आजकल मानहानि का दौर चल रहा है। बेइज्जतियों की भगदड़ मची हुई है। जिसे देखो वही लपका जा रहा है अदालत की तरफ़। मानहानि का दावा पेश करने के लिये। अदालतों की भी नाक में दम हुआ पड़ा है। एक से एक चिरकुट लोग अपनी मानहानि का मुकदमा धांसे पड़े हैं अदालतों में। हाल यह कि जो जितना बड़ा चिरकुट उसका उतना ही बड़ा मानहानि का दावा। मतलब मानहानि के दावा दावावीर की चिरकुटई की मात्रा के समानुपाती है।
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Saturday, May 31, 2025
मानहानि
अदालतें हलकान हैं। व्यस्तता के आंसू रो रही हैं। उनका भी मन करता होगा -’कोई अदालत हो जहां वे अपनी इस बेइज्जती के खिलाफ़ दावा कर सकें।’
मानहानि पर कुछ कहने से पहले इसका मतलब तय कर लिया जाये। मानहानि से मोटा मतलब निकलता है कि कोई व्यक्ति जैसा खुद को समझता है , कोई दूसरा व्यक्ति उसको उससे अलग बताये। उदाहरण के लिये कोई अपने को ईमानदार समझता है। समाज में भी अपनी ईमानदारी का भौकाल बनाये हुये है। ऐसे किसी व्यक्ति को कोई सरेआम बेईमान कह दे। लाखों, करोड़ों के घपले का इल्जाम लगा दे। अगला इस इल्जाम को बजाय दिल्लगी के गम्भीरता से ग्रहण कर ले। फ़िर हल्ला मचा दे-’हमारी मानहानि हो गयी।’ अदालत में मानहानि का दावा करने की धमकी दे दे। इसके बाद मानहानि का दावा कर भी दे। बस शुरु हो गया मानहानि का मीटर।
दुनिया में जित्ती भी बड़े काम हुये सबमें मानहानि का योगदान है। सत्यनारायण की कथा में देवता को लगा उसकी मानहानि हुई। देवता रूठ गये। दुखवर्षा कर दी भक्त पर। फ़िर जजमान ने उनको पटाया। मान दिया। मत्ता दिया। प्रसाद चढाया। देवता खुश हो गये। भक्त के अच्छे दिन बहाल कर दिये।
ऋषिगण जहां अपमान महसूस हुआ नहीं कि फ़ौरन कमंडल से पानी छिड़ककर शाप जारी कर देते थे। पुराने-जमाने में राजा-महाराजाओं को जैसे ही कहीं से अपनी मानहानि की भनक मिली, वैसे ही हमले की पिपिहरी बजा देते थे। बदनामी से बरबादी भली। भले ही इतिहास की किताब में भी जगह न मिले लेकिन मानहानि के महल में रहना गवारा नहीं।
मानहानि के इतने प्रकार के होते हैं कि उनकों शब्दों में बयान करना मुश्किल है।’अविगत गति कछु कहत न आवे’ टाइप मामला होता है। गणित में कहा जाये तो मानहानि के प्रकारों की संख्या दुनिया के कुल लफ़ड़ों की संख्या से एक अधिक होती है। कहने का मतलब कि अगर संसार में अगर 100 तरह के लफ़ड़े हैं तो मानहानि के प्रकार 101 होंगे। सूत्र रूप में कहें तो Y=X+1 (यहां X= दुनिया के कुल लफ़ड़े, Y=मानहानि के प्रकार)
बेइज्जती के प्रकारों की गणित के पायजामें में घुसेड़ने के बाद आइये आपको मानहानि के कुछ पहलू दिखाते हैं। समझने में आसानी होगी आपको।
मानहानि जो है न वह लक्ष्मी की तरह चंचला होती है। कब किस रूप में हो जाये पता नहीं चलता। सीधी मानहानि का उदाहरण हमने आपको ऊपर बताया जिसमें किसी ईमानदार को बेईमान बता दिया जाये। उल्टी मानहानि भी होती है। जैसे किसी अरबों के घोटालेबाज को टिकियाचोर बताया जाये। पूरी दुनिया में जिसके हरामीपने का डंका पिटता हो उसको गली मोहल्ले के छिछोरेबाज की तरह बताया जाये। मानवमांस भक्षी ईदी अमीन की तुलना खेल-खेल में एक-दूसरे को नोच लेने वाले बच्चों से की जाये।
साहित्यिक हलके में भी उलटी मानहानि के नमूने मिल सकते हैं। अपने लेखन की खुद ही प्रसंशा करने वाले को कवि भूषण के समान बताया जाये। विसंगति की शिकायत करने पर समझाइश दी जाये -’अरे भाई, भूषण जी तो सिर्फ़ कवि थे। आप तो भूषण और शिवाजी/छत्रसाल के कम्बो पैकेज हो। मतलब वीर भी खुद वीर के चारण भी खुद। ’ अगला इतने पर मान जायेगा। न माने तो उसको उसकी विधा का देवता घोषित करके गेंदे की माला पहना दी जाये। अगला बेचारा ’स्तुति-स्नेह-सरोवर’ में छप्पछैंया करते आशीष देने के अलावा और कुछ कर भी न पायेगा।
आजकल पैसे ने मानहानि के पाले में कबड्डी खेलना शुरु कर दिया है। करोड़ों के दावे होते देख बाजार मानहानि के हलके में प्रवेश करने के लिये अंगड़ाई ले रहा है। बड़ी बात नहीं कल को बाजार में मानहानि कराने और उससे निपटने के पैकेज आ जायें। बाजार में बेइज्जती करवाने और उसके बाद मानहानि का दावा पेश करने की इस्कीमें चलने लगें। मेडिको-लीगल केस की तर्ज पर मानहानि-लीगल वकीलों के अलग बस्ते खुल जायें। बाजार की कुछ इस्कीमें इस तरह की हो सकती हैं:
१. घर बैठे बेइज्जती करायें। मानहानि का दावा करें। तुरंत भुगतान पायें।
२. बिना बेइज्जती के मानहानि दावा करें। भुगतान दावा पाने के बाद।
३. मनचाही मानहानि करायें। भुगतान किस्तों में। कैसलेस सुविधा उपलब्ध।
४. बेइज्जती में इज्जत का एहसास। आपके घर के एकदम पास। सुविधायें झकास।
५. बिना पिटे पिटने का एहसास पायें। मानहानि का दावे के लिये प्रमाण पायें।
मानहानि का बाजार चल निकलने के बाद तरह-तरह की मानहानि और उससे निपटने के तरीके बाजार में चल निकलेंगे। तरह-तरह से मानहानि करने के तरीके बताये जायेंगे जिससे आदमी की इज्जत भी उतर जाये और अगला प्रमाणित भी न कर पाये कि उसकी बेइज्जती हुई है। कुछ-कुछ गांधी डिग्री वाली पुलिस की पिटाई की तरह जिसमें पिटने वाला चोट को जिन्दगी भर महसूस भले करे लेकिन साबित नहीं कर सकता कि वह पुलिस-प्रेम का शिकार हुआ है।
आप किसी ख्यातनाम लेखक से कह सकते हैं जित्ता खराब आप लिखते हैं उससे ज्यादा खराब तो मैं अपने बायें हाथ से लिख सकता हूं। लेखक अगर इसको अपनी मानहानि समझता है और अदालत में घसीटने की धमकी देता है तो आप उसको समझा सकते हैं कि -’ आपके समझने में गलती हुई। मैं तो आपके लेखन की तारीफ़ कर रहा था। मैं बायें हाथ से लिखता हूं। मेरे कहने का मतलब यह था कि मैं कितना भी अच्छा लिखूं लूं पर वह आपके लेखन से खराब ही होगा।’
मानहानि महसूस होने पर होती है। मानो तो मानहानि। वर्ना आम बात। वो सेल्स मैन वाला किस्सा आपने सुना होगा। एक सेल्समैन ने कुछ दिन की सेल्समैनी के बाद त्यागपत्र दिया। उससे दुकान मालिक ने नौकरी छोड़ने का कारण पूछा-’ क्या बात है? तन्ख्वाह कम है? कोई शिकायत है?’ नौकरी छोड़ने वाले ने कहा-’कोई शिकायत या पैसे की बात नहीं लेकिन सेल्समैनी में ग्राहक जिस तरह बात करते हैं उससे बेड़ी बेइज्जती महसूस होती है।’ मालिक ने बड़े आश्चर्य के साथ कहा-’ यार ये तुमने नई बात बताई। हमने भी जिन्दगी भर सेल्समैनी की है। हमको लोगों ने गालियां दी, दफ़ा हो जाने के लिये, पीटने की धमकी दी, कुछ ने अमल भी किया लेकिन हमारी बेइज्जती आज तक नहीं हुई। ’
