Wednesday, August 30, 2006

मरना कोई हार नहीं होती- हरिशंकर परसाई

http://web.archive.org/web/20110101191812/http://hindini.com/fursatiya/archives/183

मरना कोई हार नहीं होती- हरिशंकर परसाई

[ परसाईजी ने जबसे लिखना शुरू किया तबसे ही मुक्तिबोध के उनसे संबंध रहे। ताजिन्दगी संबंध रहने तथा विचारों के नितन्तर आदान-प्रदान के बावजूद दोनों ने एक दूसरे के बारे में बहुत कम लिखा। मुक्तिबोध की मृत्यु के बाद परसाई जी ने उनके बारे में दो संस्मरण लिखे। इस संस्मरणों से मुक्तिबोध की सोच,मन:स्थिति का पता चलता है । परसाईजी ने मुक्तिबोध के तनावों का जिक्र करते हुये लिखा है-


मुक्तिबोध भयंकर तनाव में जीते थे। आर्थिक कष्ट उन्हें असीम थे। उन जैसे रचनाकार का तनाव साधारण से बहुत अधिक होगा भी। वे सन्त्रास में जीते थे। आजकल सन्त्रास का दावा बहुत किया जा रहा है। मगर मुक्तिबोध का एक-चौथाई तनाव भी कोई झेलता ,तो उनसे आधी उम्र में मर जाता।

मुक्तिबोध के निधन के बाद उनपर लिखते हुये परसाई जी ने लिखा-



बीमारी से लड़कर मुक्तिबोध निश्चित जीत गये थे। बीमारी ने उन्हें मार दिया ,पर तोड़ नहीं सकी। मुक्तिबोध का फौलादी व्यक्तित्व अंत तक वैसा ही रहा। जैसे जिंदगी में किसी से लाभ के लिये समझौता नहीं किया,वैसे मृत्यु से भी कोई समझौता करने को वे तैयार नहीं थे।
वे मरे। हारे नहीं। मरना कोई हार नहीं होती।

