Sunday, August 27, 2006

अमरीका सुविधायें देकर हड्डियों में समा जाता है

http://web.archive.org/web/20110926111523/http://hindini.com/fursatiya/archives/180

अमरीका सुविधायें देकर हड्डियों में समा जाता है

[अतुल ने प्रवासी जीवन के बारे में लिखी मेरी पोस्ट में डा.अंजना संधीर की कविता ,अमरीका सुविधायें देकर हड्डियों में समा जाता है, का जिक्र किया था। इस कविता का अनुवाद अनेक भाषाओं में हो चुका है। अनूप भार्गव जी ने वह कविता मुझे भेजी है। मैं यहाँ पर डा. अंजना संधीर की कविता पोस्ट कर रहा हूँ-डा. अंजना संधीर तथा अनूप भार्गव जी को धन्यवाद देते हुये।]
वे ऊँचे-ऊँचे खूबसूरत हाई-वे,
जिन पर चलती हैं कारें,
तेज रफ्तार से कतारबद्ध,
चलती कार में चाय पीते-पीते,
टेलीफोन करते,
दूर-दूर कारों में रोमांस करते,
अमरीका धीरे-धीरे सांसों में उतरने लगता है।
मूंगफली और पिस्ते का एक भाव,
पेट्रोल और शराब पानी के भाव,
इतना सस्ता लगता है,
सब्जियों से ज्यादा मांस
कि ईमान डोलने लगता है
मंहगी घास खाने से अच्छा है सस्ता मांस खाना
और धीरे-धीरे-
अमरीका स्वाद में बसने लगता है।
गरम पानी के शावर,
टेलीविजन की चैनलें,
सेक्स के मुक्त दृश्य,
किशोरावस्था से वीकेन्ड में गायब रहने की स्वतंत्रता,
डिस्को की मस्ती,
अपनी मनमानी का जीवन,
कहीं भी,कभी भी,किसी के भी साथ-
उठने-बैठने की आजादी
धीरे-धीरे हड्डियों में उतरने लगता है अमेरिका।
अमरीका जब सांसों में बसने लगा-
तो अच्छा लगा
क्योंकि सांसों को-
पंखों की उडा़न का अन्दाजा हुआ
जब स्वाद में बसने लगा अमरीका
तो सोचा -खाओ ,
इतना सस्ता कहाँ मिलेगा?
लेकिन हड्डियों बसने लगा अमरीका तो परेशान हूँ
बच्चे हाथ से निकल गये,
वतन छूट गया,
संस्कृति का मिश्रण हो गया,
जवानी बुढ़ा गई,
सुविधायें हड्डियों में समा गयीं-
अमरीका सुविधायें देकर हड्डियों में समा जाता है।
व्यक्ति वतन को भूल जाता है,
और सोचता रहता है,
मैं अपने वतन जाना चाहता हूँ,
मगर इन सुखों की गुलामी
मेरी हड्डियों में बस गयी है,
इसीलिये कहता हूँ- तुम नये हो
अमरीका जब सांसों में बसने लगे,
तुम उड़ने लगो,
तो सात समंदर पार -
अपनों के चेहरे याद रखना,
जब स्वाद में बसने लगे अमरीका-
तो अपने घर के खाने
और माँ की रसोई याद करना,
सुविधाओं में असुविधायें याद रखना
यहीं से जाग जाना,
संस्कृति की मशाल जगाये रखना,
अमरीका को हड्डियों में मत बसने देना
अमरीका सुविधायें देकर हड्डियों में जम जाता है।
डा.अंजना संधीर

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

15 responses to “अमरीका सुविधायें देकर हड्डियों में समा जाता है”

