[आज कुछ नया लिखने की सोच रहे थे। फ़िर
यह लेख
याद आ गया। सोचा आज इसे ही फ़िर से पोस्ट किया जाये। दुबारा। आदतन शुरू में
ब्लॉगिंग की बातें हर पोस्ट में लिखते थे। सो इसमें भी बाद में आ गयी हैं।
अब वे गैर जरूरी लगती हैं। एक तिहाई हिस्सा गैरजरूरी हो गया। इससे पहले कि
यह लेख गैरजरूरी हो जाये सोचा इसे फ़िर से ठेल दिया जाये । गांधी और
शास्त्री जी को याद करते हुये। विनम्र श्रद्धा के साथ। :)]

विष्णुजी
छीरसागर में शेषशैया पर ऊंघ रहे थे। शेषनाग भी जम्हुआई ले रहे थे। अचानक
किसी लहर को ठिठोली सूझी वह झटके से शेषनाग के ऊपर लस्टम-पस्टम होते हुये
विष्णुजी से जा लगी। विष्णुजी चिहुंककर जाग गये। लहरस्पर्श का सुख दबाते
हुये गीले पीताम्बर के साथ गंभीरता का चोला लपेट लिया। शेषनाग ने मुस्तैदी
के साथ कमांडो वाले अंदाज में फुफकार कर सारा पानी फिर क्षीरसागर में डाल
दिया।
सब कुछ जैसे का तैसा हो गया। सिर्फ लहर के साथ विष्णु जी की नींद परिदृश्य से ओसामा बिन लादेन बन कर गायब हो गयी थी।
जैसा कि होता है सब कुछ सामान्य हो जाने के बाद खतरे का अलार्म घनघना
उठा। तमाम अन्य लोगों के साथ नारदजी लदफद करते हुये घटना स्थल पर नमूदार
हुये।
विष्णुजी ने सबको बताया कि लफड़ा क्या हुआ था। यह भी कि अब लहरें तक
शरारत करने लगीं हैं। उनके चेहरे की गंभीरता से मुस्कान झांक रही थी।
मुस्कान विशेषज्ञों का कहना था
कि मुस्कान से शरारत खरोंच कर उसमें गरिमा का लेप लिया किया गया था।
बाद में मुझसे अपने तक ही सीमित रखने का वायदा लेकर नारदजी ने बताया कि
वह लहर और कोई नहीं कृष्णावतार के समय की यमुना की लहर थी जो यमुना के साथ
बहते हुये सागर में आ मिली। यहां क्षीरसागर में जब भी विष्णुजी को अकेला
पाती है,उनको चौंकाने के लिये चुहुलबाजी कर देती है। विष्णुजी को भी मजा
आता है । उनके कृष्णावतार के बचपने की याद आ जाती है। तमाम सारी शरारतें
याद आ जातीं है तो मन तरोताजा हो जाता है।विष्णुजी के चेहरे पर
अलौलिक,दिव्य, मोहिनी मुस्कान का भी यही राज है।
कुछ मुंह लगे छुटभैये देवताओं ने कहा -महाराज इस मामले की तो जांच होनी
चाहिये। वो तो कहो कि आप जागते हुये सो रहे थे,शेषनाग भी साथ में थे वर्ना
कोई कुछ भी आरोप लगा सकता था। कि विष्णुजी लहर के साथ रंगरेलियां मना रहे
थे।
हां साहब ,ये सही कह रहे हैं। एक दूसरा नया देवता उवाचा। एक-एक स्टिंग
आपरेशन से पल्ला छुड़ाने में,निपटाने में कभी-कभी पूरा साल निकल जाता है।
पहले विपक्षी दलों की शरारत बताओ,फिर देश को कमजोर करने वाली ताकतों की
साजिस बताओ फिर दुनिया भर की कसमें खाओ, पार्टी की मजबूती के इस्तीफा देने
का नाटक करो,समर्थकों से शांति बनाये रखने की अपील करो, खुद को पार्टी का
अनुशासित सेवक बताओ, देश की न्याय व्यवस्था पर भरोसा जताओ, जज को पटाओ ,
पत्रकारों से कुछ पक्ष में लिखवाओ ,काउंटर स्टिंग आपरेशन करवाओ। तब कहीं
साला एक स्टिंग आपरेशन निपट पाता है। बड़ा बवाल है,कचूमर निकल जाता है।
चुनाव का समय हुआ तो भइया गई भैंस पानी में । एक पंचवर्षीय योजना का सारा
माल पंचतत्व में विलीन हो जाता है।
विष्णुजी ने इस तरह का ज्ञानोपदेश बहुत दिन बाद सुना था। देवता चेहरा भी नया था सो पलकों पर
‘आपकी तारीफ’! का इस्तहार चिपकाया।
देवता ने गला खखारकर अपना परिचय देना शुरू किया। उसने तमाम झूठ अपने