अपने देश की आम जनता भी इसी दुकान के मालिक की तरह है। तरह-तरह के लोग इसको धोखा देते हैं, सेवा करने के नाम पर ठगते हैं, लूटते हैं , हाल-बेहाल करते हैं लेकिन जनता इसे अपनी मानहानि नहीं मानती। वह सोचती है यह तो आम बात है।
आपको इत्ता पढना पडा बेफ़ालतू में। कहीं आपकी शान में तो कोई गुस्ताखी नहीं हुई। मने पूछ रहे है। हो तो बता दीजियेगा। किसी की मानहानि करने का अपना कोई इरादा नहीं है।
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Friday, May 30, 2025
गली में समय एकदम ठहरा हुआ सा दिखा
अमीनाबाद में किताब की खरीदारी करते दोपहर हो गयी थी। घर चलने का निर्णय कर चुके थे लेकिन फिर मन किया कि चौक चलकर नागर जी का घर देख ही लें। 'मन की बात' कितनी वाहियात लगे लेकिन उसको टालना मुश्किल होता है। चल दिये चौक की तरफ।
चौक के लिए भी पहले सोचा कैब कर लें लेकिन फिर पैदल ही चल दिये। पैदल चलने की वजह यह सोच थी कि रास्ते के नजारे देखते चलेंगे।
रामा बुक स्टोर के लिए आते समय पास में जगत सिनेमा दिखा था पते में। उसके पहले छेदीलाल धर्मशाला दिखी। ईश्वरी प्रसाद वर्मा ट्रस्ट द्वारा संचालित। ईश्वरी प्रसाद वर्मा जी के बारे में जानकारी लेने के लिए नेट पर सर्च किया तो सबसे पहले ईश्वरी प्रसाद वर्मा ट्रस्ट के एक मुकदमे के बारे में जानकारी मिली , दूसरे में 'पटना कलम' के चित्रकार के नाम से परिचय मिला। लेकिन वे कभी लखनऊ आए नहीं । पता नहीं चला ईश्वरी प्रसाद जी के बारे में जिनके नाम यह ट्रस्ट है। धर्मशाला देखने से ऐसा लग रहा था कि यहां लोग आते, ठहरते हैं। ऐसी इमारतें बनना अब बंद सा हो गया है। इसकी जगह लोग अब होटल या मॉल बनवाते हैं।
छेदीलाल धर्मशाला के बगल में ही जगत सिनेमा हाल है। सिनेमा हाल में अमिताभ बच्चन की फ़िल्म नमकहलाल चल रही थी। सन 1982 में बनी फ़िल्म 43 साल बाद भी देखी जा रही है।
पुराने समय के सिनेमा हाल की तरह बाहर ही टिकट काउंटर था। वहाँ एक पठान टाइप का चौकीदार मौजूद था। उसने बताया कि आज आख़िरी शो है नमकहलाल का। कल से यहाँ भोजपुरी फ़िल्म 'कईसे हो जाला प्यार' लगने वाली है।
सिनेमा हाल के ऊपर 'सुंदर पिक्चर पैलेस' लिखा था। चौकीदार ने बताया कि पहले सिनेमा हाल का नाम सुंदर सिनेमा ही था। बाद में जगत टाकीज हुआ नाम। चौकीदार
से और जानकारी लेने की कोशिश की तो उसके तेवर थोड़ा सख्त से हो गए । उसके लहजे से लगा मानो कह रहा हो कि देखना हो तो टिकट लेकर फ़िल्म देखो वरना आगे बढ़ो । हमें पिक्चर देखनी नहीं थी लिहाजा आगे बढ़ गए।
आगे बढ़ते हुए एकदम निखालिश लखनौवी चाल वाली दुकानें मिलती गयीं। कहीं कबाब , कहीं बिरियानी , कहीं पराठा के दुकानें। एक गली में कई कागज की दुकानें दिखीं। A4/A3 साइज के कागजों के बंडल लादे इधर -उधर आते-जाते दिखे। आगे कुछ चिकन की दुकानें भी मिलीं। लखनऊ के चिकन के कपड़े मशहूर हैं ।
सड़क पर एक जगह मेज़ पर दुकान का पोस्टर लटकाये चाय वाला भी दिखा। उसके पोस्टर पर चाय शायरी लिखी थी :
सुनो ये हकीकत बहोत पुरानी है ,
चाय आज भी दिल के राजधानी है।
चाय वाले से पूछा ये शायरी कहाँ लिखी ? वो बोला -" प्रिंटर ने छाप दिया। हमको कुछ नहीं पता।" यह कुछ ऐसा ही हुआ जैसे माननीय लोग बिना मतलब समझे लिखा हुआ भाषण पढ़ देते हैं । पोस्टर भले बना लिया हो लेकिन चाय के दुकान का नाम नहीं लिखा था पोस्टर पर। बताया -"नाम नहीं तय किया अभी।" बिना नाम के चाय बेचने वाले के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही न हो जाये हम कुछ देर यही सोचते रहे।
दुकान के पास खड़ा एक लड़का दुकान वाले से जिस 'लोकभाषा' में बात कर रहा था उस तरह से बातचीत करते हुए अगर कोई माननीय कैमरे के सामने पकड़ा जाता तो टीवी चैनलों/यूट्यूबरों के लिए कम से कम हफ़्ते भर की बहस का और सौ -पचास लेखकों/व्यंग्यकारों के लेखों इंतजाम हो जाता। लेकिन दोनों बालक सेलिब्रिटी कहलाने के चोंचले से दूर थे इसलिए उनकी बतकही वहीं की फिजाओं में खो गई।
इससे एक बार फिर साबित हुआ कि आम इंसान की आवाज तो छोड़िये , उनकी गाली गलौज तक कहीं नहीं सुनाई देती। जिस तसल्ली से निश्चिंत होकर वे आपस में गाली गलौज कर रहे थे उससे लगा कि उनको यूसुफ़ी साहब के बात अच्छे से पता है -"गाली, गिनती और गंदा लतीफ़ा तो अपनी मादरी ज़बान में ही मज़ा देता है।"
चलते-चलते थक गए और चौक अभी भी ढाई किलोमीटर दूर था। सुस्ताने के बहाने एक ठेले वाले के पास रुककर मट्ठा पिया। उससे चौक का रस्ता पूछा। उसने वही रास्ता बताया जो पहले के दस लोगों ने बताया था। लेकिन उसने सलाह भी दी कि टेम्पो में चले जाओ , धूप तेज है।
मट्ठे वाले की सलाह मानकर हम सामने से आते एक टेम्पो पर बैठ गए। उसमें पहले से एक महिला अपने बच्चे के साथ बैठी थी। बैठते ही हमने बच्चे से बात शुरू करने के लिहाजा से पूछा -"इसके क्या ले जा रहे हो ?" बच्चे ने अपने साथ के पोटली को जकड़ते हुए हल्की सी बेरुख़ी से बताया -"बिरियानी।" यह कहकर बच्चा चुप हो गया। उसके साथ की महिला , जो शायद उसकी अम्मी रही होगी , ने अपने चेहरे पर नक़ाब चढ़ा लिया। उन दोनों को चुप देखकर अपन भी चुप हो गए। टेम्पो भी चुपचाप आवाज करता हुआ आगे बढ़ता रहा। थोड़ी देर में चौक भी आ गया।
चौक पहुंचकर हमने अँगड़ाई लेते चौराहे का मौक़ा मुआयना किया। चौराहे पर लोग ऐसे भागते हुए जा रहे थे मानों जरा देर हुई तो बवाल मच जाएगा। रास्ता पूछते हुए आगे बढ़ने पर खुनखुन जी ज्वेलर्स की हवेली दिखी। कभी बुलंद रही हवेली अब मार्गदर्शक इमारत सरीखी दिख रही थी । अब वहाँ किसी स्कूल का बोर्ड लगा था।
खुनखुन जी ज्वेलर्स वाली हवेली के बारे में बताते हुए चौराहे के ठेले वाले ने बताया था -"उनके वारिस सब मर मरा गए। हवेली वीरान है अब ।" यह एक आम आदमी के एक हवेली के लोगों के बारे में बयान था ।
सड़क पर तमाम फलों , सब्जियों और खाने-पीने के दुकानें देखकर लगा कि किसी खाते-पीते इलाके में आ गए हैं।
