Friday, June 27, 2025

श्रीलंका में भक्त हनुमान मंदिर


 सीता जी की खोज के लिए हनुमान जी समुद्र लांघ कर श्रीलंका पहुँचे। श्रीलंका में वह जगह जहाँ माना जाता है कि वहाँ हनुमान जी समुद्र लांघकर उतरे थे वह जगह (गांव) रावण गोद (Ravana Goda) कहलाती है। इसी जगह के आसपास रावण से युद्ध के लिए रामसेना इकट्ठा हुई थी। तमिल में इस जगह को "Ramboda, Rampadai" कहते हैं। वहीं पास में ही Ramboda हनुमान मंदिर है।

रामकथा के अनुसार हनुमान जी ने लंका में पहुंचकर लंका राज्य का नुक़सान किया था, बाग उजाड़े थे, आग लगाई थी इसलिए वहाँ हनुमान जी उतने लोकप्रिय नहीं थे। लेकिन बाद में, पिछली सदी में, हिंदू संगठनों और स्थानीय तमिलों ने वहाँ हनुमान मंदिर बनाए और पूजा शूरू की।
इस लिहाज से देखा जाए तो एक समय श्रीलंका के लिए नुकसान पहुँचाने वाले रहे होंगे हनुमान जी। लेकिन अब उनके कई मंदिर बने हैं, उनमें पूजा होती है।
कोलम्बस को अमेरिका की खोज के लिए महान का दर्जा दिया जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में अमेरिका पहुँचने पर कोलम्बस द्वारा किए गए अत्याचारों की कहानी सामने आने पर उसका भी पुनर्मूल्यांकन हुआ है। कोलम्बस की निंदा हुई है। अपने देश में भी आजकल गांधी जी की निंदा करने का और गोडसे को नायक बताने का चलन खुलेआम शुरू हुआ है। इससे साबित होता है कि समय के साथ समाज के नायकों, खलनायकों का पुनर्मूल्यांकन होता रहता है।
Raamboda में हनुमान मंदिर चिन्मय मिशन द्वारा बनवाया गया है। चिन्मय मिशन की स्थापना केरल में पैदा हुआ स्वामी चिन्मयानंद जी द्वारा 1953 में की गई थी। सन 1993 में स्वामी चिन्मयानंद जी के निधन के बाद उनके शिष्य स्वामी तेजोमयानंद के प्रयासों से यहाँ पर 1999 में 'भक्त हनुमान मंदिर' बनवाया गया।
यह जगह कोलंबो रास्ते में कोलंबो से क़रीब 150 किलोमीटर दूर है। हम लोग Damro चाय फैक्ट्री देखने के बाद दोपहर करीब 12 बजे 'भक्त हनुमान मंदिर' पहुँचे। पहाड़ी पर खूब खुली जगह पर मंदिर बना है। सामने हरियाली और पानी खूबसूरती का बखान कर रहे थे।
मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़कर हम लोग ऊपर पहुँचे। दोपहर की धूप में सीढ़ियाँ और रेलिंग बहुत गरम हो गए थे। तप जैसे रहे थे। हम फटाफट सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर मंदिर के प्रांगण में पहुँचे। मंदिर का अहाता पार करके मंदिर में पहुँचे। मंदिर में हनुमान जी की विशाल मूर्ति विराजमान है। यह मूर्ति श्रीलंका में हनुमान जी की सबसे ऊँची मूर्ति है।
मंदिर में दर्शन करके हम फटाफट नीचे आए। पास ही चिन्मय मिशन की किताबों की दुकान थी। वहाँ किताबों की दुकान में किताबें देखते हुए काफ़ी पी। श्रीलंका के सौ रुपए की एक कप काफ़ी। एक किताब ख़रीदी। जब तक साथ के लोग मंदिर दर्शन करके आयें अपन ने आसपास के नजारे को कायदे से देखा। सब लोगों के आने का बाद हम लोग आगे बढ़े।
दोपहर को एक जगह खाना खाने के पहले एक बड़ी दुकान में गए। वहाँ लकड़ी के सामान का अद्भुत कलेक्शन था। छोटे से छोटे लकड़ी के खिलौने, मूर्ति से लेकर विशालकाय लकड़ी के विभिन्न कलाकृतियाँ वहां मौजूद थीं। हम उनको देखकर ही चकित होते रहे। फोटो खींचते रहे। कुछ लोगों ने कुछ छुटकी टाइप कलाकृतियां याददाश्त के रूप में ख़रीदीं भी।
उस दुकान को ‘निपटाकर’ हम लोगों ने पास के एक फैमिली रेस्टोरेंट में खाना खाया। उस समय तक शाम के साढ़े चार बज गए थे। खाना खाकर हम लोग कोलंबो के लिए चले। कोलंबो वहाँ से क़रीब तीन घंटे की दूरी पर था। कोलंबो पहुँचकर हम लोग उसी होटल में रुके जहाँ शुरुआत में रुके थे। यह टूर के ज्यादातर लोगों के लिए प्रवास का आख़िरी दिन था। अगले दिन लोगों को भारत के लिए उड़ान पकड़नी थी।


