Saturday, February 24, 2018

कमजोर दिल के घपलेबाज


आजकल बैंकिग घोटालों की बमबम मची है। एक के बाद एक ताबड़तोड़ घपले किलकते हुये पैदा हो रहे हैं। ’मीडिया रैम्प’ पर सुन्दरियों की तरह इठलाते हुये कैटवॉक कर रहे हैं। एक घपले के सौंदर्य को जी भरकर निहार भी नहीं पाते कि भड़भड़ा के सामने आया दूसरा घोटाला अपने हनीट्रैप में फ़ंसा लेता है।
घपले करने वाले ताबड़तोड़ बैटिंग वाले अंदाज में स्कोर टांगते जा रहे हैं। जनता बेचारी न्यूट्रल अम्पायर की तरह चुपचाप किनारे खड़ी घपलचियों के जलवे देख रही है। घपलावीरों की हिट की हुई हर गेंद बाउंड्री के बाहर जा रही है। मीडिया चीयरलीडरानियों की तरह हर घपले पर मटक रहा है। घोटालचियों की अदाओं का सौंदर्य निहारते हुये उनको मधुर अंदाज में धिक्कारता है जैसे वधू पक्ष की महिलायें वरपक्ष के सम्मान में मंगलगालियां देती हैं।
उधर कई गुज्जू भाइयों मिलकर हज्जारों करोड़ पार किये। इधर कनपुरिया कोठारी जी ने भी ताव में आकर अकेले ही ’कलट्टरगंज झाड़ दिया।’ मसाला प्रेमी कनपुरिया मुंह के मसाले से सड़क का मुंह रंगते हुये कह रहा है- ’यार इज्जत रख ली अगले ने कानपुर की। अब कोई मना भी करे लेकिन अपन बिटिया की शादी में बरातियों का स्वागत पान पराग से ही करेंगे।’
फ़रवरी में मध्यवर्ग आयकर कटौती के हमलों से हलकान होता है। अपने खर्चे काटता हुआ किसी तरह महीना गुजर जाने का इंतजार करता है। इस समय आयकर की कटौती प्रतिद्वन्दी लेखक को मिले सम्मान सी अखरती है। ऐसे में बैंकिग घोटाले ’बुरा न मानो होली है’ सा कहते हुये हौसला बंधा रहे हैं - ’देख बाबू, देश के हज्जारों करोड़ लुट गये फ़िर भी वह मुस्करा रहा है। तुम अपने चंद रुपयों की कटौती पर बिलख रहे हो।’ बाबू देशभक्ति के नाम पर मुस्कराने की कोशिश करता है तब तक पता चलता है उसके पीएफ़ पर भी कैंची चल गयी। बिना समझाये वह समझ जाता है कि देशभक्त होने के नाते देश का नुकसान उसको ही झेलना पड़ेगा।
घपले पहले भी होते रहे हैं। लेकिन हाल में हुये घपले अलग तरह के हैं। पहले घपलेबाज पकड़े जाने पर शरमाते थे। मुंह छिपाते थे। घपला करने के बाद पछताते थे। अपने बहक जाने की बात बताते थे। कुछ तो मारे शरम के चुल्लू भर पानी में डूब तक जाते थे। इसका कारण उनमें आत्मविश्वास की कमी होती थी। उनको लगता था कि उन्होंने गलत किया है। पकड़े जाते ही वे शर्मिन्दगी वाले मोड़ में चले जाते थे। वे कमजोर मन वाले घपलेबाज होते थे।
लेकिन हाल के घपलेबाजों में अलग तरह का आत्मविश्वास दिखता है। माल्या जी उधर लंदन से हड़काते हुये कहते हैं-’हमको ज्यादा उकसाओगे तो सबकी पोल खोल दूंगा।’ पोल खुलने की घमकी से तो नंगा तक डरता है। इसलिये लोग सहम गये।
घपलेबाज भाई भी ने बैंक और मीडिया को धमकाया है कि उनके खुलासे के चलते उसकी साख में बट्टा लगा। अब कोई पैसा वापस नहीं करेंगे। ’जबरा लूटे, रोवन न देय।’
हमें तो धुकुर-पुकुर मची है कि अगला कहीं देश पर मानहानि का दावा न ठोंक दे। घपले की रकम से दोगुने का हर्जाना न मांगने लगे। खुदा न खास्ता अगर ऐसा हो गया तो अभी तो पीएफ़ कम हुआ है, आगे कहीं तन्ख्वाह भी न दुबली हो जाये।