Alankar Rastogi ने जानकारी दी थी कि उनके स्कूल के पीछे ही नागर जी का घर है। हम गूगल मैप देखते हुए एक गली में घुस गए। आगे पूछा तो एक दुकान वाले ने बताया -"आप ग़लत आ गए। उधर से भटक जाएँगे।" अपनी दुकान पर खड़े उस आदमी के आधे दाँत ऊपर के और आधे दाँत नीचे के जिस तरह नदारद थे उसको देखकर लगा उसके ऊपर नीचे के दाँत मिलकर अंग्रेजी का Z बना रहे हो मुँह में ।
उसने हमको वापस लौटकर अगली गली से जाने को कहा। साथ ही यह भी -" वहाँ कोई गली में किसी से भी पूछा लेना बता देगा नागर जी का घर कहाँ है। उनके घर के सामने ही चिकन की दुकान है।"
लौटकर सड़क पर आकर अगली गली की तरफ़ बढ़े। रास्ते में अमृत लाल नागर सभागार दिखा। सभागार की बाहरी छत उड़ी हुई थी । लखनऊ विकास प्राधिकरण के जिम्मे सभागार की देखभाल का जिम्मा होगा। सभागार के हाल देखकर लगा कि लखनऊ विकास प्राधिकरण के देखभाल का जिम्मा किसी क़ाबिल इंसान के हवाले है ।
आगे गली में घुसने के बाद एक चिकन के दुकान दिखी। वहाँ काम करनेवाली एक बच्ची ने बताया कि यही सामने अमृत लाल नागर जी का घर है। उसने बताया -"बहुत बड़ा , सात आँगन का, घर है। यहाँ से लेकर अगली गली तक है।"
इससे ज्यादा वह कुछ बता नहीं पायी। उसके अनुसार यह घर नागर जी का ही है। जबकि लोगों के जानकारी के हिसाब से नागर जी यहाँ किराए पर रहते थे। घर के दरवाज़े पर दो बड़े ताले लटके देखकर लगा मकान पर कब्जे का भी कोई विवाद है।बच्ची ने बताया कि नागर जी के घर वाले बंबई में रहते हैं। बहुत दिन से आए नहीं । उसने यह भी बताया कि उसने नागर जी का घर अंदर से नहीं देखा है।
जिस घर के बारे में अनगिनत किस्से सुन रखे हों , जहाँ पर हिन्दी साहित्य के अनेक ग्रंथ रचे गए हों वहाँ ताले लटके हुए थे। मकान के ईंटें उखड़ रही थीं।खंडहर होने की तरफ़ बढ़ते मकान को देखते रहे। कुछ देर वहाँ ठहरकर लौट लिए।
लौटते हुए अग्रसेन इंटर कालेज देखते हुए आए। यहाँ अलंकार पढ़ाते हैं। आजकल स्कूल बंद है। स्कूल के आँगन से होते हुए आए। प्रिंसिपल के कमरे के सामने स्कूल के प्रार्थना लिखी हुई थी :
हे प्रभु सद्बुद्धि दो , सद कार्य ही हम कर सकें
सद मार्ग पर चलते रहें , हम नियम पालन कर सकें।
प्रार्थना के रचयिता विद्यालय के प्रधानाचार्य रहे हरिनेंद्र श्रीवास्तव 'रोशन ' थे। वे यहाँ 1962 से लेकर 1989 मतलब 27 साल प्रिंसीपल रहे। आजकल इतने दिन किसी स्कूल का प्रधानाचार्य बने रहना दुर्लभ बात है।
स्कूल बंद था। वहां मौजूद स्टाफ ने बताया स्कूल का एडमिशन जुलाई में होगा । तब आना। हमने बताया कि हम ऐसे ही आए। स्कूल के गेट पर दो कुत्ते ऊँघ रहे थे। शायद उनको भी स्कूल खुलने का इंतजार था।
बाहर आकर चौक के गलियों से होते हुए आगे बढ़े। गलियाँ का संकरापन देखकर यूसुफ़ी साहब का जुमला याद आ गया -"उस शहर की गलियां इतनी तंग थीं कि अगर मुख्तलिफ़ जिंस (विपरीत लिंगी) आमने-सामने से आ जायें तो निकाह के अलावा कोई गुंजाइश नहीं रहती।"
यहाँ हालाँकि ऐसा कुछ नहीं हुआ। अलबत्ता एक जगह मोटरसाइकिल पर खड़ा आदमी गली में खड़े दूसरे आदमी से बतियाता दिखा तो लगा कि उनके रहते कोई तीसरा वहाँ से नहीं गुज़र सकता। हमारे वहाँ से गुजरने पर दोनों ने थोड़ा टेढ़े होकर हमको निकलने दिया।
गली में समय एकदम ठहरा हुआ सा दिखा। एक दम ऊँघता हुआ , छुट्टी मनाता समय। दोपहर भी मानों लंच लेकर आराम फ़रमा रही थी गली में। किसी को कोई जल्दी नहीं। न आने की न जाने की । गली में मोटरसाइकिलें भी तिरछी होकर आराम से ऊँघती दिखी।
एक दुकान पर बैठे एक आदमी ने गली से कान का मैल निकालने वाले को जाते देखा तो गद्दी से सरककर नीचे आ गया और अपना कान 'कनमैलिये' के हवाले कर दिया। कान का मैल निकालने वाला उसका कान खोदने लगा।
गली से बाहर आकर हमने पहले सोचा कैब करें। कैब बुक करने का काम उबर के हवाले करके हम वहीं ठेले पर बिक रहे फ़ालसे लेकर खाने लगे। उबर का एप इधर -उधर घूमता रहा। उसको हमारे लिए कोई कैब नहीं मिली। इसके बाद हम सामने निशातगंज के लिए आवाज लगाने वाले टेम्पो में लपक कर बैठ गए। ठेले वाले ने बताया था कि यहां से निशातगंज और फिर वहाँ से इंदिरा नगर के लिए टेम्पो मिल जाएगा।
हमारे बाद दो महिलायें टेंपों में घुसते ही टेम्पो वाले से बोली -"साथ में बच्चा है उसके पैसे न लेना।" टेम्पो वाले ने फौरन हाँ करते हुए कहा-"बच्चे को गोद में बैठा लेना।" बच्चा अगली सवारी आने तक सीट पर बैटने के इरादे से बैठते ही उछल गया। सीट धूप से नाराजगी में गरम हो रही थी। कुछ देर बाद सामने की सीट पर एक और महिला आकर बैठ गई। बुर्का पहने महिला के साथ दो छोटे बच्चे थे ।उसने बच्चों के किराए के बारे में पूछा भी नहीं। तसल्ली से बैठ गई। उनमें से एक बच्चा खड़े-खड़े ऊँघ रहा था। कुछ देर बाद वह अपनी अम्मी के कंधे से टिककर खड़े-खड़े सो गया ।
निशातगंज आकर हमने टेम्पो बदला। इंदिरा नगर आए। चौंक से इंदिरा नगर का कैब का किराया 200 रुपए बता रहा था । टेम्पो से आने में कुल जमा 25 रुपये लगे (चौक से निशातगंज 15 रुपये, निशातगंज से इंदिरा नगर 10 रुपए) । इस तरह हमने लौटते हुए 175 रुपए बचाए ।
इंदिरानगर से पैदल टहलते हुए घर आ गए।
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Thursday, May 29, 2025
किताबों की खोज में
आजकल उर्दू सीखने के चस्का लगा है । दिन में कई बार उर्दू इमला लिखने का अभ्यास करते हैं । आनलाइन वीडियो देखते हैं । पढ़ना कुछ कुछ सीख गए हैं । अब लिखना और अच्छी तरह से पढ़ना सीखना है।
उर्दू की कोई किताब कई दिन से खोज रहे थे। नहीं मिली। दो दिन पहले लखनऊ के यूनिवर्सल बुक स्टोर में देखी। वहाँ भी नहीं मिली। उसने बताया -'अमीनाबाद में रामा बुक स्टोर में मिल जायेगी।'
कल रामा बुक स्टोर गए। ऑटो से। आटो वाले का नाम सलाउद्दीन बता रहा था। हमने उसके नाम का मतलब पूछा तो उसने बताया -"मेरा सही नाम सलामुद्दीन है।" सलामुद्दीन से मतलब अपने आप लगा लिया -"सलाम करने वाला या जिसको लोग सलाम करते हों।" लेकिन मतलब देखा तो पता चला -सलामुद्दीन का मतलब होता है -शांतिप्रिय और दृढ़ धार्मिक आस्था वाला व्यक्ति।
इससे पता चला कि हम अपने अनुमान के आधार पर बहुत कुछ सोच लेते हैं जबकि सच उससे बहुत अलग होता है। कई बार हम अपने अनुमान की परख इस डर से भी नहीं करते कि कहीं अनुमान टूट गया तो बवाल होगा।
सलामुद्दीन ने बताया कि वे बिल्कुल पढ़े नहीं हैं। कक्षा एक में कुछ दिन ही गए स्कूल। फिर नहीं गए। हमने पूछा जब स्कूल नहीं गए तो पैसे-रुपए कैसे गिन लेते हो ?