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Thursday, June 26, 2025

आपातकाल


 कल आपातकाल की पचासवीं वर्षगांठ थी। इस मौके पर तमाम लोगों ने लेख लिखे। जिन लोगों ने इस मौके पर संघर्ष किया था , जेल गए थे, यातनाएँ भोगी थीं उनके बारे में लिखा। कई लेखों में उस समय की परिस्थितियों का जिक्र करते हुए बताया गया कि जयप्रकाश नारायण जी द्वारा फ़ौज और पुलिस को विद्रोह करने का आह्वान के बाद स्थिति अराजक हो जाने के डर से इंदिरा जी आपातकाल लगाया था।

कुछ पोस्टों में इस बात का भी उल्लेख पढ़ा मैंने कि जयप्रकाश नारायण जी ने बाद में माना कि उनका फौज और पुलिस को विद्रोह करने के लिए उकसाने का आह्वान ग़लत था।
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी जी ने अपनी किताब ‘ How Primemisters Decide’ (प्रधान मंत्री कैसे निर्णय लेते हैं) में विस्तार से उन प्रधानमंत्रियों के निर्णय लेने की प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया है जिनके साथ उन्होंने काम किया है। इसमें इंदिरा गांधी जी से लेकर मनमोहन सिंह जी तक के प्रधान मंत्रियों के कार्यकाल का विवरण है।
इंदिरा जी के कार्यकाल के बारे में चर्चा की शुरुआत आपातकाल प्रकरण से होती है। जब इलाहाबाद हाईकोर्ट में इंदिरा जी मुक़दमा हार गईं तो उनको अलग-अलग लोगों ने अलग-अलग सलाह दी। कुछ लोगों ने यह सलाह भी दी कि इंदिरा जी रायबरेली सीट से त्यागपत्र देकर किसी और को कुछ दिनों के लिए प्रधान मंत्री बना दें। फिर चुनाव जीतकर फिर से प्रधानमंत्री बन जायें। कुछ लोगों का मत था कि सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाये, त्याग पत्र देने की कोई जरूरत नहीं है।
इंदिरा जी को शायद किसी पर भरोसा नहीं था जिसको कुछ दिन प्रधानमंत्री बनाकर वो बाद में दुबारा चुनाव जीतकर फिर प्रधानमंत्री बन जायेंगी। आज की राजनीति में तो यह और भी पक्का हो गया कि जो भी कुर्सी पर बैठा वह फिर छोड़ता नहीं है।
बाद में बदलते घटनाक्रम को देखते हुए राष्ट्रपति के अनुमोदन से संविधान की प्रक्रिया के तहत आपातकाल लगाया गया।
आपातकाल में सभी विपक्षी नेता जेल में बंद हो गए। उस समय के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघ संचालक द्वारा इंदिरा जी को लिखे कई पत्रों का उल्लेख नीरजा जी किया है जिसमे सर संघ संचालक जी ने आपातकाल के ख़िलाफ़ न लिखते हुए इंदिरा जी को बधाई दी थी कि वे सुप्रीम कोर्ट में जीत गईं। तमाम पत्राचारों के माध्यम से उन्होंने इंदिरा जी की मिजाजपुर्सी जैसी ही की थी।
आपातकाल लगने के कुछ महीनों बाद चन्द्रशेखर जी ने इस मसले पर सलाह देते हुए कहा था -“गोरों से (आपातकाल के ख़िलाफ़) लिखवाओ।” गोरों से मतलब पश्चिमी प्रेस से। इंदिरा जी को अपनी लोकतांत्रिक छवि की चिंता थी और वे पश्चिमी देशों के अखबारों की प्रतिक्रियाओं से प्रभावित होती थीं।नीरजा जी ने इंदिरा जी के आपातकाल हटाने के निर्णय के पीछे उनके लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से कहीं न कहीं जुड़ाव के भाव का भी उल्लेख किया है।
आपातकाल हटने के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार आपसी लड़ाई में गिर गई। राजनारायण जी ने पहले मोरार जी की सरकार गिरवाने में अहम भूमिका निभाकर चरणसिंह जी को प्रधानमंत्री बनवाया। बाद में उनको हटवाने के लिए जुट गए। सारी कहानी बड़ी रोचक है।
चरणसिंह जी, जो जनता पार्टी की सरकार में रहते इंदिरा जी को जेल भेजने पर आमादा थे , कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने। उनके प्रधानमंत्री बनने पर उनका इंदिरा जी से मिलना उनके बंगले पर जाना तय था। लेकिन उनके किसी चेले ने उनको समझा दिया कि आप तो प्रधानमंत्री हैं , आप उनके यहाँ क्यों जाएँगे। वे नहीं गए। इंदिरा जी अपने बंगले में गुलदस्ता लिए इंतज़ार करती रहीं। उसी समय तय हो गया था कि चरणसिंह जी ज़्यादा दिन प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे।
इंदिरा जी की सबसे ज़्यादा डर इस बात का था कि कहीं जगजीवन राम जी प्रधानमंत्री बन गए तो किसी के लिए कोई मौक़ा नहीं रहेगा। उनको हटा पाना मुश्किल होगा। उनकी प्रशासनिक क्षमता से इंदिरा जी भी भली-भाँति परिचित थी। अगर जगजीवन राम प्रधानमंत्री बनते तो शायद अपने देश की कहानी कुछ और होती। लेकिन पहली बार वो इस कारण प्रधानमंत्री नहीं बन पाये क्योंकि उन्होंने आपातकाल का समर्थन किया था। दूसरी बार अपने बेटे सुरेश राम के आपतिजनक स्थिति में मिले चित्रों के छप जाने के कारण।
बाद में चरणसिंह की सरकार भी गिरी। चुनाव हुए। इंदिरा जी फिर प्रधानमंत्री बनी।
आपातकाल के पचास साल बीतने को संविधान हत्या वर्षगाँठ के नाम पर मनाया जाना भी मजेदार है। जो आपातकाल संविधान में मौजूद एक धारा के अनुसार लगाया गया था उसकी हत्या कैसे हुई थी? आपातकाल खराब था लेकिन वो लगाया तो संविधान के तहत ही गया था। दूसरी बात कि जो संगठन आपातकाल लगाने के विरोध में कुछ नहीं लिखकर उसकी तारीफ़ कर रहा था तो अगर संविधान की हत्या हुई तो इस हत्या साज़िश में वह संगठन भी शामिल था। उसकी भी भर्त्सना होनी चाहिए।
आपातकाल का ज़िक्र करते हुए तमाम आजकल के समय को अघोषित आपातकाल बताते हुए अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं। आने वाले समय पता नहीं इस समय को किस तरह याद किया जाएगा। यह आने वाला समय ही बताएगा।
फ़िलहाल तो वो लोग जो लोग पचास साल पहले आपातकाल में जेल गए और कष्ट भोगे वे आज की स्थितियों की तुलना करते हुए बता सकते हैं कि क्या वाक़ई आजकल का समय 'अघोषित आपातकाल' का है?