परसाईजी द्वारा मुक्तिबोध पर लिखे संस्मरणों में से एक यहाँ प्रस्तुत है।]
मुक्तिबोध
मुक्तिबोध
राजनाँदगाँव में तालाब के किनारे पुराने महल का दरवाजा है- नीचे बडे़ फाटक के आसपास कमरे हैं,दूसरी मंजिल पर एक बड़ा हाल और कमरे,तीसरी मंजिल पर कमरे और खुली छत। तीन तरफ से तालाब घेरता है। पुराने दरवाजे और खिड़कियाँ ,टूटे हुये झरोखे,कहीं खिसकती हुई ईंटे,उखड़े हुये प्लास्टर की दीवारें। तालाब और उसके आगे विशाल मैदान। शाम को जब ज्ञानरंजन और मैं तालाब की तरफ गये और वहाँ से धुँधलके में उस महल को देखा तो वह भयावह रहस्य में लिपटा वह नजर आया।
आजकल सन्त्रास का दावा बहुत किया जा रहा है। मगर मुक्तिबोध का एक-चौथाई तनाव भी कोई झेलता ,तो उनसे आधी उम्र में मर जाता।
दूसरी मंजिल के हाल के एक कोने में विकलांग मुक्तिबोध खाट पर लेटे हुये थे। लगा, जैसे इस आदमी का व्यक्तित्व किसी मजबूत किले-सा है। कई लडा़इयों के निशान उस पर हैं। गोलों के निशान हैं,पलस्तर उखड़ गया है,रंग समय ने धो दिया है-मगर जिसकी मजबूत दीवारें गहरी नींव में धंसी हैं और वह सिर ताने गरिमा के साथ खड़ा है।
मैंने मजाक की,”इसमें तो ब्रह्मराक्षस ही रह सकता है।” मुक्तिबोध की एक कविता है,’ब्रह्मराक्षस’। एक कहानी भी है जिसमें शापग्रस्त ब्रह्मराक्षस महल के खँडहर में रहता है।
मुक्तिबोध हँसे। बोले,”कुछ भी कहो पार्टनर, अपने को यह जगह पसन्द है।”
मुक्तिबोध में मैत्री-भाव बहुत था। बहुत सी बातें वे मित्र को संबोधित करते हुये कहते थे। कविता,निबन्ध,डायरी सबमें यह ‘मित्र’ प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से रहता है। एक खास अदा थी उनकी। वे मित्र को ‘पार्टनर’ कहते थे। कुछ इस तरह बातें करते थे-’कुछ भी कहो पार्टनर,तुम्हारा यह विनोद है ताकतवार…आपको चाहे बुरा लगे पार्टनर पर अमुक आदमी अपने को बिल्कुल नहीं पटता।’ ज्यादा प्यार में आते तो कहते-’आप देखना मालक, ये सब भागते नजर आयेंगे।’
मुक्तिबोध जैसे सपने में डूबते से बोले,” आप जहाँ बैठे हैं वहाँ किसी समय राजा की महफिल जमती थी। खूब रोशनी होती होगी,नाच- गाने होते होंगे। तब यहाँ ऐश्वर्य की चकाचौंध चकाचौंध थी। कुछ भी कहो ,पार्टनर,”फ्यूडलिज्म’(सामन्तवाद) में एक शान तो थी…बरसात में आइये यहाँ। इस कमरे में रात को सोइये। तालाब खूब जोर पर होता है,साँय-साँय हवा चलती है और पानी रात-भर दीवारों से टकराकर छप-छप करता है…कभी-कभी तो ऐसा लगता है ,जैसे कोई नर्तकी नाच रही हो,घुँधरुओं की आवाज सुनायी पड़ती है। पिछले साल शमशेर आये थे। हमलोग २-३ बजे तक सुनते रहे…और पार्टनर बहुत खूबसूरत उल्लू…मैं क्या बताऊँ आपसे,वैसा खूबसूरत उल्लू मैंने कभी देखा ही नहीं…कभी चमगादड़ें घुस आती हैं”…बडे़ उत्साह से वे उस वातावरण की बातें करते रहे। अपनी बीमारी का जरा अहसास नहीं।