इस पर मुस्कराते हुए बताया -"उतना सीख गए हैं।"
अमीनाबाद में एक के बाद कई किताबों की दुकानें हैं। एक शुक्ला बुक स्टोर भी दिखी , दूसरी न्यू शुक्ला बुक स्टोर। लाइन से किताबों के कई दुकानें देखकर कोलकाता के कालेज बुक स्ट्रीट की याद आयी। एक बार गए थे , फिर जाना है।
रामा बुक स्टोर सामने ही दिखी । गर्मी के वजह से दुकान में घुसते ही प्लास्टिक का पर्दा लगाया हुआ था।
दुकान के काउंटर पर बैठे सज्जन से उर्दू की क़िताब के बारे में पूछा तो उन्होंने वहाँ किताब दे रहे दूसरे को हिन्दी -उर्दू किताब देने के लिए बोल दिया। उसने ऊपर टांड के अंदर बैठे लड़के से किताब मांगी। लड़के ने किताब निकाल कर नीचे थ्रो कर दी। नीचे वाले ने लपक कर मुझे थमा दी।
हमने किताब उलट-पलट कर देखी। काम भर का मसाला दिखा किताब में । इस बीच एक और किताब का ध्यान आया- शिरीष खरे की 'नदी सिंदूरी' लाने के लिए दीदी ने कहा था । पूछने पर काउंटर वाले ने कहा -"लिखकर दीजिये नाम।" नाम लिखकर दिया तो उसने दूसरे को बोला -"देखकर बताओ है क्या किताब अपने यहाँ ?"
कुछ देर बाद लौटकर बताया उसने कि किताब दुकान पर नहीं है। इस बीच दुकान के बारे में काउंटर पर मौजूद आदमी ने बताया कि 60-70 साल पुरानी है दुकान। चालीस साल तो ख़ुद उनको यहाँ काम करते हो गए।
भुगतान काउंटर पर शायद दुकान के मालिक बैठे थे। उनसे पूछा तो उन्होंने एक और किताब के बारे में बताया। वह भी ले ले। दोनों किताबें 110 रुपए के पड़ीं। किताबों के बिक्री के बारे में बात चलने पर बताया कि आजकल लोग किताबें नहीं ख़रीदते। पास होने के लिए क्वेश्चन बैंक ख़रीदते हैं। इंजीनियरिंग के पढ़ाई वाले लड़के तक प्रश्न बैंक से काम चलाते हैं । पता नहीं इंजीनियर बनकर कैसे काम करेंगे ?
हमारे पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। हम भुगतान करके बाहर आ गए। चौराहे पर खड़े होकर कुछ देर सोचते रहे कि वापस चला जाये या चौक चलें । चौक में अमृतलाल नागर जी का घर देखने का विचार बहुत दिन से था। चौक वहाँ से साढ़े तीन किलोमीटर दिखा रहा था। अलंकार रस्तोगी वहीं पास ही रहते हैं। उनका स्कूल नागर जी के घर के पिछवाड़े ही है। उन्होंने आने के लिए कहा। लेकिन हमने कहा -"फिर आयेंगे।"
कुछ देर अमीनाबाद चौराहे पर खड़े घर लौटने के बारे में सोचते रहे। सामने प्रकाश कुल्फी की दुकान थी। मन किया वहाँ बैठकर क़ुल्फ़ी खा लें लेकिन डायटीशन के हिदायत का ध्यान आ गया तो क़ुल्फ़ी के पैसे बचा लिए।
घर लौटने के लिए कैब बुक करते हुए लगा कि इतनी पास आकर नागर जी का घर देखे बिना लौटना ठीक नहीं। यह 'लगते' ही हम पलट कर चौक के तरफ़ चल दिए।
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Saturday, May 24, 2025
बांगड़ू लोगों को कोई टोकने वाला दोस्त
पिछले दिनों कालेज के एक मित्र से बात हो रही थी। बहुत दिन बाद। उसको पता है कि मेरी कुछ किताबें प्रकाशित हुई हैं। उसने कहा -'कोई ऐसी किताब बताओ जिसको आसानी से पढ़ सकें। आसानी से मतलब छोटी-छोटी पोस्ट हों। ज़्यादा लंबा पढ़ना अब हो नहीं पाता।'
दोस्त की बात सुनकर हमने सोचा कि अच्छा हुआ कि अगले ने ईमानदारी से बता दिया । हमने सोचा कि उसे पुलिया सीरीज के किताबें (पुलिया पर दुनिया और पुलिया पर जिंदगी) का लिंक दे देंगे। सोचकर छोड़ दिया। दोस्ती के नाम पर अत्याचार ही होगा कि उसको पढ़ने में होने के परेशानी के बावजूद अपनी किताबें ठेल दें। बता भी देते तो अगली बार पक्का कहता -'यार , तुम्हारी किताबें अभी ले नहीं पाये। लेंगे जल्दी ही। एक बार फिर से लिंक भेज दो।'
आजकल यह सामान्य स्थिति है। लोग छोटे-छोटे लेख पढ़ना पसंद करते हैं। छोटी फ़िल्म देखना पसंद करते हैं। इसी लिए रील्स का चलन बढ़ा है । रील प्रधान विश्व करि राखा। इस चक्कर में फ़िल्में देखने का चलन भी कम हुआ है। जो लोग देख लेते हैं वो बताते हैं। अपन भी कई फ़िल्में 'देखी जाने वाली लिस्ट' में सजाये बैठे हैं । सोचते हैं लेकिन देख नहीं पाते । बाकी चीजें चलते-फ़िरते देखते-पढ़ते रहते हैं ।
पढ़ना भी ऐसा ही चलता रहता है । आजकल दो किताबें पढ़ रहे हैं । दोस्तोवस्की की 'अपराध और दण्ड ' और जोसेफ़ हेलर के 'कैच -22'। ‘अपराध और दंड’ करीब साढ़े आठ सौ पेज की किताब है । इतनी मोटी किताबें आजकल कम लिखी जाती हैं । इसमें दूनिया की माँ ने अपनी बेटी के के बारे में अपने बेटे को जितना लंबा लंबा पत्र लिखा है उतने में एक लंबी कहानी हो जाती है । इस तरह के क्लासिक के पढ़ने में कई अवरोध हैं उनमें से एक अवरोध ये रील्स और छुटपुट वीडियो हैं जिनकी आज भरमार है ।
फेसबुक के पोस्ट भी पढ़ना होता है। कुछ में टिप्पणी भी करते हैं । सबमे टाइम लगता है। इस चक्कर में लिखना भी छूट जाता है ।
आजकल उर्दू लिखना-पढ़ना भी सीख रहे हैं। पहले भी कई बार शुरू किया था। लेकिन बीच में या किनारे ही रुक गए। अबकी बार सारी इमला सीख गए। अक्षर पहचानना आ गया। आशा है साल के अंत तक काम चलाऊ उर्दू पढ़ना-लिखना सीख लेंगे। मेरी दिली ख्वाहिश है कि उर्दू के क्लासिक मूल रूप में पढ़ सकूँ । उर्दू सीखने के बाद कोई एक दक्षिण भारतीय भाषा सीखेंगे।
सोशल मीडिया में ज्यादातर पोस्ट्स इतनी आक्रामक दिखती हैं कि उनको पढ़कर डर लगता है। लोगों का लेखन इतना आक्रामक हो गया है कि बुश की याद आती है जो कहते थे -‘जो हमारे साथ नहीं वह हमारा दुश्मन है।’
बुश को सामने भले लोग कुछ न कहते हों लेकिन पीछे तो उनके बारे में लोग लिखते-कहते ही थे। कृष्ण बलदेव वैद जी ने अपनी डायरी में लिखा था -‘ बुश बांगड़ू है।’
हमारा भी ऐसी डायरी लिखने का करता है। खुली डायरी। लेकिन दोस्त लोग टोंकते है -क्या जरूरत तुम्हें यह सब लिखने की बे?’