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Wednesday, June 25, 2025

काली चाय , हरी चाय और सफ़ेद चाय


 चाय का शौक बचपन से रहा है।चाय का मतलब हमारे लिए चाय की पत्ती, दूध, चीनी और साथ में अदरख से रहा है। इसके अलावा और कुछ साज-सिंगार हो गए चाय के कभी-कभी वो बात अलग। लेकिन बिना दूध की चाय कभी जमी नहीं अपन को।

दफ़्तर में भी साथ के लोग सीनियर होने के साथ ग्रीन टी पीने लगे। शायद उनको डर था कि अगर ग्रीन टी नहीं पियेंगे तो सीनियरिटी चली जायेगी। लेकिन इस मामले में अपन ने कभी दूध वाली चाय का साथ नहीं छोड़ा। ग्रीन टी या बिना दूध वाली चाय को अपन वीआईपी टी या एस.ए.जी. (सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव टी) कहते थे। कोई ग्रीन टी या काली चाय पिलाता तो कहा -"हमको भाई नार्मल चाय ही पिलाओ।" दूध मंगाया जाता , चाय पिलाई जाती।
ऐसे में कोई चाय कंपनी वाला कहे -"हम तो बिना दूध की चाय ही पिलायेंगे" तो कैसा लगेगा? वह लाख कहे हमारी चाय बहुत अच्छी है लेकिन हम तो न मानेंगे। दूध को तलाक़ देकर भला कहीं चाय का घर बस सकता है?
लेकिन हमारे साथ ऐसा हुआ। श्रीलंका में सीता माता का मंदिर देखने के बाद हम एक चाय कंपनी देखने गए। दमारो टी कंपनी (Damro Tea Company) श्रीलंका की सबसे पुरानी चाय कंपनियों में से एक है। श्रीलंका में कई जगह इनके प्लांट हैं। नुआरा एलिया पहाड़ी क्षेत्र के चाय के बागान हैं।
श्रीलंका विश्व का प्रमुख चाय उत्पादक देश है। यहाँ की चाय विदेशी मुद्रा का प्रमुख स्रोत है। श्रीलंका में चाय का उत्पादन 1867 से शुरू हुआ। भारत में चाय की खेती श्रीलंका से तीस साल पहले 1836 में शुरू हुई थी। पहले चाय अंग्रेजों के लिए उगाई जाती थी। बाद में तो यहाँ के लोग भी चाय के आदी हो गए। चाय यहाँ का सबसे ज़्यादा लोकप्रिय पेय बन गया।
जिस प्लांट को हम लोग देखने गए थे वहाँ सामने ही चाय के बागान के बीच Damro Tea Company का बोर्ड लगा था। तमाम लोग प्लांट देखने आए थे। हम भी पहुँच गए।
प्लांट में बाग में लाई गई पत्तियों से चाय बनाई जा रही थी। हमारे साथ के गाइड ने अलग-अलग तरह की चाय बनाने के तरीके बताये। चाय सुखाने, ऑक्सीकरण और अलग-अल्ला तरह साइज में कैसे तैयार की जाती है सब विस्तार से बताया। पहली मंजिल से हम लोग नीचे बड़े हाल में बनती चाय देखते रहे। बड़ी मेज में चाय की पत्तियाँ पसरी हुई थी और सुखाई जा रही थी।
हमको चाय की दो क़िस्में ही पता थीं काली चाय और ग्रीन टी। लेकिन वहाँ पता कि चाय की एक तीसरी कैटेगरी भी होती है -सफेद चाय। सफेद चाय सबसे महंगी होती है। सभी चाय में अंतर उसके आक्सीकरण के लेवल का होता है। सफेद चाय सीधे बागान में सुखाई जाती है, ग्रीन टी में ऑक्सीकरण नहीं होता है, काली चाय जो सबसे ज़्यादा प्रयोग की जाती है वह सुखाने, ऑक्सीकरण और प्रोसेसिंग के बाद अलग-अलग साइज में पैक की जाती है। जैसे-जैसे चाय की पत्तियों का साइज कम होता है वैसे-वैसे उसका कड़कपन बढ़ता जाता है , कीमत कम होती जाती है।
प्लांट घूमने के बाद हम लोग वहाँ आए जहाँ चाय का काउंटर था। अलग-अलग तरह की चाय अलग-अलग पैकेट में बिक रही थी। वहीं तरह-तरह की चाय टेस्ट के लिए भी उपलब्ध थे। छुटके-छुटके कप में लोग चाय पी रहे थे। हमने कहा -"दूध वाली चाय पिलाओ।" लेकिन वहाँ बताया गया -"यहाँ दूध प्रयोग नहीं करते।" हमने कहा-"बिना दूध की चाय का क्या मजा? दूध मिलाओ। उसका पैसा हम दे देंगे।" वाहन बताया गया -"हम दूध रखते ही नहीं।"
बिना दूध की चाय बेमन से पी। सोचते हुए कि कानपुर में होते तो अपने घर से दूध लाकर चाय में डाल लिए होते। लेकिन सोचने से क्या होता है। सच्चाई तो यही थी कि हम श्रीलंका में थे, कानपुर में नहीं।
थोड़ी देर वहाँ रहकर हम लोग वापस कोलंबो के लिए चल दिए।

