Sunday, February 19, 2017

'व्यंग्य श्री सम्मान -2017' रपट -4



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कार्यक्रम की शुरुआत हुई। गोविन्द व्यास जी ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। रोचक अंदाज में सबके बारे में जानकारी देते हुये फ़ूल-माला पहनवाये। पुष्पगुच्छ दिये। सबसे अंत में नीरज बधवार को गुलदस्ता देते हुये मंच के संचालन की जिम्मेदारी सौंप दी।
Neeraj Badhwar ने कार्यक्रम का शानदार संचालन किया। मजे भी लिये सबसे। सबसे अच्छा पुण्य का काम किया कि श्रीमती आलोक पुराणिक ( Aparna Puranik ) और श्रीमती ज्ञान चतुर्वेदी जी को मंच के पास बुलाकर पुष्पगुच्छ दिलाये ( मंच पर बुलाकर देते तो और अच्छा रहता)। इसके बाद नीरज ने आलोक पुराणिक की माता जी श्रीमती रजनी पुराणिक के सम्मान में श्रोताओं से तालियां बजवाईं। आलोक पुराणिक की माता जी आ नहीं पाईं थीं। आलोक जी के व्यक्तित्व निर्माण में उनका बहुत बड़ा योगदान है। अपना पहला व्यंग्य संकलन ’नेकी कर अखबार में डाल’ आलोक जी ने अपनी माताजी को ही समर्पित किया है।
नीरज बधवार ने बताया कि जब आलोक पुराणिक मात्र आठ वर्ष के थे तब उनके पिताजी विदा हो गये थे। मुझे आलोक पुराणिक के पिता जी के कम उमर में निधन की बात पता थी। इसके अलावा जानकारी नहीं थी। लिखत-पढत की दुनिया में वर्षों तक जुड़े रहने के बाद भी हम लोग एक-दूसरे के व्यक्तिगत जीवन के बारे में कितना कम जानकारी रखते हैं।
आलोक पुराणिक के इस बारे में बात करते हुये पता चला कि उनके पिता श्री शंकर पुराणिक बहुत मस्त तबियत के इंसान थे। सेना में शार्ट सर्विस कमीशन वाली नौकरी से रिटायर होने के बाद सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया में नौकरी करते थे। वायलिन और बांसुरी बजाने का शौक था। (शायद सेना में नौकरी के चलते) सिगरेट पीने का शौक था। चेन स्मोकर थे। मात्र 36 साल की उमर में दिल के दौरे से आगरा में निधन हो गया।
पिता के निधन के बाद माता जी को उनकी जगह बैंक में नौकरी मिल गई। उन्होंने आलोक पुराणिक और उनकी दीदी को पाल-पोसकर बड़ा किया। मात्र आठ साल की उमर में पिता को खो देने वाले आलोक पुराणिक का शुरुआती जीवन कैसा संघर्षमय रहा होगा इसका अंदाज लगाया जा सकता है।
पिता के कम उमर में दिल के दौरे के निधन की याद आलोक जी के मन में इतनी गहरी है कि वे स्वास्थ्य के प्रति बेहद सजग हैं। पिछले साल अपना वजन 20-25 किलो कम किया। अब भी जब कभी बात होती है तो अक्सर पार्क में टहलते हुये पाये जाते हैं।
मुझे याद है जब करीब छह-सात साल पहले पहली मुलाकात हुई थी हमारी कानपुर में आलोक पुराणिक से। वे अपना शायद जागरण संस्थान में व्यंग्य पाठ करने आये थे। कार्यक्रम के बाद हम उनको उठाकर घर ले आये। घर आते हुये कुछ समस्या लगी तो हम लोग घर आने के पहले अपने अस्पताल पहुंचे। ईसीजी-फ़ीसीजी हुआ। हार्ट-टेस्टिंग-ओके के बाद घर आये। उस समय अम्मा थीं। बाद में जब भी बात हुई तो आलोक पुराणिक ने माताजी के बनाये लड्डू के स्वाद का जिक्र अवश्य किया।
आलोक पुराणिक के लेखन पर फ़िदा होने वाले साथियों को उनकी स्वास्थ्य के प्रति सजगता से भी सीख लेनी चाहिये।
अगली पोस्ट में संबोधन सुभाष चन्दर जी का Subhash Chander

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