Monday, February 15, 2010

टुकुर-टुकुर देउरा निहारै बेईमनवा

http://web.archive.org/web/20140421162802/http://hindini.com/fursatiya/archives/1253

32 responses to “टुकुर-टुकुर देउरा निहारै बेईमनवा”

  1. Prashant(PD)
    लोक गीत सुनना हमेशा से ही अच्छा लगता है, सो ये भी बढ़िया लगा.. :)
    कुछ समझ में नहीं आया तो मिनिग भी मिल गया, अब और क्या चाहिए??
  2. anil kant
    [:)]
    अच्छा लगा
  3. वन्दना अवस्थी दुबे
    लोक-गीत किसी भी क्षेत्र-विशेष की पहचान होते हैं. अवधी बोली के लोकगीत तो वैसे भी बहुत लोकप्रिय हैं. यहां इस सुन्दर लोकगीत सुनवा के आपने हमारी जडें याद दिला दीं. बहुत सुन्दर. (वैसे मैने पहले ही सुन लिया था.)
  4. समीर लाल 'उड़न तश्तरी वाले'
    भावार्थ बड़ा मन लगा कर लिखे हैं. :)
    बढ़िया गीत रहा.
  5. संजय अनेजा
    शुक्ला जी, आनंद आ गया। अर्थ साथ देकर हम जैसॊं के लिये आसानी कर दी। आभार।
  6. amrendra nath tripathi
    .
    अति उत्तम ! ! !
    .
    उस दिन प्रदत्त लिंक के अनुसार जब पढ़ा था तभी मन बंध गया था , यहाँ
    तो सभी पक्ष जैसे स्पर्धा कर रहे हों – क्या चित्र , क्या गीत , क्या लोकगीत , क्या
    भावार्थ ,क्या ध्वनित वस्तु , क्या ध्वनन – शैली , क्या मार्मिकता , क्या सहजता ,
    क्या खिलंदडपना-सह-डपटपना(डहपटपना भी) , क्या लोकगीतजन्य बेबाकपना , आदि – आदि ……
    .
    यह चित्रकार भी उतना ही ‘फोक’ में फुका है गोया
    बिरहा-अगिनिया उकेर कर ही मानेगा !
    .
    और आपने जो भावार्थ लिखा है उसपर उड़न – तस्तरी की सही उड़ान
    है कि ”भावार्थ बड़ा मन लगा कर लिखे हैं. ” , यह मजाक
    नहीं है सच्चाई है ! और एक राज की बात यह भी है कि जब इतने छोटे – छोटे
    वाक्य होने लगें तो मान लीजिये भावुकता पैंयाँ – पैंयाँ चल रही है ! अनुभव जैसे
    अपने आदिम रूप में जाना चाह रहे हों … इस लोक – गीत का अभिप्रेत भी तो यही है !
    ऐसा भावार्थ उस अभिप्रेत का सहज-सरल-सजल-सरस साधन है ! इस मनोयोग-पूर्ण
    साधन को प्रणाम !
    .
    लोकगीत के कंटेंट पर बहुत कुछ कहा जा सकता है पर फिर कभी ! … आज इतनी देर तक
    जगता रहा , अब लगता है कि इस अच्छी पोस्ट को पढ़ना बदा था … आभार ,,,
  7. amrendra nath tripathi
    और हाँ !
    ई गौनई तौ कइउ
    बार सुनि डारेन !
    ‘
    फुरै मा …
    जिउ अघाय गा !!!
  8. M Verma
    बहुत भाव विभोर कर देने वाली गीत सुनाने के लिये आभार
    बेहतरीन
  9. हिमांशु
    झट से जोड़ दिया आपने लोक संवेदना से ! अवधी का समृद्ध लोक-पक्ष उजागर हुआ यहाँ ।
    लवकुश जी की आवाज में इसे सुनना तो और भी आनन्ददायी है ।
    चित्र भी शानदार बनवाया है आपने ! चित्र का संप्रेषण जबरदस्त है !
    हर्ष हो आया है बहुत । अवधी-अमरेन्द्र तो आ ही रहे होंगे कलेजे लगाने इस प्रविष्टि को !
