाई। इन्हें पंडित नेहरू की विदेश नीति पसंद नहीं थी। ये सोवियत रूस से इतने घनिष्ठ सम्बन्ध नहीं चाहते थे। ये साम्यवाद विरोधी थे। पर देश में ये तुरन्त आर्थिक क्रांति चाहते थे, जो अव्यवहारिक थी। पहले ही आम चुनाव में समाजवादियों की बुरी तरह हार हुई। तब नेहरू ने उनसे कहा कि तुम लोग कांग्रेस में आ जाओ तो मुझे ताकत मिलेगी। हम मिलकर दक्षिणपन्थियों से लड़ लेंगे। तब जयप्रकाश नारायण ने कार्यक्रमों की लिस्ट दी जिसे नेहरू ने मान लिया। तब जयप्रकाश नारायण अपने चार साथियों के साथ नेहरू मंत्रिमंडल में जाने को राजी हो गये थे। इसमें लोहिया भी थे। पर डॉ. लोहिया के हठ के कारण यह समझौता टूट गया।
JLNehruतब से लोहिया नेहरू के कट्टर विरोधी हो गये। वे तुरन्त क्रांतिकारी कार्य करवाना चाहते थे, पर कम्युनिस्ट पार्टियों को साथ न लेकर जनसंघ जैसी प्रतिक्रियावादी पार्टी को साथ लेते थे। वे सिलसिलेवार आन्दोलन नहीं करते थे, उपद्रव और अक्सर स्टंट करते थे। नेहरू पर अशिष्ट भाषा में हमले करते थे। वर्ग- संघर्ष को तैयार नहीं थे और संसदीय लोकतंत्र में भी निष्ठा नहीं थी। वे पता नहीं क्या चाहते थे? बुद्धिमान थे, विचारक थे, अच्छा लिखते-बोलते थे। उन्होंने इतिहास पर भाषण दिये थे, जो ’इतिहास चक्र’ नाम की पुस्तक में सगृहीत हैं। उनके विचार काफ़ी पुस्तिकाओं में हैं। पर डॉक्टर लोहिया का कुल मिलाकर एक ही वाद रह गया- नेहरू तथा उनकी पुत्री का हर मामले में विरोध। यह विरोध कार्यक्रमों को लेकर होता तो एक बात थी। इस विरोध का मूल वाक्य था -नेहरू ने देश का नाश कर दिया। नेहरू की खानदानी सल्तनत को मिटाओ। वे एक बार लोकसभा के सदस्य हुये। वहां भी उन्होंने अशिष्ट भाषण दिया। नेहरू ने टिप्पणी की- मैने डॉ. लोहिया को काफ़ी साल बाद देखा। मैं उनसे बेहतर बातों की अपेक्षा कर रहा था। पर मैं निराश हुआ।
लोहिया नेहरू और इन्दिरा गांधी की रोज आलोचना करते थे, पर नेहरू और इन्दिरा ने कभी कोई शब्द लोहिया के खिलाफ़ नहीं कहा -यानी उनकी अवहेलना की। लोहिया पंडित नेहरू के खिलाफ़ चुनाव लड़ते थे। पंडित नेहरू एक शब्द भी लोहिया के खिलाफ़ नहीं बोलते थे।
लोहिया के सम्बन्ध अमेरिका से अच्छे थे। एक अमेरिकी महिला की पुस्तक है- ’लोहिया एंड अमेरिका मीट’। इसमें लोहिया की अमेरिका यात्रा का विवरण था। अमेरिकी शासक नेहरू की गुटनिरपेक्षता तथा समाजवादी देशों से मित्रता और स्वतंत्र विदेश नीति पसन्द नहीं करते थे। डॉ.लोहिया नेहरू का कड़ा विरोध करते थे। इसलिये वे प्रिय थे।
परसाई-जीडॉ. लोहिया वर्ण-संघर्ष की भी बात करते थे। वे जनेऊ तुड़वाते थे। पर जनेऊ तोड़ने से कहीं वर्ण मिटते हैं? ईसाइयों में भी ब्राह्मण ईसाई और गौड़ ईसाई – यह वर्ण भेद है।
लोहिया का नारा था गैरकांग्रेसवाद ! कांग्रेस को सत्ता से हटाओ। पर वे सामाजिक-आर्थिक क्रांति का कोई वैकल्पिक कार्यक्रम नहीं देते थे। शायद वे क्रांति भी नहीं चाहते थे- हालांकि उन्होंने लिखा है सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण कार्ल मार्क्स का ही सही और वैज्ञानिक है, महात्मा गांधी का नहीं। पर वे वर्ग संघर्ष की तैयारी भी नहीं करते थे। वे वास्तव में पूंजीवाद का सफ़ाया भी नहीं चाहते थे।
वे आंदोलन करते थे, कानून तोड़ते थे तो जेल जाते थे। मणिपुर की घटना के बारे में मैं नहीं जानता।
(देशबन्धु, रायपुर में 11 मार्च, 1984 को प्रकाशित)

2 responses to “लोहिया नेहरू के पास छोटे भाई की तरह आये थे”

  1. neeraj
    blog subscribe nahi ho raha, check kriye
  2. arvind mishra
    यह श्रृंखला बहुत अच्छी चल रही है -देश के राजनैतिक अतीत और महापुरुषों पर परसाई जी को पढ़ना ज्ञान के नए पहलुओं से मुखातिब होना है।
    लोहिया के बारे में मुझे सदैव कुछ अधिक जानने की उत्कंठा बनी रहती है। उनकी विद्वता का लोहा मानता आया है देश -मगर आज की बिना मूल्य की राजनीति में वे बस एक मोहरा बने हुए हैं !
    मैं इस लेख को लिखता तो एक फोटू और चेपता -अनूप शुक्ल की। या फिर अपनी – दोनों शख्सियतों में कुछ न कुछ नेहरु -लोहिया का अंतर्द्वन्द तो है :-)
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..झांसी गले की फांसी दतिया गले का हार…….(सेवा -संस्मरण जारी)

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