बारे में बोलने का प्रयास किया लेकिन उसे आश्चर्य हुआ कि उसका झूठ बोलने
वाला साफ्टवेयर काम ही नहीं कर रहा था।
उसने मोबाइल पर अपने पीए को फोन मिलाया तो मोबाइल से आवाज आ रही थी -
क्षमा करें आप जिनसे सम्पर्क करना चाहते हैं उनसे फिलहाल बातचीत सम्भव नहीं है।
नवदेवता ने एक बार फिर मोबाइल सेवा प्रदान करने वाली कम्पनी को कोसने के
लिये मन में समुचित भाव पैदा किये । इतने मेहनत मात्र से उसके माथे पर
पसीना चुहचुहा आया।
विष्णुजी ने अपने ‘
अन्तरयामी ‘वाले साफ्टवेयर से देवता
की परेशानी भांप ली। बोले- आपके देश की संसद की तर्ज पर यहां मोबाइल जैमर
लगे हुये हैं। इसके अलावा यहां एक नया साफ्टवेयर भी लगाया गया है जिसके
कारण कोई भी यहां झूठ नहीं बोल सकता है। चूंकि अभी गारंटी पीरियड में है
इसलिये यह साफ्टवेयर काम भी कर रहा है। इसीलिये तुम झूठ बोलने के प्रयास
में सफल नहीं हो पा रहे हो । इसीलिये तुम्हारे माथे पर पसीना आ रहा है।
विष्णु जी ने बोलना जारी रखा- हम पसीने से परहेज करते हैं क्योंकि पसीना
मेहनत का प्रचार करता है। यहां स्वर्ग में मेहनत मेहनत की भावना का प्रवेश
वर्जित है लिहाजा पसीना यहां की आचार संहिता के खिलाफ है। तुम अभी नये हो
इसलिये शायद यहां के तौर-तरीके मालूम नहीं होंगे आशा है जल्द ही सीख जाओगे।
फिलहाल निस्संकोच अपना परिचय दो। हम सुनने के लिये बेताब हैं।
देवता धरती से अपने कर्मों के चढ़ावे और जुगाड़ की लिफ्ट पर चढ़कर
नया-नया स्वर्ग में आया था। जितने सतकर्म उसने किये थे उससे ज्यादा उसने
कुकर्म किये थे। लेकिन चित्रगुप्त के आफिस में तैतान बाबू को ले-देकर उसने
अपने कुकर्मों की पासबुक गायब करा दी थी। उसका स्वर्गारोहण यह तरीका बहुत
प्रचलित हो गया था तथा स्वर्ग की जनसंख्या प्रगति की दर भारत की जन संख्या
प्रगति की दर को पीछे छोड़ रही थी।
देवता जानता था कि स्वर्ग भी भारत देश की संसद की तरह है जहां एक बार
पहुंच जाने पर बड़े से बड़ा अपराधी तमाम आरोपों के बावजूद कार्यकाल पूरा
होने के पहले निकाला नहीं जाता । अपनी स्वर्गारोहण एजेंसी की धाक का ध्यान
करते हुये तथा विष्णुजी के निस्संकोच बोलने की बात का ध्यान करते हुये सारा
सच बयान कर दिया।
यह घपला सुनते ही सारी सभा शर्म-शर्म चिल्लाने लगी। सारी बातें सुन लेने
के बाद विष्णुजी ने अपने कानों पर हाथ रख लिये। पहले तो उनके मन में विचार
आया कि चित्रगुप्त के आफिस के बाबू को तुरंत निलंबित कर दें लेकिन उजड्ड
बाबू यूनियन के कारण वहां पर होने वाले संभावित बवाल को सोचते हुये
उन्होंने अपना इरादा त्याग दिया।
सारी सभा की निगाहें विष्णुजी के चेहरे पर लगीं थीं। विष्णुजी को कुछ
समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। फिर अचानक उन्हें याद आया कि जब समस्या का
कोई हल समझ में नहीं आता तब वार्ता की जाती है। उन्होंने केबीसी वाले
अमिताभ बच्चन वाले अंदाज में कहा -
गांधी जी से बात कराओ।
आपरेटर ने फोन लगा के दे दिया। उधर टेप बज रहा था-
मैडम तो चुनाव में बिजी हैं। चुनाव आचार संहिता के कारण फिलहाल किसी से बात करने में असमर्थ हैं।
विष्णुजी झल्लाये -ये फोन अमेरिका लगा दिये क्या जो टेप बज रहा है।
गांधी जी अमेरिका में कब से रहने लगे? वो क्या कोई कम्प्यूटर इंजीनियर
हैं?ये मैडम कौन हैं ? यार ये कहां लगा दिया फोन?
