Saturday, September 30, 2017

चिर युवा लेखक आलोक पुराणिक - अनूप शुक्ल

[आलोक पुराणिक पर केन्दित किताब ’ आलोक पुराणिक - व्यंग्य का ए.टी.एम.’ के सम्पादकीय के बहाने लिखा लेख]
और मजाक- मजाक में यह किताब भी आ ही गई।
आलोक पुराणिक पर किताब निकालने की इसी महीने सोची मैंने- बस ऐसे ही। महीने की शुरुआत हुई तो याद आया कि इसी महीने की 30 तारीख को जन्मदिन पड़ता है - ’व्यंग्य बाबा’ का। एक आइडिया बिना परमिशन लिये दिमाग में घुस आया कि क्यों न किताब निकाली जाये आलोक पुराणिक पर। और कोई आइडिया होता हम हड़का के भगा देते। ऐसे न जाने कित्ते तीसमार खां और फ़न्ने खां टाइप आईडियों को दिमाग की देहरी से भगा दिये हैं। लेकिन ये वाला आइडिया बेचारा इत्ता मासूम था कि बावजूद तमाम व्यस्तता के उसको हड़काते भी नहीं बना। मासूमियत के चलते हमने आइडिये से वादा भी कर लिया- ’ठीक है बेट्टा ! हम अमल करेंगे तुम पर।’ हुआ भी अमल। भले बल भर न हुआ पर काम भर का तो हुआ ही।
महीने की शुरुआत में कोई रूपरेखा नहीं थी कि किताब किस रूप में निकलेगी। लेकिन बातचीत करना शुरु कर दिये। फ़िर सोचा आलोक पुराणिक की सभी किताबों के पंच शामिल करेंगे और अपनी तरफ़ से उनके बारे में लिखकर 100 पेज के करीब किताब निकाल देंगे। लेकिन फ़िर लगा कि आलोक पुराणिक को उनके दूसरे अपनों की नजर से भी देखा जाये। इसी क्रम में आलोक पुराणिक से बातचीत का सिलसिला भी शुरु हुआ। कई साथियों ने अपने सवाल दिये उनके जबाब आलोक पुराणिक ने दिये। सवालों के जबाब से आलोक पुराणिक की विद्वता का भी जलवा टाइप जमा। जिस अंक में आलोक जी ने अपने बचपन के किस्से बताये, उसको पढकर कई लोग भावुक हुये। उनके पिता के कम उमर में निधन के किस्से से कई लोगों- ’अपनी जैसी कहानी समझा।’
सबसे कठिन, दिलचस्प और आखिर में सबसे सुकूनदेह भी हिस्सा रहा आलोक पुराणिक के अपने लोगों से उनके बारे में लिखवाना। लोगों ने अपनी मर्जी से लिखा आलोक पुराणिक के बारे में। इससे उनकी लोकप्रियता का अन्दाजा लगता है। हरीश जी ने स्वयं लिखा मेरे फ़ेसबुक पर कि वे भी लिखेंगे। उनके घर में उनके नजदीकी रिश्तेदार बीमार थे। इसके बावजूद उन्होंने पांच पन्ने लिखकर भेजे। यह आलोक पुराणिक के प्रति उनके स्नेह का परिचायक है। उनके बीच स्नेह का ताना-बाना उनके लेख से समझकर आता है। ज्ञान जी, जिनको आलोक पुराणिक व्यंग्य के कुलाधिपति बताते हैं, ने अपने और आलोक पुराणिक के बीच के ’मुचुअल एडमिरेशन सोसाइटी’ का जिक्र करते हुये जो लिखा वह मैं यहां बताकर उसका आनन्द कम नहीं करना चाहता। प्रेम जनमेजय जी, जिनको आलोक पुराणिक ’व्यंग्य बुजुर्ग’ की उपमा से नवाजते हैं, ने बावजूद तमाम व्यस्तता अपने व्यंग्य यात्रा के आगामी अंक में जो वे आलोक पुराणिक के बारे में लिखने वाले हैं, उन नोट्स को मुझे भेज दिया। ’एक समर्पित संपादक का यह बलिदान, याद रखेगा व्यंगिस्तान।’ अरविन्द तिवारी जी ने पहले ही अपना लेख अपने फ़ेसबुक पर छाप दिया है। उसे यहां फ़िर से बांचकर आन्न्दित होंगे।