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Monday, June 23, 2025

ज्ञान का सागर

 आजकल ईरान-इजरायल-अमेरिका पर इतनी एक्सपर्ट जानकारी सोशल मीडिया, यूट्यूब, अखबार और दीगर माध्यमों से मिलती है कि समझ में नहीं आता किसके सहमत हुआ जाये। व्हाट्सएप ग्रूपों पर इतना गुरु गंभीर ज्ञान का सागर लहराता है कि किनारे खड़े-खड़े ही लगता है इसमें उतरे तो डूब जायेंगे।


हर पक्ष के अपने तर्क है। ईरान , इजरायल और अमेरिका समर्थकों के अपने तर्क हैं। लेकिन यह बात तय है कि यह लड़ाई दुनिया की बड़ी आबादी के आम लोगों के ख़िलाफ़ है। दुनिया की बहुसंख्यक आबादी चाहती है कि यह लड़ाई ख़त्म हो। इस लड़ाई का निर्णय लेने वाले लोग संख्या में कम हैं लेकिन चालाकी, धूर्तता और सिस्टम पर कंट्रोल के चलते निर्णय का अधिकार उन्होंने अपने हाथों में कर रखा है। इजरायल, ईरान या अमेरिका तीनों देशों की बड़ी आबादी इन लड़ाइयों के ख़िलाफ़ है लेकिन तीनों ही राष्ट्रवाद की आड़ में लड़ाई में जुटे हैं। ये भी शायद अपने से बड़ी ताकतों की कठपुतलियाँ हैं।
बाक़ी देशों में भी अधिकतर चालाकी, धूर्तता से क़ब्ज़ा जमाये हुए लोग सरकारें चला रहे हैं। दुनिया की बड़ी आबादी सबको चुपचाप देखती हुई अपने-अपने हिसाब से अपडेट हो रही है। सोशल मीडिया नहीं होता तो कहाँ जाते तमाम लोग। इतना ज्ञान का सागर जो यहाँ उफनाता रहता है वह कहाँ लहराता ?

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किताबों की लिस्ट

 


आज Sudhir Vidyarthi जी ने उन किताबों की लिस्ट बताई जिनको वो फिर से पढ़ना चाहते हैं। इनमें से कुछ हमारी पढ़ी हैं, कुछ आधी पढ़ीं हैं। किताबों की सूची देखकर किताबें पढ़ने की ललक और तेज हो गई।

आजकल Joseph Heller की कैच-22 और दोस्तोवस्की का ‘अपराध और दंड’ पढ़ रहे हैं। कैच-22 की अंग्रेजी इतनी उलजाऊ है कि किंडल पर हर शब्द के मतलब तुरंत पता लगने के बाद भी वाक्य का मतलब समझने के लिए ठहरकर सोचना पड़ता है। इतनी गरीब अंग्रेजी है अपन की। पिछली सदी के सबसे बेहतरीन उपन्यासों में से एक माना जाने वाला युद्ध विरोधी व्यंग्य उपन्यास है यह। मैं सोचता हूँ कि जिन लोगों ने इसे पढ़ा और पसंद किया, क्या उनको भी यह पढ़ते हुए इतना ही कठिन लगा होगा या उनकी अंग्रेजी अच्छी होने के कारण वे इसे सटासट, फटाफट पढ़ते गए।
‘अपराध और दंड’ पढ़ते हुए लगता है बहुत दिन का होमवर्क छूटा है जो बहुत पहले कर लिया जाना चाहिए था।
तमाम अच्छी किताबों के बारे में जब लोग लिखते हैं और बताते हैं तो लगता है कि इनको हमने क्यों नहीं पढ़ा अभी तक। लगता है जल्दी ही पढ़ लेंगे। ऐसी किताबों की सूची बढ़ती जा रही है।
बात उन किताबों की सूची से शुरू हुई थी जिनकों हम एक बार पढ़ चुके हैं और फिर से पढ़ना चाहते हैं। हमारी लिस्ट में कसप, आदि विद्रोही, आधा गाँव, युद्ध और शांति, राग दरबारी, ग्लिपन्सेस आफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री और तमाम किताबें शामिल हैं जिनके नाम फौरन याद नहीं आ रहे।
आपने कौन सी किताबें पढ़ीं हैं जिनको आप फिर से पढ़ा चाहते हैं?
फ़ोटो कैच-22 का किंडल फ़ोटो

