Wednesday, September 06, 2017

बाजार सबसे बड़ी विचारधारा है- आलोक पुराणिक




आलोक पुराणिक से सवाल-जबाब की अगली कड़ी में आज पेश हैं राजनीति और भाषा संबंधी प्रश्नों पर बातचीत। राजनीति के मामले में जहां उनका मानना है -"अब वह डिबेट ही अप्रासंगिक हो गयी है कि पार्टनर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है। अब सवाल है पार्टनर तुम्हारी इकोनोमिक्स क्या है। " वहीं भाषा के सवाल पर उनका कहना है -"जहां भाषाई शुद्धता और व्यापक संवाद के बीच चुनना होगा मैं व्यापक संवाद चुनूंगा"। नये पुराने की बहस के बारे में आलोक पुराणिक फ़र्माते हैं- " हरेक को यह हक है कि वह खुद को महानतम घोषित कर दे, बस झगड़ा तब शुरु हो जाता है जब वह दूसरों से भी यह मनवाने पर तुल जाये कि उसे महानतम मान लिया जाये। "
यह तो हमने अपनी समझ में लब्बो-लुआब बताया। विस्तार से जानना हो तो आप खुद बांच लीजिये। सवाल-जबाब का सिलसिला शुरु होता है अब!
सवाल 1: व्यंग्य में राजनीतिक घटनाओं / चरित्रों के उपयोग को आप कितना जरूरी समझते हैं।
जवाब-राजनीति का मतलब सिर्फ नेतागिरी, सरकार की राजनीति या विपक्ष की राजनीति नहीं है। राजनीति टेलीकाम कंपनियां भी कर रही हैं और सास बहू के बीच भी हो रही है। पति पत्नी के बीच भी राजनीति है। राजनीति का अर्थ मैं व्यापक लेता हूं, सत्ता समीकरणों की उठापटक राजनीति है। मां बच्चे को कह रही है कि दूध पी ले, टीवी देखने दूंगी, यह भी राजनीति है और बच्चा कह रहा है लो एक रोटी ज्यादा खा ली, लाओ अब मोबाइल से खेलने दो। यह भी राजनीति है। राजनीतिक घटनाएं तात्कालिक हैं, पर उनके असर दीर्घजीवी हैं। व्यंग्यकार का काम उन दीर्घजीवी असरों की पड़ताल है। कुछ चरित्र राजनीति के इतने शाश्वत हैं कि वे शायद ही कभी ना जायें राजनीति से जैसे भजनलाल। कुल मिलाकर राजनीति हर सत्ता समीकरणों के बीच का खेल है, वो चाहे जिन पक्षों के बीच भी हो रहा हो। राजनीति समझे बगैर व्यंग्य नहीं किया जा सकता।

सवाल 2: इस मामले में परसाई जी और शरद जोशी जी के राजनीतिक व्यंग्य में क्या अंतर पाते हैं?
जवाब-परसाई बहुत साफ तौर कांग्रेस-लेफ्ट संधि के समर्थक थे इतने कि उनके यहां उस आपातकाल के प्रति भी समर्थन मिलता है, जिसे अभिव्यक्ति की आजादी का सबसे बड़ा हनन माना जा सकता। पर इससे परसाई का समग्र व्यंग्य छोटा नहीं हो जाता। शरद जोशी को आप कांग्रेस-लेफ्ट का नहीं मान सकते, आखिरी दिनों में वह वीपी सिंह के इतने समर्थक हुए कि वीपी सिंह के समर्थन में लिखे गये व्यंग्य उनकी प्रतिष्ठा में चार चांद नहीं लगाते। बहुत महीन बात यह देखें कि ना परसाई ना शरद जोशी आज अपने खालिस पार्टीगत राजनीतिक व्यंग्यों के लिए याद किये जाते हैं, परसाईजी याद आते हैं इंसपेक्टर मातादीन चांद पर जो दलगत राजनीति पर नहीं है, शरद जोशी याद आते हैं-सरकार का जादू के लिए, जो किसी भी सरकार पर लागू हो सकता है। तो तात्कालिक राजनीति से क्लासिक व्यंग्य नहीं आता। क्लासिक व्यंग्य आ रहा है राजनीति के परिप्रेक्ष्य को समझने से और उसके वृहत्तर संदर्भ समझने से।
सवाल 3. राजनीतिक व्यंग्यों में आमतौर वामपंथी और दक्षिण पंथी रुझान चलन में माना जाता है। श्रीलाल जी ने खुद को बीच सड़क पर थोड़ा बायें तरफ़ चलने वाले व्यंग्यकार के रूप में परिभाषित किया था। आप अपने को वैचारिक रूप से कहां पाते हैं?