मुक्तिबोध का फौलादी व्यक्तित्व अंत तक वैसा ही रहा। जैसे जिंदगी में किसी से लाभ के लिये समझौता नहीं किया,वैसे मृत्यु से भी कोई समझौता करने को वे तैयार नहीं थे।
वे मरे। हारे नहीं। मरना कोई हार नहीं होती।
दोपहर में हम लोग पहुँचे थे। हमें देखा ,तो मुक्तिबोध सदा की तरह-’अरे वाह,अरे वाह’,कहते हुये हँसते रहे। मगर दूसरे ही क्षण उनकी आँखों में आँसू छलक पड़े। डेढ़-एक महीने वे जबलपुर रहकर आये थे। एक्जिमा से परेशान थे। बहुत कमजोर। बोलते-बोलते दम फूल आता था। तब मुझे वे बहुत शंकाग्रस्त लगे थे। डरे हुये से। तब भी उनकी आँखों में आँसू छलछला आये थे,जब उन्होंने कहा था-पार्टनर अब बहुत टूट गये हम। ज्यादा गाड़ी खिंचेगी नहीं। दस,पाँच साल मिल जायें,तो कुछ काम जमकर कर लूँ।
आँसू कभी पहले उनकी आँखों में नहीं देखे थे। इस पर हम लोग विशेष चिंतित हुये। मित्रों ने बहुत जोर दिया कि आप यहाँ एक महीने रुककर चिकित्सा करा लें। पर उन्हें रुग्ण पिता को देखने नागपुर जाना था। सप्ताह भर में लौट आने का वादा करके चले गये। फिर वे लौटे नहीं।
क्षण भर में ही वे सँभल गये।पूछा,”आप लोगों का सामान कहाँ है?”
शरद कोठारी ने कहा,”मेरे घर रखा है।”
वे बोले,”वाह साहब,इसका क्या मतलब? आप लोग मेरे यहाँ आये हैं न?”
हम लोगों ने परस्पर देखा। शरद मुस्कराया।इस पर हम लोग मुक्तिबोध को कई बार चिढ़ाया करते थे-”गुरू ,कितने ही प्रगतिशील विचार हों आपके ,आदतों में ‘फ्यूडल’ हो। मेरा मेहमान है मेरे घर सोयेगा,मेरे घर खायेगा,कोई बिना चाय पिये नहीं जायेगा,होटल में मैं ही पैसे चुकाऊँगा,सारे शहर को घर में खाना खिलाऊँगा-यह सब क्या है?”
शरद को मुस्कराते देख वे भी मुस्करा दिये। बोले,”यह आपकी अनाधिकार चेष्टा है,बल्कि साजिश है।”
यह औपचारिक नहीं था। मुक्तिबोध की किसी भी भावना में औपचारिकता नहीं- न स्नेह में ,न घृणा में ,न क्रोध में। जिसे पसंद नहीं करते थे,उसकी तरफ घंटे भर बिना बोले आँखे फाड़े देखते रहते थे। वह घबडा़ जाता था।
बीमारी की बात की तो वैज्ञानिक तटस्थता से -जैसे हाथ-पाँव और यह सिर उनके नहीं किसी दूसरे के हों। बड़ी निर्वैयक्तिकता से,जैसे किसी के अंग-अंग काटकर बता रहे होंकि बीमारी कहाँ है,कैसे हुई,क्या परिणाम है?
“तो यह है साहब अपनी बीमारी”-बोलकर चुप हो गये।
फिर बोले -”चिट्ठियाँ आती हैं कि आप यहाँ आ जाइये या वहाँ चले जाइये। पर कैसे जाऊँ? जाना क्या मेरे वस की बात है?…हाँ एक भयंकर कविता हो गयी। सुनाऊँगा नहीं। मुझे खुद उससे डर लगता है। बेहद डार्क,ग्लूमी! भयंकर ‘इमेजें’ हैं। न जाने कैसी मन:स्थिति थी। कविता वात्स्यायनजी को भेज दी है।…पर अब लगता है ,वैसी बात है नहीं। जिंदगी में दम है। बहुत अच्छे लोग हैं,साथ।कितनी चिट्ठियाँ चिन्ता की आयी हैं। कितने लोग मुझे चंगा करना चाहते हैं! कितना स्नेह ,कितनी ममता है ,आसपास! पार्टनर…अब दूसरी कविता लिखी जायेगी।”
