Saturday, February 10, 2018

जयपुर की सुबह

चित्र में ये शामिल हो सकता है: आकाश, वृक्ष, बाहर और प्रकृति
आइसक्रीम के कोन जैसे सिंहासन में गुड़ी-मुड़ी सूरज भाई


आज सुबह जयपुर में हुई। टहलने निकले तो सड़क पर इक्का दुक्का लोग दिखे। सर्दी कम टाइप। 'चाय कमीज' (टी शर्ट)में टहलते दिखे लोग।

सूरज भाई अभी निकले नहीं थे। शायद उनको पता नहीं होगा कि हम उनको जयपुर में खोज रहे। गुडमार्निंग के लिए।
निकले भले न हों लेकिन सूरज भाई के निकलने की तैयारी हो रही थी। आसमान में लाल-पीली कालीन बिछ गई थी। कूंची से थोड़ा आड़ी-तिरछी बनाई गई थी कालीन ताकि थोड़ी स्वाभविक लगे।
सड़क पर कुत्ते जमा थे। मुझे लगा सूरज भाई की अगवानी में खड़े हैं। निकलते ही कड़क गार्ड ऑफ ऑनर ठेल देंगे। एक कुत्ता तो आगे आकर पूंछ हिलाते हुए खड़ा हो गया। ऐसे जैसे मुझसे पूंछ रहा हो -'कुछ खबर मिली कब आएंगे, सूरज भाई।'
आगे सड़क पार करके देखा तो सूरज भाई टाई-साई लगाकर निकलने ही वाले थे। आसमान एकदम लाल कर लिये अपने अगल-बगल। जैसे नेता निकलते हुए अपने को कमाण्डो से घेर लेता है, लगुये-भगुये चिपक लेते हैं वैसे ही सूरज भाई को चारों तरफ से उजाले, रोशनी, किरणों ने घेर लिया। चिड़ियां लोग उनके सम्मान में समर्पित मीडिया की तरह चहकने लगीं।
पलटकर देखा तो कुत्ते लोगों को कोई आदमी सड़क पर फेंककर बिस्कुट खिला रहा था। ग्लूकोश के बिस्कुट के टुकड़े करते हुए सड़क पर फेंकता जा रहा था। कुत्ते लपकते हुए खाते जा रहे थे। उनको सूरज के निकलने से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। बिस्कुट खिलाने वाले भाई ही उनके लिए सूरज थे। अब मुझे पता लगा कि वे पूंछ हिलाते हुए मुझसे सूरज भाई के बारे में नहीं बल्कि 'बिस्कुट भाई' के बारे में पूंछ रहे थे। हरेक का सूरज अलग-अलग होता है।
बिस्कुट वाले भाई बिस्कुट जमीन पर फेंकते हुए कह रहे थे-'बहुत पाप करते हैं हम लोग। थोड़ा पुण्य भी कर लेना चहिये। इसलिए बिस्कुट खिलाते हैं हम इनको।'
दुनिया के तमाम अच्छे काम पाप कम करने के लिए किये जाते हैं। पुण्य बैंक में बचत की तरह जमा किये जाते हैं ताकि पाप की वसूली आये तो पुण्य से भुगतान किया जा सके। लेकिन अब दिन पर दिन बचत मुश्किल होती जा रही है। पीपीएफ भी बंद होने की बात चल रही है। पाप-पुण्य का झूला झूलने वाले मिडिलची कि मरन है।
पलट कर देखा तो सूरज भाई आसमान पर गद्दी संभाल चुके थे। किसी आइसक्रीम के कोन में घुसी बहुरंगी आइसक्रीम सरीखे गुड़ी-मुड़ी से लगे। खूबसूरत लग रहे थे। मुस्कराते हुए नमस्ते किया तो और मुस्कराने लगे। लगता है कोई धांसू डायलॉग सोच रहे थे जिसको मारकर अपना जलवा जमा सकें।
लेकिन अब उनको कौन समझाये की धांसू डायलॉग सोचकर नहीं मारे जाते , सहज आते हैं। कोई नहीं, समझ जाएंगे साथ उठते-बैठते। सबकुछ सिखाने-बताने से नहीं आता। बहुत कुछ देखते-सुनते अपने आप आता है।
है कि नहीं ? सुबह हो गयी। मजे करिये। मस्त रहिये।

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