Saturday, October 28, 2023

परसाई के पंच-88

 

1. व्यवस्था बदलना इस देश में पाप माना जाता है। इसी पाप का यह पुण्य फ़ल है कि हम दोरंगी जिन्दगी जीते हैं। चुम्बन को गन्दा मानते हैं और खुजुराहो की काम कला की मूर्तियों को ज्यादा से ज्यादा लोगों को दिखाने के लिये पर्यटन विभाग विज्ञापन करता है।
2. हम भी तो हरिजन को जिन्दा जला देते हैं। मुर्गे को तो मारकर भूनते हैं, मगर हरिजन को जिन्दा भूनते हैं।
3. जब शर्म की बात गर्व की बात बन जाय तब समझो कि जनतन्त्र बढ़िया चल रहा है।
4. राजनीति में शर्म केवल मूर्खों को आती है।
5. जब कोई मनुष्य से मन्त्री बन जाता है तो उससे अटपटी बातें होने लगती हैं।
6. मन्त्री होने पर एक तरफ़ तो आदमी यह भूल जाता है कि वह पहले क्या और कैसा था ! फ़िर वह परम ज्ञानी भी हो जाता है। इसके साथ ही वह समझता है कि उसका स्तर एकदम बढ़ गया है।
7. अगर जाति इतनी बुनियादी चीज है तो अलग-अलग जाति की अलग-अलग गन्ध होती। ब्राह्मण की गुलाब की गन्ध , वैश्य की चम्पा की गन्ध।
8. प्रेम स्त्री-पुरुष में नहीं होता, जाति-जाति में होता है।
9. इस देश का मजा यह है कि हिन्दू मुसलमान तो हो सकता है, पर ब्राह्मण कायस्थ नहीं हो सकता। कोई ब्राह्मण कहे कि मैं जाति बदलकर कायस्थ होना चाहता हूं तो उसे नहीं होने देंगे। पर वह मुसलमान होना चाहे तो हो जाने देंगे।
10. थूक चाटने से जाति नहीं जाती, रोटी खाने से जाती है।
11. आजकल हाल यह है कि सफ़र करने वाला आदमी चार बार बिस्तर खोलता और बांधता है। बड़ी हिम्मत करके वह स्टेशन जाने को रिक्शा में बैठता है, तो इस तरह जैसे अर्थी पर चढ़ रहा है।

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