हम फ़िलहाल दोस्त की बात मान लेते हैं। अपनी बात याद करके -‘वह व्यक्ति बड़ा अभागा होता है जिसे कोई टोकने वाला नहीं होता।’
क्या बांगड़ू लोगों को कोई टोकने वाला दोस्त नहीं होता ?
(फ़ोटो मेरे बेटे Anany की । अपने उत्पाद कोटेड धागा का प्रचार करते हुए। पूरा विज्ञापन इंस्टाग्राम की रील में देख सकते हैं)
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Wednesday, May 21, 2025
राजीव गांधी जी और शरद जोशी जी को नमन


आज 21 मई है । आज के ही दिन भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मृत्यु हुई थी। इंदिरा गांधी जी के मौत के बाद हुए चुनावों के बाद बंपर बहुमत से जीती थी उनकी पार्टी। 415 सांसद थे उनकी पार्टी के लोकसभा में। राजीव गांधी अनिच्छा से राजनीति में आए थे। राजनीति का अनुभव नहीं था उन्हें। उनके कार्यकाल में सबसे उल्लेखनीय काम देश का कम्प्यूटर के क्षेत्र में शुरुआत करना रहा। इसका फ़ायदा देश के हर क्षेत्र में हुआ। आज अमेरिका और दूसरे तमाम देशों में जो प्रवासी हैं उसके पीछे भी कहीं न कहीं भारत के कम्प्यूटराइजेशन का योगदान है। और भी कई काम हुए उनके समय ।
उनके प्रधानमंत्री रहते तमाम गलतियाँ भी हुईं। उनके साथी वित्तमंत्री ही उनके ख़िलाफ़ पर्चा लहराते रहे। बोफोर्स प्रकरण , जिसे भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी दारोग़ा के लेवल का केस कहते थे , उनकी सरकार के लिए भारी पड़ा और अगले चुनाव में पहले की आधी सीटें भी नहीं पाई उनकी पार्टी। 197 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद उन्होंने सरकार बनाने का दावा नहीं पेश किया । विपक्ष में बैठे। यह बात 35 साल पहले की है। आज इतनी सीटों पर तो लोग कैसे भी लोग सरकार तो बनवा ही लेते , बाद में पांच साल चलाने के लिए मैनेज भी कर लेते । लेकिन तब यह चलन शुरू नहीं हुआ था ।
संयोग से आज हिंदी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी जी का जन्मदिन भी है । शरद जी का हिन्दी व्यंग्य में विशिष्ट योगदान है। उनके 'प्रतिदिन' स्तंभ की चर्चा अक्सर होती है। मैंने प्रतिदिन के संकलन के पंच शुरू किए थे (लिंक टिप्पणी में )। 22 पोस्ट में 220 पंच लिखे थे । फिर रुक गया काम । जल्द ही फिर शुरू करेंगे ।
शरद जी ने राजीव गांधी जी के प्रधानमंत्री रहते हुए उन पर कई व्यंग्य लेख लिखे थे उनमे से एक 'पानी की समस्या' पर था । कवि सम्मेलनों में जब इसे पढ़ते थे तो लोग बहुत पसंद करते थे ।
राजीव गांधी की आतंकवादियों द्वारा हत्या हो जाने के बाद शरद जी ने कभी इस व्यंग्य का पाठ नहीं किया। एक बड़े संवेदनशील लेखक और एक घटिया राजनीतिज्ञ में अंतर होता है।
राजीव गांधी जी और शरद जोशी जी को नमन।
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Tuesday, May 20, 2025
यह क्या हो रहा है?
आजकल खबरों में सच और झूठ , अफवाह और वास्तविकता इस कदर घुली मिली है कि असलियत पता नहीं चलती। लुटने वाला चोर साबित हो रहा है, जिसको जुतियाया जाना चाहिए उसकी जय बोली जा रही है। यह सब क्या है -'हमारे एक मित्र भन्नाते हुए बोले।'
यह जादुई यथार्थवाद है। मार्खेज का नाम सुने हो? जादुई यथार्थवाद उसी के नाम पर चला है। हजार साल पहले की बात आज घटती हुई बताता है। आज की बात को हजार साल पहले घटी बताता है। सब गड्ड-मड्ड। मार्खेज तो लिखकर चला गया, हमारा समाज उसको जी रहा है। यह जो हो रहा है न , वह जादुई यथार्थवाद है। हमारा समाज जादुई यथार्थवाद जी रहा है। हमारे दोस्त ने अंगड़ाई लेते हुए बताया।
हम जिस दोस्त को बुड़बक समझते थे वह सुबह-सुबह इतने ज्ञान की बात कह गया। हम समझ नहीं पा रहे कि क्या कहे? मन कह रहा है कि धृतराष्ट्र की तरह आंख मिचमिचा के पूछें - यह क्या हो रहा है?
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नेकचंद की वाइफ नहीं रहीं
‘साहब, वो नेकचंद की वाइफ नहीं रहीं।’ -सोसाईटी के गेट पर दरबान ने बताया। उसकी आवाज में हल्की हकलाहट थी। मैंने सोचा बचपन में देखभाल हो जाती तो उसकी आवाज ठीक हो जाती।
दूसरों के बारे में फ़ौरन निष्कर्ष निकालना हमारी आदतों में शुमार है।
इन दरबान से कभी मेरी बातचीत नहीं हुई थी। हो सकता है नेकचंद से बात करते हुए उसने मुझे देखा हो। इसलिए उनकी पत्नी के निधन की सूचन मुझे दे रहा हो।
नेकचंद से दो बार बात हुई थी। वह भी गाड़ी का इंतजार करते हुए। टाइमपास के बहाने हुई बातचीत। हालचाल लेने के बहाने हुई बातचीत।
नेकचंद हरदोई के रहने वाले हैं। हमको हरदोई बताया तो हमने कहा -‘हददोई कहो।’
वो मुस्कुराए और बातचीत की गाड़ी सरपट दौड़ने लगी। हरदोई का नाम भले हरदोई है लेकिन कहा हददोई ही जाता है। हरदोई मतलब हरि द्रोही। बातचीत में ‘ र ‘ ग़ायब रहता है। हरदोई वालों से जुड़ने का पासवर्ड है ‘ र ‘ गोल करके शहर का नाम लेना।
नेकचंद ने बताया कि उनके एक बेटी और एक बेटा हैं। बेटी की शादी कर दी। बेटा अच्छी नौकरी करता था लेकिन माँ के इलाज में सहयोग के लिए नौकरी छोड़ दी। अब माँ की देखभाल करता है। नेकचंद दरबान का काम करते हैं। दस-बारह हज़ार पाते होंगे।
पत्नी की बीमारी के बारे में बताया कि पीलिया हो गया। कैसे हो गया पता नहीं चला।अब अहमदाबाद से इलाज हो रहा है। कुछ फ़ायदा है लेकिन खाना-पीना नहीं हो रहा। जो खाती हैं उलट देती हैं। नेकचंद हैरान हैं कि कोई बीमारी नहीं थी पता नहीं कैसे पीलिया हो गया और इतना गंभीर हो गया कि इलाज मुश्किल।
पीलिया कानपुर में आम रोग है। सीवर लाइन और पानी की लाइनें आपस में गलबहियाँ करके पूरे शहर में फैली हैं। कहीं लीकेज हो जाता होगा। दोनों अपने-अपने माल-मत्ता एक दूसरे से साझा कर देती होंगी। इस लाइन मिलन की सौग़ात शहर के लोगों पीलिया के रूप में मिलती है। हरदोई वाली पाइप लाइनों ने भी देखा-देखी आपस में दोस्ती कर ली होगी।
नेकचंद ने अपनी उम्र बताई 55 साल। पत्नी की 65 साल। आम तौर पर इस तरह की जोड़ी फिल्मी दुनिया में ही बनती है। लेकिन वहाँ के लोग पीलिया पीड़ित नहीं होते।
अब आते-जाते गेट पर नेकचंद को देखते हैं। लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं होती, वापस आए कि नहीं?