इसके बाद विष्णुजी किसी नये एनआरआई की तरह अपने ज्ञान का मुजाहिरा करने
से बाज नहीं आये कि अमेरिका में लोग फोन पर अपना संदेश छोड़कर सप्ताहांत
में इसके उसके घर फुट्टफैरी करते रहते हैं।
आपरेटर ने चेहरे पर काम भर की घबराहट तथा काम भर की विनम्रता का लेप
लगाते हुये आत्मविश्वास की चासनी में लपेट कर कहा-महाराज आपने गांधीजी बात
कराने को कहा। मैंने सोनिया गांधी जी से बात कराने के लिये फोन मिलाया।
क्या आप प्रियंका गांधी से बात करना चाहते हैं या राहुल गांधी से? दोनों
अभी तो चुनाव दौरे पर होंगे । किसी बैलगाड़ी में बैठे फोटो खिंचा रहे
होंगे।उनका भी मोबाइल नहीं है मेरे पास।
विष्णुजी ने अपने चेहरे पर याहू का गुस्से वाला आइकन चिपकाया।बोले -यार
कैसी बातें करते हो? गांधीजी को नहीं जानते ? गांधीजी मतलब महात्मा गांधी।
मोहनदास करम गांधी-लंगोटी वाले,गुजराती। गुजरात जहां सड़क साफ करने के लिये
मंदिर,मस्जिद तथा अब तो आदमी भी साफ कर दिये गये।अखबार नहीं पढ़ते क्या?
आपरेटर ने अपनी विनम्रता तहाकर अलग रख दी। झुंझलाते हुये बोला-महाराज,
गांधीजी को कहां अब कोई पूछता है? आपका भी पुराना रिकार्ड साल में दो फोन
का रहा है। २ अक्टूबर को तथा दूसरा ३० जनवरी को। इसके अलावा तो कभी बात
नहीं होती। इसीलिये मैं समझ नहीं पाया। खैर, ये लीजिये गांधीजी के यहां
घंटी जा रही हैं।
विष्णुजी ने कहा- ठीक है जरा वीडियो कान्फ्रेंसिंग भी कराओ। हम देखते
हुये बात करना चाहते हैं महात्मा जी से। बहुत दिन से देखा नहीं महात्माजी
को!
आपरेटर ने वीडियोकान्फ्रेंसिंग के लिये कनेक्शन किया तो पहले तो स्कीन
पर लहरें दिखती रहीं। सारे बटन दबाने के बावजूद जब लहरों का अतिक्रमण नहीं
हटा तो आपरेटर ने सिस्टम सप्लाई करने वाली कंपनी को कोसते हुये स्क्रीन को
तीन-चार बार ठोंका तो एकाएक स्क्रीन पर तस्वीर सी नजर आने लगी।
बिना ठोंके साला आजकल कोई काम नहीं करता -आपरेटर ने तस्वीर की सेटिंग ठीक करते हुये कहा।
सेटिंग ठीक होने पर दिखाई दिया कि स्वर्ग तथा नरक के बीच ‘नो मैंन्स
लैंड’ में हजारों -लाखों लोगों की भीड़ जमा थी। उधर एक संवाददाता माइक लिये
बोल रहा था-
ये जो आप लाखों लोगों की भीड़ देख रहे हैं ये वे लोग हैं जिनके स्वर्ग या नर्क में जाने का निपटारा होना अभी बाकी है।
लगभग सभी लोगों ने अदालतों में स्टे ले रखा रखा है। गर्मी की छुट्टियों
में सारे जज या तो हिलस्टेशनों में चले गये हैं या उनके दिमाग में
हिलस्टेशन उग आये हैं लिहाजा सारी अदालतों में कार्यवाही भारत देश के विकास
की तरह धीमी पड़ गयी है। अधिकतर लोगों की शिकायत है उनकों उनके कर्मों के
मुताबिक जगह नहीं मिली। जितने लोग हैं उतनी तरह की शिकायतें हैं:-
-कुछ लोगों का कहना है कि धरती से जिस बोरे में उनकी आत्मा
पैक करके आई थी वह रास्ते में फट गया लिहाजा उनके सत्कर्म खो गये।ट्रेवेल
एजेंसी का ठेका चूंकि यमराज करते हैं लिहाजा वे यमराज को दोष देते हुये
स्वर्ग में जगह मांग रहे हैं।
- कुछ लोग अपने हिसाब में गड़बड़ी की शिकायत कर रहे हैं। उनका कहना है
कि उनके पाप बढ़ा-चढ़ा कर तथा पुण्य काट-छांट कर चढ़ाये गये हैं। अपनी बात
के प्रमाण में वे अपने चार्टेड एकाउंटेट द्वारा बनाई तथा सत्यापित बैलेंस
सीट दिखा रहे हैं।
-कुछ लोग स्वर्ग में मिलने वाली सुविधाओं से नाखुश हैं। वे कह रहे हैं
