Monday, September 11, 2017

जिसको जो लिखना है, उसे वह लिखने की छूट होनी चाहिए -आलोक पुराणिक

आलोक पुराणिक से पूछताछ की कड़ी में आज के सवाल Anshu Pradhan के हैं। अंशु जी जनसन्देश में नियमित व्यंग्य लेख लिखती हैं। उनके सवालों की शुरुआत आलोक पुराणिक की फ़िटनेट को लेकर हुई। बताते चलें कि आलोक पुराणिक का वजन कभी सौ किलो के अल्ले-पल्ले पहुंच गया था। इसके बाद वजन कम करने की ठानी तो साल भर में तीसेक किलो वजन बाहर कर दिया। आलोक पुराणिक इसे स्वास्थ्य की जरूरत बताते हैं लेकिन उनके बहुत खास लोगों ने नाम न बताने की शर्त पर जानकारी दी कि उनकी ’लेखन सहेली’ सन्नीलियोनी जी राखी सावंत जी ने संयुक्त रूप से स्लिप-ट्रिम होने के लिये इशरार किया था। यह तक कह दिया कि अगर हमारा अपने लेखों में रखना है तो पहले छैला बाबू बनना है। फ़िर क्या था - परिणाम सामने है। दोनों फ़ोटुयें देख सकते हैं आप नीचे।
बाकी के सवाल लेखन से जुड़े हैं। पहले भी इन पर आलोक पुराणिक लिख चुके हैं। एक बार इसी बहाने और सही।
आपके कोई सवाल हों आलोक पुराणिक से तो मुझे इनबाक्स करें या फ़िर मेल करें anupkidak@gmail.com पर।
फ़िलहाल तो आप सवाल-जबाब पढें और अपनी प्रतिक्रिया बतायें। 
सवाल 1- आप इतना फिट कैसे रहते हैं?
जवाब-फिट रहना बहुत आसान है। चित्त निर्मल रखें, किसी से राग-द्वेष ना पालें, किसी का अहित ना सोचें, तो मन साफ रहता है। सुबह उठकर मैं योग करता हूं और एक घंटा कम से कम घूमता हूं। खाने में नियंत्रण रखता हूं। एक वक्त मैं बहुत अनफिट था मेरा वजन सौ किलो तक चला गया था और दिन में आठ कप चाय पी जाया करता था। अब खान-पान पर नियंत्रण रखा है।
सवाल 2- आपके व्यंग्य में विविधता रहती है, वो कैसे ?
करुणा की जमीन पर अनुभव-चिंतन के बीज डालिये और संवेदना से सींचिये, व्यंग्य फलीभूत हो जाता है। खूब देखिये, खूब पढ़िये और खूब सोचिये, तो व्यंग्य आता है। बाजार, तकनीक, इंसानी पाखंड, क्रिकेट, इश्तिहार सबको खुली आंखों से देखिये तो व्यंग्य की रेंज बहुत लंबी बन जाती है। मैं रोज 11 अखबार पढ़ने की कोशिश करता हूं। और पंद्रह-बीस पत्रिकाएं नियमित पढ़ता हूं, तकनीक से लेकर शेयर मार्केट से लेकर साहित्य से लेकर तमाम विषयों पर, विविधता बनी रहती है। बहुत आवारागर्दी करता हूं, तरह तरह के लोगों से संवाद करता हूं। इस सबसे लगातार खुद को अपडेट करने में मदद मिलती है।