  10. Dr.Manoj Mishra
    बेहतरीन पोस्ट ,गीत तो हम सभी के तन-मन में बसा है,प्रस्तुति के लिए आपको बहुत धन्यवाद.
  11. ताऊ लठ्ठवाले
    …. उस नठिया को तो बस टुकुर-टुकुर ताकना है!
    लगता है बेचारे पर होली चढ्गई है.:)
    रामराम.
  12. ज्ञानदत पाण्डेय
    यह गाना बज नहीं रहा है। सो कितना टुकुर टुकुर ताकें!
    हमेशा की तरह उम्दा पोस्ट।
  13. विवेक सिंह
    सुन्दर ।
  14. Saagar
    यहाँ तो फाग रंग चढ़ा है… वैसे टेस्ट अच्छा है…. “जोगी जी धीरे -धीरे” वाला… यह फ्लेवर जरुरी था इस बसंत में.
  15. Ranjana
    उफ्फफ्फ्फ़ क्या कहूँ…..
    गीत ने तो मन बाँध ही लिया,पर उसकी जो विवेचना की है आपने….वाह !!!
    सचमुच यह गीत केवल चित्ताकर्षक ही नहीं बल्कि ग्रामीण परिवेश में परिवार के मध्य स्थित नारी की स्थिति भी बखूबी बयां करती है…
    “तोरे संग देउरा मनइहौं फगुनवा,
    मनइहौं फगुनवा,
    जइसै वीरनवा मनावैं सवनवां,
    भौजी तोरी मइया तू मोरो ललनवा,
    टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा| ”
    शील का जिस प्रकार से संवहन किया गया है इनमे…ओह्ह्ह !!! कमाल का है…
    लाजवाब पोस्ट है…लाजवाब…आपका बहुत बहुत आभार इस अद्भुद पोस्ट के लिए…कुछ न कहते हुए भी इस एक गीत के बहाने कितना कुछ कह दिया आपने…
  16. purushottam rana
    bahut he acha laga man karta hai chu lu un pao ko jo hame gyan ke sath sath sahi raste pe chalne ke prerna deta haimouka mele to es no par ek misscal jarur mareye aapse baat kar ke mujhe bahut hr khushi milega thanks …………….09804832572
  17. Abhishek
    बढ़िया !
  18. कार्तिकेय मिश्र
    लाजवाब.. देवर भाभी के आध सूत नाजुक रिश्ते को बहुत नये ढंग से छूती है आपकी यह पोस्ट!
    अबतक इस तरह के रिश्तों में हँसी ठिठोली ही मूल भाव उभर कर आता था, लेकिन इस पोस्ट से भौजाई की संशय में पड़ी मनोवृत्ति बड़े मुखर ढंग से सामने आई है..
    अवधी-भोजपुरी क्षेत्र में पला बढ़ा होने के बावजूद इस मनोविज्ञान पर आज तक गौर नहीं किया… अजीब बात है।
  19. कार्तिकेय मिश्र
    वैसे एक बात बताइये, ई देवर-भौजाई की ठिठोली काहे सूझ रही है,, फागुन का ही असर है या कोई और बात है..?
    ऑफ द रेकार्ड ही सही..
  20. jyotisingh
    shirshak ne hi man moh liya ,jahan aagaz hi itna khoobsurat hai aage kahne ki jaroort hi nahi mahsoos hui ,aapki kalam ki roshni to adbhut hai .
  21. Dipak Chaurasiya 'Mashal'
    किस किस बात की तारीफ करुँ??? माकूल चित्र की, कमाल के लोकगीत की या फिर उसके खूबसूरत निर्वहन की?
    तीनों ने मिलकर इसे एक महत्वपूर्ण पोस्ट बना दिया.. आभार इसे चर्चा में रखने पर..
    जय हिंद… जय बुंदेलखंड…
  22. काजल कुमार
    रचनात्मकता जटिल व दुरूह तो है किंतु है प्रकृति-प्रदत्त. और इस क्षेत्र में प्रकृति अत्यंत कृपण है. अनूप जी, दुखियों (अधिकांश) की इस ब्लागबस्ती में कुछ ही ब्लाग हैं जहां आकर मन वास्तव में ही प्रसन्न होता है.