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Sunday, June 22, 2025

श्रीलंका में सीता माता मंदिर

 



श्रीलंका में राम कथा से जुड़े दो प्रमुख स्थल हैं। एक रावण का क़िला और दूसरा अशोक वाटिका (सीता वाटिका) । रावण का क़िला तो हमारे टूर प्रोग्राम से अलग रास्ते पर था इसलिए उसे तो देखने नहीं जा पाये। अलबत्ता सीता वाटिका देखने को जरूर मिला।
रामकथा के अनुसार लंका के राजा रावण ने सीता जी का अपहरण करके उनको अशोक वाटिका (सीता वाटिका) में रखा था। सीता जी का पता लगाने के लिए हनुमान जी भेजे गए थे। वे सीता वाटिका पहुंचे और सीता जी के दर्शन करके उन्होंने भगवान राम की अंगूठी निशानी के तौर पर दी। सीता वाटिका वह जगह कही जाती हैं सीता माता से हनुमान जी की भेंट हुई थी।सीता जी के नाम पर यहाँ बना मंदिर सीता माता मंदिर कहलाता है।
एक दिन पहले हम लोग ट्रेन से यात्रा करके नानू ओया स्टेशन आए थे। वहाँ नुआरा एलिया शहर में रात को रुके। सुबह वेलेंटाइन डे था। उस दिन सुबह की चमकदार धूप में वैलेंटाइन डे की शुभकामनाएं ले-देकर हम लोग सीता वाटिका देखने के लिए चले। सीता वाटिका होटल से कुछ ही दूरी पर थी । आधे घंटे से भी कम समय में वहाँ पहुँच गए। मंदिर के नाम पर वह जगह सीता एलिया कहलाती है।
सीता माता का मंदिर हाई वे (Peradeniya-Badulla-Chenkaladi Highway) पर बना हुआ है। गाड़ियाँ आती-जाती हैं। संभलकर सड़क पार करना होता है। मंदिर में प्रवेश करने की फीस सौ श्रीलंकाई रुपए थे। भारत के हिसाब से क़रीब तीस रुपए। सबके टिकट लेकर हम लोग अंदर गए।
मंदिर के अंदर राम-सीता-लक्ष्मण जी की काले संगमरमर की मूर्ति बनी हुई है। मंदिर के अंदर सबको मुकुट पहनाकर तिलक लगाया जाता है । तीस रुपए में मुकुट और तिलक मंहगा सौदा नहीं है। मंदिर के अंदर फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी मना थी इसलिए लोग धड़ल्ले से कैमरे चमका रहे था। पुजारी के एकदम सामने फ़ोटोग्राफी करने पर पुजारी जी फोटोग्राफी से मना करने की औपचारिकता निभा रहे थे। लोग भी औपचारिक रूप से उनके टोंकने पर कैमरे दूसरी तरफ़ करके फ़ोटो खींचने लगते थे।
मंदिर में राम कथा से संबंधित फोटो और विवरण लगे थे। उसमें सीता हरण और राम जी से जुड़ी अन्य कथायें भी शामिल थीं।
मंदिर में हनुमान जी की भी मूर्ति थी। आम तौर पर हनुमान जी की मूर्तियां 'लाल देह लाली लसे' के अनुसार लाल रंग की होती हैं। लेकिन यहाँ काली मूर्ति थी हनुमान जी की। एक और रोचक बात यह कि हनुमान जी की मूर्ति में 108 पान के पत्तों की माला थी। यह अनूठी परंपरा है यहाँ श्रीलंका में जिसमें हनुमान जी को फूलों की माला न पहना कर पान के पत्तों की माला पहनाई जाती है।
मंदिर के पीछे की तरफ़ वह जगह बनी थी जहाँ माना जाता है कि हनुमान जी अशोक वाटिका में उतरे थे। एक जगह पर पैर के आकार का गड्ढा बना था। माना जाता है वह गड्ढा हनुमान जी के अशोक वाटिका में उतरने का निशान है। उसके अगल-बगल भी कई गड्ढे बने हुए हैं। विश्वास किया जाता है वे सब भी हनुमान जी के पैरों के निशान है।
लोग हनुमान जी के पैरों के निशान के पास बैठकर तरह-तरह से फ़ोटो खिंचवा रहे थे। वीडियो बना रहे थे। जगह काफ़ी संकरी है इसलिए लोग बारी-बारी से उस जगह पहुँचकर फ़ोटो खिंचवा रहे थे।
पास में ही एक नदी बह रही थी। किंवदंती के अनुसार सीता जी के सीता वाटिका में प्रवास के दौरान सीता जी इसी नदी में स्नान करती थीं । उनके नाम पर ही इसे सीता नदी कहा जाता है। सीता नदी के ऊपर बने इस पुल से नीचे उतरते ही हनुमान जी के पैर बने थे। लोग पुल पर खड़े-खड़े हमुनान जी के पैर के निशान के साथ लोगों को फोटो खिंचाते देखते हुए अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे।
मंदिर में लगे सूचना पट्टों के अनुसार मंदिर की मरम्मत और संचालन में श्रीलंका सरकार के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। कुछ भारतीय संस्थाओं के नाम भी मंदिर प्रबंधन में सहयोग में लगे दिखे।
तमिल में लिखी कम्बन लिखित राम कथा के अनुसार हनुमान जी जब सीता जी की खोज-खबर लेने के लिए लंका गए थे तो राम जी सीता जी की खबर पाने को उतावले और व्याकुल थे। हनुमान जी को राम जी की व्याकुलता का अंदाजा था। इसलिए श्रीलंका से वापस लौटने पर राम जी को देखते ही उन्होंने कहा -"देखा, मैंने सीता को।" हनुमान जी को अंदाज़ था राम जी लंबा विवरण सुनने की स्थिति में नहीं है। " देखा" सुनते ही उनको तसल्ली हो गई कि सीता जी का पता चल गया है। इसके बाद हनुमान जी ने तसल्ली से पूरी लंका कथा सुनाई होगी।
इस कहानी से अंदाज़ लगता है -"काम की बात करने के लिए बहुत कम शब्दों की जरूरत होती है।"
सीता माता मंदिर देखने के बाद हम लोग आगे बढ़े। हमारी अगली मंजिल एक चाय का बागान और उससे जुड़ी चाय की फैक्ट्री थी।