लेकिन कल एक काम वाली से बात की तो उसने बताया कि वह हरदोई की रहने वाली है। प्रेस का काम करती है। उससे पूछा तो उसने बताया कि वह नेकचंद को नहीं जानती।
नेकचंद की पत्नी 65 साल की उम्र में चली गईं। उनके घर परिवार के लोगों को उनकी याद होगी। कुछ घटनाएं। लेकिन वे ख़ुद अपने आप में बड़ा आख्यान होंगी। बचपन से लेकर गुज़र जाने तक न जाने कितनी यादें होंगी उनके ज़ेहन में। क्या पता कोई लेखक होता तो उनके बारे में उपन्यास लिख देता। लेकिन वे विदा हो गईं। पीलिया जैसी सामान्य बीमारी से जिसका पता भी नहीं चला उनके परिवार वालों को।
काश बीमारियों की भी एंटी मिसाइल होती। बीमारी के हमला करते ही उसकी पहचान करके उसको मार गिराती। होती तो हैं ऐसी ऐंटी मिसाइल लेकिन अभी आम इंसान की पहुँच से बहुत दूर हैं।
फ़िलहाल तो देश का आम आदमी अपने देश की सुरक्षा में तैनात एंटी मिसाइल के कारनामे देखकर ही ख़ुश है।
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Monday, May 19, 2025
अपने समय को जानने के लिए अपने आप को जानिए- उदय प्रकाश
[उदय प्रकाश Uday Prakash जी मेरे पसंदीदा लेखकों में से हैं। उनकी कई कहानियां आज की प्रसिद्द कहानियों में शामिल हैं। वे हिंदी के सबसे अधिक पढ़े जाने वाले लेखकों में से एक हैं। उनका कथेतर गद्य मुझे सबसे अधिक पसंद है। पिछले दिनों 20 अप्रैल को दिल्ली के आक्सफोर्ड बुक सेंटर में उनका एक व्याख्यान हुआ था। विषय था -'भाषा और समाज।' करीब 22 मिनट के उनके इस व्याख्यान को मैंने रिकार्ड किया। थोड़ा दूर से रिकार्ड किया था इसलिए आवाज कहीं धीमी है। कई बार सुना इसे। आज सोचा कि इसे टाइप करके पोस्ट किया जाए। वीडियो की रिकार्डिंग और संगत के 50 वे एपिसोड में उदय प्रकाश जी का इंटरव्यू टिप्पणी में दिए लिंक में है। कुछ वाक्य जो अधूरे लगे उनको अपनी तरफ से पूरा किया है। पोस्ट लम्बी है। बहुत कम लोग पढ़ेंगे। लेकिन जितने लोग पढ़ेंगे वह ही बहुत होगा। जैसा इस पोस्ट में एक जगह कहा भी गया है -'अपने आइडिया को लेकर आप आ सकते हैं और उस आइडिया से जुड़ेगा वही आपका अपना होगा आपका मित्र होगा।भले की कोई एक हो। ']
अंग्रेज़ी में जो मशहूर कहावत है -Man is a social animal. आदमी एक सामाजिक प्राणी है। (इसमें महिलाएँ भी शामिल हैं)। सब कुछ के बावजूद हम कहीं न कहीं सामाजिक पशु ही हैं। और जो चीज़ हमको जानवर होने से अलग करती है वो भाषा है।
और भाषा वो भाषा जिसकी हम आज बात कर रहे हैं यह विकसित भाषा है। दुनिया में बहुत सारी विकसित भाषाएं हैं। एक लम्बे अरसे के बाद वो हासिल हुयी हैं। रामविलास शर्मा की का कहना था कि वो सब आपकी चेतना है। आप अपनी चेतना को जितना ही नीचे लेते(गिराते) जाएँगे उतना ही आप पशु होते जाएँगे। तो ऐसे समय में जब हम आज यह बात कर रहे हैं भाषा और समाज दोनों बड़े जोखिम भरे विषय हैं। अगर आप समाज के बारे में बात करेंगे तो आप देख ही रहे हैं। बंगाली के एक बुजुर्ग लेखक हैं (गौतम सान्याल जी ), कहीं कम आते-जाते हैं, एक दिन उन्होंने लम्बी बाते शुरू कर दीं। उन्होंने कहा -"मैं बहुत याद करता हूँ आपको।"
मैंने कहा -"क्यों याद करते हैं?"
उन्होंने कहा -"आपसे ऐसी-ऐसी किताबों की जानकारी मिली जिनको मैंने पहले नहीं पढ़ा था।उनको मैं पढ़ता हूँ।"
मैंने कहा -"उनमें से क्या याद है?"
उन्होंने पहली किताब जो बताई वह थी 'एलिस इन वंडर लैंड।' तो मैंने कहा -"वो क्यों याद है?"
वो बोले -"मैं आज का माहौल देखता हूँ तो मुझे बार -बार वही किताब याद आती है।"
मैंने कहा -"क्यों?"
तो उन्होंने कहा -"आपको याद है न कि एलिस टाईम मशीन में बैठ जाती है और कहती है -'मैंने past (विगत) को जाम कर दिया और हमने future को भी जाम कर दिया। अब हम बैठे हैं इसमें तो क्या सवाल पूछे अपने बगल वाले से जो हमारा सहयात्री है ? जवाब बड़ा मुश्किल है। उसका जवाब है क्योंकि हमारे पास Future नहीं है past भी नहीं है, सिर्फ़ आज है हमारे पास।"
तो हम जिस समय में हैं आज उस समय जब हम भाषा और समाज के बारे में बात करेंगे तो अगर एक लेखक के रूप में बताऊँगा तो मुझे बड़ा दुःख होगा। क्योंकि समाज जिसे हम कहते थे वह आज है नहीं। एक ऐसा कंसेप्ट है जो बनाया गया है। एक मल्टीपल सोसाइटी है। इतने समाज हैं। हम लोग यहाँ बैठे हैं यह कुछ लोगों का समाज है।
मार्केट समाज नहीं बनाता, यह आप मान कर चलिए। मार्केट आपकी किताबें पहुँचा देगा लेकिन समाज नहीं बनाएगा। यह बात कई बार साबित हुई है। एक बार मैं यूनिवर्सिटी जा रहा था। मैच चल रहा था हिंदुस्तान-पाकिस्तान का। सारे लोग ट्रांज़िस्टर पर सुनने के लिए आ गए। जब मैं यूनिवर्सिटी पहुँचा तो सुनने वालों में कुछ स्टूडेंटस थे, बच्चे थे। यही विषय था -भाषा और समाज। तो मैंने कहा -'वो ज़्यादा बड़ा समाज था जो स्पोर्ट्स वाला था । उसमें इतने सारे लोग थे। यहाँ कुछ ही लोग लाकर जुटा दिए गए हैं और लेखक बोल रहा है तो ऐसा लग रहा है कि मोहनजोदड़ो के समय का कोई छोटा शहर हो जिसको लेखक संबोधित कर रहा हो।
तो यह मुझे हमेशा लगता है कि हम समाज के बारे में फ़िलहाल उतना न सोचें। नाम चोमस्की जो आज 95 साल के हो गए और कहीं आ-जा नहीं पाते, बोरखेज जो कहीं आते-जाते नहीं थे वो समाज के बारे में क्या सोचते थे? वो रियलिटी के बारे में क्या सोचते हैं?