सवाल 3: एक व्यंग्यकार का व्यंग्य कैसा होना चाहिए ? क्या व्यंग्य को इस तरह से लिखा जा सकता है जो हर आयु वर्ग के अनुरूप तो हो ही साथ में उसमें स्थिरता भी हो ? क्या इन बातों को ध्यान में रखकर ही व्यंग्य लिखा जाना चाहिए।
जवाब: व्यंग्यकार को व्यंग्य वह लिखना चाहिए, जो उसे रुचता है, जो उसे जमता हो। किस आयु वर्ग के लिए, किस जेंडर के लिए, ऐसे मुद्दे पहले तय ना कीजिये। पहले जो मन करे, लिखिये, फिर खुद को कई बार डिस्कवर करते हैं कि हम तो यहां बेहतर कर सकते हैं, तो गाड़ी फिर उस रुट पर दौड़ा दीजिये। रचनात्मक कामों में बने बनाये रास्ते ना होते, ट्रायल एंड एरर बहुत होता है, इसी से सीखना होता है
सवाल 4. किसी समस्या पर एक दो चुटकी लेकर उसी पर लीपा पोती करते हुए आर्टिकल को व्यंग्य कहने वालों को या ऐसे आर्टिकल को आप कैसे देखते हैं? क्या ये व्यंग्य के लिए सही है, क्या व्यंग्य ऐसा ही होना चाहिए। आपकी इस विषय पर क्या राय है।
जवाब: देखिये, जिसको जो लिखना है, उसे वह लिखने की छूट होनी चाहिए। क्या व्यंग्य है क्या व्यंग्य नहीं, यह अच्छा व्यंग्य है या बुरा व्यंग्य है, इसकी बुनियादी तमीज हमें अपने बुजुर्गों को पढ़कर आ जानी चाहिए। ज्ञान चतुर्वेदीजी के काम को सामने रखें, श्रीलाल शुक्ल के काम को सामने ऱखें, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, बाल मुकुंद गुप्त, भारतेंदु, मनोहर श्याम जोशी के काम को सामने रखें, तो मोटा मोटा अंदाज हो जाता है कि ये मानक काम हैं। बाकी जो लिखना चाहे, वह लिखे, उनके लिखे पर फतवे भी जारी नहीं किये जाना चाहिए। कोई सीखने का उत्सुक हो, तो उसे किसी वरिष्ठ से मार्गदर्शन ले लेना चाहिए। ठोस लेखन समय की छलनी के पार जाता है, श्रीलाल का शुक्ल का रागदरबारी करीब पचास साल बाद भी बांधे हुए है। तो सबको लगातार सीखना चाहिए, इस भाव में नहीं रहना चाहिए कि मैंने जो कर दिया वही अल्टीमेट है।
सवाल 5: एक लेखक का सशक्त लेखन और शब्दों का चुनाव उसे पहचान दिलाता है या फिर मठ, मण्डली और चापलूसी आदि । आपके इस सन्दर्भ में क्या विचार हैं।
जवाब: इतिहास को देखें, तो सिर्फ काम ही समय की छलनी की पार ले जाता है। जौक गालिब के समकालीन थे और जौक उस वक्त के बादशाह जफर के उस्ताद थे, बहुत करीबी थे। आज गालिब का कद जौक से बहुत बड़ा माना जाता है, क्यों, इसलिए काम ही हम तक आ रहा है। मठ मंडली चापलूसी बहुत आगे तक नहीं ले जाती। सिर्फ समय खपाऊ काम हैं ये और मेरा मानना है कि सच्चे रचनात्मक व्यक्ति की क्षमताओं में भी नहीं है यह सब चापलूसी और मठबाजी वगैरह।
सवाल 6: हिंदी में पैसा बिलकुल भी नहीं है इसलिए भी हिंदी की कोई खास पहचान नहीं है न हिंदी लेखकों की। इस विषय पर आपका क्या कहना है? क्या हिंदी में पैसा न होना ही हिंदी को और हिंदी लेखक को कमजोर बनाये हुए हैं
जवाब : हिंदी में पैसा है, पर हिंदी के साहित्यिक लेखन में नहीं है। हिंदी व्यंग्य को अगर कोई मंच पर कायदे से पेश कर सकता है तो भरपूर पैसा है, शरद जोशीजी ने दिखाया है। हिंदी व्यंग्य लेखक को अपनी मार्केटिंग करनी पड़ेगी पाठक तक पहुंचना पड़ेगा, वरना वह प्रकाशक का गुलाम टाइप ही होकर रह जायेगा।
सवाल 7. लेखक को अपने किसी भी लेखन में क्या बिल्कुल साधारण भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए या फिर लेख को उचित शब्दों के चुनाव और अभिव्यक्ति की शैली पर भी ध्यान देना चाहिए?
जवाब- जो मरजी आये लेखक को करना चाहिए, कर के देख लेना चाहिए, फिर तय करना चाहिए कि यह ठीक जा रहा है या नहीं। लेखक को मन में नहीं रखनी चाहिए कुछ भी सब करके देख ले। मैं रचनात्मक कामों में इस तरह की फतवेबाजी के खिलाफ हूं कि ये होना चाहिए या यह नहीं होना चाहिए। जो मन करे सब होना चाहिए। बाद में फैसला कर लें कि जो आपने किया, वह आपके हिसाब से ठीक था या नहीं।

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