कि इससे ज्यादा सुविधायें तो उन्हें धरती पर थीं। वे धरती पर वापस जाने के
लिये परेशान हैं लेकिन यमराज के कार्यालय से उन्हें बताया गया कि उनकी
सांसे पूरी हो चुकीं हैं । वे अब वापस नहीं भेजे जा सकते हैं।इनमें से कुछ
लोगों ने धरती की तमाम गरीब आत्माओं से उनकी सांसे खरीद ली हैं तथा वापस
धरती पर जाने के लिये यमराज दूत तथा दरबान को पटाने के लिये अपने दलालों को
लगा दिया है।
-कुछ लोग गलती से यहां आ गये हैं। उनको वापस भेजने की व्यवस्था की जा
रही है। लेकिन उनका कहना है कि अब वे वहां जाकर करेंगे क्या? उनके मुर्दे
जलाये जा चुके हैं। वे रहेंगे कहां? कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि तमाम लोगों
के शरीर में पचास तरह की आत्मायें रहती हैं। उनके शरीर रिटायरिंग रूम की
तरह होंते हैं। ऐसे ही किसी शरीर में रह लेना कुछ दिन लेकिन आत्मायें अपना
हक मांग रही हैं।
-कुछ आत्मायें कह रही हैं कि उनके साथ उनके पाप-पुण्य तो आ गये लेकिन
उनका ग्रीन कार्ड नहीं आ पाया। वे कह रहे हैं कि मेहनत तथा अनुशासन से
अर्जित किया गया उनका ग्रीनकार्ड उन्हें वापस किया जाय। ताकि अगले जन्म में
जब पैदा होने की बारी आये तो किसी अमेरिकी कोख में जुगाड़ लगे। मेहनत से
सीखी अंग्रेजी भी काम आ जायेगी। ऐसे लोगों को देवदूत देवभाषा में समझाने का
प्रयास कर रहे हैं कि यहां पाप-पुण्य के अलावा कोई करेंसी कोई जुगाड़ नहीं
काम करता । लेकिन वे मान नहीं रहें हैं। तूफानी अंग्रेजी में आंखे
गोलियाते,चौड़ियाते हुये कह रहे हैं- व्हाट आर यू टेलिंग? डालर एंड
ग्रीनकार्ड आर नाट वैलीड हेयर! अगर कहीं बुश को पता चल गया तो एज यूजुअल
,ही विल अटैक हेयर,विदाउट थिंकिंग अबाउट एनीथिंग!
बहरहाल ये तो थीं कुछ झलकियां नो मैंस लैंड में लाखों की तारीख में धरना
दे रहे लोगों की। अब आपको हम ले चलते हैं नो मैन्स लैंड के पास ही स्थित
गांधी जी की कुटिया की तरफ। ये देखिये स्क्रीन पर आपको दिख रहे हैं महात्मा
गांधी के निजी सचिव महादेव देसाई जी। महात्मा गांधी कुटिया में कोने में
लेटे हुये हैं। बाहर उनकी बकरी बंधी है। कस्तूरबा गांधी जी महात्माजी के
तलुओं में मालिश कर रही हैं।
महात्मा गांधी जब आये थे तो उन्होंने अपना चरखा साथ में लाने के लिये
बहुत प्रयास किये। लेकिन प्रयास में सफल नहीं हो पाये। लेकिन महात्मा गांधी
ने हार नहीं मानी। अपने स्वदेशी तथा स्वाबलंबन को यहां स्थापित कर के
दिखाया। यहां के तमाम खराब पड़े कंप्यूटरों की बोर्ड निकालकर चर्खे का बेस
बनाया। उसके ऊपर कूड़े में पड़ी बेकार सीडी लगाकर चरखे के पहिये बनाये तथा
बेकार पड़े कैसेट का टेप निकाल कर चरखे की डोर बना ली। चरखे के हैंडिलकी
जगह पैन ड्राइव को लगा दिया। अब जगह -जगह गांधीजी के चरखे ,कम्प्यूटर के
कबाड़ से बने चरखे, चल रहे हैं। स्वर्ग में अब लोग किसी पीसी के खराब होने
पर कहते हैं-
अपना पीसी चरखा बन गया है।
बहरहाल जब सारा दृश्य विष्णुजी के सामने साफ नजर आने लगा तो उन्होंने महादेव देसाई से कहा -
महादेवजी आपको मेरी आवाज सुनाई दे रही है।
महादेव देसाई ने मौज लेते हुये मुस्कराकर जवाब दिया-
हां महाराज सुनाई दे रही है। हमारे कान कोई न्याय व्यस्था तो हैं नहीं जो सुनाई न दे।
विष्णुजी फिलहाल मौज मे मूड में नहीं थे-बोले महात्माजी से बात कराइये। वे कैसे हैं। उनके क्या हालचाल हैं?