जवाब-नब्बे में सब बदल गया है। जब तक सोवियत संघ डूबा नहीं ,था तब तक दो खेमे साफ थे। साम्यवादी रुस वाला दूसरा अमेरिका पूंजीवाद वाला। सोवियत संघ डूबा तो साम्यवादी कामकाज को लेकर गहरे सवाल खड़े हुए। आज पूरी दुनिया में किसी भी देश में एक भी साम्यवादी कामकाजी सरकार नहीं है, साम्यवाद की खाल ओढ़े हुए पूंजीवादी सरकारें सब तरफ हैं। चीन साम्यवादी नहीं खालिस पूंजीवादी देश है। पूंजीवाद से बदतर क्योंकि पूंजीवाद और लोकतंत्र की संधि के चलते जो छूट लोकतंत्र में मिल जाती हैं, वह चीन में नहीं है। देखिये नब्बे के दशक के अंत में सोवियत संघ के डूबने के साथ साम्यवादी राजनीति का खेल इस अर्थ में खत्म हुआ कि वहां लफ्फाजी तो मिल सकती है, पर समस्याओं के ठोस हल नहीं मिलते। और फिर शुरु होता है पाखंड, सिंगूर में किसानों को किसने मरवाया कौन सी सरकार थी-साम्यवादी सरकार ही थी। विदेशी निवेश के लिए लाइन साम्यवादी नेता भी लगा रहे हैं, और वो भी जो साम्यवादी नहीं हैं। दरअसल इतना कनफ्यूजन हो लिया है नब्बे के बाद कि आप साम्यवादी और राइट का बहुत ज्यादा फर्क नहीं दिखायी देता सिवाय तेवर बाजी के। साम्यवादी वही सब कर रहा है जो करने का आऱोप दक्षिणपंथी सरकारों पर लगाया जाता है। अभी आप देखें दलित राजनीति की आईकोन मायावतीजी फार्महाऊस वाली हैं, समाजवादी नेता लालू जी की बिटिया मीसा भारती फार्महाऊस वाली हैं, भाजपा के बड़े नेता फार्म हाऊस वाले हैं, कांग्रेस के नेता तो पुराने फार्महाऊस वाले हैं, साम्यवादी नेताओं की आर्थिक शुचिता पर सवाल नहीं उठा सकते। साम्यवादी नेताओं पर आर्थिक भ्रष्टाचार के आऱोप सबसे कम लगे हैं, पर साम्यवाद अब दुनिया भर में खालिस लफ्फाजी करता है, कहीं भी एक ठोस कामकाजी सरकार का, कामकाजी व्यवस्था का विकल्प नहीं देता है। तो कुल मिलाकर साम्यवाद या साम्यवादी विमर्श एक नैतिक विमर्श के तौर पर भले ही मौजूद हो, पर एक ठोस कामकाज राजनीतिक व्यवस्था देने की शक्ति इसकी जाती रही। भारतीय संदर्भों में जो बात राम मनोहर लोहिया कहते हैं, उसका आशय है कि कम्युनिस्ट कीड़ा कांग्रेसी कूड़े पर पलता है। गहरे निहितार्थ हैं इसके। कांग्रेस के श्रेष्ठ प्रवक्ता सीता राम येचुरी साम्यवादी हैं। सोवियत संघ डूबने के बाद आप गहराई से देखें, बाजार अपने आप में विचारधारा हो लिया है। मैं आपको थोड़ा और गहराई में उतर कर बताऊं साम्यवादी नेताओं के ब्रांड और दक्षिणपंथी नेताओं के ब्रांड एक जैसे होते हैं। अभी कुछ दिनों पहले एक साम्यवादी सांसद को उसकी पार्टी ने डपटा कि तुम एप्पल फोन को शो आफ करते हो, तो उसका जवाब था कि यह मेरा व्यक्तिगत मामला है। बाजार अपने आप में एक बड़ी विचारधारा के तौर पर नब्बे के दशक के बाद उभर गया है। अब वह डिबेट ही अप्रासंगिक हो गयी है कि पार्टनर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है। अब सवाल है पार्टनर तुम्हारी इकोनोमिक्स क्या है। दिल्ली में मैं ऐसे कई साम्यवादी प्रोफेसरों को जानता हूं जो हर ब्रांड अमेरिका का यूज करते हैं और बताते हैं कि कैलिफोर्निया में रहा बेटा दे गया। साम्यवाद की भूमिका अब भारतीय संदर्भों में या विश्व संदर्भ में यह रह गयी है कि वो तमाम हालात का एक पक्ष प्रस्तुत करती है, जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। जैसे ऐसे कई श्रमिक संघर्ष हैं, जिनकी जानकारी आपको सीपीआईएम के मुखपत्र पीपुल्स डेमोक्रेसी में ही मिलती है, और कोई उन्हे कवर नहीं कर रहा है। वो संघर्ष महत्वपूर्ण हैं। उनके बारे में सबको जानना चाहिए। तो बतौर व्यंग्यकार मेरी नजर सब तरफ है, पर अब मैं आंख खोलकर देखता हूं कि दिखता है कि बाजार सबसे बड़ी विचारधारा है, जो सारी विचाराधाराओं को धीमे धीमे खुद में समाहित कर रही है। सरकार से कई मामलों में ज्यादा असरदार बाजार साबित हो रहा है। तो बाजार को समझना, उसके छद्म को समझना, यह बहुत जरुरी है व्यंग्यकार के लिए। मैं ना लेफ्ट ना राइट खुद को बाजार के खेल समझने कोशिश में पाता हूं।
सवाल 4. आपके एक पाठक ने आपसे मोहभंग की शिकायत करते हुये आपके दक्षिणपंथी होते जाने की शिकायत की है। पाठकों के इस उलाहने पर आपका क्या कहना है?