आलोक पुराणिक के बारे में उनके जबर प्रशंसक मित्रों ने दिल खोलकर लिखा। कुल 31 लेख आये मित्रों-सहेलियों के। मजे की बात यह कि आलोक पुराणिक की महिला प्रशंसको ने उनके बारे में लेख स्वत: स्फ़ूर्त ढंग से भेजे। अलग तरह से उनको देखा। इससे आधी आबादी वाले पाठक वर्ग में आलोक पुराणिक की लोकप्रियता का अंदाज लगता है। लखनऊ की निकिताशा कौर बरार जी ने तो बस एक पोस्ट में लिखा था कि उन्होंने आलोक पुराणिक की रचना 9 वर्ष की उमर में पढी थी और वे इस बात पर गर्व करती हैं कि वे उनके पसंदीदा लेखक हैं। मैंने फ़ौरन उनको गर्व की अभिव्यक्ति वाला लेख लिखने का अनुरोध किया यह कहते हुये - ’एन्ड योर टाइम स्टार्ट्स नाऊ।’ निकिताशा जी ने भी शाम तक लेख मेरे मेल बक्से में जमा कर दिया। कुछ ऐसा ही जबरियन लेखन राना अरुण सिंह से भी कराया गया।
हर लेख के बारे में बतायेंगे बहुत लिखना होगा लेकिन सबसे मजेदार रहा सुभाष चन्दर जी से लिखवाना। उनसे मैंने इतने तकादे किये कि भले आदमी को लिखना ही पड़ा। मुझे पक्का भरोसा था कि वे लिखेंगे और उन्होंने मेरे विश्वास की रक्षा की और कल खुद लेख टाइप करके भेज दिया। मेरे भरोसे की वजह जानने के लिये मेरी व्यंग्य श्री सम्मान की रपट देखिये।
जिन भी लोगों ने मेरे अनुरोध पर या अपनी मर्जी से अपने लेख भेजे उनके प्रति आभार। कुछ साथी समय के अभाव में नहीं लिख पाये। कुछ लिखास का दबाव न बन पाने के कारण लेख नहीं भेज पाये। उनके प्रति भी आभार कि कम से कम उन्होंने वादा किया कि मूड बना तो लिखेंगे और भेज देंगे। अब अगर बहुत चाहने पर भी मूड न बन पाये तो कोई भला क्या कर सकता है।
आलोक पुराणिक से मेरी जान-पहचान 2006 में हुई। तब तक वे चर्चित लेखक हो गये थे। हमारी कई मेल-मुलाकाते हुईं। उनके अनेक हुनर से परिचित होते गये। उनकी क्षमताओं से भी। अक्सर बातचीत भी होती रही। उनके बारे में साथियों ने तमाम बातें लिखी हैं। उनसे उनके व्यक्तित्व के कई पहलुओं का अंदाज लगता है। यह पकड़ने वाले के राडार पर निर्भर है कि वह उनके व्यक्तित्व की कौन सी बात पकड़ता है। जैसे रेशू वर्मा ने लिखा कि आलोक पुराणिक के अन्दर दो आलोक रहते हैं। डॉ राजरानी शर्मा ने उनमें व्यंग्य का हैरी पॉटर देखा। अनिल उपाध्याय जी ने उनकी अपने व्यक्तिगत जीवन में ’आर्म्स लेंग्थ रिलेशनशिप’ रखने की तरफ़ इशारा करते हुये जो लिखा उससे लगता है कि अभी आने वाले समय में इस स्लिम ट्रिम आदमी और भारी भरकम लेखक के कुछ ऐसे और हसीन पहलू दिखेंगे जिनके चलते उनसे थोड़ी ईर्ष्या रखना और जायज हो जायेगा।
आलोक पुराणिक के लेखन के कुछ पहलुओं से तमाम लोगों से कुछ शिकायत हो सकती है। कुछ को भाषा सम्बन्धी कुछ को सरकार की बुराई करने की बजाय कमजोर विपक्ष पर उनके द्वारा व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते रहने को लेकर। दोनों ही मसलों पर आलोक पुराणिक अपनी बात कह चुके हैं। उनके लगातार नये प्रयोग करते रहने की बात कई साथियों ने कही। इस मामलें वे परसाई जी की यौवन की परिभाषा,
