Sunday, February 19, 2017

'व्यंग्य श्री सम्मान -2017' रपट -7




पिछली रपट पढने के लिये इधर आयें:https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210608601024689
हरीश जी के बाद बोलने का नम्बर आया आलोक पुराणिक का। आलोक पुराणिक ने गोपाल प्रसाद व्यास जी को याद करते हुए बात शुरू की। बताया कि उन्होंने तीस साल पहले गोपाल प्रसाद जी के स्तम्भ 'चकाचक' के साथ एक ही अख़बार में लिखा।
व्यंग्य के बारे में आलोक पुराणिक ने अपनी राय जाहिर करते हुये कहा: "आर्थिक स्थितियों को समझे बगैर आज व्यंग्य लिखना सम्भव नहीं है।"
आज इस मुल्क का हर सफल आदमी कुछ न कुछ बेंच रहा है।
बोरोप्लस ब्यूटी क्रीम मेरी सफलता का राज है कहकर अमिताभ बाजार की जयकार करते हैं।
आलोक जी ने व्यंग्य की परम्परा कबीरदास से शुरु होने की बात की: "कबीरदास शायद पहले व्यंग्यकार थे। वे कहते हैं - सब पैसे के भाई। कबीर जी की रचना में व्यंग्य भी है, अर्थशास्त्र भी है। एक दिन खाना न मिले घर में तो पत्नी इज्जत नहीं करेगी। व्यंग्य बाजार की शक्ल में हमेशा सामने है। "
आलोक पुराणिक की राय में: "आज व्यंग्य लेखन किसी माध्यम का मोहताज नहीं है। अगर आपके लेखन में कुछ दम है तो माध्यम का महत्व नहीँ रखता। अख़बार, पत्रिका, फेसबुक, ट्विटर और माध्यमों में लोग अपना हुनर दिखा रहे हैं।"
बकौल आलोक पुराणिक :"कौन छोटा, कौन बड़ा लेखक इस पचड़े में फ़ंसे बिना अपना काम करते रहते चाहिये। पाठक और समय सबसे बड़ी कसौटी हैं किसी रचनात्मक काम की। मिर्जा ग़ालिब अपने समय में सबसे बढ़िया शायर नहीँ थे। लेकिन आज उनके समय के किसी और शायर को लोग नहीं जानते। काम का महत्व होता है। काम को गम्भीरता से लीजिये। खुद को गंभीरता से मत लीजिये।"
ज्ञान जी का उदाहरण देते हुये आलोक पुराणिक ने कहा: "ज्ञान जी ने कभी व्यंग्य का ज्ञान नहीं बांटा। उन्होंने लिखकर बताया कि अच्छा व्यंग्य क्या होता है। 1991 के बाद के समय के व्यंग्य लेखन का युग इसीलिये मैं ज्ञान युग के रूप में मानता हूँ। उन्होंने काम के बल पर अपनी स्वीकार्यता बताई।"
आखिर में खचाखच भरे सभागार में बैठे श्रोताओं के माध्यम से अपने अनगिनत पाठकों को धमकियाते हुये कहा:"पुरस्कार मिलने के बाद मैं व्यंग्य लिखना कम नहीँ करूँगा।"
आलोक पुराणिक ने 'यक्ष , युधिष्ठर संवाद' और 'आतंकवाद का मोबाईल हल' और 'पापा रिस्टार्ट क्यों न हुए' व्यंग पाठ किया।
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210608763948762

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