Thursday, July 16, 2026

बारिश में भीगना


 आज स्विमिंग के लिए निकलते समय पानी बरसने लगा। पहले धीमा फिर तेज। लगा पूल बंद होगा। लेकिन बिजली नहीं चमक रही थी। इसलिए सोचा शायद चालू हो पूल। लेकिन कोई सूचना नहीं थी ग्रुप में। सोचा पूल बंद भी होगा तो बारिश में भीगने की तमन्ना पूरी होगी। हम निकल लिए। सात बजकर चालीस मिनट थे जब निकले।
बारिश में बैग लेकर नहीं गए। बेकार भीग जाता। स्वीमिंग कास्ट्यूम (लोवर) और टी शर्ट पहनकर निकले। पूल पास, स्विमिंग कैप और तैराकी चश्मा मोमिया में धर लिया। मोबाइल घर छोड़ दिया। घड़ी को घर से तैराकी मोड में कर लिया। घर से ही साइकिल तैराकी शुरू कर दी।
रास्ते में कालोनी के साइकिल प्रेमी शुक्ला जी मिले। सुबह की साइकिलिंग करके लौट रहे थे। हमको देखा तो हाथ हिलाकर हेलो कहा। हमने भी किया। पूरे रास्ते कल और आज के देखे वीडियो याद करते हुए सारे स्टेप्स मन में दोहराते रहे।
पूल पर पहुंचे तो लोगों ने बताया 8-9 नौ बजे का बैच कैंसल हो गया। शाम को आयेंगे तैरने। अंदर पहुंचे तो कोच और स्टॉफ पूल में गिरते पानी को देखते बैठे थे। एक ने बताया कि ग्रुप में मेसेज डाला था 8-9 नौ बजे के बैच के कैंसलेशन का। हमने बताया -'जब हम निकले तब तक नहीं डाला होगा।'
बाद में देखा हमारे निकलने के छह मिनट बाद का था मेसेज।
पूल से लौटते हुए एक जगह बारिश से बचने के लिए बैठे चार लोग मिले। वे दिहाड़ी मजदूर थे। उनसे बतियाये। वे बारिश के मजे लेते हुए बतिया रहे थे। एक ने कहा -' पानी बरसने से अच्छा हुआ। तराई आराम से हो जायेगी। गर्मी नहीं होगी। मसाला में पानी मिलाने के झंझट नहीं होगा।'
उनमें से एक नेपाल का मूल निवासी था। बताया कि उसके पिता भी यहीं आए। कमाए। यहीं ख़त्म हो गए। बचपन से यहीं हैं। नेपाल कभी-कभी जाते हैं। पत्नी उड़ीसा की है। यहीं मुलाक़ात हुई। बचपन में साथ खेले-कूदे। बड़े हुए शादी हो गई। संवाद की भाषा हिंदी हो गई। नेपाली-उड़िया बिसर गई। उड़ीसा और नेपाल के लोगों का लखनऊ में मिलन की कहानी सुनकर हमको प्रमोद तिवारी का गीत याद आया :
'राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं,
ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं।'
(इस प्यारे गीत का लिंक यह रहा में। सुनिए। बहुत अच्छा लगेगा।)
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंदु शाह के बारे में बात हुई। उसने कहा -'बालेंदु अभी युवा है। नया है। काम कर रहा है। आगे पता चलेगा कैसा करता है।'
बाक़ी कामगारों में एक दो उन्नाव के थे। एक लखीमपुर का। हमने बताया -'लखीमपुर में हमारी ससुराल है।' उसने इसे सूचना की तरह ग्रहण किया। खास इज्जतआफ़ज़ोई नहीं की। हम आगे बढ़ गए।
आगे एक आदमी सड़क के डिवाइडर पर गद्दा, चादर बिछाए नंगे बदन चित्त, सीधा लेटा था। सर और हाथ ऊपर सरेंडरी मुद्रा में। ऐसे जैसे आसमान और बारिश के सामने समर्पण कर दिया हो।
बात की तो वह भी लखीमपुरिया निकला। बोला -'गर्मी लागि रही रहय यही लाने पानी में पहुड़े हन।' (गर्मी लग रही थी इसलिए बारिश के पानी में लेटे हुए हैं)।
आगे मोड़ पर एक कार ड्राइवर एक मोटरसाइकिल के पीछे बैठी सवारी से वाकयुद्ध में उलझा था। शायद बिना इंडीकेटर दिए मुड़ने का मामला था। कार ड्राइवर युवा था। बाइक सवारी बुजुर्ग। चालक युवा था। कार चालक ने बुजुर्ग को धमकाते हुए कहा -' उमर का लिहाज कर रहे हैं वरना बताते।' बुजुर्ग सवारी ने जबाब दिया -'हमने कोई गाली थोड़ी दी है।' कार चालक ने आवाज ऊँची करते हुए कहा -' गाली देते तो जबान नहीं खींच लेते।'
हम दोनों के लगभग बीच खड़े उनके मधुर वार्तालाप को देख-सुन रहे थे। हमने दोनों से शांति स्थापित करने की फ़िज़ूल अपील की। लेकिन उसको नजरअंदाज करते हुए दोनों बहस करते रहे। कुछ देर बाद, शायद वाकयुद्ध से बोर होकर, कार वाला कार स्टार्ट करके आगे बढ़ गया। आगे बढ़ने के पहले उसने अपने मुँह का पान मसाला बहसस्थल पर थूका। ताकि सनद रहे।
घर पहुँचकर हमने गेट के पास खड़े होकर अपना फ़ोटो खिंचवाया। बारिश में भीगने की याद के रूप में। देखिए आप भी। अब शाम को जाएँगे तैरने के लिए। तब तक वीडियो देखेंगे। ऑफ़ पूल अभ्यास करेंगे। ठीक है न?

No comments:

Post a Comment