मैंने बहुत पहले से कहना शुरू किया कि कुछ चीजें जिनको आप मानकर चलते हैं कि वे हैं क्या आप सचमुच उनको जानते हैं, देखा है कभी उनको? जैसे समाज है, जनता है, रियलिटी (यथार्थ) है इनको क्या आपने देखा है? अपने नहीं देखा। आपने वो देखा तो आपके साथ घटित हुआ है। तो उस मास्टर क्लास का यही मक़सद है कि आप अपने बारे में सोचें। अगर अपने बारे में सोचेंगे, अपने टाईम के बारे में सोचेंगे और आपके साथ जो हो रहा है उसके बारे में सोचेंगे तो शायद आप अपने समाज के बारे में अपने समय के बारे में ज़्यादा कंट्रिब्यूट कर जाएँगे।
अगर आप कहीं आवांगर्द (अपने समय से आगे की कोई भी चीज़ ) बनकर या कोई मसीहा बनकर, ऐसे बहुत हो गए हैं और वे किस तरह का समाज बना रहे हैं और उसका असर क्या पड़ रहा है , तो लगता है ऐसे भ्रम , मैग्लोमीनियास ( मानसिक बीमारी का एक लक्षण जो महानता, धन आदि के भ्रम से चिह्नित होता है। असाधारण या भव्य चीजें करने का जुनून। ) होते हैं (तो समाज का कुछ भला नहीं होने वाला)।
फ़िल्में देखिए। ज़्यादातर फ़िल्में अब वो बची हैं जिनमें समाज के बारे में नहीं सोचा गया है और जिन्होंने समाज के बारे में सोचा उन्होंने भाषा को कितना भ्रष्ट किया आप इसके नतीजे देख रहे हैं। लोग क्लेरिफ़िकेशन दे रहे हैं, माफ़ियाँ माँग रहे हैं। (वे) कह रहे हैं समाज की जो बोली है, भाषा है हम वही लाएँगे। तो समाज से आप प्रभावित हो रहे हैं। समाज को कुछ दे नहीं रहे हैं। समाज से आप इंफ़ेक्टेड (प्रदूषित) हैं।
लेखक की सबसे बड़ी ताक़त है कि वह समाज बनाता है। ग़ालिब ने अपना एक समाज बनाया, गांधी ने अपना एक समाज बनाया। अच्छे, अच्छे कवियों, लेखकों को देखिए उन्होंने अपना समाज बनाया। समाज उन्हें नहीं बनाता। Language is a not social product only (भाषा केवल एक सामाजिक उत्पाद नहीं है) । यह सिर्फ़ सामाजिक उत्पादन नहीं है। ऑथर (लेखक, रचयिता) किसको मानते हैं? ऑथर (वह) होता जिसकी Language (भाषा) में ऑथरिटी होती है। वही होता है ऑथर। ऑथरिटी किसकी है? ऑथरिटी सारे प्रोफ़ेट्स की है। आप याद कीजिए चाहे कृष्ण को लीजिए, क्राइस्ट को लीजिए, प्राफेट मोहम्मद को लीजिए (ये) सब ऑथरस हैं। साइंस के पहले रेशनिलिटी (चेतना) नहीं थी और उन्होंने भाषा पे जो ऑथरिटी बनाई उसी से ऑथर बना। अगर कोई व्यक्ति ऑथर है तो वह मसीहा है। (अब) वह ऑथरिटी नहीं रही।
तकनीक सुख तो देती है यह मान के चलिए, लेकिन वह रिड्युस भी करती है। छोटा बनाती है। और हम इतने छोटे हो गए हैं कि आप एक 'एप' देखिए और आप अलग-अलग हो गए। तो ग्रोथ आफ टेकनालोज़ी का सामाजिक विकास का कोई पैमाना नहीं है (तकनीक का विकास का मतलब सामाजिक विकास नहीं है)। आप नहीं सकते कि हम इतने टेक्निकली एडवांस हैं तो हमारा समाज भी उतना ही ज़्यादा एडवांस हो या हमारा लिट्रेचर या हमारे क्रिएटेट आउटपुट (रचनात्मक उत्पाद) भी उतने ही एडवांस हों।ऐसा नहीं होता है। मुझे लगता है कि कभी-कभी आपको कई फ़्रंट्स को देखना पड़ता है और तब आप देखेंगे जब आप अपने बारे में सोचेंगे।
कोई ऐसा समाज जहाँ कोई बच्ची सुरक्षित न रहे, कोई वृद्ध कहीं सुरक्षित न रहे जो वलनरेबल (अरक्षित) है उसे ज़िंदगी जीना मुहाल हो जाए। और आप फ़िल्म भी ऐसी लेकर आएँगे जिसमें उन चीज़ों को पेश किया जा रहा हो जिनको पेश नहीं करना चाहिए (Nonrepresntational presentation नहीं होना चाहिए) इस पर बहुत लम्बी डिबेट चली है। आपको याद होगा जब इराक़ में (अमेरिका का) हमला हुआ था उसमें लोगों की गरदन काटते हुए दिखाया गया था इतना सेन्शूअस तरीक़े से कि आप देखकर दहल जाते थे। क्या यह जो Nonrepresntational presentation (ग़ैरप्रतिनिधित्ववादी प्रदर्शन) है क्या यह होना चाहिए चाहे वह भाषा में हो या विजुअल फार्म के प्रेजेंटेशन हो ? हम लोग यहाँ से सोचना शुरू करते हैं।
मुझे कई बार ऐसा लगता है कि आप सब लोग , आप तो नई पीढ़ी के हैं, (हम तो पुरानी पीढ़ी के हैं, हमने तो अपना फ़्यूचर ब्लाक कर रखा है) आप तो फ़्यूचर में जाएँगे लेकिन आपके सामने जो चैलेंजेज होंगे वो ज़्यादा बड़े होंगे। हमारा तो बीत गया सब कुछ, हमने तो जी लिया जैसे भी जीना था लेकिन आप क्या करेंगे? हम तो सलाह देंगे कि अपने समय को जानने के लिए अपने आप को जानिए और यह कोई ऐसा मॉब या कोई गिरोह या कोई आरगेनिज़ेशन बनाकर (नही किया जा सकता)। आप नतीजे देखिए डेमोक्रेसी नहीं बची। डेमोक्रेसी जब आयी थी तक की बात को आप फूकोयामा को पढ़िए । डेमोक्रेसी इसलिए नहीं बची कि जो उसका आइडिया था (वह रहा नहीं )
ऐसे समय में आपके पास सबसे ज़्यादा सम्भावनाएँ हैं अपने आइडिया को लेकर आप आ सकते हैं और उस आइडिया से जुड़ेगा वही आपका अपना होगा आपका मित्र होगा। वही फ़्रेटरनिटी (बिरादरी) बनेगी वही आपका समाज बनेगा। हो सकता है वो दस लोगों का समाज हो, हो सकता है पाँच लोगों का समाज हो, हो सकता है वह सिर्फ़ दो लोगों का समाज हो। या यह भी हो सकता है, जैसा बोर्खेस कहते हैं, कि आप अकेले ही हों। तो इसकी चिंता ही नहीं करनी चाहिए।
मुझे लगता है कि यह समय शायद इस तरह का है कि छप रही हैं किताबें। मेरे पास रोज इतने फोन आते हैं , कोई कहानी मांगता है , कोई कविता मांगता है, कोई कहता है इंटरव्यू दे दीजिये। कोई कुछ और कहता है। और फिर घर में इंफ्लक्स है कागज़ का , वर्ड्स का , किताबों का। और फिर आपको ब्लर्ब लिखना है। अगर आप ईमानदार हैं कोई कहेगा कि पांच लाइन लिख दीजिये , तीन लाइन लिख दीजिये। ऐसा हो सकता है कि तीन वाक्य लिखने में तीन हफ्ते लग गए, तीन महीने लग गए। तो यह जीवन ब्लर्ब लिखने के लिए तो नहीं बना।
किताबों का जो अम्बार है हर शब्द पढ़ने के लिए नहीं बना है। क्योंकि हर शब्द की अपनी एक सत्ता होती है। अपनी दुनिया होती है। तो एक तो बहुत अधिक प्रोडक्शन करने से, कागज़ को बरबाद करने से, पेड़ों को कटवा देने से हम लोग प्रकृति के विनाश में पार्टी होते हैं।
मैं जहाँ रहता हूँ अनूपशहर में वहां का पेपरमिल एशिया के सबसे बड़े पेपरमिल में एक है। वहां जो डिफारेषटेशन हुआ उसके बारे में मैं जानता हूँ। वन्यप्राणी कहाँ गए, पेड़ नहीं रहे। शाल का पेड़ जिसको हमारे यहाँ सरई कहते हैं। शाल के एक पेड़ को ग्रो करने में 80 साल लगते हैं।अब 80 साल तक तो कोई कागज़ का कारखाना इन्तजार नहीं करेगा। इसलिए तेजी से बढ़ने वाले पेड़ लगाए गए। वाटर लेवल कम हो गया। जानवर कहाँ गए पता नहीं। ब्लेम कर दिया गया कि हंटर्स (शिकारियों) ने उन्हें मार डाला या आदिवासियों ने। लेकिन ऐसा कहीं नहीं है। आदिवासियों से बड़ा फारेस्ट गार्ड (जंगल रक्षक) कोई नहीं। उनके यहाँ कोई फर्नीचर नहीं होता। अब इसी को देखिये आक्सफोर्ड बुक सेंटर में कितना सारा फर्नीचर है। आदिवासी जलाते नहीं है। उतनी लकड़ियां उनको नहीं चाहिए। वे अगर बांस को भी काटते हैं तो देखते हैं कि कौन सा बांस पूरी तरह से ग्रो कर चुका है , उसको काटते हैं। एक बढ़ते हुए बांस को नहीं काटते। उनसे कुछ चीजें हमको सीखनी चाहिए। (हालांकि) हम (बहुत )लेट हो गए हैं।