इस लिहाज से कनपुरिया घपलेबाज संस्कारी डिफ़ाल्टर हैं। घपले का खुलासा होते ही देशभक्त हो गये। पासपोर्ट जब्त हो जाने के चलते सिस्टम में सहज विश्वास पैदा हो गया था। कानून की जकड़ में आया आदमी न्याय व्यवस्था पर भरोसा करने लगता है। इसी विश्वास के चलते उन्होंने कानपुर छोड़कर न जाने की धमकी दी है। जिस बैंक से लोन लेकर पैसा पीटा, तमाम कनपुरियों को पान मसाले के जरिये कैंसर भेंट किया उनको ही चूना लगाते हुये कनपुरिया जुमले - ’ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं’ को अमली जामा पहनाया। कानपुर को ऐसे शहर प्रेमी वीर पर गर्व होना चाहिये।
हर खाया पिया आदमी देश के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराना चाहता है। महापुरुष बनना चाहता है। पुराने समय में लोग महान बनने के लिये जिन्दगी भर परोपकार करते थे। स्कूल कालेज खुलवाते थे। कुंये-बावड़ी बनवाते थे। देश के लिये जेल जाते थे। जिन्दगी गुजर जाती थी तब कहीं महापुरुषों के खाते में नाम दर्ज हो पाता था। महान बनने के चक्कर आदमी की जिन्दगी परोपकार में ही हलकान हो जाती थी। घपलों-घोटालों ने महानता के नये रास्ते खोले हैं। इस रास्ते पर चलकर आदमी ऐश करते हुये भी इतिहास की किताब में घुस सकता है। आज बच्चा-बच्चा विजय माल्या और नीरव मोदी का नाम जानता है।
हाल में सामने आये घपलों के कारीगर बिना कुछ खर्च किये अहिंसक तरीके से मीडिया में छाये रहे। दिल्ली के मुख्यमंत्री अगर घपलेबाजों से सीखते तो उनको अपनी सरकार के विज्ञापन करने के लिये आधी रात को अपने सचिव से मारपीट नहीं करनी पड़ती।
लेकिन इन घपलों से हमको परेशान नहीं होना चाहिये। हमको इनके धवल पक्ष देखने चाहिये। बैंक में हुये घपलों से बैंको की सुरक्षा मजबूत हो होगी। जरूरत मंदों के लोन मुश्किल हो जायेंगे। घोटालेबाजों से लुटने की भड़ास बैंक वाले शिक्षा लोन लेने वालों पर निकालेंगे। इसका फ़ायदा यह होगा कि बच्चे पढने लिये विदेश कम जायेंगे। प्रतिभा पलायन में कमी आयेगी। जो युवा दुनिया की उन्नति में योगदान देते वे देश में ही रहते हुये रोजगार की तलाश में भटकेंगे। राजनीतिक कार्यकर्ता बनकर जिन्दाबाद मुर्दाबाद के नारों से आसमान गुंजायेंगे। मारकाट करते हुये देश की जनसंख्या कम करने में सहयोग करेंगे। देश आगे बढायेंगे।
हम सदियों से पैसे को हाथ का मैल मानते आये हैं। हमें सोचना चाहिये कि गबन करके विदेश भागे लोग देश की गंदगी लेकर भागे हैं। देश के स्वच्छता अभियान में अप्रतिम योगदान है यह उनका। यह पैसा भी कोई हमेशा के लिये थोड़ी गया है बाहर। जहाज के पंछी की तरह यह फ़िर वापस आयेगा देश में। घपलों के रुपयों का देश से तगड़ा लगाव होता है। जरूरत पड़ते ही वापस आयेगा। देश में चुनाव, दंगे, अराजकता की पुकार पर दौड़ता भागता चला आयेगा। जहां जरूरत होगी, खप जायेगा। देश के घपले का पैसा अंतत: देश में ही खपता है। घपले के पैसे की देशभक्ति में संदेह नहीं करना चाहिये। घपलों में देश की बरक्कत देखना चाहिये।
घपलों का सामना हमको उदारता से करना चाहिये। ’वसुधैव कुटम्बकम’ के हिसाब से घोटाले करने वालों को अपना भाई-बहन मानना चाहिये। जिन घपलों से भाई-बहनों का भला होता हो उनका बुरा नहीं मानना चाहिये। घपलेबाजों की इज्जत करनी चाहिये। ’बुरा न मानो होली है’ कहते उनको गले लगाना चाहिये।

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