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Saturday, June 21, 2025

जामा मस्जिद


 जामा मस्जिद के किस्से बहुत सुने थे। दुनिया की बड़ी मस्जिदों में शुमार इस मस्जिद के बारे में तमाम किस्से सुन रखे थे। कुछ छवियाँ भी गढ़ रखीं थीं। उनमें से एक यह कि मस्जिद के सामने बहुत चौड़ी सड़क है। बड़े मैदान जितनी सड़क है मस्जिद के सामने। खुला इलाका है मस्जिद के सामने। लेकिन जब देखने गए तो असल में बात अलग थी।

ग़ालिब की हवेली से निकलकर देखा जामा मस्जिद पास ही है। करीब एक किलोमीटर। टहल लिए मस्जिद की तरफ़। भीड़ भरी सड़क पर रिक्शा, स्कूटर, साइकिल और पैदल लोग चल रहे थे। दोनों तरफ़ तरह-तरह की दुकानें। दोपहर की गर्मी सड़क पर चलते लोगों के चेहरे पर चमक रही थी।
ग़ालिब की हवेली से जामा मस्जिद के रास्ते में 'गली दिलखुश राय खजांची' में छोटे बच्चों का स्कूल के बोर्ड के साथ लटके तारों का जंजाल दिखा । दिलखुश राय खजांची कौन थे अभी पता नहीं लेकिन जरूर काम भर के बड़े आदमी रहे होंगे तभी उनके नाम की बनी है। Alok Puranik जी और Manu Kaushal जी टहलाते हैं यह इलाक़ा। वो कुछ बतायेंगे दिलखुश राय खजांची के बारे में।
मस्जिद की तरफ़ जाने वाली सड़क किसी तेज गेंदबाज के फेंकी गेंद की तरह स्विंग करते हुए घूमती हुई चल रही थी। कई मोड़ पर मुड़ने के बाद जामा मस्जिद के गेट नंबर 3 के सामने पहुँच गए। भीड़ भरी सड़क के सामने कोई मैदान नहीं था, कोई बहुत चौड़ी सड़क भी नहीं थी। मतलब जामा मस्जिद के पहले दीदार में ही हमारी एक छवि का क़त्ल हो गया जिसकी रिपोर्ट किसी थाने में नहीं लिखाई जा सकती थी।
एक बार फिर से लगा कि दुनिया के तमाम लोगों, जगहों और चीजों के बारे में हमने अपने सोच के हिसाब से हम लोग तमाम छवियाँ मन में बना लेते हैं। असलियत इसके एकदम अलग होती है।
जामा मस्जिद मुग़ल बादशाह शाहजहां ने बनवाई थी। 1650 से 1656 के बीच। यह शाहजहां द्वारा बनवाई आख़िरी बड़ी इमारत थी। इसको बनवाने में उस समय दस लाख रुपये खर्च हुए थे। इस मस्जिद के उद्घाटन के लिए उस समय बुखारा, उज़्बेकिस्तान से सैयद अब्दुल ग़फ़ूर शाह बुख़ारी को बुलवाया गया था। उनको शाही इमाम बनाया गया और उन्होंने 23 जुलाई 1656 को मस्जिद का उद्घाटन किया। तबसे बुख़ारी ख़ानदान के लोग ही जामा मस्जिद के इमाम बनते आए हैं।
गेट नंबर तीन की सीढ़ियों से चढ़कर ऊपर पहुँचे। कुछ देर सीढ़ियों पर बैठे रहे। तमाम लोग सीढ़ियों पर बैठे फोटोबाजी में मशगूल थे। कुछ देर हमने उनको देखा और फिर सामने की सड़क का फोटो लिया। फिर अंदर की तरफ़ जाने के लिए आगे बढ़े।
मस्जिद के अंदर जाने पर जूते बाहर ही उतारने पड़ते हैं। जूते जमा करवाने का इंतजाम करने वाले को दस रुपए भुगतान करने थे। हमने उससे पूछा -"हमको गेट नम्बर एक की तरफ़ से बाहर जाना है, जूते यहाँ जमा करके उधर जा सकते हैं?" उसने सलाह दी -"जूते हाथ में लेकर चले जाइए। पहनिएगा नहीं मस्जिद में।"
हमने जूते अपने पास के झोले में डाल लिए। दस रुपये बच जाने का सुकून ने चेहरे पर अपने-आप कब्जा कर लिया। उधर झोले में पहले से मौजूद मोबाइल, पावर बैंक, पानी की बोतल और किताब जूते को देखकर थोड़ा चौंके, शायद नाक-भौं भी सिकोड़ी हो लेकिन हमने किसी के नखरे देखा बिना बैग की चैन बंद कर दी। हो सकता उनमें आपस में कुछ कहा-सुनी हुई हो लेकिन वो पक्का रेल में जनरल डिब्बे के यात्रियों की तरह एडजस्ट हो गए।
