Wednesday, August 31, 2016

व्यंग्य के बहाने -१


व्यंग्य लेखन के बारे में अक्सर छुटपुट चर्चायें होती रहती हैं। लोग अपने अनुभव के हिसाब से बयान जारी करते रहते हैं। शिकवा, शिकायतें, तारीफ़, शाबासी भी चलती ही रहती है। कभी-कभी लम्बी चर्चा भी होती रहती है। कुछ बातें जो अक्सर सुनने में आती रहती हैं:
१. व्यंग्य संक्रमण के दौर से गुजर रहा है।
२. व्यंग्य में मठाधीशों का कब्जा है।
३. नये-नये लोग लिखने वाले आते जा रहे हैं।
४. नये लोगों को लिखना नहीं आता, उनको जबर्दस्ती उछाला जाता है।
५.पुराने लोग नये लोगों को तवज्जो नहीं देते।
६. नये लोग पुरानों की इज्जत नहीं करते।

इसी तरह की और भी बातें उछलती रहती हैं। समय-समय पर। खासकर किसी इनाम की घोषणा के समय। जिसको इनाम मिलता है, वह बेचारा टाइप हो जाता है। सामने तारीफ़ होती है, पीछे से तारीफ़ को संतुलित करने के लिये जबर खिल्ली उड़ाई जाती कि इसको भी इनाम मिल गया, इसको तो लिखना भी नहीं आता, अब तो भगवान ही मालिक है व्यंग्य का। कुछ नाम ऐसे भी हैं जिनको कोई भी पुरस्कार मिलता है तो कहा जाता है इनाम सम्मानित हुआ है इनको सम्मानित करने से। वह बात अलग है कि उनके  भी किस्से चलते हैं कि कैसे इनाम जुगाड़ा गया, क्या समझौते हुये। लेकिन इनाम की छोडिये- इनाम तो हमेशा छंटे हुये लोगों को मिलता है।

सबसे पहले बात मठाधीशी की। आज की तारीख में छपने, छपाने, पाठकों तक पहुंचने की जैसी सुविधा है उसके चलते मठाधीशी जैसी स्थिति कत्तई सम्भव नहीं है। अगर किसी के पास लिखने का हुनर है तो उसको छापने के अनगिनत मंच हैं। अगर कोई अच्छा लिखता है तो वह किसी ने किसी तरीके से देर-सबेर लोगों तक पहुंचता ही है। कोई भी खलीफ़ा किसी को अपने पाठकों तक पहुंचने से रोक नहीं सकता। किसी की मठाधीशी नहीं चल सकती आज के समय में किसी भी विधा में। लोग अपने-अपने ग्रुप बनाकर अपने पसंदीदा की तारीफ़ करें, अपने पसंदीदा को देवता बनाकर पूजें वह बात अलग है। संविधान भी अनुमति देता है अपने हिसाब से पूजा पाठ के लिये।
-आगे भी लिखा जाये क्या ? 

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