जवाब-बतौर व्यंग्यकार मैं खुद की चेकिंग इस तरह से करता हूं कि हर सत्ता केंद्र को व्यंग्यकार से शिकायत होनी चाहिए, हर सत्ता केंद्र को। चाहे वो व्यंग्य के मठाधीश हों या कांग्रेस हो या भाजपा हो या साम्यवादी दल हों या एनजीओ हों। पाठक कहता है कि आप उतने मोदी विरोधी नहीं हैं, जितना आपको होना चाहिए था, आप उतने राहुल गांधी समर्थक नहीं हैं, जितना आपको होना चाहिए था। मतलब आप कुछ भी कर लें, कुछ भी लिख लें, हमेशा कुछ लोग आपको यह कहने वाले होंगे कि आप यह नहीं हैं, वह नहीं हैं, आप उतने ऐसे नहीं हैं, उतने वैसे नहीं हैं। यह विमर्श अंतहीन है। हर रचनाकार को अपना फैसला खुद को लेकर तय करना होता है कि उसे क्या करना है। हरेक के पास विकल्प है, किसी खास राजनीति का प्रवक्ता बनने का, किसी विचार का वाहक बनने का, हरेक विचार की खिंचाई का। मैंने पहले बताया कि मेरी कोशिश होती है मैं ना लेफ्ट ना राइट, बाजार का खेल समझ पाऊं। मुझे अपनी तरह से अपनी बात कहने का हक है, पाठकों को शिकायत का हक है।
सवाल 5. आपके कुछ पाठकों की यह भी शिकायत है कि आपके राजनीतिक व्यंग्यों में आपने तुलनात्मक रूप से कमजोर स्थिति पर पहुंच गये राजनीतिक चरित्रों पर व्यंग्य लिये हैं, उनकी खिंचाई की है। मजबूत सत्ता पक्ष की कमियों पर कम ध्यान दिया है। जो लोग व्यंग्य को सत्ता की कमजोरियों को उजागर करने का औजार मानते हैं उनके अनुसार एक व्यंग्यकार के रूप में यह आपकी पक्षधरता पर सवाल है। आपका इस बारे में क्या कहना है?
जवाब-जो लोग राजनीतिक दलों को ही सत्ता मानते हैं, उनकी सत्ता की समझ अलग तरह की है। मैं बाजार की सत्ता को सबसे बड़ी सत्ता मानता हूं। व्यक्तियों पर फोकस करेंगे, तो आफतें हो जाती हैं। नीतिश कुमार दो महीने पहले परम प्रगतिशील थे, फिर अब भाजपा के साथ आने पर उन्हे एक झटके में फासिस्ट कहना राजनीतिक अबोधता का परिणाम हो सकता है। खेल सत्ता के हैं, नीतिश 2019 में फिर प्रोग्रेसिव हो सकते हैं, नीतिश प्रोग्रेसिव या राष्ट्रवादी होने के लिए राजनीति नहीं कर रहे हैं, कुरसी कैसे बचे, उनके लिए यह सवाल महत्वपूर्ण है। हम राजनीतिक अबोधपने में राजनीतिक विश्लेषण मचाये रहते हैं कि वो समाजवादी, वो राष्ट्रवादी वो फासिस्ट, कोई कुछ नहीं है, कुरसी की मार है। सत्ता सिर्फ राजनीति में ही नहीं है, बाजार की अपनी सत्ता है। मुकेश अंबानी हर सत्ता में ताकतवर हैं, हर सत्ता में, नितीश कुमार से ज्यादा ताकतवर मुकेश अंबानी हैं। दरअसल मोदी से ज्यादा ताकतवर मुकेश अंबानी हैं। मुकेश अंबानी बाजार की सत्ता के प्रतीक हैं। अर्थशास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते मुझे साफ दिखायी पड़ता है-बाजार की सत्ता को समझना और उसके छद्म को उजागर करना बहुत जरुरी है। व्यापक संदर्भों में सारी राजनीति बाजार का टूल दिखायी पड़ती है। मैं फिर बार बार वही कहना चाहूंगा- मेरी कोशिश होती है, ना लेफ्ट ना राइट, बाजार का खेल समझ पाऊं, बाजार में ही लेफ्ट भी समाहित है और राइट भी।
सवाल 6: राजनीतिक स्थितियों पर व्यंग्य तात्कालिक होने के कारण वे अल्पजीवी होती हैं - आपका इस धारणा पर क्या कहना है?