जिनकी हम आलोचना करते हैं , पाश्चात्य संस्कृति की (उनसे भी कुछ चीजें सीखने की हैं ) मैं तो फार्चूनेटली (सौभाग्यवश) उन राइटर्स में से हूँ जिनको बाहर जाने का बहुत मौका मिला। अब मैं यह कह सकता हूँ गर्व के साथ और इसे आप अन्यथा मत लीजिये मैं शायद हिंदी का सबसे ज्यादा ट्रान्सलेटेट राइटर हूँ। जब कोई कहता है कि आपकी रीडरशिप कितनी है तो मैं कहता हूँ आप इंटीगरल रीडरशिप देखिये वर्ल्ड ओवर लैंगुएजेज में और इंडियन लैंगुएजेज में। मेरे ख्याल से मुझसे ज्यादा कम ही होंगे। जिनको आपने तमाम एवार्ड देकर प्रोमोट किया है उनसे ज्यादा ही (मेरे पाठक) होंगे। किसी अनुवादक के पास मैंने अप्रोच नहीं किया है। कुंआ नहीं जाता कि आओ पानी पियो। जिसको प्यास लगती है वो कुएं के पास आता है।
कुछ ऐसा लिखिए कि आप मैनेज न करें। आपकी रचनाएं ऐसी हों कि कहीं का भी हो ,किसी भी देश का हो , वो कहीं से सुनकर आपके पास आये। मैं एक उदाहरण दे रहा था कि जिनकी हम लोग आलोचना करते हैं , पश्चिमी हैं , पश्चिमी हैं। मैं एक उदाहरण दूंगा -"मेरे एक अनुवादक हैं उनको आप सब जानते हैं वे पीस कीपिंग फोर्स में रहे हैं , रेड क्रास में रहे हैं। कश्मीर में रहे हैं। भोजपुरी बढ़िया बोलते हैं , हिंदी भी बढ़िया बोलते हैं। बोलने लगेंगे तो लगेगा कि अमेरिकी हैं या हिन्दुस्तानी। उनका घर जो उन्होंने बनाया, यह मान के चलें कि अध्यापक के पास ज्यादा पैसे नहीं होते , शिकागो में एक लेन है , छोटा सा पार्ट है, जिसको कहते हैं डीयरबॉर्न
( Dearborn ) लेन, ( Dearborn Station एक स्टेशन का नाम था किसी जमाने में , उसको प्रिंटर्स लेन भी कहते हैं। सारे प्रिंटिंग प्रेस उसी लेन में थे जहाँ से पुराने जमाने की किताबें छपा करतीं थीं , 18 वीं सदी , 19 वीं सदी में। अब वह (स्टेशन) बंद हो चुका है। लेकिन प्रिंटर्स के जो घर थे वो अब वहां पर हैं। (वो) अजीबोगरीब घर होते हैं। घर क्या फैक्ट्री होती हैं। कहीं पर किसी का घर है , कहीं पर कॉम्पजिटेटर हिस्सा है। अब उनको रिडिजायन करना है। ऐसा डिजाइन हुआ है कि वहां जाकर लगता है कि किसी भूलभुलैया में आ गए। उनको बुकसेल्फ बनाना था और एक अलतार (वेदी ) बनाना था। कारपेंटर आया। कारपेंटर जैकेट पहने थे।
उसके सारे टूल्स जैकेट में थे। उसने काम शुरू किया और देखते ही देखते उसने पूरा बुकशेल्फ बना दिया। चालीस के करीब उसकी उम्र रही होगी। फिर वो वेदी बनाने लगा। मैंने कहा -'इसमें कितना समय लगेगा ?' उसने कहा -'चार घंटे , पांच घंटे।' मैंने कहा -'हमारे यहां कारपेंटर आते हैं तो तीन महीने जाते ही नहीं। ' उसने कहा -'ऐसा कैसे हो सकता है ?' फिर उसको लगा कुछ कि कहीं बाहर से हैं। उसने पूछा -'आप कहाँ से हैं ?' मैंने कहा -'इंडिया से। ' तो उसने कहा ,'इण्डिया तो मैं नहीं आया।सीलोन आया हूँ ' फिर बात खाने पीने की होने लगी, होने ही लगती है । उसने पूछा -'क्या पसंद है ?' मैंने कहा -'वाइन। ' फिर उसने कहा -'कौन सी चीज है जो आप मिस करते हैं ?' मैंने बता दिया कि हिरन। तो उसने कहा -'मैं कल आकर खिलाता हूँ। ' अगले दिन उसने हिरन की टांग भेज दी। मैंने कहा -'ये कहाँ से लाये ?' उसने कहा -'मैंने शूट किया। हंट (शिकार )किया। ' मैंने कहा -'क्यों ? ' तो उसने कहा -'हमारे यहाँ तो अलाउड है।
तो जो जानकारी मिली वो मैं बताना चाहता हूँ कि आप मॉनिटर करते हैं और आप जानते हैं कि कौन प्रोडक्टिव एज में हैं , कौन नान प्रोडक्टिव एज में। जो नान प्रोडक्टिव एज में हैं उनको आप हंट आउट कर देते हैं। जहाँ प्रोडक्टिव एज में हैं उनकी केयर करते हैं , मॉनीटर करते हैं। यही बात है। यह मत मानिये हमको यहाँ यही करना था। (हमने) नदियां ख़त्म कर डालीं। जंगल खत्म कर दिये।कागज़ पैदा किया। जानवरों को खत्म कर दिया। और आप देख रहे हैं 48 में हरा था हमारा इलाका यहीं जहाँ हम बैठे हुए हैं। 1975 में जब मैं जेेएनयू आया था तब बसें नहीं चलतीं थीं। एक बाइक थी दिवाकर आजाद के पास , उसकी सात -आठ गर्लफ्रेंड थीं सिर्फ एक बाइक थी। आज आप देखिये पार्किंग की जगह नहीं मिलेगी। कितना अच्छा लगता था। आर के पुरम सेक्टर आठ पर उतरते थे , जहाँ संगम सिनेमा हुआ करता था ,वहां से पैदल चलते हुए जेे एन यू पहुंचते थे। अब आप देखिए जाकर वहां क्या हाल हैं ?
चीजें बदली हैं , समाज बदला है और भीड़ । दिल्ली की आबादी उस समय 52 लाख थी आज दो करोड़ से ऊपर है। कारों का हिसाब आज से दस साल पहले का यह था कि अगर सारी कारों को एक के पीछे एक खड़ा कर दिया जाए तो आगरा -वगैरा सब पार हो जाएंगे और रोड जाम हो जाएगा।दोनों , तीनों लेन। इतनी कारें हैं (दिल्ली में )। मैंने कहा -'इसके क्या बात हुई ?'
तो इस समय में आप लिख रहे हैं और आप उम्मीद कर रहे हैं कि आप समाज के बारे में लिख रहे हैं। पहले आप अपने बारे में लिखिए। तो मेरा फिर से कहना है , चेखव कहते हैं -'बहुत बड़ी -बड़ी चीजों को मत देखो। छोटी -छोटी चीजों को देखो। ' तो उन छोटी -छोटी चीजों को देखिये। और कोशिश कीजिये (ऐसा लिखने की ) कि कोई अकेला लड़का या लड़की या बच्ची पढ़े आपको तो उसे लगे कि यह मेरे बारे में लिखा है। यह कोशिश होनी चाहिए।
मैं उन्हीं गौतम सान्याल (बंगाली लेखक ) की बात से अपनी बता समाप्त करता हूँ। उन्होंने कहा कि मुझे एक चीज हमेशा हांट करती है कि मुझको एक चींटी ने जहाँ पर नाखून जुड़ते हैं उस जगह पर काट लिया। तो उन्होंने कहा -'मैं सोच रहा हूँ कि इसने काटा क्यों मुझे ? मैंने ऐसा क्या कर दिया कि इसने मुझे काट लिया? उनके दिमाग में कहीं अटक गयी यह बात।
तो जब आप इस स्तर तक सोंचने लग जाएँ तब आपको लगता है कई छोटी सी बात बहुत बड़ी परिणतियों की ओर , बहुत बड़ी रियलिटीस की ओर एक फ्यूचर में होने वाली जो संभावनाएँ हैं उनकी ओर इशारा कर देती हैं। तो यही कोशिश रहनी चाहिए। समाज के बारे में बात करना मेरे ख्याल से ठीक नहीं है। हमने तो फ्यूचर भी जाम कर दिया है , पास्ट भी जाम कर दिया है। आज के वक्त के बारे में , भाषा के बारे में , समाज के बारे में बोलना ठीक नहीं। बोलूंगा तो आप जानते हैं कि लेखक सबसे वल्नरेबल (कमजोर) होता है। मन की बात और है जो कही जाती है। लेखक अपने मन की बात कहेगा तो मुश्किलें बहुत आएंगी।
-उदय प्रकाश
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