ज्ञानरंजन ने कहा,”पिछली भी सही थी और अब जो होगी,वह भी सही होगी।”
वे आश्वस्त से लगे। हम लोगों ने समझाया कि बीमारी मामूली है,भोपाल में एक-दो महीने में ठीक हो जायेगी।
उनकी आँखों में चमक आ गयी। बोले,”ठीक हो जायेगी न! मेरा भी यही ख्याल है। न हो पूरी ठीक ,कोई बात नहीं। मैं लँगड़ाकर चल लूँगा। पर लिखने-पढ़ने लायक हो जाऊँ।”
इतने में प्रमोद वर्मा आ गये। देखते ही मुक्तिबोध फिर हँस पड़े,”लो,अरे लो,ये भी आ गये! वाह ,बड़ा मजा है ,साहब!”
प्रमोद मैं और शान्ता भाभी तथा रमेश से सलाह करने दूसरे कमरे में चले गये।इधर मुक्तिबोध ज्ञानरंजन से नये प्रकाशनों पर बात करने लगे।
तय हुआ कि जल्दी भोपाल ले चलना चाहिये। मित्रों ने कुछ पैसा जहाँ-तहाँ से भेज दिया था। हम लोगों ने सलाह की कि इसे रमेश के नाम से बैंक में जमा कर देना चाहिये।
मुक्तिबोध की किसी भी भावना में औपचारिकता नहीं- न स्नेह में ,न घृणा में ,न क्रोध में। जिसे पसंद नहीं करते थे,उसकी तरफ घंटे भर बिना बोले आँखे फाड़े देखते रहते थे। वह घबडा़ जाता था।
मुक्तिबोध पर बड़ी विचित्र प्रतिक्रिया हुई इसकी। बिल्कुल बच्चे की तरह वे खीझ उठे। बोले,” क्यों? मेरे नाम से खाता क्यों नहीं खुलेगा? मेरे ही नाम से जमा होना चाहिये। मुझे क्या आप गैर जिम्मेदार समझते हैं?”
वे अड़ गये। खाता मेरे नाम से खुलेगा। थोड़ी देर बाद कहने लगे,”बात यह है पार्टनर कि मेरी इच्छा है ऐसी। ‘आई विश इट’। मैं नहीं जानता कि बैंक में खाता होना कैसा होता है। एक नया अनुभव होगा मेरे लिये। तर्कहीन लालसा है-पर है जरूर ,कि एक बार अपना भी एकाउन्ट हो जाये! जरा इस सन्तोष को भी देख लूँ।”
मुक्तिबोध हमेशा ही घोर आर्थिक संकट में रहते थे। अभावों का ओर-छोर नहीं था। कर्ज से लदे रहते थे। पैसा चाहते थे ,पर पैसे को ठुकराते भी थे। पैसे के लिये कभी कोई काम विश्वास के प्रतिकूल नहीं किया। अचरज होता है कि जिसे पैसे-पैसे की तंगी है,वह रुपयों का मोह बिना खटके कैसे छोड़ देता है। बैंक में खाता खुलेगा-यह कल्पना उनके लिये बड़ी उत्तेजक थी। गजानन माधव मुक्तिबोध का बैंक में खाता है-यह अहसास वे करना चाहते थे। वे शायद अधिक सुरक्षित अनुभव करते।
तभी एक ज्येष्ठ लेखक की चिट्ठी आयी कि आप घबड़ायें नहीं,हम कुछ लेखक जल्दी ही अखबार में आपकी सहायता के लिये अपील प्रकाशित करा रहे हैं।
चिट्ठी पढ़कर मुक्तिबोध बहुत उत्तेजित हो गये। झटके से तकिये पर थोड़े उठ गये और बोले ,”यह क्या है? दया के लिये अपील निकलेगी! अब,भीख माँगी जायेगी मेरे लिये! चन्दा होगा! नहीं-मैं कहता हूँ-यह नहीं होगा।मैं अभी मरा थोड़े ही हूँ। मित्रों की सहायता ले लूँगा-लेकिन मेरे लिये चन्दे की अपील! नहीं । यह नहीं होगा!”
हम लोगों ने उन्हें समझाया कि आपकी भावना से उन्हें परिचित कर दिया जायेगा और अपील नहीं निकलेगी।