  23. Alpana
    लवकुश दीक्षित का लिखा/गाया गीत बहुत ही बढ़िया लगा .
    लोक गीत सुनने का अपना ही आनंद है.
    बहुत ही सुंदर!आभार.
  24. Manish Kumar
    शुक्रिया इस लोकगीत को यहाँ साझा करने के लिए।
  25. बवाल
    तोरे संग देउरा मनइहौं फगुनवा,
    मनइहौं फगुनवा,
    जइसै वीरनवा मनावैं सवनवां,
    भौजी तोरी मइया तू मोरो ललनवा,
    टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा|
    बहुत ही वास्तविक और जीवंत यथार्थ का परिचय देती इस पोस्ट की एक एक विषय वस्तु। फ़ुरसतिया जी,
    बस इसीलिए लोग आपके मुरीद हुआ करते हैं।
    सुन्दर अति सुन्दर ! होली पर इससे आला बात नहीं कही जा सकती।
  26. गौतम राजरिशी
    हमारे मिथिलांचल में भी खूब मैथिली गीत हैं इस विषय-वस्तु पर। मेरे ख्याल से इस भाभी-देवर के रिश्ते पर यूपी और बिहार में सर्वाधिक लोक-गीत लिखे गये हैं।
    पिछले पोस्ट जो छूट गये थे पढ़ने जा रहा हूँ अब…
  27. Dr.Danda Lakhnavi
    इस लोक गीत को मंचों पर श्री लवकुश लवकुश दीक्षित से अनेक बार सुना ……..इसे जितनी बार सुनो आनन्द बढाता है। होली की बधाई……इस अवसर पर प्रकृति भी उल्लास से सराबोर है…..उसका एक रूप एक रचना आपको नज़रानाए अकीदत …………डॉ० डंडा लखनवी !
    नेचर का देखो फैशन शो
    -डॉ० डंडा लखनवी
    क्या फागुन की फगुनाई है।
    हर तरफ प्रकृति बौराई है।।
    संपूर्ण में सृष्टि मादकता -
    हो रही फिरी सप्लाई है।।1
    धरती पर नूतन वर्दी है।
    ख़ामोश हो गई सर्दी है।।
    भौरों की देखो खाट खाड़ी-
    कलियों में गुण्डागर्दी है।।2
    एनीमल करते ताक -झाक।
    चल रहा वनों में कैटवाक।।
    नेचर का देखो फैशन शो-
    माडलिंग कर रहे हैं पिकाक।।3
    मनहूसी मटियामेट लगे।
    खच्चर भी अपटूडेट लगे।।
    फागुन में काला कौआ भी-
    सीनियर एडवोकेट लगे।।4
    इस जेन्टिलमेन से आप मिलो।
    एक ही टाँग पर जाता सो ।।
    पहने रहता है धवल कोट-
    ये बगुला या सी0एम0ओ0।।5
    इस ऋतु में नित चैराहों पर।
    पैंनाता सीघों को आकर।।
    उसको मत कहिए साँड आप-
    फागुन में वही पुलिस अफसर।।6
    गालों में भरे गिलौरे हैं।
    पड़ते इन पर ‘लव’ दौरे हैं।।
    देखो तो इनका उभय रूप-
    छिन में कवि, छिन में भौंरे हैं।।7
    जय हो कविता कालिंदी की।
    जय रंग-रंगीली बिंदी की।।
    मेकॅप में वाह तितलियाँ भी-
    लगतीं कवयित्री हिंदी की।8
    वो साड़ी में थी हरी – हरी।
    रसभरी रसों से भरी- भरी।।
    नैनों से डाका डाल गई-
    बंदूक दग गई धरी – धरी।।9
    ये मौसम की अंगड़ाई है।
    मक्खी तक बटरफलाई है ।।
    धोषणा कर रहे गधे भी सुनो-
    इंसान हमारा भाई है।।10
    सचलभाष-0936069753
  28. बेचैन आत्मा
    …टुकुरु-टकुरु देउरा निहारै बेइमनवा।
    वाह! आपके ब्लॉग पर तो अनमोल खजाने हैं .