महादेवजी बोले- हाल तो उनके दिव्य हैं लेकिन वे फिलहाल बात नहीं कर सकते। मौनव्रत धारण किये हैं।
मौन व्रत की बात पर विष्णुजी का भुनभुनाने का मन किया लेकिन वीडियो
कान्फ्रेंसिंग का ख्याल करके चेहरे पर चिंता लपेटते हुये बोले- किसलिये
मौनव्रत धारण किया है महात्मा जी ने? किस बात से दुखी हैं? क्या फिर किसी
ने उनका दिल दुखाया है?
महादेव देसाई जी ने बताया नहीं बात कोई खास नहीं है। महात्माजी ने नये जमाने के लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिये अपना
ब्लाग
शुरू किया है। अभी तक यहां किसी ने उसका नोटिस नहीं लिया। न स्वागत किया न
ही उनके विचारों की तारीफ की। पहले तो इस बात से दुखी थे। एक पोस्ट इस दुख
पर भी लिखी तब भी किसी ने कोई टिप्पणी नहीं की। इसपर भी महात्मा जी को कोई
तकलीफ नहीं हुई। उनको तो इस बात का अभ्यास है कि उनके कट्टर अनुयायी होने
का ढोल पीटने वाले तक उनकी बात पर आचरण न करें।
अच्छा ! मैंने भी कुछ सुना है ब्लाग के बारे में। नारद से
पूछा भी था
कि कैसे लिखते हैं ब्लाग लेकिन नारद ने आज तक बताया नहीं। पूरा कोकाकोला
का फार्मूला बना रखा है ब्लाग लेखन विद्या को। वैसे महात्मा जी ने लिखा
क्या था? कोई कविता-सविता लिखी थी क्या? हमारे तमाम भक्त अक्सर शिकायत करते
हैं कि फलाने की कविता पढ़कर सरदर्द हो गया। ढिमाके ने कुछ ऐसा
लिखा कि समझ में ही नहीं आया। इसी तरह की कोई चीज तो नहीं लिखी उन्होंने?
नहीं साहब, महात्माजी ये सब खुराफात नहीं करते। आदतें बदली नहीं हैं अभी
भी। हम लोग बहुत समझाते हैं महात्माजी अब तो अपनी आदतें बदल डालिये। बकरी
बेंच के दीजिये यहां कामधेनु है ही जो मुफ्त में सबकी जरूरतों को पूरा
करती है। लेकिन वो कहते हैं महादेव तुम भ्रम में हो कि कामधेनु मुफ्त में
सबकी जरूरतें पूरा करती है। ये बेचारी भी तो किसी की हुक्म की गुलाम है।
कामधेनु मुफ्त दूध के बदले तुमसे तुम्हारे श्रम करने की आदत ले लेती है। जब
तुम पूरी तरह इस पर आश्रित हो जाओगे तब तुम्हें यह , अपने आका के इशारे
पर,किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की तरह छोड़कर किसी दूसरी जगह चली जायेगी।
अच्छा तो आज क्या हुआ जिसके कारण महात्माजी ने मौनव्रत धारण
किया?विष्णुजी अब कुछ बोर तथा कुछ अधीर होने लगे थे। स्कीन पर साफ दिख रहा
था कि उनका मेकअप अब पुराना हो गया था तथा चेहरे पर पावडर के नीचे की
सिलवटें चुगली करने लगीं थीं।
आप हंसेगे सुनकर लेकिन यह सच है कि अब आज महात्माजी ने ब्लाग खोला तो
खुल ही नहीं रहा था। बड़ी मुश्किल से खुलता दिखा लेकिन बार-बार उसमें
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के बंद हो जा रहा है।इससे महात्माजी को लग रहा है कि कोई उनके काम को ४२०
का काम बताना चाहता है लेकिन हिंदी ठीक से जानने के कारण ४२० को ४०४ लिख
रहा है।
महात्मा जी दर्द दोहरा है । एक तो लोग उनके प्रयासों को धोखाधड़ी बताने
का प्रयास कर रहे हैं। दूसरे लोग हिंदी की गिनती भी ठीक से नहीं जानते
जिससे कि मुहावरे का सटीक प्रयोग नहीं हो पा रहा है। इसीलिये उन्होंने दुखी
होकर मौनव्रत धारण कर लिया।
विष्णुजी आगे कुछ पूछते तब तक सम्पर्क टूट गया। देश की आम जनता की तरह
तब तक सभा का ध्यान नये देवता किये घपले से हटकर नये चोंचले ,ब्लागिंग पर