उस शाम को रमेश ने एक चिट्ठी लाकर दी,जिसमें बीस रुपये के नोट थे। चिट्ठी उनके एक विद्यार्थी की थी। उसने लिखा था कि मैं एक जगह काम करके पढ़ाई का खर्च चला रहा हूँ । आपके प्रति मेरी श्रद्धा है। मैं देख रहा हूँ कि अर्थाभाव के कारण आप जैसे साहित्यकार की चिकित्सा ठीक से नहीं हो पा रही है। मैंने ये बीस रुपये बचाये हैं। इन्हें आप ग्रहण करें। ये मेरी ही कमाई के हैं,इसलिये आप इन्हें लेने में संकोच न करें। स्वयं आपको रुपये देने का साहस मुझमें नहीं है,इसलिये इस तरह पहुँचा रहा हूँ।
चिट्ठी और रुपये हाथ में लिये वे बड़ी देर तक खिड़की के बाहर देखते रहे। उनकी आँखें भर आयीं। बोले,”यह लड़का गरीब है। उससे कैसे पैसे ले लूँ।”
वहाँ एक अध्यापक बैठे थे। उन्होंने कहा,”लड़का भावुक है। वापस कर देंगे , तो उसे चोट पहुँचेगी। ” मुक्तिबोध बहुत द्रवित हो गये इस स्नेह से। बड़ी देर तक गुमसुम बैठे रहे।
भोपाल जाने की तैयारी होने लगी। उनका मित्र -भाव फिरजाग उठा। मुझसे कहने लगे,”पार्टनर,मैं आपसे एक बात साफ कहना चाहता हूँ। बुरा मत मानना। देखिये, आपकी जीविका लिखने से चलती है। आप अब भोपाल मेरे साथ चलेंगे। वहाँ रहेंगे। आप लिख नहीं पायेंगे, तो आपको आर्थिक कष्ट होगा। मैं कहता हूँ कि आप मेरे पैसे को अपना पैसा समझकर उपयोग में लाइए।”
मुक्तिबोध बहुत गम्भीर थे। हम लोग एक-दूसरे को देख रहे थे।
वे मेरी तरफ जवाब के लिये आँखें उठाये थे और हम लोग हंसी रोके थे।
तभी मैंने कहा,”आपके पैसे को मैं अपना पैसा समझने को तैयार हूँ। पर पैसा है कहाँ?” प्रमोद जोर से हँस दिया। मुक्तिबोध भी हँस पड़े। फिर एकदम गम्भीर हो गये। बोले,” हाँ ,यही तो मुश्किल है,यही तो गड़बड़ है।”
जो थोडे़ से पैसे उनके हाथ में आ गये थे,वे कुलबुला रहे थे। उन्हें कितने ही कर्तव्य याद आ रहे थे। कोई मित्र कष्ट में है,किसी की पत्नी बीमार है,किसी के बच्चों के लिये कपड़े बनवान हैं। उस अवस्था में जब वे खुद अपंग हो गये थे और अर्थाभाव से पीड़ित थे,वे दूसरों पर इन पैसों को खर्च कर देना चाहते थे। आगे भोपाल में तो इस बात पर बाकायदा युद्ध हुआ और बड़ी मुश्किल से हम उन्हें समझा सके कि रोगी का किसी के प्रति कोई कर्तव्य नहीं होता,सबके कर्तव्य उसके प्रति होते हैं।
और उस रात हम लोग गाड़ी पर चढ़े ,तो साथ में रिमों कागज था। मुक्तिबोध ने हठ करके पूरी कवितायेँ,अधूरी कवितायें, तैयार पाण्डुलिपियाँ सब लदवा लीं। बोले, “यह सब मेरे साथ जायेगा। एकाध हफ्ते बाद मैं कुछ काम करने लायक हो जाऊँगा ,तो कवितायें पूरी करूँगा, नयी लिखूँगा और पाण्डुलिपियाँ दुरस्त करूँगा। अपने से अस्पताल में बेकार पडा़ नहीं रहा जायेगा,पार्टनर! और हाँ…,वह पासबुक रख ली है न?”
पर उन कागजों पर मुक्तिबोध का न फिर हाथ चल सका और न वे एक चेक काट सके।
जिंदगी बिना कविता संग्रह देख और बिना चेक काटे गुजर गयी।
-हरिशंकर परसाई