“यौवन नवीन भाव, नवीन विचार ग्रहण करने की तत्परता का नाम है; यौवन साहस, उत्साह, निर्भयता और खतरे-भरी जिन्दगी का नाम हैं,; यौवन लीक से बच निकलने की इच्छा का नाम है। और सबसे ऊपर, बेहिचक बेवकूफ़ी करने का नाम यौवन है“
पर पूरे मन से अमल करते हैं। आलोक पुराणिक नवीन विचार ग्रहण करने की तत्परता रखते हैं। नये प्रयोग करने की बेहिचक बेवकूफ़ी करने की इच्छा रखते हैं और उस पर अमल भी करते हैं। इसीलिये वे चिर युवा हैं। इसीलिये उनकी नजदीकी नये जमाने की आइकन सन्नी लियोनी जी से है। राखी सावन्त जी से है। अब इससे कोई ईर्ष्या रखे तो रखे।
आलोक पुराणिक को हालांकि अपने को लेखक के रूप में पहचान पाने में कठिनाई नहीं हुई लेकिन फ़िर भी, जैसा हरीश जी ने लिखा कि पहले लोगों ने उनको बाजार से सम्बन्धित लेखन के चहले ज्यादा भाव नहीं दिये। लेकिन इससे आलोक पुराणिक विचलित नहीं हुये। उल्टे भाव की दुकान लगाने वाले ही त्रस्त हुये होंगे कि यार ये अजीब उल्टी खोपड़ी का है- हम भाव देने के लिये बैठे हैं और ये आता ही नहीं मेरे पास। आलोक पुराणिक की ताकत उनके पाठक रहे हैं। और मुझे इस बात का ताज्जुब होता है कि उनकी बात चलने पर पाठक बीसियों वर्षों से उनको पढ रहे हैं। ऐसे ही एक सीनियर पाठक प्रमोद कुमार उनके बारे में टिप्प्णी करते हुये लिखा - “आलोक पुराणिक जी व्यंग्य के पर्याय हैं ............उनके लेखन में एक सतत प्रवाह है .......गरिमा है ........हास्य और व्यंग्य का बारीक फर्क आलोक जी को पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है ........गम्भीर विसंगतियों पर बहुत सहज और रोचक प्रतिक्रिया आपका स्वभाव है ,,,,,,,युवा पाठक को व्यंग्य विधा से जोड़ने में आपका उल्लेखनीय योगदान रहा है ,,,,,,,,,दुख की बात ये है आलोक जी की तुलना संभव नहीं ........क्योंकि वे अपने ढंग के इकलौते हैं “
ऐसे ही जब शेफ़ाली पांडेय अपने लेख में और अंशुमाली रस्तोगी ने बातचीत करते हुये आलोक पुराणिक के शुरुआती दिनों के लेखन का जिक्र करते हुये जब उनके स्तम्भ ’जालबट्टा’ का जिक्र करते हैं तो मुझे आलोक पुराणिक के इन ’सीनियर पाठकों’ से काम भर की जलन होती है कि उमर में हमसे कम होते हुये भी जो मजे इन लोगों ने लिये हम उनसे बेफ़ालतू में ही वंचित रहे।
आलोक पुराणिक के लेखक रूप से ज्यादा और बहुत ज्यादा मुझे उनका व्यक्तित्व अच्छा लगता है। पसंद आता है। अपने पर और अपनी मेहनत पर अगाध भरोसा, किसी के प्रति छोटी सोच न रखना और किसी बात के लिये शार्टकट न अपनाना उनके ये गुण मुझे आकर्षित करते हैं। जिसमें भी होंगे उसके प्रति आकर्षण होगा, लगाव होगा।