लग गया था।विष्णुजी सफलतापूर्वक अपने जन भावना को अपने अनुकूल रुख देने में
सफल हुये थे। इसी कौशल के कारण वे युगों-युगों से सारे ब्रम्हांड के
पालनकर्ता बने हुये थे।
बहरहाल,ब्लागिंग के बारे में जानने के लिये वे एक बार फिर उस्सुक हुये
तथा इधर-उधर देखने पर जब नारदजी नहीं दिखे तो अर्दली से अकबरी अंदाज़ में
बोले- नारद को बुलाया जाय।माबदौलत नारद के गुफ्तगू करना चाहते हैं। उनको
यहां आने के लिये कहा जाये।
अर्दली कुछ देर तक इधर-उधर टहलकर वापस आया तथा फर्सी सलाम बजाता हुआ
बोला- जहांपनाह ,हजरज नारद अपने किसी डुप्लीकेट से हिसाब बराबर करने भारत
देश की ओर
जाते पाये गये हैं।
विष्णुजी ने कुछ देर सोचा कि अब क्या करें लेकिन चेहरे पर तमाम बल डालने
के बावजूद वे तय नहीं कर पाये कि क्या किया जाय। नारद के बिना उनकी हालत
बिना विभाग के मंत्री तथा बिना चमचे के नेता की तरह हो रही थी।
विष्णुजी ने नारदजी के मोबाइल पर एक बार फिर से सम्पर्क करने का प्रयास
किया। हर बार की तरह एक बार फिर उन्हें सुनाई- क्षमा करें जिनसे आप वार्ता
करना चाह रहे हैं उनसे फिलहाल सम्पर्क नहीं हो पा रहा है।विष्णुजी पिछले
आधे घंटे में सौ बार क्षमा कर चुके थे। उनके धैर्य का बांध तथा कृष्णावतार
के समय में जरासंध को निन्यानबे बार क्षमा रिकार्ड भंग हो चुका था। चुके
हुये धैर्य,नये रिकार्ड की ललक तथा नारदजी के सम्पर्क न हो पाने के
मिलेजुले गठबंधन ने उनको क्रोध के मंच पर विराजमान करा दिया ।
इसके बाद जो हुआ वह ऐतिहासिक था,धार्मिक था,सामाजिक था,आर्थिक भी कम नहीं था।
क्रोध के मंच पर विराजमान विष्णुजी ने गुस्से में नथुने फड़काते हुये मोबाइल जमीन पर पटक दिया।
जब वातानुकूलित आश्रमों में रहने वाले बाबाओं को यह घटना पता चली तो
उन्होंने बताया विष्णुजी ने जो चीज पटकी थी वह शेषनाग का फन था उसी से
सुनामी का तूफान आया। समाज में बढ़ते पाप से रुष्ट होकर भगवान ने यह
चेतावनी दी थी। सो हे नराधमों मायामोह त्याग कर प्रभुचरणों में मन लगाओ।
बाबाओं की घटना के सहारे मोबाइल पटकने की बात तक पहुंची मोबाइल कंपनियों
तक जब यह बात पहुंची तो पागलों की तरह विष्णु जी को इंटरव्यू के लिये
खोजने लगीं। हर कंपनी ने अपने सबसे होनहार ,बुद्धिमान,आकर्षक ,युवा को इसके
लिये लगा दिया। पागलपन की दौड़ में जब पता चला कि विष्णुजी मादा नहीं
पुरुष हैं तो साथ में आकर्षक युवा के साथ खूबसूरत युवती को भी लगा दिया।
कुछ समझदार लोगों ने बताया भी कि जब युवती जा ही रही है तो युवा की क्या
जरूरत ? क्या फायदा समय,पैसा बरबाद करने का? लेकिन उन्हें यह कहकर चुप करा
दिया गया -जाने दो दोनों को।पता नहीं कब किसकी क्या जरूरत पड़ जाय।
हर कंपनी का एकमात्र उद्देश्य विष्णुजी से यह कहलाना था कि जो मोबाइल
गुस्से में उन्होंने फेंका वह प्रतिद्वंदी कंपनी का था तथा जब से इस कंपनी
का मोबाइल लिया है तबसे उनको कोई तकलीफ नहीं हुई है।
जब किसी भी कंपनी का प्रतिनिधि विष्णुजी से मिल नहीं पाया तो कारण खोजने
पर पता चला कि वो तो स्वर्ग में रहते हैं। यदाकदा पृथ्वी पर आते जाते हैं।
वो भी न जाने किस भेष में।स्वर्ग में तो केवल आत्मा जा सकती है। सशरीर
संवाददाता नहीं जा सकता है।
तबसे हर मंदिर में सारी मोबाइल कंपनियां निगाह रखे हुये हैं। कुछ ने