  1. kali
    thats why jod jod dukh raha hai, main sochun chickenguniya ho gaya hai, per nahi yeh to america hi hai jo jod-jod main baas gaya hai.
  2. निधि
    बहुत सुंदर और मर्मपूर्ण कविता। लेखिका को बधाई। आपको, अतुल जी को और अनूप भार्गव जी को यह रचना हम तक पहुँचाने के लिये हार्दिक धन्यवाद।
  3. समीर लाल
    अनूप द्वय एवं अतुल जी को रचना को यहां तक लाने और पढ़्वाने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद.
  4. Anoop Bhargava
    मुझे अंजना जी को जाननें का सौभाग्य रहा है । कोलम्बिआ यूनिवर्सिटी में पढाती हैं । अपनी कविताओं के साथ साथ वह खूबसूरत गज़ल सिर्फ़ लिखती ही नहीं , गाती भी हैं । मेरे पास उन की कुछ गज़लों की Audio Files हैं ।
    उन की एक गज़ल देखिये :
    होंठ चुप है निगाह बोले है
    आंख सब दिल के राज खोले है
    उसका दुश्मन जमाना हो ले है
    आजकल जो ज़बान खोले है
    आइना देख लीजिये साहब
    आइना साफ़ साफ़ बोले है
    मुझ को महसूस अब ये होता है
    मेरी सोचों में तू ही बोले है
    हम हों तुम हों कि बूटा बूटा हो
    मीर की ही ज़बान बोले है
    अब गुजरती नहीं गुजारते हैं
    ज़िन्दगी अब सफ़र में डोले है
    दिन गुजरता है रात होती है
    सुबह होती है शाम होले है ।
  5. जगदीश भाटिया
    दर्द और आनंद का अनूठा मिश्रण है कविता में, एक कविता में इतना कुछ कह दिया जितना पिछले दिनों इस विषय पर हिंदी चिट्ठों पर चली बहस में भी नहीं कहा गया था।
    सच्ची और बेबाक कविता।
  6. ई-स्वामी » जो सिर पर से निकल गई!
    [...] गुरुदेव के कृपा प्रसाद से कविता पढी – “अमरीका हड्डियों में समा जाता है” [...]
  7. SHUAIB
    बहुत सुंदर है – सबके साथ शेर करने के लिए धन्यवाद और बधाई
  8. सागर चन्द नाहर
    बहुत अच्छी कविता और लेख पर शायद इस कविता से सभी लोग सहमत ना हों, यह भी हो सकता है कि किसी को यह सारी बातें दकियानूसी लगे।
    ……………भाई किसने जबरदस्ती की है कि आप अमेरिका चले आओ
  9. अतुल
    अ..र..र..रे, हमे काहे का श्रेय गया भाई। साधुवाद है अनूप भाई साहब (फुरसतिया) और अनूप भाई साहब (भार्गव) को।
  10. Manoshi
    कविता पहले भी सुनी थी और अपने आप में बहुत सुंदर है कविता। सब्ज़ी से ज़्यादा माँस मिलना और यहाँ रह कर यहाँ के खाने के अभ्यस्त हो जाना, बच्चों का हाथ से निकल जाना (ऐसा हमेशा हर परिवार में नहीं होता), और जो भी बयान किया गया है इस कविता में जैसी गाडियों में दूर दूर तक काफ़ी हाथ में लिये आदि आदि यहाँ दिखता है हर जगह, बिल्कुल सही वर्णन है, मगर बस एक ही बात से नहीं सहमत हो पा रही हूँ कि “सुविधायें देकर हड्डियों में समा जाता है।” ये सच है कि सुविधायें बहुत ज़्यादा हैं बल्कि ये कहें कि हमें हमारे मेहनत और टैक्स देने का सही रिवार्ड दिया जाता है, सुविधाओं के रूप में। तो उसमें ग़लत क्या है? एक फ़ोन भर की देरी और सारा अटका काम मिनटों में हो जाना ( ९५% समय), अनुशासित ट्रैफ़िक, साफ़ सड़कें और गलियाँ, सबका काम एक हे निर्धारित समय पर होना आदि आदि, सच अमेरिका हड्डियों में उतर जाता है। मगर वतन छूटता नहीं, न मन से न ही तन से…
  11. Tarun
    कुछ दिनों से देख रहा हूँ मैं (जिस देश में रहते हैं वो देश) महान, मैं महान का गुणगान चल रहा है। मैं तो इतना ही कहूँगा –
    तुम्हें इंडिया से कब फुरसत, हम यू एस से कब खाली।
    चलो बस हो चुका कोसना, ना तुम खाली ना हम खाली।।
    जहाँ रहो वहाँ के होके रहो और मस्त रहो स्वर्ग ना भारत है ना ही अमेरिका वैसे ही नर्क ना भारत है ना ही अमेरिका इसलिये दोनो जगह के अपने अपने फायदे नुकसान हैं। अब ये रहने वाले को चुनना है कि उसकी शोपिंग लिस्ट में कौन कौन से फायदे और कौन कौन से नुकसान हैं।
  12. रजनीश मंगला
    आपकी हर बात सच्ची है लेकिन हर सच्ची बात इसमें नहीं है। विदेश में रहे बगैर हर बात समझना मुश्किल है। और इस तरह का प्रचार किसी के काम नहीं आ सकता, बल्कि दोनों ओर के लोगों का केवल मन ही बहला सकता है। वैसे भी यहां लिखी गई बातों का फ़ासला अब बहुत कम हो गया है और कम होता जाएगा। वैसे ये कविता अपनी मुफ़्त बंटने वाली इस छोटी सी पत्रिका में डाली है। आसा है कि आपको कोई आपत्ती नहीं होगी।
  13. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] गये रंगून 19. वो तो अपनी कहानी ले बैठा… 20. अमरीका सुविधायें देकर हड्डियों में स�…. 21. सीढियों के पास वाला कमरा 22. परदे के [...]
  14. rajeshri panchal
    अर्थपूर्ण कविता है,लेखिका को मेरी तरफ से हार्दिक धन्यवाद .
  15. चंदन कुमार मिश्र
    फिर भी अमेरिका के लिए हहुआए हुए हैं बहुत से लोग!
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..नीतीश कुमार के ब्लॉग से गायब कर दी गई मेरी टिप्पणी (हिन्दी दिवस आयोजन से लौटकर)My ComLuv Profile

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1 comment:

  1. कविता बहुत अच्छा हैं :)

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