जवाब-राजनीतिक दलों पर राजनीति पर लिखे गये व्यंग्य अल्पजीवी ही होते हैं। दूर तक व्यंग्य वही जाते हैं, जिनमें व्यापक मानवीय सामाजिक संदर्भ हों। व्यंग्यकार को यह ध्यान रखना चाहिए कि जो राजनीतिक घटना आज सबसे अहम दिखायी पड़ रही है, कुछ बरसों बाद वह फुटनोट के काबिल भी ना बचेगी।
सवाल 7: आपके अनेक फ़ार्मेट में बच्चे की निबन्ध डायरी वाले फ़ार्मेट से आपके खास लगाव का क्या कारण है?
जवाब-निबंध फार्मेट बहुत छूट देता है। कहानी छूट नहीं देती। निबंध फार्मेट में कई सारी बातें एक साथ ही कह सकते हैं। इसलिए मुझे यह बहुत प्रिय है। कहानी में एक ढांचा होता है, आपको उसको निभाना होता है। निबंध में इधर कूद फांदकर फिर मुद्दे पर आ सकते हैं।
सवाल 8. आपके कुछ बहुत अजीज पाठकों नें आप पर भाषा से अतिशय खिलवाड़ करने वाला बताते हुये व्यंग्य की भाषा बिगाड़ने का श्रेय आपको दिया है। सोमवार को मंडे लिखने की आपकी अदा को भाषा को जबरियन तोड़ने-मोड़ने वाली आदत बताया है। इस पर आपका क्या कहना है?
जवाब-देखिये मुझे अपनी तरह की भाषा लिखने का हक है, पाठक को मुझ पर आरोप लगाने का हक है। कबीरदास को आलोचना में भाषा का डिक्टेटर बताया गया था। इससे कबीर के कहे का वजन कम नहीं हो जाता है। मैं क्या लिख रहा हूं वह महत्वपूर्ण है। भाषा के साथ प्रयोग करने का मेरा हक है, उसकी आलोचना का भी पाठक को हक है। पर मैंने जो भी किया, अपनी समझ से ठीक किया और आगे भी ऐसा ही या कुछ नया करुंगा। पाठकों ने मुझे पढ़ा आलोचना की, पर मैं आलोचना से डर कर कुछ भी नहीं बदलनेवाला हूं। मैं ठीक वही करुंगा, जो मुझे ठीक लगेगा। सबके ठीक अलग अलग हो सकते हैं। व्यंग्य में मैं संवाद के लिए आया हूं, भाषाई शुद्धता की रक्षा मेरा मूल काम नहीं है। जहां भाषाई शुद्धता और व्यापक संवाद के बीच चुनना होगा मैं व्यापक संवाद चुनूंगा। एकदम शुद्ध भाषा मुझे लिखना आता है, पर उसकी संवाद की क्षमताओं की सीमाओं का अहसास भी है मुझे। समाज शुद्धतावादी दायरों में नहीं चलता। भाषा बहती नदी होती है, उसमें बहुत कुछ बहता आता है। नदी यह नहीं कहती है ये नहीं आने दूंगी, वह नहीं आने दूंगी। मुझे लगता है कि चार-पांच सौ साल बाद इंगलिश हिंदी की एक बोली हो जायेगी। तोड़ना मरोड़ना, नये शब्द रचना, यह सब बदस्तूर चलेगा।
सवाल 9: भाषा में आपके तरह-तरह के प्रयोग क्या नयी पीढी तक अधिक से अधिक पहुंचने की कोशिश का भी नतीजा है?