पुजारियों की चोटियों पर अपने एंटीना टावर लगा दिये हैं।इससे एक पंथ दो काज
हो रहा है। विष्णुजी पर निगाह भी रखी जा रही है तथा ग्राहकों को सेवा भी
मिल रही है। व्यर्थ की टावरों की तोड़फोड़ से भी बचाव हो रहा हैं।
सुप्रीमकोर्ट का स्टे है न देवस्थानों पर तोड़फोड़ के खिलाफ।
स्वर्ग में केवल आत्मा जा सकती है यह जान लेने के बाद कुछ कंपनियों के
किसी भी कीमत परिणाम प्राप्त करने के विचार से ओतप्रोत अधिकारी गंभीरता
पूर्वक विचार कर रहे हैं कि किसी संवाददाता के शरीर से रूह निकाल कर
स्वर्गलोक भेजा जाये। रूह वहां जाकर विष्णुजी का इंटरव्यू लेकर उसकी आडियो
फाइल बनाकर भेज दे।
वे यह भी विचार बना रहे हैं कि अगर वह संवाददाता सकुशल किसी तरह वापस आ
गया तो उसे एकमुश्त कई प्रमोशन दे देंगे। अगर खुदा न खास्ता वह नहीं लौट
पाया तो उसकी जिंदगी भर की तनख्वाह का जितना गुना वो चाहेगा वह जिसे जायेगा
उसके खाते में डाल दिया जायेगा-उसकी आत्मा की स्वर्ग यात्रा शुरू होने के
तुरंत बाद।
इस बारे में समाचार पत्रों में आकर्षक विज्ञापन देने के लिये बेहतरीन
प्रबंध संस्थानों की ,विज्ञापन एजेंसियों की सेवायें भी लेने के बारे में
विचार लिया जा रहा है।
जब मैं यह बातें अपने कुछ दोस्तों को बता रहा था तो वे हम पर हंस रहे
थे- क्या बेवकूफों की तरह बातें करते हो ? ऐसा भी कहीं होता है? कौन कंपनी
भला करेगी ऐसी बेवकूफी की हरकतें!
हमारे दूसरे ज्ञानी दोस्तों ने मेरी बात तथ्यों के आधार पर खारिज कर दी।
उनका कहना है कि मेरा देवताओं के बारे में ज्ञान अधकचरा है। संहार का काम
तो शंकर जी का है।विष्णुजी तो पालनकर्ता हैं। वे कैसे सुनामी जैसा संहारक
काम कर सकते हैं!
इस ज्ञान के आलोक में तय हो गया मेरी बातें बेवकूफी की हैं। यह भी कि मेरी अकल घास चरने चली गयी है।
मुझे भी अपनी बातें बेवकूफी की लगतीं थीं तथा मैं भी अपने दोस्तों की हंसी में अपना ठहाका मिला लेता था।
ऐसा अक्सर होता था। हमारी बेवकूफियां हंसने का कारण बनी रहतीं थीं।
लेकिन पता नहीं क्यों अब दोस्तों ने मेरी बात पर हंसना बंद कर दिया है । वे अब मेरी बेवकूफी की बात पर चुप्पी साध लेते हैं।
मैंने जब कारण पता करना चाहा तो किसी ने बताया नहीं लेकिन मुझे लगता है कि वे समाचार पत्रों के
आवश्यकता है
वाले विज्ञापन एक दूसरे से छिपाकर पढ़ने लगे हैं।इन्ही विज्ञापनों में से
एक में ब्रह्मांड के किसी भी कोने में जाकर खबर जुटाने में सक्षम ,आकर्षक
संवाददाताओं की आवश्यकता का विज्ञापन छपा है।
इससे मेरा दिल बैठने लगता है।
पता नहीं आपको कैसा लगता है?
आप के रपटने के इंतजार में हम कई बार परेसान हो जाते हैं लेकिन जैसे ही आपका रपट आता है , सब कुछ
भूल जाते है . आप आपे लिख्हे पे निगाह दीजिये खुद वाह कर उठेंगे …….
हां यह जरूर कहे कि सुरेश भाई आपकी पोस्टों में जित्ती आग है कि अगर कहीं गैस खतम हो जाये तो आपकी पोस्टो नीचे रखकर उसकी आग में खाना पकाया जा सकता है.
बस भाईजी थोरा इंतजार की दूरी कम करिए.
प्रणाम.
विवेक सिंह की हालिया प्रविष्टी..जली तो जली पर सिकी भी खूब
मेरा पक्क से मुँ खोल देना अभी उचित नहीं ।
जो बात अलग पोस्ट बना कर डालते वह यहाँ लिख देते है. आजकल जब जब लिखने का सोचा कभी पोस्ट लिख नहीं पाए.