  29. RAJ SINH
    क्या बात है अनूप जी ! न जाने ये पोस्ट कैसे छूट गयी थी .देर से आये ………..टुकुर टुकुर निहारते :) .
  30. roop
    बहुत प्रभावी रचना है , अब जाकर पढ़ा . और गायन तो और भी सुस्वादु… वाह ..क्या कहना ! …
  31. Anonymous
    क्या कहू आपके लेखो का, मैं तो दीवाना हूँ तो सिर्फ आपकी कविताओ का |
    मैं तो सलाम करता हु आपके इस दिमाग को की कैसे करते हैं ये अद्भुत रचना
    मैं तो दीवाना हूँ तो सिर्फ आपकी कविताओ का || ;-)
  32. राजकिशोर
    बहुत बढ़िया भईय्या…मजा आ गया…पढ़ने से ज्यादा आनंद सुनने में आया…

Sunday, January 31, 2010

…अथ कोलकता मिलन कथा

http://web.archive.org/web/20110925234515/http://hindini.com/fursatiya/archives/1227

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

26 responses to “…अथ कोलकता मिलन कथा”

  1. सतीश पंचम
    बहुत ही धांसू फांसू और हांसू पोस्ट है। हिंदी और अंग्रेजी पर समान अधिकार…….. चौकीदार द्वारा पांच इडियट पकड कर रखना…… गजब का ह्यूमर है जी ।
  2. Prashant(PD)
    1. एक बातें नोट कर ली हमने.. अबकी बार कलकत्ता जाओ तो शिव भैया से रसगुल्ले की उम्मीद करो.. पिछली बार तो बस भौजी के हाथ का खाना खाकर ही सलटा लिये थे.. :D
    2. कंचन दीदी का गला तो हमेशा ही खराब रहता है.. वैसे भी वो मुझे नया नाम दे चुकी हैं, और उसी के मुताबिक मुझे कोस रही होंगी कि, “ये नौस्टैल्जिया को एक काम दिये थे वो भी भूल गया..” कौन सा काम? यह जानने के लिये उन्ही से संपर्क करें.. :)
    3. कलकत्ता में कुछ खास बात है क्या? कोट-वोट पहिन कर गये थे? चेन्नई में तो ऐसे नहीं आये थे? लगता है आंटी जी(आपकी मिसेज) से बात करना जरूरी हो गया है.. :P
  3. Manoj Kumar
    इस विस्तार से की गई चर्चा के लिये आभार। ऐसा लगा मानों फिर से वह शाम सजीव हो उठी।
    पर शिव कुमार जी द्वारा पानी पिला-पिला कर किये गये स्वागत को आप कैसे भूल सकते हैं?
  4. अर्कजेश
    क्‍या खूब लिखे हैं । मजा आ गया पढकर । स्‍टाइल है ….
  5. समीर लाल
    बढ़िया रहा कलकत्ता मिलन बाँचना.
  6. Vivek Rastogi
    एक दम धांसू लिखे हैं, इस ब्लॉगर मिलने की बातें
  7. Dr.Manoj Mishra
    बढ़िया शैली में लिखी है यह पोस्ट ,प्रशंसनीय..
  8. Shiv Kumar Mishra
    बहुत गजब लेखन.
    सही कह रहे हैं. अभी तक महाकाव्य नहीं तो खंड-काव्य तो निकाल ही लेना चाहिए था. पीड़ा और दुख शायद यह सोचते हुए टिके हुए हैं कि “कुछ न कुछ तो लिखेगा ही.” पीड़ा की आशंका में दो-चार पोस्ट निकल आती हैं, सच की पीड़ा में तो न जाने क्या-क्या निकाला जा सकता है….:-) वैसे पढ़कर लगा जैसे हमें आपने केवल १०१ रूपये के निजी मुचलके पर छोड़ दिया…..:-)
  9. Sanjeet Tripathi
    blog jagat par kuchh hi logo ki lekhan shailee aisi hai jise padhkar irshya hoti hai, aapne unme se ek hain ;)
  10. संजय बेंगाणी
    इस पोस्ट एक संक्षिप्त वर्जन भी लिखना चाहिए.