जवाब-नया नया कुछ होना चाहिए। नयी पीढ़ी तक पहुंचना मेरे लिए बहुत ही जरुरी है। मैं क्या हर लिखनेवाला चाहेगा कि उसका पाठक हर वर्ग में हो। भारत की कुल आबादी का पचास परसेंट पच्चीस साल से नीचे का है, तो जाहिर है बड़ा पाठक वर्ग युवाओं से ही आ रहा है।
सवाल 10: आपका सबसे बड़ा पाठक वर्ग आपको कौन लगता है? युवा, बुजुर्ग बालक वृन्द?
जवाब-बीस साल से लेकर पचास साल तक के आयुवर्ग में मुझे अपने पाठक सबसे ज्यादा मिलते हैं।
सवाल 11: आपको व्यंग्य लिखते हुये दो दशक करीब हुये। आज के दौर में व्यंग्य में ताजगी, पठनीयता की शिकायतें होती हैं। पुराने समय के लोगों की बातें करते हुये अक्सर लोग कहते पाये जाते हैं कि अब उस समय के बराबर अच्छा लेखन नहीं होता। इस बारे आपका क्या कहना है।
जवाब-देखिये यह सतत रोना है। रोने की अपनी पालिटिक्स है। पुराने नयों को खारिज नहीं करेंगे, तो पुरानों को पूछेगा कौन। नयों को खारिज करो कि घटिया लिखते हैं ये, फिर बढ़िया कौन लिखता है, जी वो तो हम लिख गये हैं सत्तर के दशक में साठ के दशक में। यह वर्चस्व की लड़ाई है। पुराने नये को स्वीकार करके अपना ठिकाना नहीं छोड़ना चाहते या उन नयों के लिए ही छोड़ना चाहते हैं, जो उनका झोला उठाते हैं। वक्त बदल जाता है, लोगों के फ्रेम नहीं बदलते। शिकायत नये लेखकों से है कि अच्छा नहीं लिखते और फिर पाठकों से है कि बताओ कितने खराब हैं कि हमारा लिखा नहीं पढ़ते। बदलते वक्त में वही चलेगा जो या तो क्लासिक हो या सामयिक हो। अधिकांश रुदनवादी वही हैं, जो क्लासिक जैसा कुछ रच नहीं पाये और सामयिक रह नहीं गये है। अप्रासंगिक हो जाने का खतरा रुदन, चीख-चिल्लाहट, फ्रस्ट्रेशन में निकलता है। अच्छा बुरा बहुत सब्जेक्टिव शब्द हैं। हरेक के अपने अच्छे बुरे हैं। हो सकते हैं। फिर अच्छे बुरे की कसौटी क्या है। मेरे लिए दो कसौटी हैं-एक तो समय की छलनी के पार जो भी कृति आयी है, उसमें कुछ तो होगा ही। दूसरी कसौटी यह है कि कितना व्यापक पाठक समुदाय किसके पास है। बाकी तो हरेक को यह हक है कि वह खुद को महानतम घोषित कर दे, बस झगड़ा तब शुरु हो जाता है जब वह दूसरों से भी यह मनवाने पर तुल जाये कि उसे महानतम मान लिया जाये। पुरानों ने जो कुछ श्रेष्ठ किया है, वह नयों को स्वीकार करना पड़ेगा, श्रीलाल शुक्ल, परसाई, शरद जोशी, ज्ञान चतुर्वेदी को कौन सा नया अस्वीकार कर सकता है। भाई काम है, ठोस काम है, क्लासिक काम है, मानना ही पड़ेगा। पुरानों में नये विषयों पर लिखने का श्रम करने का आलस्य है, नये लोग नये विषय पढ़ रहे हैं। आप ही शोध करके बतायें, वीआरएस, बाजार, सेलरी के नये पैकेज जनित तनाव, बाजार के बवालों पर हमारे अभी के बुजुर्गों में से ज्ञानजी के अलावा कौन काम कर रहा है। ज्ञानजी ने काम किया है, तो उनकी चमक अलग है। आप, एकाध अपवाद छोड़ दें, ज्ञानजी का सम्मान हर नया करता है। पर ज्ञानजी जैसे सम्मान के लिए ज्ञानजी जैसे काम करने पड़ते हैं। अनार्जित सम्मान देने को बिलकुल तैयार नहीं हैं नये लोग।
आलोक पुराणिक से हुई यह बातचीत आपको कैसी लगी इस पर अपनी राय बतायें। आपके भी कुछ सवाल हों तो निसंकोच पूछें। सवाल इनबॉक्स कर सकते हैं या फ़िर मुझे मेल करिये anupkidak@gmail.com पर।

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