आपका स्नेह शुरूआत से ही बना रहा. आपने राष्ट्रवादी की पहचान स्थापित करने में जाने अनजाने सहयोग भी दिया. मन में सम्मान था तो, आपसे मिलने की बेहद इच्छा भी रही, मिले तो लगा बस गले लग जाए, चरण स्पर्श की इच्छा भी दबा गए. इन सब के लिए शायद कानपुर आना पड़ेगा….
आयोजको आजकल के किन्हीं मर्दों- वाक्य रचना दुरुस्त नहीं है
इस वार्तालाप मोबाइल किसका इस्तेमाल हुआ थी।-यह कैसा वाक्य ?
आयोजकों आयोजन स्थल पर एक टेलीफ़ोन की व्यवस्था रखनी -को छूट गया
मटिया दिये-फिर तो बहटिया लिख देते
सिधार्थ-नाम तो दुरुस्त कर ही लें
इस बार ब्रेक कुछ ज्यादा जल्दी लेके डाल दिए।
ललकार सुनायी दे रही है।
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..प्रयाग का पाठ वर्धा में काम आया… शुक्रिया।
मनोज कुमार की हालिया प्रविष्टी..देसिल बयना – 52 – चोर के अर्जन सब कोई खाए- चोर अकेला फांसी जाए !
बहुत अफ़सोस है कि इसमें सम्मिलित नहीं हो पाए…
रंजना. की हालिया प्रविष्टी..आन बसो हिय मेरे
shikha varshney की हालिया प्रविष्टी..पर्दा धूप पे
http://ajit09.blogspot.com/2010/10/blog-post_17.html
हम भी पढ़ रहे हैं टिप्पणियों समेत कथा. देर से प्रतीक्षा थी. फोटो वोटो तो तभी देख भाल लिए गए थे. अब इंतज़ार पूरा हुआ.
- लावण्या
आप तो बस इस का मजा लूटिये
बड़ी मुश्किल है …. 20.10.2010 को आई नैक्स्ट में प्रकाशित व्यंग्य
बीस दस बीस दस : यह तो लय है जी, लय की जय है जी : पहेली बूझें
शुभ रात्रि!
प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI की हालिया प्रविष्टी..आलोचना ≈ तारीफ
अफ़सोस होता है कि हम क्यों न पहुंच पाए।
जय कुमार झा जी की टिप्पणी बहुत सही लगी।
जरा इस तरह का आयोजन कर या करवाकर देखे फिर पता चलेगा की किसी के काम में खामियां निकालना कितना आसान होता है …
बढ़िया।
सतीश पंचम की हालिया प्रविष्टी..वर्धा के बाद अब एक और ब्लॉगर बैठकी का आयोजन हो रहा हैअब शिकायत न करें कि हमें आमंत्रण नहीं मिलाइस पोस्ट को ही आमंत्रण समझें सतीश पंचम
वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन के चित्रों में मौजूद सभी महानुभावों को मेरा प्रणाम।
शरद कोकास की हालिया प्रविष्टी..खून पीकर जीने वाली एक चिड़िया रेत पर खून की बूँदे चुग रही है
rishabha deo sharma की हालिया प्रविष्टी..रूसी साहित्यकार चेखव के १२ नाटकों के ६ भारतीय भाषाओं में अनुवाद हेतु कार्यशाला
Abhishek की हालिया प्रविष्टी..टाइम ट्रेवेल कराती एक किताब
Ram की हालिया प्रविष्टी..गांधी और मेरे पिता
अविनाश वाचस्पति जी से बात करके बहुत अच्छा लगा. हम आपके आभारी हो गए जो आपने उन्हें मेरे एस एम् एस के बारे में बताया.
मिश्र जी की बातों पर ध्यान दिया जाय. गिरिजेश जी की अनुपस्थिति में ‘वर्तन’ सुधार करने का भार उठाने के लिए उनका आभार!
इस बात से तो सहमत हूं कि पूरे आयोजन के दौरान श्री त्रिपाठी जी कहीं से भी आयोजक का आवरण ओढ़े नजर ही नईं आए। जब भी दिखे सहज, प्रफुल्लित ही दिखे। ऐसा आयोजन, वह भी इतने बड़े आयोजन का आयोजक तो पहली बार देखा अपन ने। जय कुमार झा जी सही कह रहे हैं। जाता हूं अब अगली किश्त पढ़ने
इनके बिना कथा
का संपूर्ण आनंद नहीं आता है
हिन्दी ब्लॉगिंग के एक सेमिनार में शामिल ब्लॉगरों के हथियारों की झलक
अविनाश वाचस्पति की हालिया प्रविष्टी..मेरे जन्मदिन को हंसीदिवस के रूप में मनायें – खूब खिलकर खिलखिलायें