    सभी फोटो ध्यान से देखे, दूर्योधन की डायरी कहाँ छिपा कर रखी जा सकती है, यह निरिक्षण करते रहे.
    अंग्रेजी हमसे ज्यादा किसी की कमजोर हो ही नहीं सकती, अपना नाम तक रोमन में नहीं लिख सकते.
    आप हंस लिये, हँसा दिये…बहुत पुण्य का काम किया :)
  11. वन्दना अवस्थी दुबे
    चकाचक चर्चा….यात्रा कथा. शिवकुमार जी की इतनी मौज ले ली है न आपने, कि अब अगली बार जाइये कोलकता, तब समझ में आयेगा, जब न रसगुल्ले मिलेंगे न ढोकला. चाय तो अभी ही………….
  12. मसिजीवी
    बहुत से ब्‍लॉगरों के बारे में बातें की हर जगह सर्वनाम का इस्‍तेमाल कर आगे चल दिए हैं जबकि कायदे से संज्ञा का इस्‍तेमाल होना चाहिए था कुछ और मजा आता।
    चाय की सतत अवनति की कथा बेहद मनोरंजक रही।
  13. कुश भाई 'जयपुर वाले'
    पी डी की बात गौर करने वाली है.. कोट पहन के तो जयपुर भी नहीं आये थे आप.. कलकत्ते में क्या चक्कर है.. ?
  14. dr anurag
    शुक्र है इस विजिट …..लाल स्वेटर साथ लेकर नहीं गये…..इन दिनों ब्लोगिंग बड़ी खतरनाक हो गयी है ..फेशन सरीखी …जिस शहर जायो …फोन घुमा दो…नाश्ते पानी का इंतजाम मुफ्त…. वैसे भी इतने बिलोगर सम्मलेन हो गये है के कई लोग तो सम्मलेन स्पेशलिस्ट हो गये है ….सुनते है एक भाई साहब ने तो चुटकुले सुना सुना कर बिलोगिंग की छह सौ पोस्ट एक महीने में लिख डाली ….हर आधे घंटे में एक चुटकुला छोड़ देते थे ….फ़िलहाल शाल खरीद रहे थे के भाई पुरूस्कार इसे पहनकर लूँगा …तभी तो पोस्ट लगेगी….हमने पूछा कौन दे रहा है .बोले बिरादरी के लोग कह रहे है तुमने नाम रोशन किया है हमारा …बिरादरी के पहले बिलोगर जो हो…….खैर कई मजेदार फटके है इस पोस्ट में …….
    1)जब बाहर हो तो फ़ोन करने का जी बहुत हुड़कता है। उनको भी फ़ोनिया लेते हैं जिनके नम्बर पास नहीं होते।
    2)लेकिन छत भी अनामी ब्लॉगर सरीखी बेशरम चुपचाप तमाशा देखती रही। यह लिख चुकने के बाद मन बोला- भैये, छत को अनामी मत लिख! तटस्थ लिख! अनामी उखड़ जायेगा उसको तुमने बेशरम लिख दिया!। सो पूरी बात फ़िर से–छत भी तटस्थ ब्लॉगर की तरह चुपचाप तमाशा देखती रही! उसको इस बात की कौनौ चिन्ता फ़िकिर नहीं थी कि कोई उसके अपराध लिखेगा-कभी।
    3)जिन लोगों ने कभी एक-दूसरे को देखा नहीं वे जरा-जरा से मुद्दे पर दूसरे को देख लेने की धमकी दे देते हैं। लोग धमकियां ऐसे देते हैं जैसे ब्लॉगर मीट के लिये अदालत में बुला रहे हैं।
  15. dr anurag
    ओर हाँ कंचन की बात पर गौर फरमाये ….इधर एक्टिंग स्कूल के लोग आपसे बहुतो आगे निकल रहे है ……
  16. shefali pande
    bahut aanand aaya ….post bahut dhaansu hai….milne a silsila banae rakhen……
  17. anitakumar
    :) पहले तो हम अपने कुछ मित्रों का समर्थन कर रहे हैं। हम भी संजीत की तरह ईर्ष्या कर रहे हैं इस शैली पर और हम भी जानना चाह्ते हैं जी ये कलकत्ता में ऐसी क्या खास बात थी कि आप अपना मनपसंद लाल स्वेटर तक तज दिये और कोट चढ़ा लिये।
    पी डी की आंटी के लिए कोई शॉपिंग वापिंग वगैरह नहीं किए, घर में घुसने कैसे दिया गया?