किताब की शुरुआत से अभी इसको पूरा करने तक जितना समय और मेहनत लगी उतने में शायद मेरी अपनी खुद की दो-तीन किताबें मुकम्मल हो जातीं। लेकिन जो सुकून और सन्तोष इसको पूरा करके मिला शायद उसका आधा भी न मिल पाता। कक्षा आठ में पढा याज्ञवल्क्य का मैत्रेयी को बताया सूत्र याद आता रहा- “ आत्मनस्तु वै कामाय सर्वम प्रियम भवति।“ सब कुछ अपनी ही कामना के लिये प्रिय होता है। इस किताब पूरा करने का प्रिय सन्तोष भी ऐसा ही है। इस किताब में कई कमियां रह गयीं। उनको धीरे-धीरे ठीक करेंगे। लेकिन इसको पूरा करने के दौरान जो इस तरह के काम करने का विश्वास बढा वह नायाब मेरे लिये बहुत बड़ा अनुभव है। अब लगता है कि खूब सारे ऐसे और इससे अलग और बेहतर भी काम किये जा सकते हैं।
किताब आलोक पुराणिक की माता जी श्रीमती रजनी पुराणिक और आलोक पुराणिक के तमाम पाठकों, मित्रों और प्रशंसकों को समर्पित है। माताजी अपने जिद्दी और बचपन से केयरिंग रहे बालक के 51 वें जन्मदिन पर इस किताब को देखकर अवश्य प्रसन्न होंगी। मुझे पूरा भरोसा है कि उनके प्रसन्न होते ही उनके आशीर्वाद का प्रसाद हम सब तक अपने आप पहुंच जायेगा।
इस किताब को पूरा करने में जिन भी लोगों ने सहयोग दिया, लेख भेजे, फ़ोटो भेजे उस सभी का शुक्रिया, आभार। रेशू वर्मा ने कई फ़ोटो भेजे। कुश ने घन्टे भर के अनुरोध पर कवर पेज बना दिया। आलोक पुराणिक को तो दो-दो मिनट में परेशान करते रहे अपन। जो कहा वह सामग्री भेजी। चलते-चलते मोटर साइकिल के साथ फ़ोटो भेजने के लिये कहा तो भाई साहब धूप में मॉडलिंग करने निकल लिये और फ़ोटो भेजी।
घरैतिन का समय तो हमने इस किताब के चक्कर में ऐसा खाया जैसा नेता लोग राहत सामग्री का पैसा अपने चुनाव प्रचार में फ़ूंक देते हैं। अब इसके लिये उनको आभार देंने भर से उस समय की भरपाई तो हो नहीं जायेगी लेकिन आभार प्रकट करने में चूकना भी कैसा?
इसके अलावा जिनके प्रति आभार प्रदर्शन से हम चूक गये हों वे सभी हमारी चूक को नजर अन्दाज करते हुये हमारे द्वारा अपने प्रति आभार प्रदर्शित किया हुआ मानें।
अंत में अपने बेहद प्रिय सितम्बरी लाल , व्यंग्यबाबा और व्यंग्य के अखाड़े के सबसे तगड़े पहलवान , बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न भाई आलोक पुराणिक को उनके 51 वे जन्मदिन की अनेकानेक मंगलकामनायें। वे अपने मनचाहे काम कर सकें। खूब सारी उपलब्धियां उनके खाते में जुटें। स्वस्थ रहें। सानन्द रहें। मस्त रहें , बिन्दास। लिखत-पढत-फ़ोटू खिंचाई और सब काम चलते रहें। बाकी जो होगा देख लिया जायेगा। अभी फ़िलहाल इतना ही।
’आलोक पुराणिक व्यंग्य का ए.टी.एम’ इस लिंक पर पहुंचकर मंगाई जा सकती है। कीमत है 51 रुपये मात्र।
आप फौरन इस लिंक पर पहुंचिए और किताब देखिये , ख़रीदिए और अपने साथियों को भी बताइये।
http://rujhaanpublications.com/…/alok-puranik-vyangya-ka-a…/
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10212660957612321

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