मस्जिद के बहुत बड़े अहाते में तमाम लोग घूमते, टहलते, बतियाते, हँसते, खिलखिलाते दिखे। जो भी आया था वहाँ फ़ोटो खिंचाते दिखा। कई लड़कियां सेल्फी लेते, कई जोड़े अपने जोड़ीदार का फ़ोटो लेते, कई घरवाले अपने परिवार के लोगों के साथ तरह-तरह से फ़ोटो खिंचाते दिखे।
मस्जिद के अहाते के बीच में बने पानी के तालाब के चारों तरफ़ बैठे लोग पानी से मुँह धोते, उसके साथ फ़ोटो खिंचाते, अपने बच्चों को पानी छुआते दिखे। शायद यह तालाब मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए आने वालों के वजू करने के लिए था।
मस्जिद के अहाते, तालाब और आसपास के नज़ारे देखने के बाद मस्जिद देखने के लिए आगे गए। मस्जिद प्रवेश पर एक जगह लिखा था -"यहाँ वीडियो बनाते समय गाने न चलायें।" हमने एहतियातन वीडियो बनाया ही नहीं।
आगे की जगह पर रस्सी लगी थी और बोर्ड पर लिखा था -"प्रवेश केवल नमाजियों के लिए।" हम वहीं रुक गए। वहीं खड़े-खड़े उर्दू में लिखा हुआ पढ़ा -"सिर्फ़ नमाजियों के लिए।" यह भी जाना कि सिर्फ़ के लिए 'स' सुवाद से लिखा जाता है 'सीन' या 'से' से नहीं। इतनी उर्दू पढ़ लेने का सुकून भी बिना टिकट मिला।
रस्सी से बनी सीमा रेखा के दूसरी तरफ़ तमाम लोग बैठे, लेटे आराम कर रहे थे। नमाज में अभी समय था। तब शायद वे नमाज पढ़ें या यह भी हो सकता हो नमाज के समय वे वहाँ से उठकर रस्सी की सीमा रेखा से बाहर आ जायें। जो हो अपन से पलट लिए। अहाते के और सामने वाले मीनार के कुछ और फ़ोटो लिए, वीडियो बनाए। लौटने लगे।
लौटते हुए देखा कि एक जगह मीनार देखने के लिए टिकट का नोटिस लगा था। हमने सोचा देखें इसे भी। सत्तर रुपए का टिकट लिया और मीनार देखने के लिए चल दिए। संकरी सीढ़ियों से चलते हुए पहली मंजिल पर पहुंचे। मीनार की तरफ़ जाने के पहले मौजूद लोगों ने झोला वहीं जमा करा लिए। दस रुपए फीस थे सामान जमा कराने की । वो लोग पानी की बोतल भी रखे थे। हमने झोला जमाकर टोकन लिया और मीनार की तरफ़ चल दिए।
मीनार की गोल घेरे में बनी , संकरी सीढ़ियों पर चढ़ते हुए सोचते रहे अब कितनी ऊँचाई और बची है। सीढ़ियों में जगह-जगह रोशनदान बने हुए थे। कहीं-कहीं बल्ब भी लगे थे।
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए थक गए तो एक जगह बैठ भी गए। थोड़ा सुस्ताने के बाद फिर ऊपर बढ़े। एक जगह रोशनदान के पास एक सफेद दुपट्टा भी रखा था। हमें लगा कोई भूल गया होगा। हमने उसको अनदेखा किया और ऊपर बढ़ते रहे।
ऊपर पहुँचकर जीने से सटी जगह पर बैठे-बैठे हमने कई साँसे एक साथ लीं। सुकून की, तसल्ली की, इत्मिनान की, संतोष और भी न जाने किस-किस घराने की। सब साँसे अपने साथ ले गई आक्सीजन को हमारे दिल को सौंपती गयीं। दिल भी तसल्ली से धड़कते हुए पूरे शरीर को ख़ून भेजता रहा।
ऊपर दो लड़कियाँ और एक लड़का पहले से मौजूद थे। लड़का शांत था, लड़कियां चहकती हुईं फोटो, वीडियो, सेल्फी बनाती हुई मोबाइल कैमरे की कीमत वसूल कर रही थी। उनमें से एक ने कहा -"मेरा दुपट्टा पता नहीं कहाँ गिर गया?" हमने उसको बताया -"रास्ते में एक जगह दिखा था मुझे।" उसने थोड़ा ख़ुशी जाहिर की फिर अपनी मम्मी को वीडियो काल करके मीनार से आसपास का नज़ारा दिखाने लगी। मम्मी ने नीचे आने को कहा तो बोली -"आधे घंटे बाद आऊँगी नीचे।"