    शिव भाई के जल्द स्वस्थ होने की कामना करते हैं।
    साहित्य विमर्श भी बड़िया रहा। मनोज जी के बारे में जानना भी सुखद रहा। वैसे आप के दफ़्तर के कितने लोग ब्लोगरस हैं?
  18. हिमांशु
    संजय जी का कहना सही है, इसका संक्षिप्त वर्जन भी लिखना चाहिये ! शुरुआत में ही फ्लैट कर दिया आपने, जब यह समीकरण दिया – “शायद यात्रा की बोरियत जम्हुआई लेते समय खुले मुंह की समानुपाती होती हो।”
    शानदार !
  19. sushila puri
    अनूप जी तुसी ग्रेट हो !!!!!!!! कलकत्ते जाकर तो आपने कमाल कर दिया , कलकत्ता शहर धन्य हुआ आपके चरण -रज से …., आपकी इतनी सुखद यात्रा को सुनकर हम कुंए के मेढकों को भी उछलने का मन करने लगा .
  20. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI
    ,,,,हम भी समझ नहीं ना पा रहे स्वेटर (अरे ! वही इंटहा कलर का) छोड़ कोट-फोट में कैसे ?
    पर जो भी बड़े झकास लग रहें हैं !!
  21. amit
    बढ़िया चकाचक तरीके से बाँच दिए, पर फोटू नज़र नहीं आ रहे, जो स्लाईडशो लगाए हैं ऊ लगता है अब उधर नहीं है जहाँ पहले था!! फ्लिकर पर आपका खाता तो है ही, फोटू उधर चढ़ा के इधर चस्पा दीजिए! :)
  22. ज्ञानदत्त पाण्डेय
    किसी ब्लॉगर की अंग्रेजी कमजोर कमजोर होने की बात चली तो हमने कहा कि बात केवल अंग्रेजी की नहीं है। उनका अंग्रेजी और हिन्दी पर समान अधिकार है। इस सच को सुनते ही न जाने क्यों सब हंसने लगे।
    —————–
    अच्छा, हमारी खिल्ली उड़ाई गई! :-)
  23. Abhishek Ojha
    अनुरागजी द्वारा लिस्टेड पॉइंटस में सुमुखी की जम्हाई का समानुपाती सिद्धांत भी जोड़ लिया जाय :)
  24. मृगांक
    कहाँ कहाँ मौज लेते रहते हो बंधू ?कभी meerut का भी प्रोग्राम बनाओ
  25. kanchan
    aaj nikale hai sair par to idhar bhi aa gaye…hamari burai…???? dekh lungi.
    @PD beta ab gala bhi achchha ho gaya aur kaam bhi ho gaya….!
  26. गौतम राजरिशी
    इस पोस्ट का डा० साब से इतना तारीफ़ सुने कि पूछिये मत। पढ़ने का मौका आज मिला है। सचे में…नहीं पढ़ते तो कुछ बहुत ही “अजबे-सा” छूट जाता।
    “बहुत बढ़िया” लिखना तनिक बोरिंग-सा हो गया है आपके ब्लौग पर कि हर पोस्ट ही तो बहुते बढ़िया होता है।
    परसाई, चतुर्वेदी सबे आप हैं इस हिंदी ब्लौग-जगत के…”शुक्ल” का जिक्र नहीं कर रहे हैं कि ऊ तो खुदे ले रखे हैं अपने नाम में।
    “छत की तटस्थता” वाला जुमला…आहहा…लाजवाब है।