Wednesday, October 25, 2023

परसाई के पंच-85

 

1. जो बाहर भ्रष्टाचार है, वही पवित्र स्थान में सदाचार है। बाहर सोना चुराकर गलाना दुराचार है, मगर साधु की अंगीठी में गलाना सदाचार है। बाहर स्त्री-संसर्ग व्यभिचार है, मगर मन्दिर में सदाचार है। बाहर जिसे ग्रहण करना अनैतिक माना जाता है, उसे मन्दिर में देवदासी बनाकर रख लेना, पूरी तरह नैतिक है।
2. बाहर नशा करना बुराई, पर मन्दिर में साधु चरस पीते हैं, तब वह पवित्र कर्म होता है। दुनिया के हर धर्म के धर्मस्थल में बुरा काम अच्छा बनाकर किया जाता है। जीव-हत्या तो वैसे पाप माना जाता है, मगर देवता के लिये मन्दिर में बकरे का बलिदान पवित्र अनुष्ठान होता है।
3. ईमानदार आदमी को सुख देना किसी के वश की बात नहीं है। ईश्वर तक के नहीं।
4. दलगत राननीति में जब तक कोई अपने साथ है, हीरा है। अलग हुआ तो कंकड़ है।
5. धर्म का रहस्य है कि पैगम्बरों और धर्मगुरुओं की बड़ी फ़जीहत उनके अनुयायी करते हैं।
6. तेल-शेख दो बार बम्बई आता है- एक बार रण्डीबाजी करने और फ़िर उससे पैदा हुई बीमारी का इलाज कराने।
7. बांटकर खानेवाला कभी भी नहीं पकड़ा जाता।
8. दस लाख सालों में आदमी विकास करते-करते कुत्ता बन जायेगा, तब भ्रष्टाचार मिटेगा। याने नस्ल बनाये बिना भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा। जब तक आदमी की नस्ल है, भ्रष्टाचार रहेगा।
9. ऐसे लोकतंत्र से क्या फ़ायदा जिसमें अपनी पार्टी न जीते। सच्चा लोकतंत्र वह है जिसमें अपनी पार्टी जीते। जिसमें विरोधी जीत जायें वह भी कोई लोकतंत्र है?
10. मुहल्ले की नयी बहू के बदचलनी के किस्से जब चलते हैं तो लोग यह भूल जाते हैं कि इसकी सास अपने जमाने में बहुत बदचलन थी।
11. मन्त्री या मुख्यमन्त्री जब काण्ड करता है तब उसका उत्तरकाण्ड नहीं होता। उसका तब किष्किन्धा काण्ड ही चलता है। जब मामला दब जाता है, नये मामले संसद का समय और अखबार का कागज बरबाद करने लगते हैं तब उससे चुपचाप कहा जाता है कि अब तुम खिसक जाओ, अब तुम्हारी जगह दूसरे को काण्ड करने का मौका दिया जायेगा।

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