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

14 responses to “मरना कोई हार नहीं होती- हरिशंकर परसाई”

  1. समीर लाल
    बहुत मार्मिक है, पढ़्ते पढ़्ते खो गया. साधुवाद आपको इसे यहाँ तक लाने के लिये.
  2. eswami
    साहित्य को समृद्ध करने वाले स्वयं कितने अभावों में जिए जान कर दु:ख होता है!
  3. भारत भूषण तिवारी
    प्रगतिशील हिन्दी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर का स्वयं के जीवन-काल में एक भी काव्य-संग्रह प्रकाशित न हो पाना विडम्बना ही है.
    संस्मरण उपलब्ध कराने हेतु धन्यवाद.
  4. सागर चन्द नाहर
    बहुत मार्मिक लेख; आपका यह पहला लेख है जिसे एक ही बार में पूरा और तीन बा पूरा पढ़ा। मुक्तिबोध जी के स्वाभिमानी स्वभाव के बारे में बताने के लिये धन्यवाद।
    हम अक्सर साहित्यकारों के बारे में पढ़ते हैं तो मन में एक सवाल उठता है कि क्या उन दिनों सारे साहित्यकारों, कवियों और लेखकों की आर्थिक स्थिती इसी तरह की हुआ करती थी?
  5. अनूप भार्गव
    लेख बहुत सुन्दर लगा । पता नहीं ‘यहां की व्यवस्था ही ऐसी है कि ‘पश्चिम में व्यवसायिक सफ़लता के लिये विचारों की इमानदारी से समझौता ज़रूरी नही है” ।
    कई बार प्रतिभा न हुए भी व्यवसायिक सफ़लता मिल सकती है (Better Marketing) लेकिन मुक्तिबोध या निराला जैसी प्रतिभा हो तो हालात अपनें आप बेहतर हो जाते हैं ।
  6. ई-छाया
    हममें से कितने लोग हिंदी साहित्यिक पत्रिकायें खरीद कर पढते हैं? कितने हिंदी उपन्यास पढते हैं? कितने हिंदी अखबार पढते हैं? क्या कारण है कि गत वर्षों में एक के बाद एक करके सारी नामी गिरामी हिंदी पत्रिकायें बंद होती चली गई? अगर इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढे जा सकें तो शायद आप जान सकें कि क्यों भूत में बहुत से विख्यात लेखक बेहद गरीबी का जीवन जीते रहे हैं।
  7. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह
    मुक्ति बोध की एक रचना की कुछ पक्तिंयां जो मुझे अच्‍छी लगती है
    ऐसा मत कह मेरे कवि, इस क्षण संवेदन से हो आतुर
    जीवन चिंतन में निर्णय पर अकस्मात मत आ, ओ निर्मल !
    इस वीभत्स प्रसंग में रहो तुम अत्यंत स्वतंत्र निराकुल
    भ्रष्ट ना होने दो युग-युग की सतत साधना महाआराधना
    इस क्षण-भर के दुख-भार से, रहो अविचिलित, रहो अचंचल
    अंतरदीपक के प्रकाश में विणत-प्रणत आत्मस्य रहो तुम
    जीवन के इस गहन अटल के लिये मृत्यु का अर्थ कहो तुम ।
    फुरसजिया जी आपके द्वारा परसाई सीरीज बहुत ही अच्‍छी है
  8. राजीव
    परसाई जी द्वारा मुक्तिबोध जी का अति मर्मस्पर्शी संस्मरण। अनूप जी, धन्यवाद।
  9. निधि
    बहुत मर्मस्पर्शी संस्मरण। कुछेक दिन पहले श्री प्रेमचंद के बारे में पढ़ रही थी। वे भी इसी प्रकार अर्थाभाव से गुज़रे थे। सोच के बहुत दु:ख होता है कि जिन अमर लेखकों ने साहित्य को सब कुछ समर्पित कर दिया उन्हें हमारा समाज कुछ नहीं दे पाया।
  10. Rakesh
    Kshama Karen Fursatiya Ji, Hindi main type karne ka anubhav nahi hai is liye roman lipi ka sahara le raha hoon.
    Bahut hi marmik sansamran hai, sidha dil ko chhooti hai. Kabhi samay mila to main bhi hindi main likhoonga.
    Aasha hai aap aise hi lekh likhte rahenge.
    Shukriya,
    Rakesh
  11. Retrospection « Bavra Mann
    [...] The other day, I was reading one post from Fursatiya, the post actually contains a memorabilia of Harishankar Parsai. Not sure how many of us know his name now, but he was a very famous author of hindi satire. All I remember about his literature is one story called “Bhed Aur Bhediye”, a classic sarcasm on politics in general and the other piece of literature which I have found closest to it both in style and essence is George Orwell’s Animal Farm. [...]
  12. फुरसतिया » कल जो हमने बातें की थीं
    [...] [परसाई जी के अपने समकालीनों के बारे में लिखे संस्मरणों में साथियों की रुचि देखकर आज उनका एक और संस्मरण पेश कर रहा हूं जो उन्होंने अपने समकालीन कवि-मित्र श्रीकांत वर्मा के बारे में लिखा था। ] श्रीकांत वर्मा के विषय में लिखना मेरे लिए बहुत कठिन है। इसी तरह मुक्तिबोध जी की म्रत्यु के बाद तब लिखना कठिन था। हमारे संबंध शुरू तो साहित्य के बहाने हुए थे, पर आगे चलकर ये संबंध वैयक्तिक मित्रता के हो गए। श्रीकांत और मैं मुक्तिबोध के बहुत निकट थे और हम दोनो ने उनसे बहुत सीखा था। पर संबंध विशिष्ट थे। हम कभी वह नहीं करते थे जिसे ‘शाप टाकिंग’ (दुकानदारी की बात) कहते हैं। जब भी मैं श्रीकांत या मुक्तिबोध के साथ बैठता या हम तीनों साथ होते, दुनिया-भर की बाते होतीं, पर साहित्य की सबसे कम। भोपाल में एक पूरी रात हम लोंगो ने चाय पी-पीकर सड़क चलते हुए बातें करते गुजार दी। मुक्तिबोध ने लिखा भी है- कल जो हमने बातें की थी बात बात में रातें की थी [...]
  13. परसाई- विषवमन धर्मी रचनाकार (भाग 1)
    [...] मरना कोई हार नहीं होती- हरिशंकर परसाई [...]
  14. हरिशंकर परसाई- विषवमन धर्मी रचनाकार (भाग 2)
    [...] मरना कोई हार नहीं होती- हरिशंकर परसाई [...]

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