बच्ची बहुत खुश थी। पानीपत से आई थी जामामस्जिद देखने। बोली-"पहली बार आए हैं देखने। दिल्ली में होते तो अब तक सैकड़ों बार देखने आ चुके होते।"
हमने मीनार से आसपास के और नीचे सड़क पर चलते लोगों के नज़ारे देखे और फ़ोटो खींचे। कुछ देर में वहाँ आने वाले बढ़ते गए। जगह संकरी होती गई। हम नीचे की तरफ़ चल दिए। लौटते समय सीढ़ियाँ गिनी। कुल 120 सीढ़ियाँ हैं मीनार के ऊपर तक जाने की। जाते समय ऐसा लग रहा था कि हज़ारों सीढ़ियाँ चढ़े हैं। गिनती सौ के कुछ नज़दीक ही देखकर थोड़ा ताज्जुब हुआ।
लौटते हुए दस रुपए भुगतान करके झोला उठाया और चल दिए। झोला उठाए चल देने वाली बात पर 'फ़क़ीर की तरह झोला उठाकर चल देने' वाला बयान याद आया। यह सोचा कि अभी फ़क़ीर का झोला जमा किसके पास है। जहाँ रखा है उसका किराया कितना पड़ेगा? लेकिन फिर लगा यह सोच ख़ुराफ़ाती है इसलिए उस सोंच को वहीं छोड़कर बाहर आ गए।
शाम की नमाज़ को अभी घंटा भर बाकी था। पहले सोचा कि रुकें देखें लोगों को नमाज पढ़ते हुए लेकिन फिर निकल आए।
लौटते समय गेट नंबर एक से बाहर आए। सीढ़ियों पर माँगने वाले बैठे थे। नीचे गेट के दरवाजे पर एक मांगने वाले का पूरा चेहरा माँस से ढँका हुआ था। बगल से देखने पर लगा कि वह मुखौटा लगाए हुए है। हमने यही 'लगने' वाली बात मन में जमा कर ली। उसी समय सामने की दुकान से एक लड़का उसको चाय देने आया। वह चाय पीने लगा।
बगल से गुजरते हुए हमने देखा कि उसके चेहरे पर कोई मुखौटा नहीं था। वाक़ई उसके चेहरे मांस जमा हुआ था। आँखे नहीं दिख रहीं थी। हमने मुखौटे वाली बात मन से मिटाकर चेहरे पर माँस लटकने वाली बात जमा की। यह भी सोचा कि हम किसी के बारे में कोई धारणा बनाते हैं तो यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि हम किस कोण से उसे देख रहे हैं।
मस्जिद के बाहर सड़क के दोनों तरफ़ तमाम ठेले वाले, दुकान वाले पूरी सड़क को चहल-पहल भरा बना रहे थे। गर्मी भयंकर थी। मन किया कहीं बैठकर कुछ खाया-पिया जाये लेकिन गर्मी इतनी ज्यादा थी कि चलते रहे।
आगे कुछ उर्दू की किताबों की दुकानें दिखीं। अंजुमन पब्लिकेशन से मुस्ताक अहमद यूसुफ़ी का उपन्यास 'आब-ए-गुम' और जरगुजस्त (ZAR GUZASHT) उर्दू में खरीदी। इन किताबों के हिन्दी अनुवाद 'खोया पानी' और 'पापबीती' हम पढ़ चुके हैं। इनको मूल उर्दू में पढ़ने की इच्छा के के चलते ख़रीदीं ये किताबें। अभी तो अटक-अटक के पढ़ना सीखा रहे हैं। पता नहीं कब बिना अटके पढ़ पायेंगे लेकिन ख़रीद लीं किताबें । भले ही पढ़ी न जायें लेकिन साथ में किताबें हाथ में बंधे ताबीज की तरह होती हैं।
किताब वाले से पतरस के मजनून भी माँगी। 'पतरस के मजनून' का जिक्र हमसे मथुरा के वाले वकील साहब Surendra Mohan Sharma जी करते थे। तबसे हमारी 'पढ़नी है' वाली लिस्ट में शामिल है किताब। लेकिन उसके पास मिली नहीं पतरस की किताब । उसने शौकत थानवी की 'खुदा न खास्ता' थमा दी। हमने ले ली। 1200/- खर्च हो गए तीन किताबों में।
अंजुमन प्रकाशन से निकल कर आगे जामा मस्जिद मेट्रो के रास्ते में एक दुकान पर लिखा मजेदार जुमला दिखा। उधार देने से मना करने वाले तमाम जुमले पढ़े थे हमने पहले लेकिन यह नया जुमला था - "उधार एक जादू है, हम देंगे तो आप ग़ायब हो जाओगे।"
हमको न उधार लेना था न ग़ायब होना था लिहाज़ हम आगे बढ़ गए। मेट्रो पकड़ी और घर वापस आ गए।


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